संपादकीय
17 दिसम्बर 2017

इस वक्त छत्तीसगढ़ के एक टीवी चैनल पर खबर आ रही है कि राजधानी के पास ही एक कस्बे में एक नाबालिग लड़की ने अपनी ही चार बरस की बहन को बलि चढ़ा दिया है। दूसरी तरफ कल ही अंधविश्वास के खिलाफ सबसे अधिक आक्रामकता के साथ बरसों से अकेले लडऩे वाले छत्तीसगढ़ के डॉ. दिनेश मिश्रा ने सरकार से यह मांग की थी कि छत्तीसगढ़ में कम्बल वाले बाबा नाम से चर्चा में बने हुए एक आदमी के कार्यक्रमों पर रोक लगाई जाए जो कि मरीजों को कम्बल उढ़ाकर उनका इलाज करने का दावा करता है। पिछले कुछ महीनों से छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा भी इस बाबा से इलाज करवाते हुए उसका प्रचार कर रहे हैं, और उसे स्थापित करने में पूरी ताकत लगा रहे हैं। ऐसे में डॉ. दिनेश मिश्रा ने सरकार को याद दिलाया है कि राज्य सरकार के ही अंधविश्वास विरोधी कानून के मुताबिक ऐसे बाबा पर तुरंत रोक लगाई जाए।
पाखंड और अंधविश्वास इनके नुकसान रातों-रात सामने नहीं आते हैं। इनसे लोगों की मानसिकता जख्मी होती है, और उनकी सोच अंधविश्वास में डूबकर कभी हिंसक हो जाती है, तो कभी बिना वजह अतिआत्मविश्वास का शिकार भी हो जाती है। लोगों को लगने लगता है कि उनका कैंसर भी किसी बाबा के भभूत से ठीक हो जाएगा, वे बाबाओं और उनके पाखंडों को चिकित्सा विज्ञान का विकल्प मानकर चलने लगते हैं, और ऐसा ही पाखंड अंधविश्वास को इतना बढ़ाने लगता है कि लोगों की तर्कशक्ति खत्म होने लगती है, वैज्ञानिकता पर से उनका भरोसा खत्म होने लगता है। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ में जगह-जगह महिलाओं को टोनही कहकर मारा जाता है, उनका बहिष्कार किया जाता है, और उनकी हत्या की जाती है। ऐसा ही अंधविश्वास बढ़कर छत्तीसगढ़ में हर कुछ हफ्तों में बलि की कोई न कोई हिंसा खड़ी कर रहा है। एक नाबालिग बच्ची ने अपनी नन्हीं सी बहन को बलि चढ़ा दिया, यह उसकी अपनी सोच नहीं है, सामाजिक माहौल में अंधविश्वास इतना बढ़ा दिया गया है कि कोई बाप अपने बेटे को बलि चढ़ा रहा है, तो कोई बच्ची अपनी छोटी बहन को बलि चढ़ा रही है।
और बात सिर्फ अंधविश्वास की नहीं है, बात है देश में एक वैज्ञानिक सोच को बनाने या खत्म करने की। जब कभी देश के लोगों से तर्कशक्ति को छीन लिया जाता है, उन्हें इतिहास को नकारने को कह दिया जाता है, तमाम किस्म के कड़वे सच को झूठ मानने के लिए कह दिया जाता है, जब कानून को छोड़ देने के लिए कह दिया जाता है, और लोगों की अपनी हिंसक सोच को ही कानून मान लिया जाता है, तो देश की तर्कशक्ति, उसकी न्यायप्रियता एक पूरे समाज के रूप में खत्म होने लगती है। समाज की सोच टुकड़ों में बन या बिगड़ नहीं सकती, वह पूरी की पूरी किसी एक रंग में रंगने का खतरा रखती है। जब लोगों को किसी धर्म के प्रति, किसी विचारधारा के प्रति, किसी संगठन या किसी नेता के प्रति, किसी मंदिर या किसी मस्जिद के प्रति अंधविश्वासी बनाया जाता है, तो वह सेमर के पेड़ से उसके फल के रेशों की तरह उड़कर दूर-दूर तक पहुंचने वाली बात रहती है। नेहरू ने जिस देश की सोच को बड़ी मुश्किल से वैज्ञानिकता की ओर ले जाने की कोशिश की थी, और उसमें बहुत हद तक कामयाबी भी पाई थी, वह पूरा सिलसिला अब खत्म करने की कोशिश हो रही है, और वह ऐसी बलि की शक्ल में कामयाबी भी बता रही है।
छत्तीसगढ़ हो या कि कोई और प्रदेश हो, केन्द्र सरकार के कानून हों, या कि किसी राज्य सरकार के कानून हों, वे महज कागजों पर ही रह जाएंगे, अगर जनता की सोच को रात-दिन की कोशिशों से उन कागजों के खिलाफ ढालने का काम चलता रहेगा। छत्तीसगढ़ में एक तरफ तो सरकार चिकित्सा सुविधाओं के लगातार विस्तार का दावा कर रही है, दूसरी तरफ उसी के गृहमंत्री तमाम सरकारी सुविधाओं के साथ जाकर अंधविश्वास को बढ़ावा देने की मॉडलिंग सी कर रहे हैं। डॉ. दिनेश मिश्र ने एक बहुत जायज बात को उठाया है, सरकार उनकी बात को पूरी तरह अनदेखा करते हुए, अपने मंत्री के पाखंड को अनदेखा करते हुए चल सकती है। और हो सकता है कि छत्तीसगढ़ में ऐसी बलि, महिलाओं को टोनही कहकर ऐसी हत्या महज पुलिस आंकड़े बनकर रह जाए, और यह प्रदेश अंधविश्वास में और अधिक डूब जाए।
-सुनील कुमार
Daily Chhattisgarh
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें