4 अक्टूबर 2026

जाहिर तौर पर समझदार दिखने वाला कोई एक आदमी एक दिन में ट्विटर पर दो अलग-अलग बार लिखता है। एक बार लिखा- ‘बोला था नहीं किया।’ दूसरी बार लिखता है-‘जो बोला था वो नहीं किया।’ इसके दो-तीन दिन पहले बस इतना लिखता है- ‘हां अब ठीक है।’ इसके दो-तीन दिन पहले वह बस इतना लिखता है- ‘जीवन जीवित’। इसके पहले- ‘सुनते नहीं हैं’, और इसके दो दिन पहले बस इतना लिखा है-‘कोई नहीं था’।
अब एक-एक दिन में ऐसी दो-चार शब्दों की निरर्थक ट्वीट से लिखने वाले की दिमागी हालत का क्या अंदाज लगाया जाए? फिर यह भी है कि ऐसी हर ट्वीट के साथ वह आदमी नंबर भी लिखते चल रहा है, 5861, 5862, और कोई नंबर छूट जाता है, तो अगली ट्वीट में उसे सुधारकर यह आदमी माफी भी मांग लेता है।
उसकी लिखी गई बीते कई महीनों की बातों को देखें, तो उनमें से अधिकतर बातें दो-चार शब्दों वाली पूरी तरह से निरर्थक बातें हैं, उनमें नंबर बड़ी बारीकी और सावधानी से डले हुए हैं। लिखी हुई कुछ और बातों को यहां देख लें, चेंप दिया, लग गई, अभी तक कुछ नहीं, कुछ नहीं, बोलती बंद, आए थे मिलने फिर चले गए, कल मिलते हैं, पीछे रह गए, हे भगवान, अभी भी, जल्दी है, आता हूं, हो गया, अब कल को भी पकडऩा है, निकल गया था पकड़ लिया, चक्की चल रही है, देख लो, ऐ भैया हावड़ा का पुल देखे हो, बेसन, बटलोई, चिडिय़ा चूक गईं खेत, कल से सोचना बंद, सोचा था क्या, क्या हो गया, अभी तक नहीं कहा, बारिश आई, बस अब नो मोर ज्ञान...
ट्विटर, यानी एक्स पर अमिताभ बच्चन के अलग-अलग दिन लिखे हुए ऐसे ट्वीट देखें, तो थोड़ा सा शक होता है कि क्या उनकी दिमागी हालत ठीक है? आज सार्वजनिक जीवन में उनकी सबसे बड़ी मौजूदगी कौन बनेगा करोड़पति जैसा एक कार्यक्रम है। इसके अलावा वे किसी-किसी समारोह में भी शामिल होते हैं। लेकिन ट्रम्प की तरह रात-दिन किसी भी वक्त वे ट्विटर पर लिखने के आदी हैं, और रात तीन-चार बजे शूटिंग से घर लौटते उनका लिखना तो समझ आता है कि काम पूरा करके अब लौट रहे हैं, लेकिन पूरी तरह से निरर्थक बड़बड़ाहट वाले कुछ शब्दों से उनकी दिमागी हालत का क्या अंदाज लगाया जाए?
हिन्दुस्तानी आमतौर पर मूर्तिपूजक रहते हैं। जो गुजर गए, उनकी मूर्तियां, बनाने और लगाने का चलन तो पूरी दुनिया में है, लेकिन हिन्दुस्तानी ऐसे हैं जो कि अपने नेताओं, कलाकारों, खिलाडिय़ों, और यहां तक कि ट्रम्प की भी मूर्ति बनाकर लगा लेते हैं, पूजा-आरती भी करने लगते हैं। इसलिए हिन्दुस्तान में शोहरत-हासिल किसी इंसान की आलोचना आसान नहीं रहती। अमिताभ बच्चन की बड़बड़ाहट पर भी कुछ लिखा नहीं जा रहा है, क्योंकि उन्हें सदी का सबसे बड़ा फिल्मकार, या अभिनेता करार दिया जा चुका है, और ऐसा कहने वाले लोग अब भला किस मुंह से अपनी गढ़ी हुई प्रतिमा का मूर्तिभंजन कर पाएंगे?
लेकिन अमिताभ की गिन-गिनकर लिखी जा रही ऐसी सार्वजनिक बातों से उनके परिवार, चिकित्सकों, और प्रशंसकों को फिक्र होनी चाहिए। जिस वक्त बाकी दुनिया, और हिन्दुस्तान में भी सोचने-समझने वाले लोगों के लिए कुछ कहने की मजबूरी वाली नौबतें हर घंटे किवाड़ खटखटाते खड़ी रहती हैं, तब हाथ स्क्रीन पर, अगली ट्वीट का नंबर, लेकिन बात सिर्फ निरर्थक! यह नौबत सिर्फ बड़बड़ाहट के मनोविश्लेषण की नहीं है, यह नौबत सरोकार से सरोकारों से बेरूखी के विश्लेषण की भी है। ऐसा भी नहीं कि अमिताभ बच्चन पहले बड़े सरोकारी इंसान थे, और अब किसी विचलित मानसिक स्थिति के चलते हुए वे सरोकारों से परे रहने लगे हैं। जिस भोपाल में यूनियन कार्बाइड कारखाने में हजारों इंसानों को मार डाला था, और लाखों को लाइलाज बीमार कर दिया था, उसी भोपाल में ससुराल रहते हुए भी अमिताभ बच्चन के मुंह से कभी एक शब्द हमदर्दी का नहीं निकला था। उसके बाद भी बीते कोई पचास बरसों में उनका सामाजिक सरोकार मनमोहन सरकार के दौरान पेट्रोल की महंगाई को लेकर कुछ ट्वीट की शक्ल में सामने आया था, उसके बाद वह कुंभकर्ण जो सोया, तो आज तक नहीं जाग पाया। अब सरोकारविहीनता हर किसी का मौलिक अधिकार है, लेकिन क्या बड़ाबड़ाहट को भी किसी का मौलिक अधिकार मानकर उसकी फिक्र न की जाए?
मैं तो अमिताभ के हिमायती की हैसियत से यह बात उठा रहा हूं कि जो व्यक्ति अपने कहे हुए दो-दो, चार-चार निरर्थक शब्दों को भी सीरियल नंबर डालकर पोस्ट करता है, उसकी निरर्थकता शायद उसकी दिमागी सेहत का एक लक्षण भी है। छोटे बच्चों को तो यह आजादी रहती है कि वे निरर्थक शब्द बड़बड़ा सकते हैं, मुंह से तरह-तरह की आवाज निकाल सकते हैं, लार का बुलबुला बना सकते हैं, लेकिन क्या बुजुर्गों को भी ऐसी आजादी रहती है?
जब लोगों की अपनी जिंदगी दुनिया के सबसे परले दर्जे के ऐशोआराम से भर जाए, तब उनके लिए यह स्वाभाविक तो हो सकता है कि वे दुनिया की दुख-तकलीफ को अनदेखा करते चलें, क्योंकि यही बात उनके लिए सबसे अधिक सहूलियत की रहती है। लेकिन क्या यह बात सबसे अधिक, या बहुत मामूली सरोकार की भी रहती है? क्या सामाजिक विपन्नता की जलती-सुलगती जरूरतों के समंदर के बीच कोई उस धुएं से अनछुए अपने आलीशान टापू पर जी सकते हैं? क्या अमिताभ बच्चन के मन के भीतर के ऐसे विरोधाभास उनकी बड़बड़ाहट की शक्ल में निकल रहे हैं, या किसी भी सरोकार से मुक्त वे एक चिकने घड़े की तरह चैन से जी रहे हैं, जिन्हें दुनिया की कोई भी तकलीफ की एक बूंद भी छू भी नहीं जाती? ऐसे कई सवाल उठते हैं।
यह भी लगता है कि क्या दौलत, शोहरत, करोड़ों प्रशंसकों की भीड़, और खासे पढ़े-लिखे होने की ताकत, इन सबके बाद भी कोई दुनिया के हालात से अपने आपको इस हद तक अनछुआ रख सकते हैं कि निरर्थक बड़बड़ाहट पोस्ट करने का तो वक्त हो, लेकिन किसी जरूरी और जायज मुद्दे पर उंगलियों को लकवा सा मार जाए? आज किसी ऐसे की जरूरत है जो कि अमिताभ के कई बार के खेले गए विजय नाम के किरदार की तरह हाथ लहराकर अमिताभ से उसी तरह जवाब मांग सके जिस तरह वह विजय मंदिर में ईश्वर से तरह-तरह से जवाब मांगता था। शायद ईश्वर से जवाब मांगना अधिक आसान होता है।
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