आप में इतनी जल्दी तू-तड़ाक!

5 मार्च 2015
संपादकीय
आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल जिस धमाके के साथ एक नया इतिहास रचते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री बने, उसके बाद पिछले दो-चार दिनों में इस पार्टी में जिस तरह के मतभेद की खबरें सामने आईं, जितने बयान आए, और जिस तरह इस छोटी सी पार्टी के दो शुरुआती पायों को कल अलग किया गया, उससे देश में लोकतंत्र की बेहतरी की उम्मीद करने वाले लोगों को बड़ी निराशा हुई है। कांग्रेस और भाजपा जैसी दो स्थापित पार्टियों के दबदबे के मुकाबले जिस तरह दिल्ली में झाड़ू चला था, उससे लोगों को लगता था कि बाकी देश में भी जगह-जगह यह पार्टी अपनी संभावनाएं ढूंढ पाएगी और लोग इस पार्टी में अपनी हसरतों की संभावनाएं तो ढूंढ ही रहे थे। लेकिन इतनी जल्दी इसके भीतर इतने गंभीर टकराव सड़क पर आ जाएंगे, यह शायद महीने भर पहले किसी ने सोचा नहीं था। हमने खुद दिल्ली के चुनावी नतीजों के बाद इस पार्टी में देश की एक नई संभावना की शुरुआत देखी थी, और हमारी उम्मीद पर भी पानी फिरा है।
दरअसल जिस तरह अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की पैदाइश हुई थी, और जिस तरह इस पार्टी की कामयाबी एक व्यक्तिवादी आंदोलन और चुनाव प्रचार पर टिकी हुई थी, उसके चलते ऐसा एक खतरा तो बना हुआ था, लेकिन वह खतरा इतनी जल्दी आने का किसी को सूझ नहीं रहा था। दुनिया का इतिहास बताता है कि एक व्यक्ति पर चलने वाले आंदोलन आगे-पीछे उस व्यक्ति की सोच, जिद, और सनक के कैदी हो जाते हैं। भारत की आजादी की लड़ाई में गांधी का कमोबेश ऐसा ही हाल था। लेकिन वे जिस तरह पारदर्शी और ईमानदार थे, लाग-लपेट से परे थे, कुनबे के मोह से परे थे, और जिस तरह की लड़ाई का हौसला उनमें था, उन सबके चलते वे आजादी के आंदोलन से लेकर कांग्रेस पार्टी और नेहरू सरकार तक एक जनकल्याणकारी-तानाशाह की तरह चलते रहे। उनके बाद देश में समय-समय पर बहुत से छोटे-बड़े नेता ऐसे आए जिन्होंने राजनीति या सामाजिक दायरे में एक व्यक्ति-केन्द्रित संघर्ष खड़ा किया, उनमें से कुछ लोग सत्ता से परे रहे, कुछ लोग आंदोलन का मकसद पूरा होते ही आंदोलन से परे भी हो गए। लेकिन राजनीति परे होने की चीज नहीं होती है। राजनीति सरकार तक जाती ही है, और सरकार की भलाई या बुराई से प्रभावित होती ही है।
लेकिन आम आदमी पार्टी के साथ दिक्कत यह रही कि वह अपनी सरकार की गलतियों या गलत कामों के चलते हुए मतभेद और आपसी फूट का शिकार नहीं हुई, वह पार्टी के भीतर ही व्यक्तिवाद से उपजे टकराव का शिकार दिख रही है। अरविन्द केजरीवाल की जुबान जरूरत से कुछ अधिक नर्म है, उनके शब्द और विशेषण अपने आपको जरूरत से अधिक छोटा और तुच्छ साबित करते हैं। उनके ताजा संगठन-फैसलों से अब यह लगता है कि क्या उनकी सादगी एक सायास ओढ़ी हुई छद्म-सादगी है, और उनके भीतर भी वही एक ऐसा महत्वाकांक्षी तानाशाह है जो कि जरा सी भी असहमति को बर्दाश्त नहीं कर सकता? हम अभी अपने विश्लेषण को तात्कालिक और अस्थायी रख रहे हैं, क्योंकि किसी पार्टी की दो दिन के मामलों से उसके बारे में अतिसरलीकरण करके अपने निष्कर्ष नहीं निकालने चाहिए। लेकिन आज लोगों के मन में एक सवाल यह उठ रहा है कि क्या जिस तरह कांग्रेस, भाजपा, तृणमूल कांग्रेस, अन्नाद्रमुक, द्रमुक, बसपा, लालू की पार्टी, मुलायम की पार्टी, शिवसेना, एक व्यक्ति या एक कुनबे की मनमर्जी से चलने वाली पार्टियां हो गई हैं, या लंबे समय से बनी हुई हैं, वैसा ही हश्र आम आदमी पार्टी का इतनी रफ्तार से होना था? और लोगों के मन में यह सवाल भी उठता है कि क्या आम आदमी पार्टी की कामयाबी एक आदमी के कंधों पर चढ़कर आई थी, और उन्हीं कंधों पर टिके हुए सिर का एकाधिकार पार्टी पर रहेगा? योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे लोग बहुत ही कम राजनीतिक दलों को मिल सकते हैं। और ऐसे दो लोगों का अपने पेशे से परे राजनीति में आने, और इस तरह हाशिए पर जाने को देखना तकलीफदेह भी है। आगे-आगे देखें होता है क्या।

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