आज हमारे विचार पढऩे के बजाय असल जिंदगी की कहानियां ही पढ़ लें

03 अक्टूबर 2026  

 

जापान में चल रहे 2026 के एशियाई खेलों में भारत के लिए मैडल जीतने वाली कुछ लड़कियों की कहानी अपने आपमें एक सोच बताती है। हमारे लिए विचारों के इस कॉलम में उन कहानियों के साथ अपने विचार अधिक लिखने की जरूरत नहीं है। ट्रैप शूटिंग में नीरू ढांडा इस मुकाबले में एशियाई खेलों का व्यक्तिगत गोल्ड मैडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी है। इसी दिन नीरू ने टीम मुकाबले में सिल्वर भी जीता। परिवार की हालत यह है कि पिता बहुत ही सीमित जमीन पर खेती करते हैं, जबकि शूटिंग ऐसा खेल है जिसमें बंदूक, कारतूस, और ट्रेनिंग का खर्च खासा बड़ा रहता है। पिछले एशियाई खेलों में नीरू के एक चचेरे भाई ने शूटिंग में सिल्वर जीता था, और उसी की बंदूक लेकर नीरू ने भी प्रैक्टिस की थी। नीरू के गोल्ड जीतने के समय उसकी माँ को पता ही नहीं था कि बेटी इतिहास रच चुकी है। सुदेश देवी हरियाणा में गरीबी की रेखा के नीचे के राशन कार्ड से गेहूं लेने जा रही थीं, तभी उन्हें बेटी के गोल्ड जीतने की खबर मिली। इस लडक़ी का हौसला यह भी है कि एशियन गेम्स के ठीक पहले वह गंभीर संक्रमण से अस्पताल में थी, और करीब 25 दिन प्रैक्टिस नहीं कर पाई थी, पांच दिन तक कुछ खा भी नहीं पाई थी, फिर भी जापान पहुंची, और गोल्ड जीत लिया। 

हिमाचल के चम्बा जिले के रेट्टा गांव की सीमा कुमारी ने महिलाओं की दस हजार मीटर की दौड़ में कांस्य पदक जीता। इस मुकाबले में 2010 के बाद भारत का यह पहला एशियन गेम्स पदक था। सीमा का परिवार खेती और पशुपालन पर जिंदा है। घर कच्चा है, तीन भाई मजदूरी करते हैं। पिता भी मजदूरी करते थे, जानवर पालते थे, और जब सीमा 12 बरस की थी, सांप काटने से वे गुजर गए। सीमा को दौडऩे का शौक था, लेकिन परिवार के पास जूते खरीदने के पैसे नहीं थे। पिता ने अपने रहते एक बकरी बेचकर उसके जूते खरीदे, और 2015 में जब सीमा को साई के ट्रॉयल के लिए जाना था, तब नए जूते खरीदने के लिए भाईयों ने दूसरी बकरी भी बेच दी। भाईयों का कहना है कि सीमा कभी-कभी सरकारी बस से भी तेज दौड़ते हुए गांवों के भीतर लंबी दूरी तय करती थी। एशियन गेम्स में सीमा के जाने की बात बुजुर्ग माँ को नहीं बताई गई थी, और जब उसने मैडल जीता, तभी माँ को बताया गया कि वह जापान गई हुई है।

हरियाणा के जींद जिले के रितौली गांव की कीर्ति शर्मा ने महिलाओं की रिकर्व टीम के साथ गोल्ड जीता है। कीर्ति की शुरूआत में जब एक दशक पहले तीरंदाजी के कोच बच्चों को चुनने पहुंचे थे, तो कीर्ति को बहुत कमजोर पाया था, और उसे धनुष की डोरी खींचने जितनी ताकत वाली भी नहीं समझा गया था। जब कीर्ति को इस खेल के लिए धनुष की जरूरत थी, तो उसके किसान पिता ने 60 हजार रूपए का कर्ज लिया था। रिश्तेदारों ने सवाल किए थे कि बेटी के खेल पर इतना पैसा क्यों लगा रहा है, पिता ने फिर भी कर्ज लेकर बेटी की ट्रेनिंग जारी रखी थी। 

महाराष्ट्र के अमरावती की 17 साल की कुमकुम भारतीय टीम की सबसे कम उम्र की सदस्य हैं। पिता मिठाई दुकानों के लिए पुट्ठे के डिब्बे बनाने का छोटा सा काम करते हैं। जब 2018 में तीरंदाजी शुरू की, तो दादी ने तीन हजार रूपए से लकड़ी का धनुष दिलाया। फिर कुमकुम ने बांस के धनुष से प्रैक्टिस की, और फिर पिता ने एक सेकेंडहेंड रिकर्व धनुष खरीदा। ट्रेनिंग पर आने-जाने का खर्च भी परिवार के लिए मुश्किल था, पिता मोटरसाइकिल पर अकादमी तक लाते-ले जाते थे। आज उसी 17 साल की लडक़ी के पास एशियन गेम्स का गोल्ड है। 

कोलकाता की अंकिता भकत भी इसी रिकर्व टीम की सदस्य हैं, पिता शांतनु सुबह 4 बजे निकलकर दूध के पैकेट घर-घर पहुंचाते थे। शुरूआती सालों में लकड़ी और बांस के धनुष से अभ्यास किया। ऐसे 6 बरस तक उनके पास वह रिकर्व धनुष नहीं था जो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जरूरी होता है। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, और ट्रेनिंग और मुकाबलों के लिए पिता को कई बार अपने चार भाईयों से कर्ज लेना पड़ा था। बेटी को ट्रेनिंग के लिए छोडऩे के बाद जाकर पिता दूध बांटते थे। 

महाराष्ट्र के कोल्हापुर की सोनम मस्कर 10 मीटर एयर रायफल टीम में सिल्वडर मेडलिस्ट है। सोनम को शूटिंग का शौक था, और पिता ने रायफल और दूसरे उपकरणों के लिए परिवार की जमीन, और एक दुकान बाजार भाव से बहुत कम पर बेच दीं। इससे मिले 5 लाख रूपए पिता ने सोनम के सामानों और ट्रेनिंग पर खर्च किए। बाद में उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीते, और वह एशियन गेम्स में सिल्वर मेडलिस्ट है। 

केरल की विदार्सा विनोद भी 10 मीटर एयर राइफल सिल्वडर मेडलिस्ट है, वह एकदम गरीब परिवार की नहीं है, पिता दूसरों के घर बनाने वाले मिस्त्री हैं, बेटी की रायफल के लिए परिवार ने जमीन का एक टुकड़ा बेचा, और कर्ज भी लिया। परिवार पर आज भी कर्ज है, और बेटी एशियाई खेलों का सिल्वर मैडल लेकर लौटने वाली है। 

मणिपुर की रोशिबिना देवी ने वुशु में 60 किलोग्राम वर्ग में सिल्वर जीता है, यह उनका लगातार तीसरा एशियन गेम्स पदक है। उसके माता-पिता छोटे किसान हैं, कोई साधन-सुविधा नहीं है, उसकी ट्रेनिंग के लिए परिवार ने जमीन का एक हिस्सा बेचा था। फिर मणिपुर में 2023 में हिंसा शुरू हुई तो परिवार को अपनी फसल बेचने में भी दिक्कत आई। लेकिन परिवार ने ट्रेनिंग पर गई हुई रोशिबिना से यह सब छुपाकर रखा था ताकि वह विचलित न हों। रोशिबिना ने पिछले एशियन गेम्स में मैडल के साथ जो रकम भी पाई, उससे ट्रेनिंग के लिए बेची गई परिवार की जमीन को वापिस खरीदा। 

देश में आज अपने पर होने वाली हिंसा के खिलाफ लड़कियां और महिलाएं सडक़ों पर हैं, और सोशल मीडिया पर बहुत तीखे नारे और पोस्टर लिख रही हैं। जिस देश में लड़कियों में इतना आक्रोश है, वे जितने खतरे में जी रही हैं, उस देश में ऐसे माँ-बाप भी हैं जिन्होंने बेटियों को मुकाबले के लिए तैयार करने के लिए अपनी जमीन भी बेच दी, कर्ज भी लिया। यह सब उस समय लिया जब इस तैयारी के बाद किसी कामयाबी की कोई गारंटी नहीं थी। उन्होंने बिना किसी सफलता की संभावना के, अपनी बेटियों पर सिर्फ पूंजीनिवेश किया। यह बात भी होगी कि मैडल पाने वाली एक-एक लडक़ी के पीछे सैकड़ों और लड़कियां भी होंगी जो कि गरीब परिवारों से उठकर आईं होंगी, और माँ-बाप ने कर्ज लेकर उन्हें बढ़ाया होगा। इनकी कामयाबी वह सब कुछ कह देती है, जिसे कहने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं। एक-एक मैडल ऐसे माँ-बाप के नाम भी।

(Daily Chhattisgarh)   

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