विशेष संपादकीय
14 फरवरी 2015
सुनील कुमार
कुछ बरस पहले राजिम कुंभ में आए हुए आसाराम ने सरकार के आसमान छूते अतिथि सत्कार के बीच मंच से ही सरकार से कहा था कि चौदह फरवरी के वेलेंटाईन-डे की जगह छत्तीसगढ़ सरकार को मातृ-पितृ दिवस मनाना चाहिए, और इस दिन राज्य के बच्चे मां-बाप की पूजा करें। उस समय आसाराम, बापू भी कहलाते थे और उनके सितारे बुलंद थे। देश भर में वे जगह-जगह राजकीय अतिथि बनाए जाते थे, और उनकी कही बात बड़े-बड़े नेता सिर-आंखों पर लेते थे। नतीजा यह हुआ कि सभी लोगों के बीच पे्रम के एक त्यौहार को बुलडोजर से कुचलते हुए इस तरह उसे नौजवानों या प्रेमी जोड़ों से परे कर दिया गया कि मानो नौजवानों के बीच पे्रम के बिना भी यह दुनिया आगे बढ़ती रहेगी। उस वक्त किसी को यह अंदाज नहीं था कि मोटे तौर पर नौजवानों के बीच मनाया जाने वाला यह पे्रम-पर्व खत्म करवाने वाले आसाराम से कुछ बरसों के भीतर ही बापू नाम का तमगा भी छिन जाएगा, और वह आदमी बलात्कार का आरोपी आसाराम होकर रह जाएगा।
अब मुद्दे की बात पर आएं, तो जो आसाराम नौजवानों के बीच पे्रम के खिलाफ जल्लाद बनकर खड़ा हो गया था, वह खुद अपने एक शिष्य परिवार की नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार के आरोप झेल रहा है। कहां गया मातृ-पितृ दिवस पर उनकी पूजा करने का सिद्धांत? और जिनको मां-बाप की पूजा करनी होती है, उनको इसके लिए सालाना किसी एक दिन की जरूरत नहीं पड़ती। आसाराम जब पैदा भी नहीं हुआ था उसके भी सैकड़ों-हजारों बरस पहले से भारतीय संस्कृति माता-पिता के सम्मान की नसीहत देते आई है। और आसाराम की पीढ़ी के बच्चे भी श्रवण कुमार की वह कहानी पढ़ते हुए बड़े हुए थे जिनमें अपने मां-बाप को तीर्थयात्रा करवाने के लिए एक नौजवान उन्हें कांवर पर लेकर पूरा देश घूमता है। और उस नौजवान ने तो किसी नाबालिग से बलात्कार भी नहीं किया था। और उस नौजवान के खिलाफ ऐसा कोई पुलिस केस भी नहीं था जिसके गवाह एक-एक करके कत्ल कर दिए जाएं।
जिस आसाराम के कहे छत्तीसगढ़ में सरकार ने नौजवानों के पे्रम के प्रतीक इस दिन को पश्चिमी संस्कृति का मानते हुए इसे खत्म करने का सरकारी फैसला लिया था, वही आसाराम अपने से दो पीढ़ी छोटी बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में कई वेलेंटाईन-डे जेल में गुजार चुका है, और इस बात की पूरी-पूरी संभावना है कि अगले कई मातृ-पितृ दिवस वह जेल में काटे। दरअसल पश्चिमी बुनियाद का होने की वजह से पे्रम के एक प्रतीक को जिस नफरत के साथ भारत की साम्प्रदायिक ताकतें देखती हैं, और मां-बाप के प्रति श्रद्धा को जिस तरह से नौजवान पे्रम का विकल्प मान लिया गया, वह बहुत तात्कालिक सोच से उपजा हुआ फैसला था। यह समाजशास्त्रीय और मानवीय नजरिए से एक बहुत ही अव्यवहारिक सोच थी, और है, कि किसी एक से पे्रम किसी दूसरे से पे्रम का विकल्प हो सकता है। कल के दिन कोई एक दूसरा आसाराम यहां आकर कहे कि भाई-बहन के पे्रम की वजह से मां-बाप की उपेक्षा होती है, इसलिए राखी और भाईदूज को खत्म करके उसे भी मातृ-पितृ दिवस बना दिया जाए, तो छत्तीसगढ़ की सरकार क्या करेगी?
दरअसल जिंदगी में अलग-अलग रिश्तों का अलग-अलग महत्व होता है। जो लोग यह मानते हैं कि हमउम्र नौजवान लोगों के बीच पे्रम के बिना भी अगली पीढ़ी आगे बढ़ सकती है, वे लोग जीवन के पे्रम का शायद कभी अनुभव नहीं कर पाए। लेकिन ऐसे लोगों को अपने मां-बाप से भी पूछना चाहिए कि क्या उनके बीच कभी पे्रम रहा, या फिर जीवविज्ञान में लिखे गए शारीरिक-संबंधों से ही अगली पीढ़ी उपज गई? जीवन को प्रभावित करने वाले, निजी स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले फैसले जब आसारामों के हुक्म पर सरकारें लागू कर देती हैं, तो जीवन में पे्रम की कमी नफरत और हिंसा को जगह दे देती हैं। पे्रमी जोड़े कहीं आत्महत्या करने लगते हैं, तो चारों तरफ वे कुंठा में जीने का मजबूर भी रहते हैं। वेलेंटाईन-डे पर बाग-बगीचों में साम्प्रदायिक और हिंसक मवालियों पर रोक लगनी चाहिए, लेकिन इस वक्त छत्तीसगढ़ के बाग-बगीचों में हथियारबंद पुलिस पे्रम जोड़ों को इस तरह से रोक रही है कि मानो वे बगीचे में बैठकर पे्रम की ऐसी साजिश रच लेंगे कि जिससे भारतीय संस्कृति को धमाके के साथ उड़ा दिया जाएगा।
छत्तीसगढ़ सरकार को कम से कम यह भी सोचना था कि यह देश कृष्ण की रासलीला का देश है, और गोपियों से उनके पे्रम का देश भी है। संस्कृत से लेकर इस देश की लोकभाषाओं तक कृष्ण के पे्रम का वर्णन एक समंदर जितना है। इस देश में कामशास्त्र गढ़ा गया था जो कि दुनिया के इतिहास में सेक्स का और पे्रम का सबसे बड़ा गं्रथ माना जाता है। इस देश का कालिदास से लेकर अब तक का साहित्य, लोकसाहित्य, सब कुछ इस देश में पे्रम और श्रृंगार से भरे हुए हैं। इस देश में खजुराहो की दीवारों पर पे्रम और सेक्स को इस तरह उकेरा गया है कि जिसे देखने पूरी दुनिया से लोग आते हैं। और वहीं की बात क्यों कहें, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बगल में देवबलौदा का छोटा सा मंदिर है जहां पर सैकड़ों बरस पहले सेक्स की प्रतिमाएं गढ़ी गई थीं। उस वक्त आज के ये हिंसक-साम्प्रदायिक संगठन अगर होते, तो दीवारों पर पत्थरों में उकेरे गए पे्रम जोड़ों को अपनी लाठियों से नहीं पीट पाते, उनको पीटने के लिए हथौड़े और घन लगते। आज जब ऐसे हिंसक संगठन पे्रमी जोड़ों को यह हिंसक और आपराधिक धमकी देते हैं कि वेलेंटाईन-डे पर वे साथ दिखे, तो उनकी जबरिया शादी करा दी जाएगी, तो सरकारी चुप्पी ऐसी हिंसा को बढ़ावा ही देती है। इस तरह की हिंसक और साम्प्रदायिक बातें लोगों के मन में एक हिकारत पैदा करती हैं, और दिल्ली के चुनावों में भाजपा को जिन बातों का खामियाजा भुगतना पड़ा, उनमें से इस किस्म की साम्प्रदायिक-हिंसा की बातें भी रहीं। नौजवान पीढ़ी की स्वाभाविक शारीरिक-भावनात्मक जरूरतों को कुचलने का दाम हर जगह चुकाना पड़ेगा।
सरकार को तंगनजरिए से आनन-फानन लिया गया यह फैसला खुद होकर खारिज करना चाहिए। और अब तो आसाराम ने भी यह साबित कर दिया है कि अपने से दो पीढ़ी छोटी नाबालिग लड़की की देह से कितना पे्रम किया जाता है। धर्म और आध्यात्म के ऐसे लबादे ओढ़कर जो लोग बच्चियों से बलात्कार करते हैं, उनको कौन सा नैतिक हक है कि वे बालिग जोड़ों को भी एक प्राकृतिक और स्वाभाविक पे्रम से रोकें? और सरकार को भी ऐसे पाखंडी के हुक्म को मौके पर ही मानकर एक सरकारी फैसला नहीं लेना चाहिए था। हमने इस फैसले के तुरंत बाद ही यही बात लिखी थी, और उस वक्त तो आसाराम, बापू भी था।

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