01 अक्टूबर 2026
दुनिया भर की टेक्नॉलॉजी कंपनियों के बीच इस बात पर जोरों से बातचीत चल रही है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का विकास जिस रफ्तार से हो रहा है, क्या उस रफ्तार से उस पर काबू पाने का काम भी चल रहा है? दुनिया भर के जानकार लोग हजारों की संख्या में एक साथ यह सार्वजनिक अपील कर चुके हैं कि एआई के विकास की रफ्तार पर रोक लगाई जाए। एक बड़ी कंपनी छोडक़र निकलने वाले एआई प्रोजेक्ट के जानकार ने तो औपचारिक साक्षात्कार में यह कहा कि इस बात की आशंका दस फीसदी से अधिक है कि अगले दस बरस में एआई मानव प्रजाति को ही खत्म कर दे। ऐसे में पिछले दो-तीन दिनों से अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के साथ एआई कंपनियों, और दूसरी टेक्नॉलॉजी कंपनियों के मुखिया लोगों की बातचीत चल रही थी, और ओपनएआई, एंथ्रॉपिक, गूगल, मेटा, एक्सएआई, और एनवीडिया के मुखिया लोगों की बैठक हुई। इसके बाद इन कंपनियों ने एक स्वैच्छिक सुरक्षा समझौते पर सहमति दी, जिसके तहत ये कंपनियां देखेंगी कि उनके एआई मॉडल किसी दूसरे कम्प्यूटर सिस्टम में घुसपैठ न करें, साइबर हमला न करें, या जैविक-रासायनिक खतरा पैदा न करें। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि दुनिया में सबसे अधिक पूंजीनिवेश जिस एआई विकास पर हो रहा है, उसकी कंपनियों ने आपस में कोई कानूनी समझौता नहीं किया है, यह एक आपसी सहमति है, जिसका कानूनी और कारोबारी महत्व शून्य है। ट्रम्प की मौजूदगी में ऐसी सहमति को बहुत बड़ा समझा जा रहा है, जबकि सच यह है कि जिस कागज पर इस बयान का प्रिंट निकला है, उस कागज के वजन जितना भी वजन इस सहमति का नहीं है। कारोबारियों के भरोसे जब उनकी कारोबारी बढ़ोत्तरी की कीमत पर रोक-टोक की बात की जाएगी, तो उसका भला क्या वजन होगा? नतीजा यह है कि यह सहमति किसी तरह का कोई बंधन नहीं है, और जब सारे एआई कारोबारी एक-दूसरे के साथ गलाकाट मुकाबले में लगे हुए हैं, तो भला कौन एक-दूसरे से पीछे रहना चाहेंगे। खासकर तब जब ट्रम्प की सोच यह है कि अगर अमरीकी कंपनियों को एआई विकास करते सुरक्षा शर्तों से घेरा जाएगा, तो चीन एआई विकास में आगे निकल जाएगा। ट्रम्प किसी भी तरह की सुरक्षा शर्तों के खिलाफ है, इसलिए ऐसे आदमी की मौजूदगी में यह बोगस सहमति दिखावे की बात है।
हाल के महीनों में अलग-अलग कंपनियों के एआई एजेंटों ने कई ऐसी हरकतें की हैं जो कि उन कंपनियों की उम्मीदों से परे थीं, उनके सुरक्षा इंतजाम को तोडक़र हुई थीं। एआई एजेंटों के लिए देशों की सरहद कुछ नहीं है, अलग-अलग कंपनियों की सरहदें भी कुछ नहीं हैं। वे किसी भी सरकार की वेबसाइटों को हैक कर रहे हैं, और ऐसी कंपनियां कई-कई हफ्तों तक ऐसी जानकारी को छुपा भी रही हैं। आज ही आई हुई एक और खबर भयानक है। चीन में वहां की सबसे बड़ी कंपनियों, अलीबाबा, डीपसिक, मूनशॉट जैसे मॉडलों पर चलने वाले एआई एजेंटों ने परीक्षणों में झूठ बोला, अपनी असफलता छुपाई, और सुरक्षा सीमाओं को पार करने की कोशिश की। एक चीनी एआई एजेंट ने एक कारोबारी के लिए टेंडर हासिल करने के लिए उस कारोबारी की क्षमताओं के बारे में झूठ तैयार किया, और जब उससे एक बार और कोशिश करने को कहा गया, तो भी उसने इसी धोखे को आगे बढ़ाया। चीन में ही एक दूसरे परीक्षण में काम पूरा न कर पाने पर भी एआई एजेंट ने इस बात को मानने के बजाय नकली फाइलें तैयार कीं, और ऐसे नतीजे गढ़ लिए कि काम पूरा हो गया है। यह सब कंपनी के भीतर परीक्षण के स्तर पर ही हुआ है। लेकिन इससे भी बड़ी एक सुरक्षा चूक सामने आई है। चीन की एक एआई कंपनी ने खुद होकर इस महीने यह माना है कि उसके एआई ने किसी दूसरे के क्लाउड सर्वर पर घुसपैठ की, और वहां पर कुछ चीजों को अपलोड कर दिया। यह किसी चीनी एआई कंपनी की तरफ से बहुत ही दुर्लभ स्वीकारोक्ति है, क्योंकि चीन आमतौर पर इन बातों को मंजूर नहीं करता है। हालांकि चीन अपने स्तर पर एआई को काबू में करने की कोशिशें भी जारी रखे हुए है क्योंकि अगर उसके एआई एजेंट बेकाबू होते हैं, तो यह जरूरी तो है नहीं कि वे चीन के बाहर ही तबाही फैलाएंगे। खुद चीन के भीतर अगर एआई एजेंट बर्बादी पर जुट जाएंगे, तो आज चीनी अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा हिस्सा कम्प्यूटरों पर ही टिका हुआ है, और एक बागी एआई चीन को चौपट कर सकता है।
जिन लोगों को यह लगता है कि दुनिया के कोई आधा दर्जन टेक्नॉलॉजी कारोबारी ट्रम्प के साथ मिलकर एक गोलमोल सहमति तैयार करें, और उससे दुनिया का कुछ भला हो जाएगा, तो यह एक खुशफहमी के सिवाय कुछ नहीं है। इन कंपनियों से उनके एआई को काबू में रखने की उम्मीदें वैसी ही होंगी जैसी कि कसाईयों से यह उम्मीद की जाए कि वे मेमनों को प्यार से काटेंगे। आज दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा पूंजीनिवेश एआई में हुआ है, और दुनिया के बहुत से जानकार-सलाहकार यह भी मान रहे हैं कि एआई नाम का बुलबुला किसी भी दिन फूट सकता है, और उतने बड़े नुकसान को दुनिया की अर्थव्यवस्था भी झेल नहीं पाएगी। जब दांव पर इतना कुछ लगा हुआ है, और यह पूंजीनिवेश लगातार बढ़ते ही चल रहा है, अमरीका के भीतर ही दर्जनों या सैकड़ों कंपनियां एआई के विकास के मुकाबलों में लगी हुई हैं, और एक देश के रूप में अमरीका, और चीन का मुकाबला भी चलते ही रहता है, तब किसी से काबू बरतने की उम्मीद फिजूल की बात है। फिर इस बात को भी समझना होगा कि जिस अमरीकी राष्ट्रपति के साथ बैठकर इन कारोबारियों ने यह सहमति दी है, उस अमरीकी राष्ट्रपति को जलवायु परिवर्तन एक हरित झांसा लगता है, उसे दुनिया भर के गरीब और जरूरतमंद देशों की मदद की अमरीका की दशकों पुरानी योजनाएं बर्बादी का सामान लगती हैं, और जो कारोबार को किसी भी नैतिकता से ऊपर मानता है, उस राष्ट्रपति की अगुवाई में खतरों से बचने का काम नहीं हो सकता, वह तो खतरों को बेचकर भी कमाई और डील करने वाला घटिया कारोबारी है।
हमारा यह साफ मानना है कि ट्रम्प की मौजूदगी में एआई कारोबारियों की यह आपसी सहमति एक कारोबार के भीतर की गिरोहबंदी के अलावा और कुछ नहीं है। इस नौटंकी से इस धंधे को दुनिया भर से पड़ रहे नैतिक दबावों से छुटकारा मिल गया है। दुनिया एआई कारोबारियों के बीच की इस सहमति का बहुत बड़ा दाम चुकाएगी, और जिस तरह धंधेबाजों के हवाले नैतिकता और मानवता को कर दिया गया है, वह बहुत महंगा पडऩे जा रहा है।
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