कांग्रेस हार तो गई, लेकिन उसके बेहतर प्रदर्शन को अनदेखा करना चूक होगी

संपादकीय
18 दिसम्बर 2017


गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनाव के नतीजे मोटे तौर पर एक्जिट पोल के अनुमान के मुताबिक भाजपा के पक्ष में गए हैं, और 22 बरस से गुजरात में चली आ रही भाजपा सरकार और पांच बरसों के लिए चुन ली गई है, और हिमाचल में भ्रष्टाचार से लदी हुई कांग्रेस सरकार को जनता ने खारिज कर दिया है। इन चुनावों को दो वजहों से जरूरत से अधिक महत्व मिला था, गुजरात के भीतर पहली बार भाजपा के खिलाफ दो बड़े नौजवान सामाजिक आंदोलनों से उभरकर सामने आए थे, और ये दोनों ही भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे, या अपने लोगों को लड़ा रहे थे। दूसरी बात यह रही कि कांग्रेस के भीतर लीडरशिप की अगली पीढ़ी इन्हीं चुनावों के दौरान बदल रही थी, और राहुल गांधी की अगुवाई में गुजरात कांग्रेस एक अभूतपूर्व उत्साह के साथ चुनाव लड़ रही थी।
चुनावी नतीजे चाहे भाजपा की सरकार बना रहे हों, लेकिन वे खुद भाजपा के दावों और उनकी उम्मीदों के मुकाबले गुजरात में खासे पीछे रहे, और वहां कांग्रेस ने एक नई पकड़ साबित की है। यहां पर गुजरात के नतीजों को देखते हुए यह भी याद रखने की जरूरत है कि चुनाव प्रचार विकास के मुद्दे पर भाजपा ने शुरू किया था, और पाकिस्तान के मुद्दे पर खत्म किया। चुनाव विश्लेषकों ने यह कहा कि देश के किसी विधानसभा चुनाव में पहली बार पाकिस्तान के नाम का ऐसा इस्तेमाल हुआ, और खुद पाकिस्तान के बड़े लोगों ने ये बयान जारी किए कि भाजपा उनके नाम का इस्तेमाल न करे, और अपने दम पर चुनाव लड़े। हमारा यह कहना नहीं है कि इस एक रणनीति के बिना भाजपा चुनाव नहीं जीती होती, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपनी पूरी सरकार के साथ, पूरी पार्टी और तमाम मुख्यमंत्रियों के साथ गुजरात का मोर्चा सम्हालना पड़ा, और तकरीबन हर इलाके में खुद आमसभा करनी पड़ी। दूसरी तरफ मुकाबले में राहुल गांधी ने अकेले ही मोर्चा सम्हाला, और यह याद भी नहीं पड़ता कि कांग्रेस के कोई और बड़े नेता वहां पर जमकर बैठे हों।
अभी जब हम यह लिख रहे हैं, तब वोटों और सीटों का विश्लेषण आ ही रहा है, अभी तक जीत-हार का आंकड़ा तय नहीं हुआ है, और महज जीत-हार ही तय हुई है। इसलिए अगले एक-दो दिनों में यह साफ होगा कि हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवाणी जैसे गुजरात के दो ओबीसी और दलित नौजवान नेताओं के आंदोलनों ने क्या असर डाला है। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि दो बरस बाद देश में आम चुनाव होने हैं, और केन्द्र सरकार की, भाजपा की, हिन्दू संगठनों की बहुत से नीतियों के चलते हुए देश के आदिवासी, दलित, और ओबीसी समुदायों में अलग-अलग किस्म से बेचैनी है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि गुजरात से निकलकर इन दो नौजवानों की बेचैनी बाकी देश में भी चुनावी वोटों में तब्दील हो पाएगी, लेकिन भारत जैसे लोकतंत्र में माहौल अगर बनता है, तो उसकी शुरूआत इसी तरह किसी महत्वहीन लगते सिरे से शुरू होती है।
फिलहाल इन नतीजों के आने तक एक दूसरी बात जो साफ-साफ दिखती है, वह है कांग्रेस की नई लीडरशिप की शक्ल में राहुल गांधी की कामयाबी की। उन्होंने गुजरात चुनाव को बड़े दम-खम के साथ लड़ा, गरिमा के साथ लड़ा, देश की एकता को ध्यान में रखते हुए लड़ा, और वोटों की गिनती में भी वे पिछले चुनाव के मुकाबले खासे आगे बढ़े हैं, उनकी पार्टी ने सीटें भी बहुत अधिक हासिल की हैं। इसलिए यह मानना एक चूक होगी कि कांग्रेस की हार हुई है। भाजपा ने अपनी सरकार बचा ली है, लेकिन कांग्रेस एक मजबूत विपक्ष के रूप में ऐसी संभावनाओं के साथ कामयाब हुई है, जिसका असर वह उत्साह के साथ बाकी देश में भी लाने की कोशिश कर सकती है।
लगे हाथों हिमाचल पर अगर दो बातें कहें, तो पहली बात तो यह कि कांग्रेस को अपने भ्रष्ट नेताओं से छुटकारा पाना होगा। पूरे देश में मोदी को जो शोहरत हासिल हो रही है, उसमें इस जनधारणा का बड़ा हाथ है कि वे ईमानदार हैं। कांग्रेस को अगले आम चुनाव के पहले अपने भ्रष्ट और दुष्ट नेताओं से किनारा करना पड़ेगा, इसके बिना वह मोदी का मुकाबला नहीं कर पाएगी। राहुल गांधी के सामने आज एक क्लीन स्लेट है, और उन्हें राजनीति में अच्छी परंपराओं की इबारत लिखनी चाहिए। उन्होंने पूरे गुजरात चुनाव में अपने गंदगी से दूर रखा, भड़कावे और उकसावे के चुनावी तौर-तरीकों से दूर रखा, और देश के तमाम गंभीर राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बात का नोटिस लिया है। हमारा यह भी मानना है कि देश की जनता भी ऐसी बातों का नोटिस आगे-पीछे कभी न कभी लेती है। शायद ही किसी को यह उम्मीद रही होगी कि इन दोनों राज्यों में कांग्रेस जीतेगी, लेकिन गुजरात में उसने जो बेहतर प्रदर्शन किया है, उसे अनदेखा करना एक चूक ही होगी। (Daily Chhattisgarh)

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