संपादकीय
28 फरवरी 2015
केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली के बजट में आज की बातों पर जानकार लोग अधिक विश्लेषण करेंगे, लेकिन हम इसके छोटे से हिस्से पर अभी बात करना चाहते हैं, जिससे कि लोगों को न सिर्फ बड़ी तकलीफ होगी, बल्कि बड़ी चोरी भी बढ़ेगी। हर किस्म की सेवा पर लगने वाले 12.36 फीसदी सर्विस टैक्स को बढ़ाकर 14 फीसदी कर दिया गया है, और देश में छोटे-छोटे से काम पर भी यह टैक्स लगता है। आज भी भारत में जितने लोगों पर यह लागू होना चाहिए, उसमें से दस फीसदी लोग ही इसे चुकाते हैं, और बाकी लोग इसे चुरा लेते हैं। अब जो लोग ईमानदार नीयत से सर्विस टैक्स देना चाहते हैं, उनके और सर्विस टैक्स-चोरों के बीच कमाई का फर्क करीब 15 फीसदी हो जाएगा। यह नौबत लोगों को सर्विस टैक्स चोरी के लिए उकसाएगी, और लोग अपने कागजात छुपाकर इसके दायरे से बाहर रहना चाहेंगे।
कुछ टैक्स ऐसे रहते हैं जिनमें कमाई को, काम को, कारोबार और हिसाब-किताब को छुपाने की गुंजाइश खासी रहती है। सर्विस टैक्स वैसा ही है। छोटे-छोटे से कारोबार भी इसके दायरे में आ जाते हैं, और वहां पर व्यापार को छुपाना आसान रहता है। इसलिए ईमानदारी और बेईमानी के बीच 15 फीसदी का फासला कारोबार के हिसाब से बड़ा घातक है, और उससे टैक्स चोरों को बढ़ावा मिलेगा। टैक्स पर अमल की हमारी मामूली जानकारी और मामूली समझ के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि सर्विस टैक्स की लंबी लिस्ट में जितने तरह की सेवाएं लिखी गई हैं उन सब तक पहुंच पाना सरकार के बस का वैसे भी नहीं है। इसलिए अधिक अच्छा यह होता कि सर्विस टैक्स को घटाकर लोगों को इसकी चोरी की तरफ से दूर हटाया जाता, और टैक्स देने वालों का दायरा बढ़ाया जाता। कम लोगों से अधिक वसूली की पुरानी सोच को पता नहीं अरूण जेटली ने इस बजट में क्यों लागू किया है।
लेकिन एक दूसरी बात अमरीकी टैक्स कानून की तरह की भारत में लागू करने की बात उन्होंने की है। आयकर चोरी करने वाले, काला धन जमा करने वाले लोगों को कैद देने का एक कानून बनाने की बात बजट भाषण में की गई है, और यह एक असरदार बात हो सकती है। आयकर चोरी बहुत ही आम बात है, और देश में इसकी वजह से एक ऐसी समानांतर अर्थव्यवस्था विकसित हो चुकी है जिसके तहत और लोग भी काला धन कमाने और उसी पर अपने कारोबार को टिकाने को फायदे का पाते हैं। आज हालत यह है कि भारत में किसी जमीन या मकान-दुकान को कोई बेचना चाहे, तो एक नंबर के पैसों वाले खरीददार मिलते नहीं, या कोई एक नंबर में खरीदना चाहे तो बेचने वाले उतनी रकम एक नंबर में लेना नहीं चाहते। काले धन की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत हो चुकी है कि कई किस्म के कारोबार इसके बिना आज चल नहीं सकते, और काले धन को सफेद करना अपने आपमें देश का एक बड़ा कारोबार बन चुका है। ऐसे में आयकर चोरी या काले धन के कारोबार पर अब दस साल तक की कैद का इंतजाम किया जा रहा है, और अमरीका में यह कामयाब भी रहा है। हम इसे ठीक मानते हैं। आज भी भारत में सर्विस टैक्स वसूलने वाले केन्द्रीय आबकारी विभाग के आबकारी शुल्क की चोरी पर कैद का इंतजाम है ही, और इसका विस्तार आयकर चोरी तक होना ठीक है।
भारत के बहुत बड़े मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग को इस बजट से निराशा होगी कि आयकर छूट की सीमा नहीं बढ़ाई गई है। हम इसे बहुत अधिक जरूरी तो नहीं मानते, और टैक्स के लायक कमाई वाले लोगों को इतना टैक्स देना भी चाहिए, लेकिन यहां पर एक दिक्कत आती है। सरकारी या गैरसरकारी क्षेत्र के जो आयकरदाता अपनी तनख्वाह पर आयकर देते हैं, उनके पास छुपाने, बचाने, या चोरी करने की कोई गुंजाइश नहीं होती। जबकि यह आम बात है कि उनसे कई गुना अधिक कमाई करने वाले कारोबारी अपनी कमाई का अधिकांश हिस्सा छुपाने का रास्ता निकाल लेते हैं। इस जमीनी हकीकत को देखते हुए अरूण जेटली को वेतन पर कटने वाले आयकर पर एक छूट देनी थी, इसके बिना बराबर कमाई बताने वाले वेतनभोगी और कारोबारी के बीच टैक्स का बोझ बहुत अलग-अलग स्तर का हो जाता है। बजट की बाकी बातों पर आने वाले दिनों में इसी पन्ने पर कई और बातें।

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