संपादकीय
21 अगस्त 2018

बिहार के भोजपुर में एक किसी की लाश मिलने के बाद नाराज लोगों ने आगजनी की, और हत्या का आरोप लगाते हुए एक महिला को उसके घर से निकाला, और उसके सारे कपड़े उतारकर उसे मारते हुए उसका जुलूस निकाला। इस दौरान पुलिस वहां मौजूद रही, और उसने कुछ किया नहीं। बाद में इस सिलसिले में छह लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिसमें से एक लालू यादव की पार्टी का नेता भी बताया गया है। यह सब उस वक्त हो रहा है जब सुप्रीम कोर्ट मॉबलिचिंग को लेकर फिक्रमंद है, केन्द्र और राज्य सरकारों को कटघरे में खड़ा कर रखा है। केन्द्र सरकार भीड़ की हिंसा को लेकर एक नया कानून बनाने की बात कर रही है, और जानकार लोगों का यह मानना है कि देश के मौजूदा कानूनों में भीड़ द्वारा हिंसा पर कड़ी कार्रवाई करने के लिए वैसे भी काफी कड़े कानून मौजूद हैं, और उनका इस्तेमाल न करके अब और कड़े कानून की बात करना महज दिखावा है क्योंकि कागजों पर कड़ाई से असल जिंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ता।
आज जब बिहार की यह ताजा हिंसा सामने आई, तो लोगों को तुरंत सूझा कि इसी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सुशासन बाबू कहा जाता है, और यह कैसा सुशासन है? इसी बिहार के बालिकागृह में भयानक बलात्कार के लंबे सिलसिले को लेकर गिरफ्तारियां, मंत्री का इस्तीफा तो हुआ ही है, एक प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान टिस की रिपोर्ट यह कहती है कि बिहार के तकरीबन सभी बालक-बालिकागृह यौन शोषण के शिकार हैं। ऐसे में सुशासन की बात खोखली रह जाती है क्योंकि बलात्कारियों के सरगना और भांडाफोड़ हुए ऐसे एक बालिकागृह के संचालक के साथ राज्य के मंत्रियों और बड़े नेताओं का घरोबा सामने आया है, और सरकार की बड़ी-लंबी चौड़ी मेहरबानी भी उस पर साबित हुई है।
हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को बिहार की इस ताजा भीड़-हिंसा और महिला के साथ ऐसी भयानक बदसलूकी को लेकर एक मिसाल कायम करनी चाहिए, और वहां मौजूद तमाम पुलिस को कैद और बर्खास्त तो करना ही चाहिए, जिन लोगों की तस्वीरें और वीडियो इस महिला के साथ हिंसा करते हुए सामने आए हैं, उन तमाम लोगों को गिरफ्तार करके उनकी किसी भी जमानत पर सुप्रीम कोर्ट को ही सीधे रोक लगा देनी चाहिए। जब तक भीड़ की हिंसा पर भीड़ के हर चेहरे पर कार्रवाई नहीं होगी, कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, और जमानत की संभावना खत्म नहीं की जाएगी, तब तक भीड़ की हिंसा जारी रहेगी। हिन्दुस्तान का आज जो चेहरा पूरी दुनिया में सामने आ रहा है, वह हिंसा, खासकर यौन हिंसा से भरे हुए समाज का है, और इस तस्वीर को बदलने के लिए ही नहीं, बेकसूर लोगों को बचाने के लिए भी यह जरूरी है कि मौजूदा कानूनों के तहत ही सुप्रीम कोर्ट असाधारण कार्रवाई करे, और इसमें कुछ भी अटपटा नहीं होगा।
दूसरी तरफ अभी-अभी मध्यप्रदेश का एक वीडियो सामने आया है उसमें बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार लोगों को कुछ लड़कियां या महिलाएं खुलेआम जूतों से पीट रही हैं, इनके साथ-साथ महिला पुलिस भी उन्हें वहीं पर मार रही है। यह बात समझना चाहिए कि जब सार्वजनिक और सामूहिक हिंसा को पुलिस की तरफ से ऐसा बढ़ावा दिया जाता है, तो आज तो वह किसी आरोपी के खिलाफ है, पुलिस के द्वारा है, कल के दिन वही हिंसा, वैसी ही हिंसा बेकसूर के खिलाफ भी होती है, और वह किसी भी हद तक बढ़ती चली जाती है। किसी समाज में कानून का राज ऐसे लागू नहीं हो सकता कि पुलिस हिंसा करे, और बाकी समाज हिंसा न करे। इसलिए पुलिस को भी एक मिसाल कायम करनी होगी, सार्वजनिक हिंसा से बचकर। वरना उसके देखादेखी, उससे चार कदम आगे बढ़कर भी लोग हिंसा करते रहेेंगे। फिलहाल बिहार की इस भीड़-हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई का इंतजार है क्योंकि यह हिंसा न सिर्फ एक अकेली महिला के खिलाफ है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान ही सामने आकर अदालत को चुनौती भी है। (Daily Chhattisgarh)
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