कश्मीर सरकार को लेकर मोदी और भाजपा पर ताने कसने की जरूरत नहीं

संपादकीय
1 मार्च 2015
जम्मू-कश्मीर में अभी-अभी वहां की एक क्षेत्रीय पार्टी पीडीपी, और देश की आज की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा की गठबंधन सरकार बनी है। पीडीपी के मुख्यमंत्री और भाजपा के उपमुख्यमंत्री ने शपथ ली है। और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस मौके पर वहां पहुंचे, और उनकी तस्वीर दो ऐसे झंडों के सामने बैठे हुए आई, जो कि भारत और जम्मू-कश्मीर के थे। लोगों ने इसे देखकर याद किया कि भाजपा की पिछली पार्टी जनसंघ के संस्थापक में से एक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर के अलग संविधान और अलग निशान के खिलाफ आंदोलन चलाते हुए वहीं पर सरकारी इलाज के दौरान अपनी जान दी थी। कुछ लोगों को यह भी लग रहा है कि यह गठबंधन सरकार जनसंघ-भाजपा के तमाम नीति-सिद्धांतों के खिलाफ बनी है, और कई लोगों को मोदी का वह चुनावी भाषण याद आ रहा है जिसमें उन्होंने कश्मीर में बारी-बारी से चले आ रहे दो कुनबों के राज को खारिज करने की बात बार-बार कही थी। कश्मीर की दूसरी बड़ी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस के भूतपूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कल ही इस मुद्दे पर ट्वीट किया है कि अब जम्मू-कश्मीर की सरकार नागपुर (संघ मुख्यालय) से चलेगी। 
यह बात सही है कि नरेन्द्र मोदी से लेकर भाजपा तक, और आरएसएस से लेकर दूसरे हिन्दूवादियों तक के अब तक के कहे हुए के खिलाफ यह सरकार बन रही है। लेकिन लोकतंत्र में कई ऐसे मौके आते हैं जब कोई सम्पूर्ण-विकल्प मौजूद नहीं रहता, मुमकिन भी नहीं रहता। हमने पिछले ही बरस दिल्ली में एक बरस तक बिना किसी सरकार के एक त्रिशंकु विधानसभा देखी और उसके आखिर में दुबारा चुनाव करवाने पड़े। ऐसी नौबत देश में और भी कुछ जगहों पर आई, और कश्मीर में भी आज तकरीबन पूरा जम्मू भाजपा के साथ गया है, और पूरा मुस्लिम बहुल कश्मीर का हिस्सा पीडीपी के साथ गया है। भाजपा को वहां दर्जनों सीटें हासिल हुई हैं, और पीडीपी सबसे बड़ी पार्टी है। ऐसे में नेशनल कांफ्रेंस को तस्वीर में जोड़ें तो एक ऐसा त्रिकोण बनता है, जिसके दो कोने मिलकर या तो सरकार बनाएं, या फिर राज्य दुबारा चुनाव की तरफ जाए, और उसके बाद भी यह त्रिकोण खत्म हो ऐसी कोई गारंटी तो है नहीं। 
इसलिए हमारा यह मानना है कि लोकतंत्र में लोकतंत्र किसी भी एक या कई विचारधाराओं के ऊपर होता है। भारत की संसदीय व्यवस्था में बहुत से ऐसे मौके आए हैं जब वामपंथी दल भी आपातकाल के खिलाफ जनसंघ के साथ मिलकर आंदोलन में शामिल हुए, जब यूपीए-1 में वामपंथियों ने बाहर से साथ दिया, और यूपीए-2 में विरोध किया। उत्तरप्रदेश की राजनीति में अलग-अलग कई पार्टियां मायावती के साथ आईं और गईं। आज उमर अब्दुल्ला इसे एक अनैतिक गठबंधन बता रहे हैं। लेकिन लोगों को याद होगा कि अपने पिता के साथ वे एनडीए गठबंधन में भागीदार थे, लेकिन बाद में बाप-बेटे यूपीए का हिस्सा भी बने। रामविलास पासवान के बारे में कहा जाता है कि वे हर बार जीतने वाली पार्टी के साथ चले जाते हैं। 
भाजपा आज जिन मुद्दों पर अपनी आक्रामकता को किनारे रखकर एक अलग विचारधारा की पार्टी के साथ मिलकर कश्मीर सरकार में शामिल हुई है, उसमें भी हमें बहुत विरोधाभास नहीं दिखता। दोनों पार्टियों ने मिलकर एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया है जो कि अब सामने आ जाएगा, और असहमति के मुद्दों को अलग रखकर जनहित में, लोकतंत्र के हित में एक साझा सरकार चलाना कोई बुरी बात नहीं है। और अगर ऐसा होते हुए एक तरफ पीडीपी अपनी क्षेत्रीय आक्रामकता की धार को कुछ कम करती है, और दूसरी तरफ भाजपा कश्मीर की एक ऐतिहासिक स्वायत्तता के खिलाफ अपनी मांग किनारे रखती है, तो यह देश की राजनीति में एक सकारात्मक बदलाव भी होगा। यह तो सबके सामने है ही कि अयोध्या में मंदिर बनाने के खिलाफ रहते आए नीतीश कुमार जैसे लोग एनडीए का हिस्सा एक दशक से अधिक तक बने रहे, क्योंकि एनडीए ने भाजपा का एक खालिस मुद्दा अलग रखा था, और साझा कार्यक्रम पर बाकी पार्टियों के साथ भाजपा भी उसके भीतर चलती रही। आज कश्मीर में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जरूरतों को देखते हुए एक निर्वाचित लोकतांत्रिक और स्थिर सरकार जरूरी है। इस सरकार का नाकामयाब हो जाना कोई बड़ी बात नहीं रहेगी, क्योंकि चुनाव के नतीजे अपने आपमें किसी कामयाब गठबंधन की संभावना लेकर नहीं आए थे। लेकिन अगर यह सरकार कामयाब होती है, तो परस्पर विरोधी विचारधारा के लोगों का भी जनमत के मुताबिक मिलकर काम करना कामयाब होगा, और यह मिसाल देश भर में जगह-जगह काम भी आ सकती है। इसमें भाजपा के नीति-सिद्धांतों में किसी विरोधाभास को देखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भाजपा की आंतरिक जरूरत के मुकाबले देश के लोकतंत्र की जरूरत अधिक अहमियत रखती है। इसलिए हम इसे कोई अनैतिक सरकार नहीं मानते, और हम जनमत का सम्मान करने के लिए, दुबारा चुनाव से बचने के लिए इसे एक सही भागीदारी मानते हैं। इन दोनों के साथ रहने से, साथ उठने-बैठने से, और परस्पर तालमेल बढऩे से देश में बाकी जगहों पर भी भाजपा और मुस्लिम-पार्टियों के बीच फासला कम हो सकता है।

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