2 मार्च 2015
संपादकीय
भारत की राजनीति में चारों तरफ फैले हुए फेरबदल कुछ अधिक रफ्तार से हो रहे हैं, और इनके पीछे जो दो बातें दिखती हैं, उनमें से एक है कांगे्रस का पैदा किया हुआ एक विशाल शून्य, जिसमें आंधी की तरह मोदी का आना और समाना हुआ। और इस आंधी की वजह से बाकी पार्टियों और कई प्रदेशों में ऐसे फेरबदल हुए, जिनमें से कई उम्मीदें लोगों ने की नहीं थीं।
अब जैसे बिहार में लालू और नीतीश का साथ आना, यह एक असंभव सी लगती बात संभव इसलिए हुई क्योंकि मोदी के सामने इन दोनों की हैसियत जमीन पर बिछे हुए साए जितनी रह गई थी, और इन दोनों का गठबंधन दो सायों के हाथ मिलाने सरीखा रहा। इसके साथ-साथ उत्तरप्रदेश और बिहार में दो परस्पर साथी और असहमत भी, लालू और मुलायम समधी बनकर जिस तरह उत्तरभारत की पिछड़े वर्ग की राजनीति में एक मिली-जुली ताकत बनने की कोशिश कर रहे हैं, उसने भी तस्वीर एकदम बदल दी है। अब अगर कांगे्रस को देखें, तो उसके तकरीबन खंडहर सरीखे रह गए घर के भीतर आज यह भी समझ नहीं पड़ रहा है कि कल इस पार्टी का मुखिया किसे रहना है, यह तो दूर की बात है कि किसके मुखिया रहने पर क्या होगा। इस पार्टी को न अपनी ऐतिहासिक चूक समझने की समझ दिख रही, न इसको आज क्या करना है यह सूझ रहा, और न ही कल किसकी अगुवाई में क्या भला या बुरा होगा, यह समझ पड़ रहा। ऐसे राजनीतिक शून्य के चलते मोदी की जगह अभी भी बनी हुई है, दिल्ली के चुनाव में भाजपा के मटियामेट हो जाने के बाद भी।
अब पल भर को खुद भाजपा की बात अगर सोचें, तो लोकसभा चुनाव में आसमान के तारों को हासिल कर लेने के एवज में पार्टी ने अपने-आपको मोदी के हवाले कर दिया, और नतीजा यह हुआ कि भाजपा के भीतर तमाम शक्तिकेंद्र खत्म होकर पार्टी पूरी तरह से एकधु्रवीय बन गई, और आज मोदी-अमित शाह से परे इस पार्टी में कुछ नहीं है। और ऐसे ही खालिस एकाधिकार के चलते इस जोड़ी ने ऐसे फैसले लिए कि जिनकी वजह से दिल्ली में यह पार्टी अभी बुलडोजर के नीचे दबे हुए बर्तन की तरह चित्त पड़ी हुई है। लेकिन फिर भी भाजपा के भीतर किसी एक व्यक्ति का इस तरह का कब्जा पहले किसी ने देखा-सुना नहीं था, और यह मोदी ही हैं जिनकी वजह से भारतीय राजनीति के भीतर, भाजपा के भीतर ऐसे दिन आए हैं।
अब भाजपा के बाहर निकलें तो देखें कि कश्मीर में भाजपा ने वहां की क्षेत्रीय पार्टी पीडीपी के साथ मिलकर जिस तरह की गठबंधन सरकार बनाई है, उसकी नींव में श्यामाप्रसाद मुखर्जी से लेकर आज तक के जनसंघ-भाजपा के तमाम मुद्दों को फिलहाल दफन कर दिया गया है, और यह भाजपा-संघ परिवार के लिए एक बिल्कुल ही अलग किस्म की नौबत है। लेकिन इस बारे में कल ही हम इस जगह काफी लंबी-चौड़ी बातें लिख चुके हैं।
अब एक आखिरी बात, भाजपा और मोदी से जुड़े हुए संघ परिवार कहे जाने वाले एक तबके के बड़े-बड़े बड़बोले नेता लगातार देश में जिस तरह का तनाव फैलाने वाले बातें कर रहे हैं, उनको मोदी की मंजूरी है, या मोदी के बेकाबू हैं लोग, यह अभी साफ नहीं है। लेकिन इतने साम्प्रदायिक तनाव की बातें तो मोदी के विपक्ष में रहते हुए भी सामने नहीं आई थीं। अब एकाएक ऐसा तनाव बड़ा अजीब है, और देश के लिए बहुत ही बुरी नौबत ला चुका है, और भी बुरी लाने वाला है। यह नौबत मोदी के सत्ता में आने के बाद आई है, इसलिए हम इसे यहां गिना रहे हैं, और इससे खुद मोदी का चुनावी भला होगा, या चुनावी बुरा होगा यह तो हमें नहीं मालूम, लेकिन देश का बुरा शर्तिया हो रहा है।
कुछ कतरा-कतरा बातें मोदी की वजह से भारतीय राजनीति में आज अलग-अलग जगहों पर एक साथ हो रहे फेरबदल की हैं, और जमीन के नीचे इन बातों का एक-दूसरे से जुडऩा पता नहीं भारतीय राजनीति को किस तरफ ले जाएगा।

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