औलाद के साथ जापान जैसे ईश्वर-दर्शन पर न जाना पड़े

संपादकीय
22 अगस्त 2018


एक तस्वीर पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर घूम रही है जो है तो सच, लेकिन कुछ बरस पुरानी है। इस तस्वीर के साथ की जानकारी बताती है कि एक स्कूल की बच्चियों को वृद्धाश्रम दिखाने ले जाया गया, तो वहां उस बच्ची को अपनी दादी देखने मिली जो कि वहीं बसी हुई थी। दादी और पोती के बीच आंसू बह निकले, और जब लोगों को पता लगा कि बच्ची के मां-बाप उसे अब तक यह बताते आए थे कि दादी रिश्तेदारों के घर गई हुई है, तो बाकी बच्चियां और बाकी वृद्धाएं भी रोने लगीं। इंटरनेट की वजह से गलत जानकारी तेजी से फैलती भी है, और मीडिया का चौकन्ना हिस्सा तुरंत ही गलत जानकारी को गलत साबित भी कर देता है। इस तस्वीर की कहानी सच थी, लेकिन वह ताजा न होकर कुछ बरस पहले की थी।
आज देश में जगह-जगह अदालतों में यह बात सामने आ रही है कि बूढ़े मां-बाप का जमकर तिरस्कार हो रहा है, और उन्हें बेटा-बहू जमकर प्रताडि़त करते हैं, उनकी दौलत ले लेते हैं, और उसके बाद उन्हें दाने-दाने के लिए मोहताज कर देते हैं। कुछ महीने ही हुए हैं जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक संपन्न कारोबारी के बंद घर से पड़ोसियों ने दरवाजे खोलकर उसकी लकवाग्रस्त बूढ़ी मां को बिस्तर पर से बचाया था जिसे छोड़कर कारोबारी अपने परिवार को लेकर, मतलब, बाकी परिवार को लेकर, नए मकान में रहने चला गया था, और मां को मरने के लिए छोड़ दिया था। अभी कई जगहों पर अदालतों ने ये फैसले दिए हैं कि बूढ़े मां-बाप को गुजारा भत्ता देना या उनका ख्याल रखना उनके बच्चों की कानूनी जिम्मेदारी है। कई जगहों पर अदालती आदेश से परे ऐसे कानून भी बनाए जा रहे हैं जिनके तहत ऐसी नालायक और गैरजिम्मेदार औलाद को सजा देने का भी इंतजाम है। 
हम कई बरस पहले भी इसी जगह इस बात को लिख चुके हैं कि लोगों को अपने बुढ़ापे का ख्याल खुद रखना चाहिए। अपनी जमीन-जायदाद सम्हालकर रखनी चाहिए, और अपनी जिंदगी के आखिरी दिन तक का इंतजाम कर लेने के बाद ही उन्हें आल-औलाद को कुछ देना चाहिए। अपनी संतानों के लिए लोगों के मन में दुख-दर्द तो रहता है, लेकिन अपने बुढ़ापे की भुखमरी की कीमत पर उनको ऐसा दुख-दर्द नहीं पालना चाहिए। लोगों को अपने हाथ-पैर चलते हुए ही यह इंतजाम कर लेना चाहिए कि उनके बच्चों को उनके मर जाने के बाद ही उनसे सब कुछ हासिल हो। ऐसा न करके वे अपने बच्चों को भी गलत रास्ते धकेल देते हैं क्योंकि बेटे-बहू को जब यह समझ आ जाता है कि बूढ़े मां-बाप से अब और कुछ मिलना बाकी नहीं है, तो फिर उनमें से कुछ की नीयत तो बदल ही जाती है, और बूढ़ों की जिंदगी नर्क हो जाती है। 
बरसों पहले जापान की एक फिल्म आई थी जिसमें बहुत बुरी भुखमरी और अकाल से गुजरते हुए जापान में जब परिवारों के पास खाने को कुछ नहीं बचता है, तो बेटे बूढ़े मां-बाप को बारी-बारी से ईश्वर के दर्शन के नाम पर एक पहाड़ी पर ले जाते हैं, और वहां से उन्हें धकेलकर नीचे गिरा देते हैं, जहां का खड्ड ऐसे कंकालों से पटा हुआ रहता है। गांव के बुजुर्गों को कुछ तो एहसास हो चुका रहता है क्योंकि ऐसे ईश्वर-दर्शन को गए हुए कोई भी बुजुर्ग कभी वापिस नहीं लौटते थे। यह फिल्म कुछ अधिक क्रूर हो सकती है, लेकिन जब हकीकत को समझाना हो तो मिसालों का कुछ क्रूर होना जरूरी होता है, उससे कम में बात लोगों को समझ आती नहीं है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अगस्त

बिहार की ताजा भीड़-हिंसा सीधे सुप्रीम कोर्ट को चुनौती

संपादकीय
21 अगस्त 2018


बिहार के भोजपुर में एक किसी की लाश मिलने के बाद नाराज लोगों ने आगजनी की, और हत्या का आरोप लगाते हुए एक महिला को उसके घर से निकाला, और उसके सारे कपड़े उतारकर उसे मारते हुए उसका जुलूस निकाला। इस दौरान पुलिस वहां मौजूद रही, और उसने कुछ किया नहीं। बाद में इस सिलसिले में छह लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिसमें से एक लालू यादव की पार्टी का नेता भी बताया गया है। यह सब उस वक्त हो रहा है जब सुप्रीम कोर्ट मॉबलिचिंग को लेकर फिक्रमंद है, केन्द्र और राज्य सरकारों को कटघरे में खड़ा कर रखा है। केन्द्र सरकार भीड़ की हिंसा को लेकर एक नया कानून बनाने की बात कर रही है, और जानकार लोगों का यह मानना है कि देश के मौजूदा कानूनों में भीड़ द्वारा हिंसा पर कड़ी कार्रवाई करने के लिए वैसे भी काफी कड़े कानून मौजूद हैं, और उनका इस्तेमाल न करके अब और कड़े कानून की बात करना महज दिखावा है क्योंकि कागजों पर कड़ाई से असल जिंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ता। 
आज जब बिहार की यह ताजा हिंसा सामने आई, तो लोगों को तुरंत सूझा कि इसी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सुशासन बाबू कहा जाता है, और यह कैसा सुशासन है? इसी बिहार के बालिकागृह में भयानक बलात्कार के लंबे सिलसिले को लेकर गिरफ्तारियां, मंत्री का इस्तीफा तो हुआ ही है, एक प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान टिस की रिपोर्ट यह कहती है कि बिहार के तकरीबन सभी बालक-बालिकागृह यौन शोषण के शिकार हैं। ऐसे में सुशासन की बात खोखली रह जाती है क्योंकि बलात्कारियों के सरगना और भांडाफोड़ हुए ऐसे एक बालिकागृह के संचालक के साथ राज्य के मंत्रियों और बड़े नेताओं का घरोबा सामने आया है, और सरकार की बड़ी-लंबी चौड़ी मेहरबानी भी उस पर साबित हुई है। 
हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को बिहार की इस ताजा भीड़-हिंसा और महिला के साथ ऐसी भयानक बदसलूकी को लेकर एक मिसाल कायम करनी चाहिए, और वहां मौजूद तमाम पुलिस को कैद और बर्खास्त तो करना ही चाहिए, जिन लोगों की तस्वीरें और वीडियो इस महिला के साथ हिंसा करते हुए सामने आए हैं, उन तमाम लोगों को गिरफ्तार करके उनकी किसी भी जमानत पर सुप्रीम कोर्ट को ही सीधे रोक लगा देनी चाहिए। जब तक भीड़ की हिंसा पर भीड़ के हर चेहरे पर कार्रवाई नहीं होगी, कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, और जमानत की संभावना खत्म नहीं की जाएगी, तब तक भीड़ की हिंसा जारी रहेगी। हिन्दुस्तान का आज जो चेहरा पूरी दुनिया में सामने आ रहा है, वह हिंसा, खासकर यौन हिंसा से भरे हुए समाज का है, और इस तस्वीर को बदलने के लिए ही नहीं, बेकसूर लोगों को बचाने के लिए भी यह जरूरी है कि मौजूदा कानूनों के तहत ही सुप्रीम कोर्ट असाधारण कार्रवाई करे, और इसमें कुछ भी अटपटा नहीं होगा। 
दूसरी तरफ अभी-अभी मध्यप्रदेश का एक वीडियो सामने आया है उसमें बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार लोगों को कुछ लड़कियां या महिलाएं खुलेआम जूतों से पीट रही हैं, इनके साथ-साथ महिला पुलिस भी उन्हें वहीं पर मार रही है। यह बात समझना चाहिए कि जब सार्वजनिक और सामूहिक हिंसा को पुलिस की तरफ से ऐसा बढ़ावा दिया जाता है, तो आज तो वह किसी आरोपी के खिलाफ है, पुलिस के द्वारा है, कल के दिन वही हिंसा, वैसी ही हिंसा बेकसूर के खिलाफ भी होती है, और वह किसी भी हद तक बढ़ती चली जाती है। किसी समाज में कानून का राज ऐसे लागू नहीं हो सकता कि पुलिस हिंसा करे, और बाकी समाज हिंसा न करे। इसलिए पुलिस को भी एक मिसाल कायम करनी होगी, सार्वजनिक हिंसा से बचकर। वरना उसके देखादेखी, उससे चार कदम आगे बढ़कर भी लोग हिंसा करते रहेेंगे। फिलहाल बिहार की इस भीड़-हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई का इंतजार है क्योंकि यह हिंसा न सिर्फ एक अकेली महिला के खिलाफ है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान ही सामने आकर अदालत को चुनौती भी है।  (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 21 अगस्त

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अगस्त

सिद्धू, और नफरतजीवी

20 अगस्त  2018

पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री और वहां के पुराने क्रिकेट कप्तान इमरान खान के शपथग्रहण में पहुंचकर भारत के पंजाब के एक मंत्री, पुराने क्रिकेटर, और मशहूर टीवी कलाकार नवजोत सिंह सिद्धू ने हिन्दुस्तान में नफरतजीवियों की जिंदगी थोड़ी सी बढ़ा दी। ढेर से लोगों को उन्हें गद्दार कहने का मौका मिला जिनको कि पिछले कुछ दिनों में हिन्दुस्तान में किसी को गद्दार करार देने का मौका न मिलने पर बड़ी बेचैनी थी। बहुत से हिन्दुस्तानियों को यह लगा कि किसी हिन्दुस्तानी को ऐसे पाकिस्तानी के शपथग्रहण पर क्यों जाना चाहिए था जिसका मुल्क सरहद पर भारत के खिलाफ हमले करते ही रहता है। बहुत से लोगों को यह शिकायत हुई कि सिद्धू को आजाद कश्मीर नाम के पाक अधिकृत कश्मीर के मुखिया के बगल में बिठाया गया, और सिद्धू को इसमें कुछ बुरा नहीं लगा। बहुत से लोगों को यह बात खली कि सिद्धू ने वहां के फौजी जनरल कमर बाजवा को गले लगाया।
काफी अरसे से नफरतजीवी निराश और हताश थे कि किसी खास इंसान को देश का गद्दार करार देने का मौका आया नहीं था। ऐसे में दो-तीन छोटी-छोटी बातों में इनको निराशा की गहराई से निकालकर नफरत की सांस लेने का मौका दिया। बिहार के मोतिहारी में एक कॉलेज प्रोफेसर ने फेसबुक पर किसी और की लिखी एक बात को दुबारा पोस्ट किया या पसंद किया कि अटल बिहारी वाजपेयी के साथ फासीवाद के एक युग की समाप्ति। अटलजी अनंत यात्रा पर निकले।
इस एक लाईन पोस्ट करने के बाद इस प्रोफेसर को शहर के मवालियों ने उन्हें फोन पर धमकी दी, और शायद इसी वजह से उनके घर घुसकर उन्हें घर से निकालकर बुरी तरह से मारा, और उन पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगाने की भी कोशिश की। वैसे यह भी कहा जा रहा है कि उनके विश्वविद्यालय में वे कुलपति के खिलाफ एक आंदोलन में शामिल थे, और हमले की एक वजह यह भी हो सकती है। दिलचस्प बात यह है कि देश के एक सबसे बड़े अखबार का मोतिहारी का ब्यूरोचीफ अपने फेसबुक पेज पर इस प्रोफेसर को आतंकवादी लिखते आ रहा था, और इस हमले और हिंसा में भी वह शामिल था, और उसे भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है।
उधर महाराष्ट्र के औरंगाबाद में म्युनिसिपल कार्पोरेशन में जब अटलजी को श्रद्धांजलि देने का प्रस्ताव कुछ पार्षदों ने रखा, तो एक मुस्लिम पार्टी के एक पार्षद ने इसका विरोध किया। इस पर प्रस्ताव रखने वाले पार्षदों ने एकजुट होकर जिस तरह सदन के भीतर ही उस मुस्लिम पार्षद को घेरकर मारा, टेबिलों पर चढ़कर लातों से मारा, जमीन पर गिराकर मारा, उसका वीडियो दिल दहलाने वाला है।
अब नवजोत सिंह सिद्धू को गद्दार कहकर उस पर हमला करने वाले लोगों को, और अटल बिहारी वाजपेयी के हिमायती बनकर उनके आलोचकों पर या उनसे असहमति रखने वालों पर हमला करने वाले लोगों को कुछ पढ़ाई-लिखाई की जरूरत है। अटलजी ने अपने प्रधानमंत्री रहते हुए देश के करोड़ों नफरतजीवियों की मर्जी के खिलाफ, अपनी पार्टी के बहुत से लोगों के मर्जी के खिलाफ बस लेकर पाकिस्तान तक जाना तय किया था, और वे गए थे। उनकी बस में बैठी हुई तस्वीरें ऐतिहासिक हैं, और बाद का इतिहास भी सरल हिन्दी भाषा में भी दर्ज है ताकि नफरतजीवी उसे ठीक से पढ़ सकें। इस दिल्ली-लाहौर बस को सदा-ए-सरहद नाम दिया गया था, और ऐसी पहली बस लेकर 19 फरवरी 1999 को अटलजी पाकिस्तान गए थे, और जब कारगिल की जंग चल रही थी तब भी यह बस जारी रखी गई थी। लोगों को यह भी याद रखने की जरूरत है कि पाकिस्तान के एक फौजी तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ ने बाद में खुलासे से यह मंजूर किया था कि किस तरह उन्होंने हिन्दुस्तान के कारगिल पर हमला किया था, कब्जा किया था, और इस जंग की शुरुआत की थी। और ऐसी जंग के चलते हुए भी अटलजी ने आम हिन्दुस्तानियों और पाकिस्तानियों के आने-जाने की इस बस को बंद करने का सोचा नहीं था।
जिन लोगों के लिए आज नफरत को उगलना रोजाना का एक जरूरी शगल है, उन लोगों को कुछ ताजा बातें भी याद रखनी चाहिए कि पिछले आम चुनाव में पूरे वक्त पाकिस्तान के खिलाफ बड़े-बड़े फतवे जारी करने वाले, और एक के बदले दस सिर काटकर लाने की मुनादी करने वाले नरेन्द्र मोदी ने भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को अपने शपथग्रहण में बुलाया था। और इतना ही नहीं, दूसरे देश से हिन्दुस्तान लौटते हुए मोदी ने अचानक यह तय किया था कि वे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के जन्मदिन पर उनके घर जाकर उन्हें मुबारकबाद देंगे, और वे अचानक पाकिस्तान में उतरे, नवाज शरीफ के घर गए, उनके परिवार से मिले, परिवार में होने जा रही एक शादी की मिठाई खाई, परिवार को तोहफे दिए, और सबको हक्का-बक्का छोड़कर हिन्दुस्तान लौटे।
दिलचस्प बात यह है कि नवाज शरीफ का जन्मदिन 25 दिसंबर को था, और उसी दिन अटल बिहारी वाजपेयी का भी जन्मदिन था, और उसी दिन पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का भी जन्मदिन था जो कि पाकिस्तान में राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है। और उस दिन जिन्ना की 140वीं सालगिरह थी, और पूरे पाकिस्तान में वह दिन बड़ा खास मनाया जा रहा था। इसके बाद भी मोदी और शरीफ परिवारों के बीच तोहफों और मिठाईयों का लेन-देन हुआ, एक-दूसरे की मां के लिए शॉल भेजी गईं, और दूसरे तोहफे भी। यह सब उस वक्त हुआ जब कुछ महीने पहले तक मोदी एक शहीद हिन्दुस्तानी सैनिक के बदले दस पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काटकर लाने की कसम मंच और माईक से खा रहे थे।
आज नवजोत सिंह सिद्धू के खिलाफ जहर उगलने वाले और उन्हें गद्दार कहने वाले लोगों को पिछले कुछ बरसों का अटल बिहारी वाजपेयी और नरेन्द्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री रहते हुए किए गए इन कामों को याद रखना चाहिए। नफरतजीवियों को यह भी याद रखना चाहिए कि चाहे पाकिस्तान हो, या कि कोई और पड़ोसी देश, उससे नफरत और दुश्मनी रखने का मतलब जंग की तैयारियों पर इतना फिजूलखर्च करना होता है कि अपने देश के सबसे गरीब बच्चों के मुंह का निवाला छिनता है, और अपने मरीजों से दवाईयां छिनती हैं, और अपनी स्कूलों से दोपहर का खाना छिनता है।
इस कीमत पर नफरत को पालना और बढ़ाना जिन लोगों को ठीक लगता है, उनको यह भी नहीं दिखता कि पाकिस्तान में पहली बार एक ऐसा फौजी जनरल, कमर बाजवा, आया है जो खुलकर भारत के साथ अमन की वकालत करता है। एक अखबारनवीस ने आज ही फेसबुक पर एक पोस्ट में यह याद दिलाया है कि अफ्रीका के कांगो में भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष मेजर जनरल विक्रम सिंह के मातहत 2012 से 2014 के बीच यूएन शांति सेना में कमर बाजवा ने काम किया था, और उन दोनों के बीच अच्छे रिश्ते थे, उनकी काबिलीयत को देखकर विक्रम सिंह ने सार्वजनिक रूप से उनकी तारीफ की थी। कांगो मिशन के बाद 2016 में कमर बाजवा को पाकिस्तानी सेना का चीफ ऑफ स्टाफ बना दिया गया था।
आज पाकिस्तान में सेना का सबसे बड़ा अफसर अगर पाकिस्तानी सेना की पुरानी साख को तोड़ते हुए एक से अधिक बार सार्वजनिक रूप से हिन्दुस्तान के साथ अमन के रिश्तों की वकालत करता है, तो हिन्दुस्तान को भी इस बात को समझना चाहिए, खासकर हिन्दुस्तान के उन नफरतजीवियों को जिनको अटल बिहारी वाजपेयी और नरेन्द्र मोदी की असाधारण पहल को अनदेखा करने में मजा आता है। कहने के लिए तो ये लोग, ऐसे लोग, वाजपेयी और मोदी के नाम पर मरने-मारने की बात करते हैं, हिंसा पर उतर आते हैं, लेकिन जिनको भारत के इन दोनों प्रधानमंत्रियों की पहल भी याद नहीं है, या इसे वे कोशिश करके भुलाकर रखते हैं।  (Daily Chhattisgarh)

हिंदुस्तान इमरान से कुछ सीख भी तो सकता है...

संपादकीय
20 अगस्त 2018


पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार में यह पहली पारी है और ऐसे में नए आए लोग कई तरह से नई शुरूआत कर सकते हैं। परंपरागत नेता, चाहे भारत में हो, या पाकिस्तान में, वे सरकारी खर्च पर रईसी से जीने के लिए जाने जाते हैं। भारत में ही वामपंथियों और ममता बैनर्जी जैसे गिनेचुने नेताओं को छोड़ दें, तो बाकी किसी पार्टी के कोई नेता सादगी का स भी नहीं जानते। और यह सब कुछ वे तब तक करते हैं जब तक जनता का पैसा अपने पर खर्च करने की ताकत उनके हाथ रहती है। और यह भी है कि इस ताकत के हाथ से जाने तक वे इतनी दौलत जुटा चुके रहते हैं कि उसके एक हिस्से को खर्च करके ही वे उसी दर्जे की सुख-सुविधा जारी रख सकते हैं। इमरान खान के पाकिस्तान में ही उनके पहले के एक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ आज भ्रष्टाचार के जुर्म में बेटी सहित जेल में हैं, और इमरान के एक दूसरे प्रतिद्वंद्वी, बेनजीर भुट्टो के पति पर भी भ्रष्टाचार की अनगिनत तोहमतें लगी हुई हैं। 
खैर, भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में भ्रष्टाचार की बात अधिक करना फिजूल है जब तक कि इनमें किसी नेता के भ्रष्टाचार के पुख्ता सुबूत अदालत में खड़े न हो सकें। ऐसे सुबूत डटे रहें, तो भारत में कुछ नेता अपने मरने के पहले शायद कुछ बरस कैद पा भी लेते हैं, जैसे लालू यादव। लेकिन अधिकतर लोगों का कुछ बिगड़ता नहीं है, इसलिए भ्रष्टाचार के बजाय किफायत पर चर्चा जरूरी है। छत्तीसगढ़ में ही हम देखते हैं कि जो लोग सरकारी खर्च पर अपने घर-दफ्तर सजाते हैं, उन्हें कितना भी खर्च करते हुए कोई दर्द नहीं होता। जो लोग कुछ बरस पहले दुपहियों पर चलते थे, और आज गाडिय़ों के काफिलों में सायरन बजाते जनता को रौंदते चलते हैं, उन्हें बंगलों में सौ-पचास एयरकंडीशनर लगवाते हुए भी कुछ नहीं लगता।
लेकिन यह जरूरी नहीं है कि छत्तीसगढ़ में ऐसी संपन्नता और ऐसी फिजूलखर्ची हमेशा बनी रहे, और किसी अदालत का इस पर कोई हुक्म न आए। हम पूरे भारत के संदर्भ में इमरान खान की बात कहना चाहते हैं जिन्होंने यह घोषणा की है कि उनका महल सरीखा मकान सुरक्षा एजेंसियों ने सुरक्षित नहीं पाया है, इसलिए वे सरकारी मकान में तो रहेंगे, लेकिन तीन बेडरूम के एक छोटे मकान में रहेंगे न कि प्रधानमंत्री निवास पर। प्रधानमंत्री के लिए अब तक चली आ रहीं अस्सी कारों में से वे सिर्फ दो रख रहे हैं, और बाकी नीलाम करवा दे रहे हैं। इसी तरह प्रधानमंत्री निवास पर अब तक तैनात सवा पाँच सौ कर्मचारियों में से वे सिर्फ दो कर्मचारी घर पर रख रहे हैं, और बाकी सरकारी विभागों को वापिस कर दे रहे हैं। अब तक एक सरकारी अफसर जिस मकान में रहता था, वे उसमें रहने चले गए हैं, और वहां से कल प्रधानमंत्री कार्यालय पैदल जाते हुए भी उनकी तस्वीर छपी है।
हिंदुस्तान और पाकिस्तान के आम लोग, खास लोग, और नेता एक दूसरे की देखा-देखी बहुत सी बातें करते हैं, और बहुत से काम करते हैं इसलिए भारत के नेताओं को इमरान को देखते हुए किफायत में उनको शिकस्त देने की कोशिश करनी चाहिए। आज तो हालत यह है कि किसी राज्य सरकार में भी मंझले दर्जे के किसी अफसर के घर भी दो या अधिक गाडिय़ां तैनात दिखती हैं। यह सिलसिला टूटना चाहिए, और इसके लिए जरूरत हो तो जनता के बीच से किफायत की मांग उठनी चाहिए। 
(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अगस्त

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अगस्त

केरल को लगी बुरी ठोकर से बाकी प्रदेश सबक लें...

संपादकीय
19 अगस्त 2018


केरल में अंधाधुंध असाधारण बारिश और उससे आई बाढ़ में सैकड़ों लोग मारे गए हैं, लाखों लोग बेघर हो गए हैं, और दसियों हजार करोड़ के नुकसान का अंदाज है। अब जिस तरह की विकराल बारिश हुई है, उसने सौ बरस रिकॉर्ड तोड़ दिया है, और उस पर सीधे-सीधे सरकार का कोई काबू नहीं दिखता है। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ और ऐसी बातें हैं जो कि केरल सरकार को करनी चाहिए थीं, और उसने नहीं की। वहां से दूर हमारा यह लिखना न तो आज केरल सरकार को कोई मदद कर सकता है, न ही इस आलोचना को यह अहिन्दीभाषी प्रदेश पढऩे जा रहा है, लेकिन इसे लिखने का मकसद यह है कि दूसरे राज्य और उनको चलाने वाले लोग अपने-अपने इलाकों में हालात को काबू में रखने की कोशिशें करने में लग जाएं। जो तैयारी केरल नहीं कर पाया था, वह तैयारी बाकी राज्य कर सकें। 
अभी जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक केरल में नदियों के किनारे अंधाधुंध खुदाई हुई है, और इस तरह की बाढ़ आने की एक वजह इसको भी बताया जा रहा है। दूसरी तरफ हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बैठकर यह देख रहे हैं कि यहां भी तमाम नदियों के किनारे गैरकानूनी मशीनें लगाकर अंधाधुंध रेत खुदाई की जा रही है, और ईंट भ_ों के लिए मिट्टी भी खोदी जा रही है। इससे कुदरत की मार जिस दिन इस प्रदेश पर पड़ेगी, उस दिन नदियों में बाढ़ का क्या हाल होगा, इसका अंदाज लगाना अभी हमारे लिए मुमकिन नहीं है, लेकिन कोई अच्छा हाल नहीं होगा। दूसरी तरफ जहां-जहां बाढ़ के हालात होते हैं, वहां का एक आम तजुर्बा यह है कि नदियों के किनारे के इलाकों में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई होती है, और उसकी वजह से जमीन में पानी को रोकने की क्षमता घट जाती है, और मिट्टी बह-बहकर नदियों में आती है, और उन्हें पाटकर गहराई घटाती है, पानी रोकने की क्षमता कम कर देती है। यह पूरा सिलसिला बहुत वैज्ञानिक तरीके से दर्ज हो चुका है, और इस पर हमारी अलग से कोई निजी सोच नहीं है, सिवाय इसके कि समय रहते राज्यों को यह समझ लेना चाहिए कि वे कुदरत पर जुल्म बंद करें।
केरल के बारे में एक बात यह भी सामने आई है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश, और केन्द्र सरकार के निर्देश के बावजूद केरल में एसडीआरएफ (राज्य आपदा निपटारा फोर्स) की एक भी बटालियन नहीं बनाई गई थी। इसलिए जब यह भयानक तबाही हुई तो राज्य को केन्द्रीय सुरक्षा बलों के साथ-साथ मिलिट्री का भी मोहताज होना पड़ा। एक तरफ तो सेना के हेलीकॉप्टरों और मोटरबोट ने लोगों की जिंदगी बचाई, दूसरी तरफ राज्य के हजारों मछुआरों ने अपनी नाव और बोट लेकर दसियों हजार लोगों को बचाया है। चारों तरफ पानी से घिरे हुए राज्य ने पिछली एक सदी में ऐसी तबाही नहीं देखी थी, और इसलिए उसने शायद यह मान लिया था कि उसे किसी तैयारी की जरूरत नहीं है। इस प्रदेश में या देश में किस पार्टी का राज्य है, इसे देखे और सोचे बिना शासन-प्रशासन के हिसाब से यह सोचना जरूरी है कि सरकार ने कहां-कहां चूक की है, और उसे लगी ठोकर से बाकी राज्य अपनी तैयारियों को एक बार कैसे कसौटी पर कस लें। 
दरअसल देश या दुनिया में जहां कहीं भी किसी भी तरह के प्राकृतिक या मानव निर्मित हादसे होते हैं, उन्हें देखकर बाकी दुनिया के शासन-प्रशासन को यह तौल लेना चाहिए कि अगर उनकी जिम्मेदारी के इलाके में अगर ऐसा कुछ होता है, तो क्या वे उससे निपटने के लिए तैयार हैं? कई राज्यों में लगातार स्कूल बसों के सड़क हादसे होते हैं, मुसाफिर बसों के बड़े बुरे एक्सीडेंट होते हैं, लेकिन दूसरे राज्य उनसे सबक लेकर अपने इलाकों में कोई जांच और सुधार करने का सरदर्द नहीं पालते। हर राज्य को आपदा नियंत्रण की अपनी तैयारी को ठीक से तौल लेना चाहिए क्योंकि जब तक केन्द्र सरकार या दूसरे राज्यों से कोई मदद पहुंचती है, तब तक तो जरूरतमंदों के शुरू के घंटे, शुरू के दिन खत्म हो चुके रहते हैं, और मौतों को टालने की संभावना भी खत्म हो चुकी रहती है। केरल आज बाकी देश की मदद से इस नुकसान से जल्द से जल्द उबरे, लेकिन हर प्रदेश को अपने आपदा प्रबंधन अफसर को अभी से तैनात करना चाहिए कि अभी वे दूर बैठकर, और कुछ हफ्तों या महीनों के बाद केरल जाकर यह सीखकर आएं कि उन्हें अपने प्रदेश में ऐसी नौबत, या किसी और नुकसान की नौबत कैसे टालना है।
-सुनील कुमार 

(Daily Chhattisgarh)