अंधविश्वास से पनप रहे हैं लूट से कत्ल तक के जुर्म!

  02 अक्टूबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक छोटे बच्चे का अपहरण करके उसे बलि चढ़ाने की एक कोशिश नाकामयाब हुई है। इसी तरह की घटना उत्तर भारत के एक स्कूल के हॉस्टल में हुई जहां स्कूल की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए उसके संचालक बाप-बेटे ने स्कूल के कुछ शिक्षकों के साथ मिलकर पहले एक बच्चे को सोते हुए ले जाकर उसे बलि चढ़ाने की कोशिश की गई, लेकिन वह जाग गया, दूसरे बच्चे भी जाग गए। इसके बाद फिर संचालक और शिक्षक  एक दूसरे बच्चे को बलि चढ़ाने के लिए नींद से उठाकर ले जा रहे थे कि वह जाग गया, और उसका गला घोंटकर मार डाला गया। इधर छत्तीसगढ़ में दो और ताजा घटनाएं हुई हैं, राजधानी रायपुर में शहर के बीच के एक परिवार में बीमारी दूर करने का झांसा देकर तीन फर्जी बाबा दो करोड़ का सोना ले गए, और इसके बाद भी उन्होंने सोना और पैसा मांगना जारी रखा। छत्तीसगढ़ के जशपुर इलाके में एक महिला पर कुछ लोग टोनही होने का आरोप लगाकर उसे प्रताडि़त करते आ रहे थे, और अभी उसके राह चलते पति को एक गाड़ी से कुचलकर मार डाला गया। टोनही कहकर हत्या के तो छत्तीसगढ़ और पड़ोसी राज्य झारखंड में कई मामले हो चुके हैं, लेकिन पत्नी पर आरोप, और पति को दिनदहाड़े कुचलकर मार डालने का यह अलग किस्म का मामला हुआ है। 

इन सब मामलों में जो एक चीज एक सरीखी है, वह अंधविश्वास है। जब लोगों के दिमाग से तर्कशक्ति खत्म होने लगती है, विज्ञान पर से भरोसा गायब हो जाता है, तब वे अंधविश्वास से घिर जाते हैं। कल की ही मुम्बई की एक खबर है कि वहां 80 बरस के एक आदमी के मरने के बाद उसके परिवार ने उसकी लाश को एक क्लिनिक के डीप फ्रीजर में चार साल से सुरक्षित रखा हुआ था, उस पर वे 50 लाख रूपए खर्च कर चुके थे, और वे चिकित्सा विज्ञान से शव को संरक्षित करके उसे अमरीका भेजना चाहते थे, ताकि भविष्य में कभी विज्ञान मरे हुए को जिंदा कर सके, तो तब तक शरीर ठीकठाक रहे। यह अंधविश्वास तो विज्ञान की संभावनाओं को लेकर है, जो कि हो सकता है कि किसी दिन सही भी साबित हो, लेकिन आज तो वह कुल मिलाकर अंधविश्वास ही है। अभी तक विज्ञान भी किसी मरे हुए को जिंदा नहीं कर पाया है, और दुनिया में दुबारा जिंदा होने की चाह रखने वाले लोग कम नहीं हैं। इसी तरह दुनिया में ऐसे लोग भी कम नहीं हैं जो किसी को चुड़ैल मानें, काला जादू करने वाला मानें, और ऐसे लोगों के पास जाकर अपने दुश्मनों को मरवाने का ठेका दें, या अपने आपको बचाने का। 

अंधविश्वास जब शुरू होता है, तो वह बढ़ते ही चलता है। जो लोग किसी एक तिलस्म, ताबीज, मंतर, या पत्थर पर भरोसा करने लगते हैं, लोग उन्हें लाकर कई और दूसरी चीजें भी पहनाने लगते हैं, उनसे तरह-तरह की रस्में करवाने लगते हैं, और अंधविश्वास की राह पहाड़ से उतरते हुए रास्ते की तरह रहती है, और अंधविश्वास से भरे हुए दिमाग बिना ब्रेक की गाड़ी जैसे। छत्तीसगढ़ में कई मामलों में तो लोगों ने परिवार के भीतर के लोगों को ही जादू-टोने के शक में मार डाला। और दिनदहाड़े थोक में ऐसे कत्ल करने के मामले भी अभी बीते एक-दो बरसों में भी सामने आए हैं। रायपुर जेल में 1978 में बैजू नाम के जिस कैदी को फांसी हुई थी, उस पर भी गांव में जादू-टोना करने का आरोप था, और अदालत में यह साबित हुआ था कि उसने चांदी के मामूली गहनों के लिए चार लोगों का कत्ल किया था। मतलब यह कि जादू-टोने की तथाकथित ताकत से उसे वे गहने नहीं मिले थे जिनके लिए चार कत्ल करने पड़े थे, और न ही वह जादू-टोने की ताकत से फांसी से बच पाया था। अभी छत्तीसगढ़ में बीते एक बरस में एक-दो दर्जन तथाकथित तांत्रिक गिरफ्तार हो चुके हैं जो कि गड़ा हुआ खजाना दिलवाने वाले थे, या कि नोटों की बारिश करवाने वाले थे। उनकी ताकत से न खजाना मिला, न नोट मिले, न किसी को ईश्वर दिखे, न किसी की बीमारी ठीक हुई, वे खुद जेल जरूर चले गए। अभी कुछ महीने पहले ही इसी राज्य में सांप का जहर झाड़-फूंक से उतारने का दावा करने वाले एक आदमी को सांप ने काट लिया। वह भागे-भागे सरकारी अस्पताल गया, और जहर से बचाने का इंजेक्शन लगवाया। उसकी पहचान उस पूरे इलाके में झाड़-फूंक से सांप का जहर उतारने वाले की थी, लेकिन जब खुद की बारी आई तो उसे आधुनिक चिकित्सा से कम कुछ नहीं सूझा। डॉक्टरों ने उससे एक वीडियो कैमरे के सामने अपील भी करवाई कि सांप काट ले, तो किसी झाड़-फूंक के चक्कर में न पड़ें, और सीधे अस्पताल पहुंचें। 

अभी जब बाबा कहे जाने वाले रामदेव, और भाजपा के एक भूतपूर्व बाहुबलि सांसद बृजभूषण शरण सिंह के बीच सार्वजनिक मतभेद हुआ, तो बृजभूषण ने खुलकर यह बात कही थी कि रामदेव पतंजलि की दवाओं से हर तरह का इलाज करने का दावा करते हैं, लेकिन जब खुद को जरूरत पड़ती है, तो अपने इलाज और ऑपरेशन के लिए वे भी एम्स में भर्ती होते हैं, और उनके सहयोगी बालकृष्ण भी आधुनिक अस्पताल में ही इलाज कराते हैं। खैर, रामदेव की हरकतों से आयुर्वेद का महत्व कम नहीं होता, और हम किसी भी किनारे से यह बात कहना नहीं चाहते कि आयुर्वेद कोई अंधविश्वास है। इस किस्म के बाबाओं ने योग, आयुर्वेद, जैसी प्रतिष्ठित भारतीय पद्धतियों और विधाओं की विश्वसनीयता भी अपने बाजीगरी दावों से कम की है। लेकिन हजारों बरस पुराने योग-आयुर्वेद ऐसे कई बाबाओं को झेलकर भी जिंदा रहने वाले हैं। 

एक बार फिर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य पर लौटें, तो यह बात समझ आती है कि अंधविश्वास सिर्फ अनपढ़ों, ग्रामीणों, बुजुर्गों में नहीं हैं, खासे पढ़े-लिखे, बड़ी-बड़ी सरकारी नौकरियों से रिटायर हुए, शहरों में बसे हुए अतिसंपन्न लोगों को भी खजाने और नोटों की बारिश जैसे अंधविश्वास पर इतना भरोसा हो जाता है कि वे करोड़ों रूपए लुटा देते हैं। जहां तक ठगी का सवाल है, तो वह एक अहिंसक और बिना खूनखराबे वाला जुर्म है, लेकिन जब मानव बलि देने की बात आ जाती है, या किसी को टोनही कहकर मार डालने की बात आ जाती है, तब अंधविश्वास का सबसे हिंसक पहलू सामने आता है। इसके लिए देश में वैज्ञानिक चेतना आना जरूरी है, और आम लोगों के बीच जब तक वैज्ञानिक चेतना की वापिसी शुरू नहीं होगी, तब तक अंधविश्वास की किसी तरह की रवानगी शुरू नहीं हो सकती। वैज्ञानिक चेतना और अंधविश्वास को एक-दूसरे से इतना परहेज है कि एक दिमाग में दोनों एक साथ नहीं रह सकते। यह तो लोगों को तय करना है कि वे अपने दिमाग का अकेला कमरा इन दोनों में से किसी किराए पर देना चाहते हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

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