Bat ke bat, बात की बात,

14 feb 2015

ब्रिटेन-अमरीका से लेकर भारत तक नाबालिग मां-बाप के खतरे

संपादकीय
18 फरवरी 2015
ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने अभी रिसर्च के बाद यह नतीजा सामने रखा है कि किशोरावस्था में ही जब लड़के बाप बनने लगते हैं, तो उनसे होने वाली संतानें कितनी तरह की गंभीर बीमारियों का खतरा लेकर आती हैं। ऐसे ही नतीजे कुछ समय पहले अमरीकी वैज्ञानिकों ने सामने रखे थे। फिर कम उम्र में मां बनने वाली नाबालिग लड़कियों की सेहत पर और उनके बच्चों की सेहत पर कैसा बुरा असर पड़ता है, यह बात बरसों से भारत के वैज्ञानिक और चिकित्सक भी बताते आए हैं। एक तरफ पश्चिम के विकसित देशों में नाबालिग लड़कियां मां बन रही हैं, और भारत के सबसे पिछड़े इलाकों में, आदिवासियों के बीच और गांवों में लगातार बाल विवाह जारी हैं। बहुत से प्रदेशों में सरकारें और सामाजिक संगठन लगातार बाल विवाह रोकने के लिए कोशिश कर रहे हैं, लेकिन पुरानी सामाजिक परंपराएं समझ और अक्ल पर, वैज्ञानिक जानकारियों पर लदकर बैठ जाती हैं, और कम उम्र के बच्चों को मां-बाप बनने की तरफ धकेल दिया जाता है। 
ब्रिटेन जैसे देश एक अलग समस्या से जूझ रहे हैं, और वहां पर स्कूली बच्चे सेक्स शुरू कर देते हैं, और अनचाही संतानों और सेक्स-बीमारियों से उनको बचाने के लिए अब वहां कुछ शहरों में 13 बरस की उम्र से स्कूली छात्र-छात्राओं को मुफ्त कंडोम देना शुरू किया गया है। यह एक बहुत ही विचित्र सामाजिक विरोधाभास है कि दुनिया के सबसे आधुनिक समाज बिना शादी किशोरावस्था में मां-बाप बनते देख रहे हैं, और हिन्दुस्तान मेें सबसे कम शिक्षित, सबसे कम आधुनिक समाज मां-बाप के बनाए हुए दुल्हा-दुल्हन देख रहे हैं। इन दोनों का किसी एक तरह का कोई इलाज नहीं हो सकता, लेकिन भारत में सामाजिक स्तर पर जागरूकता के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। दसियों बरस से बाल विवाह के खिलाफ कानून लागू है, और अदालतों के कई तरह के आदेश भी हैं, लेकिन हालत सुधर नहीं रही है। 
कुछ समाजशास्त्रियों ने अपने सामाजिक अध्ययन में यह भी पाया है कि गरीब मजदूर परिवारों में जहां मां-बाप दोनों ही मजदूरी करने बाहर जाते हैं, वहां पर अकेली लड़की को घर पर छोडऩा सुरक्षित नहीं होता, और इसलिए वे लोग मजबूरी में भी लड़की को बिदा कर देना चाहते हैं। फिर कई समाजों में सामाजिक रीति-रिवाज हावी हैं, और कानून के खिलाफ जाकर, गिरफ्तारी का खतरा झेलकर भी हर बरस अक्षय तृतीया पर राजस्थान में दसियों हजार बाल विवाह एक दिन में ही हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भी कवर्धा के इलाके में बैगा आदिवासियों के बीच बाल विवाह की एक मजबूत परंपरा है, और सरकार-सामाजिक कार्यकर्ता मिलकर भी तस्वीर को बदल नहीं पा रहे हैं। 
हम खालिस वैज्ञानिक नजरिए से देखते हैं तो लगता है कि जो समाज शादी के बाद या शादी के पहले कम उम्र के बच्चों को मां-बाप बनाता है, या बनते देखता है, वह समाज एक बड़े मेडिकल खतरे को बढ़ाते चलता है। पश्चिम के देश इस दिक्कत को अपने नजरिए से देखें, क्योंकि वहां पर सामाजिक समस्याएं अलग हैं। दूसरी तरफ भारत में इसे सामाजिक रीति-रिवाज से बाहर निकालकर, मां-बाप की मेडिकल-जानकारी बढ़ाकर बच्चों को बचाना चाहिए। 

ईश्वर के नाम पर जमा का इस्तेमाल जरूरतमंद के लिए

17 फरवरी 2015 
संपादकीय
भारत में किसी भी धर्म का त्यौहार हो, उससे जुड़े लोगों का उत्साह देखते ही बनता है। लोग काम छोड़कर, नियम-कायदों का सम्मान छोड़कर त्यौहार मनाने में लग जाते हैं। चारों तरफ सड़कों पर त्यौहार का कब्जा हो जाता है, और उपासना की जगहों पर खासा चढ़ावा आता है। बहुत बरसों से हमेशा यह लिखा जाता है कि ईश्वर पर चढ़ाया जाने वाला प्रसाद, उस पर चढ़ाया जाने वाला दूध, गरीब और भूखे, कुपोषण के शिकार बच्चों को क्यों नहीं दिया जाता? मंदिरों से निकलकर दूध नालियों में चले जाता है, और धार्मिक मान्यता के मुताबिक ईश्वर के ही बनाए हुए बच्चों को ऐसा दूध उनकी असल जिंदगी में नसीब नहीं होता। 
हिंदुस्तान में बहुत से धर्मों के लोगों के हाथों से पैसे धर्म के नाम पर ही निकलते हैं। मंदिरों में दान पेटियां भरती हैं, और अभी-अभी दक्षिण भारत के एक मंदिर के खजाने की जांच करने के बाद भारत के सीएजी रहे विनोद राय ने यह रिपोर्ट दी है कि इस चर्चित मंदिर से सैकड़ों किलो सोना गायब हो गया है। पद्मनाभस्वामी मंदिर से 266 किलो सोना गायब होना छोटी बात नहीं है, लेकिन यह सोना ईश्वर तो नहीं ले गया, उसके नाम पर इक_ा हुआ, और गायब कर दिया गया। अब यह सोना इतने दाम का होता है कि इससे लाखों बच्चों का खाना हो सकता है। लेकिन इसे ईश्वर के नाम पर जुटाकर उसके भक्त बने लोग खा बैठे।
ऐसा ही मठ-मंदिरों की जमीन-जायदाद का होता है, वक्फ की जमीनों का और इमारतों का होता है, चर्च की जमीनों का होता है। इसी छत्तीसगढ़ के रायपुर में जमीन माफिया ने चर्च की जमीनों को खरीद लिया, और मामला अदालत में चल रहा है। लोगों ने सैकड़ों बरस से धर्म के नाम पर दान किए थे, और उनको लोग लूट खा रहे हैं। इन सबके बीच ईश्वर एक मूक गवाह बने रहता है। कुल मिलाकर साबित यही होता है कि अगर उसके नाम पर काम करने वाले इंसान अच्छे हैं, तो दान का अच्छा इस्तेमाल हो सकता है। लेकिन हमारा अनुभव यह रहा है कि दुष्ट लोग ही समाज में दान की लूटपाट अधिक करते हैं, और भूले-भटके ही उसका इस्तेमाल जरूरतमंद गरीबों के लिए हो पाता है।
जब कभी धर्मस्थलों की कमाई पर सार्वजनिक या सरकारी नियंत्रण की बात आती है, तो उस धर्म से जुड़े हुए लोगों को विरोध में खड़ा करवा दिया जाता है और वोटों के लिए डरे हुए नेता कभी कड़वे फैसले नहीं लेते। हमारा यह भी मानना है कि जब कभी दान के इस्तेमाल पर लोगों को भरोसा होता है, तो वे खुलकर दान भी देते हैं। इसलिए सरकार के सभी धर्मों की जमीन-जायदाद, कमाई, इन सब पर जनता का नियंत्रण रखने के लिए इस पर सरकारी अधिकारी, और संबंधित धर्म के लोगों की मिलीजुली कमेटी बनानी चाहिए। कुछ-कुछ मामलों में अभी ऐसे ट्रस्ट हैं भी, लेकिन बिना किसी फर्क के, सबके साथ एक जैसा सुलूक होना चाहिए, और ईश्वर के नाम पर जमा पैसों का जरूरतमंद जनता के लिए इस्तेमाल होना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में सरकारी भ्रष्टाचार सरकारी मंजूरी से ही जारी

संपादकीय
15 फरवरी 2015

छत्तीसगढ़ में चावल के कारोबार में सरकार का सबसे बड़ा हिस्सा रहता है। धान खरीदी से लेकर धान के परिवहन तक, और फिर उसे गोदामों में रखने से लेकर, धान की मिलिंग तक, फिर चावल के परिवहन और उसे गोदाम में रखने से लेकर राशन दुकानों तक पहुंचाने और उसे जनता को देने में हर बरस दसियों हजार करोड़ का काम होता है। इतनी बड़ी रकम छत्तीसगढ़ के किसी दूसरे काम में नहीं लगती। और यह राज्य सरकार की सबसे बड़ी सब्सिडी भी है। राज्य के भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो ने जिस अंदाज में पहले सिंचाई विभाग में रिश्वत की नगदी के साथ बहुत से अफसरों को पकड़ा, और उसके बाद अब जिस तरह नागरिक आपूर्ति निगम और खाद्य विभाग में भयानक भ्रष्टाचार, कमीशन, और ऊपर तक रिश्वत की रकम पहुंचाने के रिकॉर्ड के साथ सरकारी दफ्तर से करोड़ों रूपए नगदी की जब्ती की है, उससे लोगों की यह धारणा सही साबित होती है कि छत्तीसगढ़ सरकार में लोग भयानक भ्रष्टाचार में लगे हुए हैं। खुद सत्तारूढ़ भाजपा के नेता यह कहते नहीं थकते कि उनकी पार्टी की सरकार में किस कदर बेकाबू भ्रष्टाचार है। 
अब यह भ्रष्टाचार तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सबसे पसंदीदा और प्रतिष्ठा सूचक अनाज की योजना में है। तो इससे यह जाहिर है कि बाकी विभागों में भ्रष्टाचार का क्या हाल होगा। पाठकों को याद होगा कि कुछ ही महीने पहले जब बिलासपुर में स्वास्थ्य मंत्री के अपने जिले में सरकारी नसबंदी कैम्प में डेढ़ दर्जन महिलाओं की मौत हुई, तो तब से लेकर अब तक सरकार में बैठे लोग इसी बात पर घुमा-फिराकर बचने की कोशिश कर रहे हैं कि वह कैम्प एक डॉक्टर ने नियमों से परे लगा दिया था, कभी सरकार कहती है कि सरकारी खरीद की दवा जहरीली थी, कभी कुछ और कहती है। इस तरह अलग-अलग बातों को करके मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश की गई, लेकिन सरकार की मासूमियत पर किसी को भरोसा न हुआ, न उसकी कोई वजह है। इसी तरह जब सिंचाई अफसरों के पास करोड़ों की नगदी बरामद हुई, तो भी लोग इतनी बड़ी रकम देखकर चौंके। लेकिन अभी नागरिक आपूर्ति निगम में जिस अफसर के पास से करीब दो करोड़ रूपए नगद बरामद किए गए, उस अफसर का पुराना रिकॉर्ड भी बड़ा शानदार है। कुछ बरस पहले उसे रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया था, और उसके बाद से आज तक उसके खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी गई। अगले बरस इस रंगे हुए हाथ को रंगने के दस बरस पूरे हो जाएंगे, और यह उम्मीद है कि तब तक भी सरकार इसके खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं देगी। रिश्वत लेते हुए पकड़ाने के बाद उसे ऐसी कुर्सी पर बिठाया गया जहां पर कि वह लाखों के बाद अब सैकड़ों करोड़ की रिश्वत जुटा सके, और उसे ऊपर बांट भी सके। 
छत्तीसगढ़ में सरकार की यह भयानक हालत है कि एक से एक परले दर्जे के भ्रष्ट अफसर कमाऊ कुर्सियों पर बैठकर राज्य सरकार के बड़े-बड़े खर्चीले फैसले करते हैं, और उनके खिलाफ मुकदमे की इजाजत की फाइलें दीमक का इंतजार करते पड़ी रहती हैं। यह नौबत बदलनी चाहिए। कुछ नमूनों को लेकर अगर कोई अदालत चले जाए तो हो सकता है कि वहां से राज्य सरकार को नोटिस भी जारी हो जाए कि दस-दस बरस तक मुकदमे की इजाजत अगर देना ही नहीं है, तो फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाले दफ्तरों को बंद क्यों नहीं कर दिया जाता? इस राज्य में तो वन विभाग के बड़े-बड़े घोटालाबाज अफसर वन विभाग के बाहर भी सरकार की बड़ी-बड़ी कुर्सियों को सम्हाल रहे हैं, जांच में कुसूरवार पाए जाने के बाद भी प्रमोशन पा रहे हैं, और उनके मुकदमे उनकी जिंदगी में कभी शुरू नहीं हो सकेंगे। 
यह नौबत बहुत ही शर्मनाक है, और खुद सरकार का एक कड़क अफसर भ्रष्टाचार विरोधी कुर्सी पर आने के कुछ हफ्तों के भीतर ही बड़े-बड़े संगठित भ्रष्टाचार को इस तरह से पकड़कर सामने ला रहा है, तो उससे यह जाहिर है कि भ्रष्टाचार को पकडऩे के लिए किसी परमाणु-फार्मूले की जरूरत नहीं है, सिर्फ नीयत की जरूरत है। और सिर्फ पकड़ लेने से कुछ नहीं होता, सरकार जब मुकदमे की इजाजत नहीं देती, तो उसका बड़ा सीधा मतलब होता है कि भ्रष्टाचार को जारी रखना। अब इतने बड़े-बड़े मामले पकड़ाने के बाद सरकार को अपनी नीयत साफ करनी चाहिए। 

छत्तीसगढ़ सरकार आसाराम के हुक्म पर अमल के बारे में एक बार फिर सोचे...

विशेष संपादकीय
14 फरवरी 2015
सुनील कुमार
कुछ बरस पहले राजिम कुंभ में आए हुए आसाराम ने सरकार के आसमान छूते अतिथि सत्कार के बीच मंच से ही सरकार से कहा था कि चौदह फरवरी के वेलेंटाईन-डे की जगह छत्तीसगढ़ सरकार को मातृ-पितृ दिवस मनाना चाहिए, और इस दिन राज्य के बच्चे मां-बाप की पूजा करें। उस समय आसाराम, बापू भी कहलाते थे और उनके सितारे बुलंद थे। देश भर में वे जगह-जगह राजकीय अतिथि बनाए जाते थे, और उनकी कही बात बड़े-बड़े नेता सिर-आंखों पर लेते थे। नतीजा यह हुआ कि सभी लोगों के बीच पे्रम के एक त्यौहार को बुलडोजर से कुचलते हुए इस तरह उसे नौजवानों या प्रेमी जोड़ों से परे कर दिया गया कि मानो नौजवानों के बीच पे्रम के बिना भी यह दुनिया आगे बढ़ती रहेगी। उस वक्त किसी को यह अंदाज नहीं था कि मोटे तौर पर नौजवानों के बीच मनाया जाने वाला यह पे्रम-पर्व खत्म करवाने वाले आसाराम से कुछ बरसों के भीतर ही बापू नाम का तमगा भी छिन जाएगा, और वह आदमी बलात्कार का आरोपी आसाराम होकर रह जाएगा।
अब मुद्दे की बात पर आएं, तो जो आसाराम नौजवानों के बीच पे्रम के खिलाफ जल्लाद बनकर खड़ा हो गया था, वह खुद अपने एक शिष्य परिवार की नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार के आरोप झेल रहा है। कहां गया मातृ-पितृ दिवस पर उनकी पूजा करने का सिद्धांत? और जिनको मां-बाप की पूजा करनी होती है, उनको इसके लिए सालाना किसी एक दिन की जरूरत नहीं पड़ती। आसाराम जब पैदा भी नहीं हुआ था उसके भी सैकड़ों-हजारों बरस पहले से भारतीय संस्कृति माता-पिता के सम्मान की नसीहत देते आई है। और आसाराम की पीढ़ी के बच्चे भी श्रवण कुमार की वह कहानी पढ़ते हुए बड़े हुए थे जिनमें अपने मां-बाप को तीर्थयात्रा करवाने के लिए एक नौजवान उन्हें कांवर पर लेकर पूरा देश घूमता है। और उस नौजवान ने तो किसी नाबालिग से बलात्कार भी नहीं किया था। और उस नौजवान के खिलाफ ऐसा कोई पुलिस केस भी नहीं था जिसके गवाह एक-एक करके कत्ल कर दिए जाएं। 
जिस आसाराम के कहे छत्तीसगढ़ में सरकार ने नौजवानों के पे्रम के प्रतीक इस दिन को पश्चिमी संस्कृति का मानते हुए इसे खत्म करने का सरकारी फैसला लिया था, वही आसाराम अपने से दो पीढ़ी छोटी बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में कई वेलेंटाईन-डे जेल में गुजार चुका है, और इस बात की पूरी-पूरी संभावना है कि अगले कई मातृ-पितृ दिवस वह जेल में काटे। दरअसल पश्चिमी बुनियाद का होने की वजह से पे्रम के एक प्रतीक को जिस नफरत के साथ भारत की साम्प्रदायिक ताकतें देखती हैं, और मां-बाप के प्रति श्रद्धा को जिस तरह से नौजवान पे्रम का विकल्प मान लिया गया, वह बहुत तात्कालिक सोच से उपजा हुआ फैसला था। यह समाजशास्त्रीय और मानवीय नजरिए से एक बहुत ही अव्यवहारिक सोच थी, और है, कि किसी एक से पे्रम किसी दूसरे से पे्रम का विकल्प हो सकता है। कल के दिन कोई एक दूसरा आसाराम यहां आकर कहे कि भाई-बहन के पे्रम की वजह से मां-बाप की उपेक्षा होती है, इसलिए राखी और भाईदूज को खत्म करके उसे भी मातृ-पितृ दिवस बना दिया जाए, तो छत्तीसगढ़ की सरकार क्या करेगी? 
दरअसल जिंदगी में अलग-अलग रिश्तों का अलग-अलग महत्व होता है। जो लोग यह मानते हैं कि हमउम्र नौजवान लोगों के बीच पे्रम के बिना भी अगली पीढ़ी आगे बढ़ सकती है, वे लोग जीवन के पे्रम का शायद कभी अनुभव नहीं कर पाए। लेकिन ऐसे लोगों को अपने मां-बाप से भी पूछना चाहिए कि क्या उनके बीच कभी पे्रम रहा, या फिर जीवविज्ञान में लिखे गए शारीरिक-संबंधों से ही अगली पीढ़ी उपज गई? जीवन को प्रभावित करने वाले, निजी स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले फैसले जब आसारामों के हुक्म पर सरकारें लागू कर देती हैं, तो जीवन में पे्रम की कमी नफरत और हिंसा को जगह दे देती हैं। पे्रमी जोड़े कहीं आत्महत्या करने लगते हैं, तो चारों तरफ वे कुंठा में जीने का मजबूर भी रहते हैं। वेलेंटाईन-डे पर बाग-बगीचों में साम्प्रदायिक और हिंसक मवालियों पर रोक लगनी चाहिए, लेकिन इस वक्त छत्तीसगढ़ के बाग-बगीचों में हथियारबंद पुलिस पे्रम जोड़ों को इस तरह से रोक रही है कि मानो वे बगीचे में बैठकर पे्रम की ऐसी साजिश रच लेंगे कि जिससे भारतीय संस्कृति को धमाके के साथ उड़ा दिया जाएगा। 
छत्तीसगढ़ सरकार को कम से कम यह भी सोचना था कि यह देश कृष्ण की रासलीला का देश है, और गोपियों से उनके पे्रम का देश भी है। संस्कृत से लेकर इस देश की लोकभाषाओं तक कृष्ण के पे्रम का वर्णन एक समंदर जितना है। इस देश में कामशास्त्र गढ़ा गया था जो कि दुनिया के इतिहास में सेक्स का और पे्रम का सबसे बड़ा गं्रथ माना जाता है। इस देश का कालिदास से लेकर अब तक का साहित्य, लोकसाहित्य, सब कुछ इस देश में पे्रम और श्रृंगार से भरे हुए हैं। इस देश में खजुराहो की दीवारों पर पे्रम और सेक्स को इस तरह उकेरा गया है कि जिसे देखने पूरी दुनिया से लोग आते हैं। और वहीं की बात क्यों कहें, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बगल में देवबलौदा का छोटा सा मंदिर है जहां पर सैकड़ों बरस पहले सेक्स की प्रतिमाएं गढ़ी गई थीं। उस वक्त आज के ये हिंसक-साम्प्रदायिक संगठन अगर होते, तो दीवारों पर पत्थरों में उकेरे गए पे्रम जोड़ों को अपनी लाठियों से नहीं पीट पाते, उनको पीटने के लिए हथौड़े और घन लगते। आज जब ऐसे हिंसक संगठन पे्रमी जोड़ों को यह हिंसक और आपराधिक धमकी देते हैं कि वेलेंटाईन-डे पर वे साथ दिखे, तो उनकी जबरिया शादी करा दी जाएगी, तो सरकारी चुप्पी ऐसी हिंसा को बढ़ावा ही देती है। इस तरह की हिंसक और साम्प्रदायिक बातें लोगों के मन में एक हिकारत पैदा करती हैं, और दिल्ली के चुनावों में भाजपा को जिन बातों का खामियाजा भुगतना पड़ा, उनमें से इस किस्म की साम्प्रदायिक-हिंसा की बातें भी रहीं। नौजवान पीढ़ी की स्वाभाविक शारीरिक-भावनात्मक जरूरतों को कुचलने का दाम हर जगह चुकाना पड़ेगा।
सरकार को तंगनजरिए से आनन-फानन लिया गया यह फैसला खुद होकर खारिज करना चाहिए। और अब तो आसाराम ने भी यह साबित कर दिया है कि अपने से दो पीढ़ी छोटी नाबालिग लड़की की देह से कितना पे्रम किया जाता है। धर्म और आध्यात्म के ऐसे लबादे ओढ़कर जो लोग बच्चियों से बलात्कार करते हैं, उनको कौन सा नैतिक हक है कि वे बालिग जोड़ों को भी एक प्राकृतिक और स्वाभाविक पे्रम से रोकें? और सरकार को भी ऐसे पाखंडी के हुक्म को मौके पर ही मानकर एक सरकारी फैसला नहीं लेना चाहिए था। हमने इस फैसले के तुरंत बाद ही यही बात लिखी थी, और उस वक्त तो आसाराम, बापू भी था।

बुनियादी मुद्दों से कतराते और बेमतलब बातों में उलझाते लोग

संपादकीय
13 फरवरी 2015
सार्वजनिक जीवन में रोज ऐसी कई खबरें आती हैं जिनको लेकर उनसे जुड़े हुए लोग यह सवाल उठाते हैं कि इनके पीछे नीयत क्या है? किसी नेता या अफसर का स्टिंग ऑपरेशन होता है, और उसमें वे रिश्वत लेते या कोई गलत बात करते पकड़ाते हैं, तो सवाल उठने पर उनका जवाब होता है कि इसे ठीक चुनाव के पहले क्यों उठाया गया, इसे उनके प्रमोशन के वक्त पर क्यों उठाया गया? कारोबार पर सरकारी कार्रवाई होती है, तो भी बहुत से लोग उसके पीछे की वजहों को गिनाने लगते हैं कि यह कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से की गई। जब लोग दूसरों पर हमला बोलते हैं, दूसरों पर आरोप लगाते हैं, या कीचड़ उछालते हैं, तो उनका तर्क होता है कि इन बातों में दम है। और हमले के शिकार लोग नीयत और वक्त का सवाल जवाब की तरह सामने रखते हैं। 
हमारा यह मानना है कि जवाबदेही की सार्वजनिक जगहों पर जो लोग रहते हैं, उन्हें सुबूतों से ऊपर जाकर नीयत के सवाल खड़े नहीं करने चाहिए। रोज टीवी पर बहुत से लोगों की प्रतिक्रिया देखने मिलती है, जिनमें वे सवालों के जवाब देने से बचते हुए कभी जनता की अदालत में जाने की बात करते हैं, कभी कानून की अदालत में जाने की, और कभी विरोधी की नीयत पर सवाल उठाते हैं। लेकिन मुद्दे की जो बुनियादी बात रहती है, उसका सीधा-सीधा और ठोस जवाब देने से कतराते हैं, और मीडिया भी पता नहीं क्यों अक्सर उस कोने तक उनको घेर नहीं पाता। जबकि होना यह चाहिए कि बात ठोस मुद्दे की हो। जो मामला बहस या विवाद का केन्द्र है, उस पर चुप रहकर किनारे-किनारे की बातों के पीछे छुपकर निकलने की सहूलियत सार्वजनिक जीवन के लोगों को नहीं मिलनी चाहिए। इसी कॉलम में हम कुछ बार एक लाईन लिख चुके हैं कि तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा...। 
पिछले दिनों छत्तीसगढ़ की एक कन्या छात्रावास में लड़कियों के साथ बदसलूकी का एक मामला सामने आया, जिस पर जिम्मेदारी साबित होने पर लंबी कैद हो सकती है। इस बारे में जब जिम्मेदार बड़े ओहदों वाले लोगों से पूछा गया, तो उनका जवाब काफी दूर तक इस पर टिका रहा कि ऐसे आरोप लगाने वाले लोगों की नीयत क्या है, वहां आसपास किस तरह का टकराव चलते रहता है, कैसी राजनीतिक-कीचड़बाजी वहां पर आम है। लेकिन छात्राओं के साथ ऐसा हुआ है या नहीं, उस पर जवाब के लिए घेरते-घेरते कुछ मिनट लग गए। यह रूख भारत में बड़ा आम है, और मीडिया के अच्छे-खासे, अपने आपको तेज-तर्रार साबित करने की कोशिश करने वाले लोग भी केक के ऊपर की खासी मोटी रंगीन सजावट में उलझकर रह जाते हैं, और इस सतह को पार करके तह तक नहीं पहुंच पाते। 
हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन की तमाम जवाबदेही की जगहों को बहुत साफ-साफ जवाब देने के लिए घेरना ही चाहिए। और यह काम जरूरी नहीं है कि अकेले मीडिया करे, आज तो सोशल मीडिया आम लोगों के हाथ है, और वहां पर लोगों को घेरा ही जा सकता है। खासकर ऐसे लोगों को जो कि जनता के पैसों पर तनख्वाह पाते हैं, या कि राजनीतिक-सामाजिक संगठनों के हैं, जो कि सरकार से टैक्स रियायत पाते हैं। किसी की नीयत या नीयत के इस्तेमाल का मौका, कभी भी असल मुद्दे से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। इसलिए बेमतलब बातों को रोकते हुए लोगों को सीधे मुद्दे के सवाल करने चाहिए। 

Bat ke bat, बात की बात

11 feb 2015

Bat ke bat, बात की बात,

10 feb 2015

जमीनों का जबरिया अधिग्रहण हिंसा का कारण न बन जाए...

संपादकीय
12 फरवरी 2015

झारखंड के नक्सलियों ने केन्द्र सरकार के भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ पटरियां उड़ाई हैं, और दूसरी तरफ गांधीवादी नेता अन्ना हजारे ने इसके खिलाफ आंदोलन की घोषणा की है। देश के बहुत से सामाजिक संगठन वैसे भी इसके खिलाफ चल रहे हैं, और कारखानेदारों, नेताओं, और बड़े अफसरों का एक तबका ही किसानों और आदिवासियों की जमीनों को हर हाल में लेकर खदानों और कारखानों के लिए देने का हिमायती है, और इससे देश के कई और हिस्सों में एक सामाजिक-आर्थिक तनाव खड़ा हो सकता है। आज भी जिस नक्सल खतरे को देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा बतलाया जाता है, वह नक्सल आंदोलन आर्थिक-सामाजिक शोषण के अंतहीन सिलसिले के एक हिंसक जवाब की शक्ल में खड़ा हुआ, और आज आधा दर्जन राज्यों पर छा गया है। अभी जिन इलाकों में कारखानों के लिए और खदानों के लिए जमीन को जबर्दस्ती लिया जाएगा, उनमें अधिकतर जमीनें आदिवासियों और गरीब किसानों की होंगी, जिनका अपनी जमीन से बेदखल होने का मतलब एक किस्म से जिंदगी से बेदखल होना ही हो जाएगा। जमीन के भाव को बाजार भाव से कुछ अधिक रखकर लेने को सरकार काफी मान लेती है। लेकिन यह पैसा एक बार आता है, और फिर न जाने किस-किस किस्म के गैरउत्पादक पारिवारिक और सामाजिक कामों में खत्म हो जाता है। अपनी जमीन खोए हुए किसान अधिकतर तो फटेहाल हो जाते हैं, और यह बेदखली उसके लिए जानलेवा होती है।
बाजार भाव का कोई पैमाना किसी की जमीन को जबर्दस्ती लेने के लिए काफी नहीं होना चाहिए। सरकार को, केन्द्र सरकार को, और राज्य सरकारों को भी कारखानों के लिए जमीनों की शिनाख्त करते हुए वहां पड़ी हुई बंजर जमीन को देखना चाहिए कि उन पर किस तरह से औद्योगिक केन्द्रों की, और उद्योगों की योजनाएं बन सकती हैं। दूसरी बात यह कि किसान के लिए जमीन लेने पर एक पर्याप्त पेंशन का इंतजाम भी होना चाहिए जो कि उसकी मौत तक जारी रहे। इस तरह की बहुत सी सामाजिक सुरक्षाओं को जमीन के अनिवार्य अधिग्रहण के साथ अनिवार्य रूप से जोडऩा चाहिए, वरना ऐसे इलाकों में हिंसा भड़केगी। 
जमीनों को जबरिया लेने का मामला भारत में वामपंथी पार्टियों से लेकर नक्सलियों तक, और तरह-तरह की विचारधारा वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं तक, हर किसी की फिक्र का सामान है। पिछली यूपीए सरकार ने जो कानून बनाया था, उसे पूंजीनिवेश में अड़ंगा मानते हुए मोदी सरकार ने बड़ी तेजी से बदला है, और उसे जमीन मालिक के हक के खिलाफ बनाया है, और कारखानेदारों के लिए आसान बनाया है। सामाजिक आंदोलनकारियों को इस कानून और इस फेरबदल की खामियां तलाश कर अदालत की मदद भी लेनी चाहिए, ताकि भूस्वामी के अधिकार सुरक्षित रह सकें। लोगों की जमीन, और सरकार के कब्जे वाली खदानें पूरी जिंदगी के लिए जब किसी कारोबारी को दी जाती हैं, तो उससे कितनी वसूली होनी चाहिए, यह मामला बारीकी से तय करने का है।

केजरीवाल और मोदी दोनों को सबक लेने की जरूरत

संपादकीय
11 फरवरी 2015

दिल्ली में नतीजे निकलने के अगले दिन, आज सुबह अरविंद केजरीवाल ने केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू से मुलाकात की, और कल सुबह वे इस वक्त तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिल चुके रहेंगे। दिल्ली राज्य, भारत के संवैधानिक ढांचे में एक पूर्ण राज्य नहीं है, और वहां की पुलिस सहित कुछ दूसरे मामलों में केन्द्र सरकार का दखल रहता है, इसलिए चुनाव हारने के बाद भाजपा के कुछ समर्थक यह भी कह रहे हैं कि केजरीवाल की जीत एक बड़ी म्युनिसिपल में जीत जैसी है। यह एक अलग बात है कि इसी बड़ी म्युनिसिपल में जीत के लिए मोदी ने अपने आपको झोंक दिया था। खैर, चुनाव कल निपट चुके हैं, नतीजे आ चुके हैं, आम आदमी पार्टी की सरकार बनने जा रही है, और तीन दिन बाद जिस वक्त बाकी देश में प्रेम के खिलाफ धर्मान्ध और साम्प्रदायिक ताकतें हिंसा कर रही होंगी, उस वक्त दिल्ली में केजरीवाल शपथ ले रहे होंगे। 
हमने छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल चुनावों को लेकर भी बार-बार यह बात लिखी थी कि चुनाव के बाद अब पार्षदों, महापौरों, और म्युनिसिपलों की बाकी कमेटियों में चुने गए लोगों, सभापति, इन सबको चुनाव के पहले की कटुता को छोड़कर, पार्टियों की राजनीति को छोड़कर, मिलकर जनहित में काम करना चाहिए। यह बात स्थानीय संस्थाओं से परे राज्यों पर भी लागू होती है, और पूरे देश पर भी। हमने यह देखा है कि गैरजरूरी टकराव से किस तरह केन्द्र-राज्य के संबंध खराब होते हैं, और उनका नुकसान राज्य पर अधिक दिखता है, होता पूरे देश को है। इससे देश की लोकतांत्रिक   हवा भी गंदी होती है, और ऐसी मिसालें कायम होती हैं जिनसे कि आगे भी गंदगी बढ़ते चलती है, और जनकल्याण पिछड़ते चलता है। इसलिए हम उसी नसीहत को आज दिल्ली के संदर्भ में फिर दुहराना चाहते हैं। आज दिल्ली विधानसभा में केजरीवाल और उनकी पार्टी की स्थिति लोकसभा में मोदी की स्थिति के मुकाबले भी सौ गुना अधिक ताकतवर है। ऐसा हैरतअंगेज जनसमर्थन किसी को भी बददिमाग कर सकता है। और इसी से बचने की जरूरत है। बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि जिस तरह भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी, और संसद के भीतर भाजपा-एनडीए की ताकत रही, उसी से देश में एक ऐसी बददिमागी पनपी जिसने कि हिंसा और साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया, और उसका नतीजा दिल्ली चुनाव में भाजपा की ऐसी हार की शक्ल में सामने आया। इसलिए आज दिल्ली विधानसभा और सरकार में लोकतांत्रिक-तानाशाह किस्म की ताकत पा चुके अरविंद केजरीवाल को चुनावी और आंदोलनकारी तेवरों से बाहर आना पड़ेगा और सरकार चलाने के एक गंभीर अंदाज में काम करना पड़ेगा, वरना किसी भी किस्म की बददिमागी अगले चुनाव में भारी पड़ेगी। 
देश के संघीय ढांचे में केन्द्र-राज्य संबंध किसी-किसी वक्त बहुत कड़वे भी हुए हैं। जैसे आज भी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से शिष्टाचार के नाते भी नहीं मिली हैं। जबकि सीपीएम के त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार भी जाकर प्रधानमंत्री से मिले हैं। चुनाव के वक्त की कड़वाहट को छोड़कर लोगों को देश और प्रदेश के हित में काम करना चाहिए। अरविंद केजरीवाल के संदर्भ में ही हम इन बातों को आज यहां लिख रहे हैं और उनको अब अधिक बोलना बंद करके ऐसे काम करना चाहिए जो बोलें। दिल्ली का विकास अकेले केजरीवाल की फिक्र नहीं है, वह केन्द्र सरकार की भी फिक्र है। और दुनिया के सामने भारत की यह राजधानी एक मिसाल के तौर पर हमेशा ही सामने रहती है। इसलिए इस मिसाल को एक अच्छी और बेहतर मिसाल बनाने का काम मोदी और केजरीवाल सरकारों को मिलकर करना चाहिए। देश की जनता ने यह वोट काम के लिए दिया है, टकराव के लिए नहीं। इसलिए जहां तक किसी टकराव की जरूरत खड़ी न हो, महज राजनीति के लिए टकराव से बचना चाहिए। केजरीवाल दिल्ली विधानसभा के चुनाव में इसके ऊपर और कहीं भी नहीं जा सकते। लेकिन अगले चुनाव के पहले वे अपने काम से इस राज्य के पूरे इतिहास के ऊपर जा सकते हैं। इतिहास गढऩे के लिए नहीं, जनता के भले के लिए उनको ऐसा जरूर करना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसे मौके गिने-चुने ही आते हैं, और गिने-चुने ही मिलते हैं। कुछ महीने पहले मोदी को ऐसा मौका मिला था, लेकिन अपने बेकाबू और हिंसक-साम्प्रदायिक साथियों की हरकतों को अनदेखा करके उन्होंने उस मौके को खो दिया, और वे देश के प्रधानमंत्री बनने के बजाय आक्रामक हिन्दू ताकतों के प्रधानमंत्री साबित किए जा रहे हैं। दिल्ली के इस चुनाव से केजरीवाल और मोदी दोनों को सबक लेने की जरूरत है। एक को पिछले कुछ महीनों के लिए, और दूसरे को अगले पांच बरस के लिए।