बुनियादी मुद्दों से कतराते और बेमतलब बातों में उलझाते लोग

संपादकीय
13 फरवरी 2015
सार्वजनिक जीवन में रोज ऐसी कई खबरें आती हैं जिनको लेकर उनसे जुड़े हुए लोग यह सवाल उठाते हैं कि इनके पीछे नीयत क्या है? किसी नेता या अफसर का स्टिंग ऑपरेशन होता है, और उसमें वे रिश्वत लेते या कोई गलत बात करते पकड़ाते हैं, तो सवाल उठने पर उनका जवाब होता है कि इसे ठीक चुनाव के पहले क्यों उठाया गया, इसे उनके प्रमोशन के वक्त पर क्यों उठाया गया? कारोबार पर सरकारी कार्रवाई होती है, तो भी बहुत से लोग उसके पीछे की वजहों को गिनाने लगते हैं कि यह कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से की गई। जब लोग दूसरों पर हमला बोलते हैं, दूसरों पर आरोप लगाते हैं, या कीचड़ उछालते हैं, तो उनका तर्क होता है कि इन बातों में दम है। और हमले के शिकार लोग नीयत और वक्त का सवाल जवाब की तरह सामने रखते हैं। 
हमारा यह मानना है कि जवाबदेही की सार्वजनिक जगहों पर जो लोग रहते हैं, उन्हें सुबूतों से ऊपर जाकर नीयत के सवाल खड़े नहीं करने चाहिए। रोज टीवी पर बहुत से लोगों की प्रतिक्रिया देखने मिलती है, जिनमें वे सवालों के जवाब देने से बचते हुए कभी जनता की अदालत में जाने की बात करते हैं, कभी कानून की अदालत में जाने की, और कभी विरोधी की नीयत पर सवाल उठाते हैं। लेकिन मुद्दे की जो बुनियादी बात रहती है, उसका सीधा-सीधा और ठोस जवाब देने से कतराते हैं, और मीडिया भी पता नहीं क्यों अक्सर उस कोने तक उनको घेर नहीं पाता। जबकि होना यह चाहिए कि बात ठोस मुद्दे की हो। जो मामला बहस या विवाद का केन्द्र है, उस पर चुप रहकर किनारे-किनारे की बातों के पीछे छुपकर निकलने की सहूलियत सार्वजनिक जीवन के लोगों को नहीं मिलनी चाहिए। इसी कॉलम में हम कुछ बार एक लाईन लिख चुके हैं कि तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा...। 
पिछले दिनों छत्तीसगढ़ की एक कन्या छात्रावास में लड़कियों के साथ बदसलूकी का एक मामला सामने आया, जिस पर जिम्मेदारी साबित होने पर लंबी कैद हो सकती है। इस बारे में जब जिम्मेदार बड़े ओहदों वाले लोगों से पूछा गया, तो उनका जवाब काफी दूर तक इस पर टिका रहा कि ऐसे आरोप लगाने वाले लोगों की नीयत क्या है, वहां आसपास किस तरह का टकराव चलते रहता है, कैसी राजनीतिक-कीचड़बाजी वहां पर आम है। लेकिन छात्राओं के साथ ऐसा हुआ है या नहीं, उस पर जवाब के लिए घेरते-घेरते कुछ मिनट लग गए। यह रूख भारत में बड़ा आम है, और मीडिया के अच्छे-खासे, अपने आपको तेज-तर्रार साबित करने की कोशिश करने वाले लोग भी केक के ऊपर की खासी मोटी रंगीन सजावट में उलझकर रह जाते हैं, और इस सतह को पार करके तह तक नहीं पहुंच पाते। 
हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन की तमाम जवाबदेही की जगहों को बहुत साफ-साफ जवाब देने के लिए घेरना ही चाहिए। और यह काम जरूरी नहीं है कि अकेले मीडिया करे, आज तो सोशल मीडिया आम लोगों के हाथ है, और वहां पर लोगों को घेरा ही जा सकता है। खासकर ऐसे लोगों को जो कि जनता के पैसों पर तनख्वाह पाते हैं, या कि राजनीतिक-सामाजिक संगठनों के हैं, जो कि सरकार से टैक्स रियायत पाते हैं। किसी की नीयत या नीयत के इस्तेमाल का मौका, कभी भी असल मुद्दे से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। इसलिए बेमतलब बातों को रोकते हुए लोगों को सीधे मुद्दे के सवाल करने चाहिए। 

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