मनमोहन सरीखे भले इंसान पर लगाई तोहमत नाजायज

संपादकीय
19 दिसम्बर 2017


संसद के दोनों सदनों में एक ऐसे मुद्दे पर सत्तारूढ़ एनडीए के सामने कांग्रेस और बाकी विपक्ष अड़ गए हैं कि प्रधानमंत्री संसद में आएं और यह साफ करें कि गुजरात चुनाव प्रचार में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की देश के प्रति वफादारी पर सवाल कैसे उठाया? कांग्रेस और बाकी विपक्ष यह भी मांग कर रहे हैं कि इस बयान के लिए नरेन्द्र मोदी सदन में आकर माफी मांगें। दरअसल गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान यह बात सामने आई कि दिल्ली में कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर के घर पर भारत और पाकिस्तान के कुछ ऐसे प्रमुख अमनपसंद लोग जुटे जो कि दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने में लंबे समय से लगे हुए हैं। इसके बाद मोदी ने अपनी आमसभाओं में यह आरोप लगाया कि मनमोहन सिंह और मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान के अफसरों और कूटनीतिज्ञों के साथ मिलकर साजिश कर रहे हैं। उन्होंने इस बात को बार-बार दुहराया और यह कहा कि गुजरात के चुनाव में पाकिस्तान दखल दे रहा है, और उसी साजिश के तहत इन लोगों ने बैठकर चर्चा की थी। मनमोहन सिंह ने बहुत ही शालीन शब्दों में मोदी की कही पूरी बात को खारिज किया था, और उस बैठक में मौजूद अधिकतर लोगों ने बयान जारी करके यह कहा था कि पूरी बैठक में गुजरात शब्द का भी इस्तेमाल नहीं हुआ था, न ही उस राज्य के चुनाव को लेकर किसी तरह की चर्चा हुई थी।
चुनाव प्रचार तो खत्म हो जाता है, लेकिन उसमें कही बातें लोगों को याद रहती हैं, और अब टेक्नॉलॉजी की मेहरबानी से ये ऑडियो-वीडियो इतिहास भी बन जाती हैं। नरेन्द्र मोदी ने जिस अंदाज में इस बैठक का चुनावी इस्तेमाल किया था, उसे लोग उस वक्त भी समझ गए थे, लेकिन वह माहौल ऐसा था कि कांग्रेस के एक दूसरे नेता मणिशंकर अय्यर ने मोदी को एक नीच आदमी कहकर भाजपा के हाथ एक बड़ा हथियार दे दिया था, और जिस सूरत में भाजपा को लगभग पूरी सीटें मिली हैं, वहां की सभाओं में मोदी ने उन्हें कही गई इस गाली को बार-बार दुहराया था, और अब ऐसा लगता है कि उसका असर भी मतदाताओं पर हुआ था। हालांकि यह एक और बात है कि इसके पहले भाजपा के कितने नेता सोनिया और राहुल के खिलाफ कितने तरह की गालियों का इस्तेमाल करते आए हैं, लेकिन ऐन चुनाव के बीच में मोदी को नीच कहकर कांग्रेस के एक लापरवाह नेता ने मानो कांग्रेस के हाथ से जीती हुई बाजी ही छीन ली।
लेकिन अभी मुद्दा यह है कि मोदी ने मनमोहन सिंह के बारे में जो कहा है, क्या उस पर उन्हें संसद में बयान देना चाहिए? हमारा ख्याल है कि भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में एक प्रधानमंत्री को कम से कम अपने ठीक पहले के प्रधानमंत्री को पाकिस्तान से मिलकर गुजरात चुनाव के लिए साजिश करने की तोहमत नहीं लगानी थी। खासकर डॉ. मनमोहन सिंह एक ऐसे सज्जन नेता हैं, जिनसे लोगों को यह शिकायत तो हो सकती है कि वे राजनीति करना नहीं जानते, लेकिन हिंदुस्तान में मोदी के अलावा शायद ही किसी को यह भरोसा रहा है कि वे गुजरात में मोदी की भाजपा को हराने के लिए पाकिस्तान से मिलकर कोई साजिश करेंगे। और अगर हम अपने अंदाज का इस्तेमाल करें, तो हमें पूरा भरोसा है कि मोदी को खुद को अपनी इस तोहमत पर फूटी कौड़ी का भरोसा नहीं रहा होगा, और उन्होंने चुनावी इस्तेमाल के लिए ऐसी बात कही जिसका आज संसद में जवाब देना शायद नामुमकिन होगा।
संसदीय लोकतंत्र के साथ एक दिक्कत यह है कि वह महज सदन में बहुमत के आधार पर बनी सरकार तक सीमित नहीं रहता, वह देश में लोकतांत्रिक परंपराओं और सद्भावना तक फैला हुआ एक लचीला तंत्र है जो कि परस्पर सम्मान को बहुत महत्व देने वाला भी है। ऐसे लोकतंत्र में अगर न सम्मान रहे, न सद्भावना रहे, और महज चुनाव जीतने के लिए किसी सच को तोड़-मरोड़कर उसका जाहिर तौर पर झूठा इस्तेमाल रहे, तो यह चल तो सकता है, लेकिन यह न वर्तमान में सम्मान पा सकता, और न ही इतिहास में दर्ज होने के बाद। फिलहाल यह बहुत अफसोस की बात है कि मनमोहन सिंह सरीखे भले इंसान पर पाकिस्तान के साथ मिलकर साजिश करने की तोहमत लगाई गई। ऐसे में संसद में लोगों की तकलीफ जायज है। (Daily Chhattisgarh)

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