औलाद के साथ जापान जैसे ईश्वर-दर्शन पर न जाना पड़े

संपादकीय
22 अगस्त 2018


एक तस्वीर पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर घूम रही है जो है तो सच, लेकिन कुछ बरस पुरानी है। इस तस्वीर के साथ की जानकारी बताती है कि एक स्कूल की बच्चियों को वृद्धाश्रम दिखाने ले जाया गया, तो वहां उस बच्ची को अपनी दादी देखने मिली जो कि वहीं बसी हुई थी। दादी और पोती के बीच आंसू बह निकले, और जब लोगों को पता लगा कि बच्ची के मां-बाप उसे अब तक यह बताते आए थे कि दादी रिश्तेदारों के घर गई हुई है, तो बाकी बच्चियां और बाकी वृद्धाएं भी रोने लगीं। इंटरनेट की वजह से गलत जानकारी तेजी से फैलती भी है, और मीडिया का चौकन्ना हिस्सा तुरंत ही गलत जानकारी को गलत साबित भी कर देता है। इस तस्वीर की कहानी सच थी, लेकिन वह ताजा न होकर कुछ बरस पहले की थी।
आज देश में जगह-जगह अदालतों में यह बात सामने आ रही है कि बूढ़े मां-बाप का जमकर तिरस्कार हो रहा है, और उन्हें बेटा-बहू जमकर प्रताडि़त करते हैं, उनकी दौलत ले लेते हैं, और उसके बाद उन्हें दाने-दाने के लिए मोहताज कर देते हैं। कुछ महीने ही हुए हैं जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक संपन्न कारोबारी के बंद घर से पड़ोसियों ने दरवाजे खोलकर उसकी लकवाग्रस्त बूढ़ी मां को बिस्तर पर से बचाया था जिसे छोड़कर कारोबारी अपने परिवार को लेकर, मतलब, बाकी परिवार को लेकर, नए मकान में रहने चला गया था, और मां को मरने के लिए छोड़ दिया था। अभी कई जगहों पर अदालतों ने ये फैसले दिए हैं कि बूढ़े मां-बाप को गुजारा भत्ता देना या उनका ख्याल रखना उनके बच्चों की कानूनी जिम्मेदारी है। कई जगहों पर अदालती आदेश से परे ऐसे कानून भी बनाए जा रहे हैं जिनके तहत ऐसी नालायक और गैरजिम्मेदार औलाद को सजा देने का भी इंतजाम है। 
हम कई बरस पहले भी इसी जगह इस बात को लिख चुके हैं कि लोगों को अपने बुढ़ापे का ख्याल खुद रखना चाहिए। अपनी जमीन-जायदाद सम्हालकर रखनी चाहिए, और अपनी जिंदगी के आखिरी दिन तक का इंतजाम कर लेने के बाद ही उन्हें आल-औलाद को कुछ देना चाहिए। अपनी संतानों के लिए लोगों के मन में दुख-दर्द तो रहता है, लेकिन अपने बुढ़ापे की भुखमरी की कीमत पर उनको ऐसा दुख-दर्द नहीं पालना चाहिए। लोगों को अपने हाथ-पैर चलते हुए ही यह इंतजाम कर लेना चाहिए कि उनके बच्चों को उनके मर जाने के बाद ही उनसे सब कुछ हासिल हो। ऐसा न करके वे अपने बच्चों को भी गलत रास्ते धकेल देते हैं क्योंकि बेटे-बहू को जब यह समझ आ जाता है कि बूढ़े मां-बाप से अब और कुछ मिलना बाकी नहीं है, तो फिर उनमें से कुछ की नीयत तो बदल ही जाती है, और बूढ़ों की जिंदगी नर्क हो जाती है। 
बरसों पहले जापान की एक फिल्म आई थी जिसमें बहुत बुरी भुखमरी और अकाल से गुजरते हुए जापान में जब परिवारों के पास खाने को कुछ नहीं बचता है, तो बेटे बूढ़े मां-बाप को बारी-बारी से ईश्वर के दर्शन के नाम पर एक पहाड़ी पर ले जाते हैं, और वहां से उन्हें धकेलकर नीचे गिरा देते हैं, जहां का खड्ड ऐसे कंकालों से पटा हुआ रहता है। गांव के बुजुर्गों को कुछ तो एहसास हो चुका रहता है क्योंकि ऐसे ईश्वर-दर्शन को गए हुए कोई भी बुजुर्ग कभी वापिस नहीं लौटते थे। यह फिल्म कुछ अधिक क्रूर हो सकती है, लेकिन जब हकीकत को समझाना हो तो मिसालों का कुछ क्रूर होना जरूरी होता है, उससे कम में बात लोगों को समझ आती नहीं है। (Daily Chhattisgarh)

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