मनमोहन सरीखे भले इंसान पर लगाई तोहमत नाजायज

संपादकीय
19 दिसम्बर 2017


संसद के दोनों सदनों में एक ऐसे मुद्दे पर सत्तारूढ़ एनडीए के सामने कांग्रेस और बाकी विपक्ष अड़ गए हैं कि प्रधानमंत्री संसद में आएं और यह साफ करें कि गुजरात चुनाव प्रचार में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की देश के प्रति वफादारी पर सवाल कैसे उठाया? कांग्रेस और बाकी विपक्ष यह भी मांग कर रहे हैं कि इस बयान के लिए नरेन्द्र मोदी सदन में आकर माफी मांगें। दरअसल गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान यह बात सामने आई कि दिल्ली में कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर के घर पर भारत और पाकिस्तान के कुछ ऐसे प्रमुख अमनपसंद लोग जुटे जो कि दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने में लंबे समय से लगे हुए हैं। इसके बाद मोदी ने अपनी आमसभाओं में यह आरोप लगाया कि मनमोहन सिंह और मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान के अफसरों और कूटनीतिज्ञों के साथ मिलकर साजिश कर रहे हैं। उन्होंने इस बात को बार-बार दुहराया और यह कहा कि गुजरात के चुनाव में पाकिस्तान दखल दे रहा है, और उसी साजिश के तहत इन लोगों ने बैठकर चर्चा की थी। मनमोहन सिंह ने बहुत ही शालीन शब्दों में मोदी की कही पूरी बात को खारिज किया था, और उस बैठक में मौजूद अधिकतर लोगों ने बयान जारी करके यह कहा था कि पूरी बैठक में गुजरात शब्द का भी इस्तेमाल नहीं हुआ था, न ही उस राज्य के चुनाव को लेकर किसी तरह की चर्चा हुई थी।
चुनाव प्रचार तो खत्म हो जाता है, लेकिन उसमें कही बातें लोगों को याद रहती हैं, और अब टेक्नॉलॉजी की मेहरबानी से ये ऑडियो-वीडियो इतिहास भी बन जाती हैं। नरेन्द्र मोदी ने जिस अंदाज में इस बैठक का चुनावी इस्तेमाल किया था, उसे लोग उस वक्त भी समझ गए थे, लेकिन वह माहौल ऐसा था कि कांग्रेस के एक दूसरे नेता मणिशंकर अय्यर ने मोदी को एक नीच आदमी कहकर भाजपा के हाथ एक बड़ा हथियार दे दिया था, और जिस सूरत में भाजपा को लगभग पूरी सीटें मिली हैं, वहां की सभाओं में मोदी ने उन्हें कही गई इस गाली को बार-बार दुहराया था, और अब ऐसा लगता है कि उसका असर भी मतदाताओं पर हुआ था। हालांकि यह एक और बात है कि इसके पहले भाजपा के कितने नेता सोनिया और राहुल के खिलाफ कितने तरह की गालियों का इस्तेमाल करते आए हैं, लेकिन ऐन चुनाव के बीच में मोदी को नीच कहकर कांग्रेस के एक लापरवाह नेता ने मानो कांग्रेस के हाथ से जीती हुई बाजी ही छीन ली।
लेकिन अभी मुद्दा यह है कि मोदी ने मनमोहन सिंह के बारे में जो कहा है, क्या उस पर उन्हें संसद में बयान देना चाहिए? हमारा ख्याल है कि भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में एक प्रधानमंत्री को कम से कम अपने ठीक पहले के प्रधानमंत्री को पाकिस्तान से मिलकर गुजरात चुनाव के लिए साजिश करने की तोहमत नहीं लगानी थी। खासकर डॉ. मनमोहन सिंह एक ऐसे सज्जन नेता हैं, जिनसे लोगों को यह शिकायत तो हो सकती है कि वे राजनीति करना नहीं जानते, लेकिन हिंदुस्तान में मोदी के अलावा शायद ही किसी को यह भरोसा रहा है कि वे गुजरात में मोदी की भाजपा को हराने के लिए पाकिस्तान से मिलकर कोई साजिश करेंगे। और अगर हम अपने अंदाज का इस्तेमाल करें, तो हमें पूरा भरोसा है कि मोदी को खुद को अपनी इस तोहमत पर फूटी कौड़ी का भरोसा नहीं रहा होगा, और उन्होंने चुनावी इस्तेमाल के लिए ऐसी बात कही जिसका आज संसद में जवाब देना शायद नामुमकिन होगा।
संसदीय लोकतंत्र के साथ एक दिक्कत यह है कि वह महज सदन में बहुमत के आधार पर बनी सरकार तक सीमित नहीं रहता, वह देश में लोकतांत्रिक परंपराओं और सद्भावना तक फैला हुआ एक लचीला तंत्र है जो कि परस्पर सम्मान को बहुत महत्व देने वाला भी है। ऐसे लोकतंत्र में अगर न सम्मान रहे, न सद्भावना रहे, और महज चुनाव जीतने के लिए किसी सच को तोड़-मरोड़कर उसका जाहिर तौर पर झूठा इस्तेमाल रहे, तो यह चल तो सकता है, लेकिन यह न वर्तमान में सम्मान पा सकता, और न ही इतिहास में दर्ज होने के बाद। फिलहाल यह बहुत अफसोस की बात है कि मनमोहन सिंह सरीखे भले इंसान पर पाकिस्तान के साथ मिलकर साजिश करने की तोहमत लगाई गई। ऐसे में संसद में लोगों की तकलीफ जायज है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 दिसंबर

कांग्रेस हार तो गई, लेकिन उसके बेहतर प्रदर्शन को अनदेखा करना चूक होगी

संपादकीय
18 दिसम्बर 2017


गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनाव के नतीजे मोटे तौर पर एक्जिट पोल के अनुमान के मुताबिक भाजपा के पक्ष में गए हैं, और 22 बरस से गुजरात में चली आ रही भाजपा सरकार और पांच बरसों के लिए चुन ली गई है, और हिमाचल में भ्रष्टाचार से लदी हुई कांग्रेस सरकार को जनता ने खारिज कर दिया है। इन चुनावों को दो वजहों से जरूरत से अधिक महत्व मिला था, गुजरात के भीतर पहली बार भाजपा के खिलाफ दो बड़े नौजवान सामाजिक आंदोलनों से उभरकर सामने आए थे, और ये दोनों ही भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे, या अपने लोगों को लड़ा रहे थे। दूसरी बात यह रही कि कांग्रेस के भीतर लीडरशिप की अगली पीढ़ी इन्हीं चुनावों के दौरान बदल रही थी, और राहुल गांधी की अगुवाई में गुजरात कांग्रेस एक अभूतपूर्व उत्साह के साथ चुनाव लड़ रही थी।
चुनावी नतीजे चाहे भाजपा की सरकार बना रहे हों, लेकिन वे खुद भाजपा के दावों और उनकी उम्मीदों के मुकाबले गुजरात में खासे पीछे रहे, और वहां कांग्रेस ने एक नई पकड़ साबित की है। यहां पर गुजरात के नतीजों को देखते हुए यह भी याद रखने की जरूरत है कि चुनाव प्रचार विकास के मुद्दे पर भाजपा ने शुरू किया था, और पाकिस्तान के मुद्दे पर खत्म किया। चुनाव विश्लेषकों ने यह कहा कि देश के किसी विधानसभा चुनाव में पहली बार पाकिस्तान के नाम का ऐसा इस्तेमाल हुआ, और खुद पाकिस्तान के बड़े लोगों ने ये बयान जारी किए कि भाजपा उनके नाम का इस्तेमाल न करे, और अपने दम पर चुनाव लड़े। हमारा यह कहना नहीं है कि इस एक रणनीति के बिना भाजपा चुनाव नहीं जीती होती, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपनी पूरी सरकार के साथ, पूरी पार्टी और तमाम मुख्यमंत्रियों के साथ गुजरात का मोर्चा सम्हालना पड़ा, और तकरीबन हर इलाके में खुद आमसभा करनी पड़ी। दूसरी तरफ मुकाबले में राहुल गांधी ने अकेले ही मोर्चा सम्हाला, और यह याद भी नहीं पड़ता कि कांग्रेस के कोई और बड़े नेता वहां पर जमकर बैठे हों।
अभी जब हम यह लिख रहे हैं, तब वोटों और सीटों का विश्लेषण आ ही रहा है, अभी तक जीत-हार का आंकड़ा तय नहीं हुआ है, और महज जीत-हार ही तय हुई है। इसलिए अगले एक-दो दिनों में यह साफ होगा कि हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवाणी जैसे गुजरात के दो ओबीसी और दलित नौजवान नेताओं के आंदोलनों ने क्या असर डाला है। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि दो बरस बाद देश में आम चुनाव होने हैं, और केन्द्र सरकार की, भाजपा की, हिन्दू संगठनों की बहुत से नीतियों के चलते हुए देश के आदिवासी, दलित, और ओबीसी समुदायों में अलग-अलग किस्म से बेचैनी है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि गुजरात से निकलकर इन दो नौजवानों की बेचैनी बाकी देश में भी चुनावी वोटों में तब्दील हो पाएगी, लेकिन भारत जैसे लोकतंत्र में माहौल अगर बनता है, तो उसकी शुरूआत इसी तरह किसी महत्वहीन लगते सिरे से शुरू होती है।
फिलहाल इन नतीजों के आने तक एक दूसरी बात जो साफ-साफ दिखती है, वह है कांग्रेस की नई लीडरशिप की शक्ल में राहुल गांधी की कामयाबी की। उन्होंने गुजरात चुनाव को बड़े दम-खम के साथ लड़ा, गरिमा के साथ लड़ा, देश की एकता को ध्यान में रखते हुए लड़ा, और वोटों की गिनती में भी वे पिछले चुनाव के मुकाबले खासे आगे बढ़े हैं, उनकी पार्टी ने सीटें भी बहुत अधिक हासिल की हैं। इसलिए यह मानना एक चूक होगी कि कांग्रेस की हार हुई है। भाजपा ने अपनी सरकार बचा ली है, लेकिन कांग्रेस एक मजबूत विपक्ष के रूप में ऐसी संभावनाओं के साथ कामयाब हुई है, जिसका असर वह उत्साह के साथ बाकी देश में भी लाने की कोशिश कर सकती है।
लगे हाथों हिमाचल पर अगर दो बातें कहें, तो पहली बात तो यह कि कांग्रेस को अपने भ्रष्ट नेताओं से छुटकारा पाना होगा। पूरे देश में मोदी को जो शोहरत हासिल हो रही है, उसमें इस जनधारणा का बड़ा हाथ है कि वे ईमानदार हैं। कांग्रेस को अगले आम चुनाव के पहले अपने भ्रष्ट और दुष्ट नेताओं से किनारा करना पड़ेगा, इसके बिना वह मोदी का मुकाबला नहीं कर पाएगी। राहुल गांधी के सामने आज एक क्लीन स्लेट है, और उन्हें राजनीति में अच्छी परंपराओं की इबारत लिखनी चाहिए। उन्होंने पूरे गुजरात चुनाव में अपने गंदगी से दूर रखा, भड़कावे और उकसावे के चुनावी तौर-तरीकों से दूर रखा, और देश के तमाम गंभीर राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बात का नोटिस लिया है। हमारा यह भी मानना है कि देश की जनता भी ऐसी बातों का नोटिस आगे-पीछे कभी न कभी लेती है। शायद ही किसी को यह उम्मीद रही होगी कि इन दोनों राज्यों में कांग्रेस जीतेगी, लेकिन गुजरात में उसने जो बेहतर प्रदर्शन किया है, उसे अनदेखा करना एक चूक ही होगी। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 18 दिसंबर

बात की बात, 18 दिसंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 18 दिसंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 17 दिसंबर

बलि की सोच एक संकेत है वैज्ञानिक सोच खत्म होने का

संपादकीय
17 दिसम्बर 2017


इस वक्त छत्तीसगढ़ के एक टीवी चैनल पर खबर आ रही है कि राजधानी के पास ही एक कस्बे में एक नाबालिग लड़की ने अपनी ही चार बरस की बहन को बलि चढ़ा दिया है। दूसरी तरफ कल ही अंधविश्वास के खिलाफ सबसे अधिक आक्रामकता के साथ बरसों से अकेले लडऩे वाले छत्तीसगढ़ के डॉ. दिनेश मिश्रा ने सरकार से यह मांग की थी कि छत्तीसगढ़ में कम्बल वाले बाबा नाम से चर्चा में बने हुए एक आदमी के कार्यक्रमों पर रोक लगाई जाए जो कि मरीजों को कम्बल उढ़ाकर उनका इलाज करने का दावा करता है। पिछले कुछ महीनों से छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा भी इस बाबा से इलाज करवाते हुए उसका प्रचार कर रहे हैं, और उसे स्थापित करने में पूरी ताकत लगा रहे हैं। ऐसे में डॉ. दिनेश मिश्रा ने सरकार को याद दिलाया है कि राज्य सरकार के ही अंधविश्वास विरोधी कानून के मुताबिक ऐसे बाबा पर तुरंत रोक लगाई जाए।
पाखंड और अंधविश्वास इनके नुकसान रातों-रात सामने नहीं आते हैं। इनसे लोगों की मानसिकता जख्मी होती है, और उनकी सोच अंधविश्वास में डूबकर कभी हिंसक हो जाती है, तो कभी बिना वजह अतिआत्मविश्वास का शिकार भी हो जाती है। लोगों को लगने लगता है कि उनका कैंसर भी किसी बाबा के भभूत से ठीक हो जाएगा, वे बाबाओं और उनके पाखंडों को चिकित्सा विज्ञान का विकल्प मानकर चलने लगते हैं, और ऐसा ही पाखंड अंधविश्वास को इतना बढ़ाने लगता है कि लोगों की तर्कशक्ति खत्म होने लगती है, वैज्ञानिकता पर से उनका भरोसा खत्म होने लगता है। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ में जगह-जगह महिलाओं को टोनही कहकर मारा जाता है, उनका बहिष्कार किया जाता है, और उनकी हत्या की जाती है। ऐसा ही अंधविश्वास बढ़कर छत्तीसगढ़ में हर कुछ हफ्तों में बलि की कोई न कोई हिंसा खड़ी कर रहा है। एक नाबालिग बच्ची ने अपनी नन्हीं सी बहन को बलि चढ़ा दिया, यह उसकी अपनी सोच नहीं है, सामाजिक माहौल में अंधविश्वास इतना बढ़ा दिया गया है कि कोई बाप अपने बेटे को बलि चढ़ा रहा है, तो कोई बच्ची अपनी छोटी बहन को बलि चढ़ा रही है।
और बात सिर्फ अंधविश्वास की नहीं है, बात है देश में एक वैज्ञानिक सोच को बनाने या खत्म करने की। जब कभी देश के लोगों से तर्कशक्ति को छीन लिया जाता है, उन्हें इतिहास को नकारने को कह दिया जाता है, तमाम किस्म के कड़वे सच को झूठ मानने के लिए कह दिया जाता है, जब कानून को छोड़ देने के लिए कह दिया जाता है, और लोगों की अपनी हिंसक सोच को ही कानून मान लिया जाता है, तो देश की तर्कशक्ति, उसकी न्यायप्रियता एक पूरे समाज के रूप में खत्म होने लगती है। समाज की सोच टुकड़ों में बन या बिगड़ नहीं सकती, वह पूरी की पूरी किसी एक रंग में रंगने का खतरा रखती है। जब लोगों को किसी धर्म के प्रति, किसी विचारधारा के प्रति, किसी संगठन या किसी नेता के प्रति, किसी मंदिर या किसी मस्जिद के प्रति अंधविश्वासी बनाया जाता है, तो वह सेमर के पेड़ से उसके फल के रेशों की तरह उड़कर दूर-दूर तक पहुंचने वाली बात रहती है। नेहरू ने जिस देश की सोच को बड़ी मुश्किल से वैज्ञानिकता की ओर ले जाने की कोशिश की थी, और उसमें बहुत हद तक कामयाबी भी पाई थी, वह पूरा सिलसिला अब खत्म करने की कोशिश हो रही है, और वह ऐसी बलि की शक्ल में कामयाबी भी बता रही है।
छत्तीसगढ़ हो या कि कोई और प्रदेश हो, केन्द्र सरकार के कानून हों, या कि किसी राज्य सरकार के कानून हों, वे महज कागजों पर ही रह जाएंगे, अगर जनता की सोच को रात-दिन की कोशिशों से उन कागजों के खिलाफ ढालने का काम चलता रहेगा। छत्तीसगढ़ में एक तरफ तो सरकार चिकित्सा सुविधाओं के लगातार विस्तार का दावा कर रही है, दूसरी तरफ उसी के गृहमंत्री तमाम सरकारी सुविधाओं के साथ जाकर अंधविश्वास को बढ़ावा देने की मॉडलिंग सी कर रहे हैं। डॉ. दिनेश मिश्र ने एक बहुत जायज बात को उठाया है, सरकार उनकी बात को पूरी तरह अनदेखा करते हुए, अपने मंत्री के पाखंड को अनदेखा करते हुए चल सकती है। और हो सकता है कि छत्तीसगढ़ में ऐसी बलि, महिलाओं को टोनही कहकर ऐसी हत्या महज पुलिस आंकड़े बनकर रह जाए, और यह प्रदेश अंधविश्वास में और अधिक डूब जाए।
-सुनील कुमार
Daily Chhattisgarh

चुनावी जीत-हार से परे कांग्रेस की एक बुनियादी परंपरा जारी

संपादकीय
16 दिसम्बर 2017


कांग्रेस पार्टी मोतीलाल नेहरू से जवाहर, इंदिरा, राजीव, सोनिया से होते हुए आज राहुल गांधी के हवाले हो गई है। कुनबापरस्त राजनीति की यह एक बड़ी लंबी मिसाल इसलिए है कि देश में बाकी कोई भी कुनबापरस्त राजनीतिक दल इतना पुराना नहीं है। नेहरू कुनबा 1919 से लेकर अब तक बीच-बीच में खासा अरसा इस पार्टी का अध्यक्ष रहा, यह एक और बात है कि बीच-बीच में दर्जनों दूसरे लोग भी इसके अध्यक्ष रहे। आजादी के पहले का एक दौर ऐसा था जब पार्टी नेहरू के कब्जे में नहीं थी, वे अकेले उसके सर्वेसर्वा नहीं थे, और कई दूसरे लोग भी अध्यक्ष बनते रहे। लेकिन नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के बाद कांग्रेस पार्टी मोटे तौर पर उनके परिवार के भीतर रही, या फिर परिवार की मर्जी से उसमें समय-समय पर कुछ दूसरे अध्यक्ष बनाए गए। लेकिन यहां पर हम आजाद भारत के एक ऐसे दौर का जिक्र करना चाहते हैं जब यह कुनबा पार्टी पर कब्जे से पूरी तरह बाहर था, और प्रधानमंत्री की कुर्सी से लेकर पार्टी अध्यक्ष तक दूसरे लोग रहे, और चुनावी शिकस्त के बाद पार्टी के अधिकतर लोग लौटकर सोनिया गांधी के चरणों में पहुंचे कि वे कमान सम्हालें और पार्टी को उबारें।
चूंकि राहुल गांधी आज पार्टी की अध्यक्षता नेहरू-गांधी कुनबे का होने की वजह से शुरू कर रहे हैं, इसलिए कुनबे की शोहरत या उसकी तोहमत, ये दोनों उनके साथ अंत तक चलने वाली बातें रहेंगी, और इससे उनका उबर पाना मुमकिन नहीं रहेगा। लेकिन कांग्रेस इस देश की अकेली कुनबापरस्त पार्टी नहीं है, यह चूंकि सबसे पुरानी है इसलिए इसके कुनबे के नाम अधिक लंबी लिस्ट बनाते हैं। वैसे तो मुम्बई में शिवसेना को देखें, शरद पवार की पार्टी को देखें, आन्ध्र में एनटीआर और चन्द्राबाबू को देखें, तेलंगाना में चन्द्रशेखर राव, तमिलनाडू में एमजीआर से लेकर जयललिता और शशिकला तक, कर्नाटक में देवेगौड़ा और उनका बेटा, छत्तीसगढ़ में शुक्ल परिवार, ओडिशा में पटनायक परिवार, मध्यप्रदेश से राजस्थान तक सिंधिया परिवार, उत्तरप्रदेश में मुलायम परिवार, बिहार में लालू परिवार, पंजाब में बादल परिवार, कश्मीर में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार, हरियाणा में कुनबे ही कुनबे, और दूसरे कई इलाकों में इसी तरह की राजनीतिक वंशावली अच्छी तरह कायम हैं। ऐसे देश में कांग्रेस को कोसने के लिए तो यह ठीक है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों ने यह हिसाब लगाया है कि करीब साढ़े पांच सौ परिवार ही ऐसे हैं जो कि देश की संसद और विधानसभाओं पर हावी हैं, वहां काबिज हैं, या वहां के फैसले लेते हैं।
कांग्रेस के तीन अध्यक्ष- इंदिरा, सोनिया, राहुल गांधी
इस देश का मिजाज कुनबापरस्ती को शायद बुरा नहीं मानता है, और वह सिलसिला चलते ही आ रहा है। ऐसे में राहुल गांधी को लेकर बहुत से मजाक तो बन सकते हैं कि वे अभी घुटनों पर चल रहे हैं, या कि वे पप्पू हैं। लेकिन एक दूसरी हकीकत को देखने की जरूरत है। मोतीलाल नेहरू से लेकर जवाहरलाल, इंदिरा, राजीव, सोनिया, और राहुल तक एक सैद्धांतिक कड़ी ऐसी चली आ रही है जिसमें धर्मनिरपेक्षता, जातिनिरपेक्षता, क्षेत्रनिरपेक्षता, सर्वधर्म सद्भाव की एक गौरवशाली परंपरा लगातार कायम है। कहने के लिए 1984 के सिक्ख विरोधी दंगों को कांग्रेस पार्टी की एक हिंसक कार्रवाई कहा जाता है, उसके बहुत से नेता इस हिंसा में शामिल थे, लेकिन यह कहना कांग्रेस के साथ ज्यादती होगी कि उसने सिक्खों को एक धर्म और एक नस्ल के रूप में खत्म करने के लिए ऐसा किया था। इन दंगों को याद करने के साथ-साथ यह भी याद रखना जरूरी होगा कि स्वर्ण मंदिर पर ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सुझाव दिया गया था कि सिक्ख अंगरक्षक उनकी सुरक्षा से हटा दिए जाएं, तो उन्होंने इससे साफ मना कर दिया था। इसलिए हम इस परिवार को साम्प्रदायिकता से परे, साम्प्रदायिकता विरोधी सिद्धांतों की राजनीति करने की एक अटूट परंपरा वाला भी मानते हैं। आज इस देश में जो माहौल बना हुआ है, उसमें यह लगता है कि भ्रष्टाचार के आरोप भारतीय लोकतंत्र को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला मुद्दा नहीं हैं, और इस लोकतंत्र की धुरी में धर्मनिरपेक्षता सबसे बड़ी ताकत है, और साम्प्रदायिकता सबसे बड़ी खामी है। इसे अगर देखें, तो कांग्रेस पार्टी की लंबी परंपरा में भी कुनबापरस्ती के साथ-साथ धर्मनिरपेक्षता की बहुत ही महत्वपूर्ण परंपरा जारी है, और आने वाले वक्त में देश की जनता यह बताएगी कि उसके लिए इन सिद्धांतों का कोई महत्व है या नहीं। हमारा मानना है कि चुनावी नाकामयाबी से परे भी किसी पार्टी के लिए धर्मनिरपेक्षता अधिक जरूरी बात है, और राहुल गांधी से देश को यह पुख्ता उम्मीद है कि चुनावी जीत-हार से परे वे इस पर टिके रहेंगे। (Daily Chhattisgarh)