दीवारों पर लिक्खा है, 24 दिसंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 24 दिसंबर

बड़े-बुरे को छोड़कर-भूलकर छोटे-बुरे के खिलाफ कोशिश

संपादकीय
24 दिसम्बर 2017


लोगों का मूल्यांकन करते हुए दुनिया उनकी खूबियों और खामियों के बीच कई बार उलझ जाती है। अभी किसी ने इटली के कुछ सदी पहले के एक सबसे चर्चित कलाकार लियोनार्दो दा विंची की इस खूबी के बारे में लिखा कि वे बाजार में बिक रहे पशु-पक्षियों को इसलिए खरीद लेते थे, कि वे उनको आजाद कर सकें। लेकिन इटली के उन्हीं के जीवनकाल के दूसरे पहलू को देखें तो यह दिखता है कि वहां पर दास प्रथा कायम थी, और गुलाम खरीदे-बेचे जाते थे, और इस कलाकार की मौत के बरसों बाद पोप ने गुलाम प्रथा के खिलाफ फतवा जारी किया था। अब पशु-पक्षियों को आजाद करने की खूबी तो है, लेकिन उसी दौर में इंसानों की मंडी के खिलाफ कुछ न कहने की बात के मुकाबले यह बात दब जानी चाहिए थी। 
आज भी दुनिया भर में बहुत से लोग बेईमानी से करोड़ों कमा लेते हैं, और उसमें से कुछ लाख खर्च करके समाजसेवा का कोई ऐसा काम करते हैं जो कि सामने दिखता है। सतह पर देखकर अपना मन तय करने वाले लोग ऐसे लोगों को महान समाजसेवक मान लेते हैं, और उनके गुणगान करने लगते हैं। ऐसा ही दुनिया के बहुत से लोगों के शाकाहारी होने, या उनके शराब न पीने, या उनकी जिंदगी बहुत अनुशासित होने को लेकर मान लेते हैं, और उनके सात खून माफ कर देते हैं। दुनिया के बुरे से बुरे लोगों की कुछ खूबियों को लेकर उनकी खामियों को अनदेखा करने की चूक कर बैठते हैं। 
इसी तरह अच्छे लोगों की कुछ बुरी बातों को, उनके कुछ गलत कामों, या उनकी कुछ गलतियों को लोग उनकी अच्छी बातों से ऊपर देखना और दिखाना शुरू कर देते हैं। भारत में जवाहर लाल नेहरू के जो सबसे सक्रिय आलोचक हैं, उनके पास नेहरू की दो-तीन तस्वीरें हैं। एक में वे सिगरेट पीते दिख रहे हैं, और एक में वे एडविना माउंटबेटन के साथ हंसते हुए दिख रहे हैं। इन दो को लेकर नेहरू को बदचलन साबित करने की कोशिश आधी सदी से चली आ रही है, और अब डिजिटल जमाना आ जाने के बाद लोगों को यह लगता है कि अगर इन दो तस्वीरों को चारों तरफ बांटा नहीं गया, तो उग्र-राष्ट्रवाद में योगदान देना नहीं हो पाएगा। कुछ लोग इससे भी अधिक आगे बढ़ते हैं और किसी विदेशी महिला के साथ गांधी के डांस करने की एक फर्जी तस्वीर को यह बताते हुए फैलाते हैं कि गांधी कितने बदचलन थे। 
लेकिन ऐसी साजिशों से परे अगर महज हकीकत की बात करें, तो लोगों को किसी की खूबी या खामी को एक व्यापक संदर्भ में ही देखना चाहिए। नेहरू के मांसाहारी होने को जो लोग उनके खिलाफ इस्तेमाल करते हैं, उनको यह भी सोचना चाहिए कि उनके अपने साथी इस देश में गांधी से लेकर गुजरात तक कितना लहू बहा चुके हैं। उनको यह भी याद रखना चाहिए कि जिस गाय को बचाने के नाम पर लोग वाहवाही पाते हैं, उनमें से कितने लोग ऐसे हैं जो कि गाय को लेकर इंसानों के कत्ल पर कुछ भी नहीं बोलते। ऐसे लोगों का मूल्यांकन हर एक बयान के बाद नहीं हो सकता, लेकिन जो समझदार लोग हैं वे दूसरों की खूबियों के बिना उनकी खामियों का मूल्यांकन नहीं करते, और न ही उनकी खामियों के बिना उनकी खूबियों का। 
गरीबों का हक दबाने वाले लोग जब सड़क किनारे प्याऊ और भंडारे खोलकर गरीबों की सेवा का नाटक करते हैं, तो उन्हें समाजसेवी मान लेने के पहले उनके बारे में गहराई से कुछ सोच भी लेना चाहिए। यह बात आसान नहीं है, क्योंकि यह बात बहुत कड़वाहट फैलाने वाली है, लेकिन दुनिया के जो गंभीर और जिम्मेदार लोग हैं, वे कतरा-कतरा बातों पर किसी के बारे में अपनी धारणा नहीं बनाते। इसलिए छोटी-छोटी खूबियों और खामियों से उबरकर एक व्यापक नजरिए से लोगों के बारे में, मुद्दों के बारे में सोचना सीखना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

पाक फौजी जनरल की ओर से समझदारी की एक बात

संपादकीय
23 दिसम्बर 2017


बहुत दिनों बाद पाकिस्तान की फौज के किसी अफसर से एक समझदारी की बात सामने आई है जो कि युद्धोन्माद से परे की है, और दोनों देशों के ताकतवर लोगों के लिए एक संदेश भी है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने भारत से रिश्ते सुधारने की वकालत की है। उन्होंने पाकिस्तान के सांसदों को आश्वासन दिया है कि पाकिस्तानी सेना उनके प्रयासों का समर्थन करेगी। मंगलवार को पाकिस्तान की सीनेट कमेटी की बैठक में दिए अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा, सेना भारत के साथ संबंध सामान्य करने के तहत उठाए गए राजनीतिक कदमों का समर्थन करती है। पाकिस्तानी सेना को लेकर आम तौर पर माना जाता है कि वह भारत के खिलाफ रहती है। इसलिए उसके मौजूदा मुखिया के इस बयान को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि इस मौके पर जनरल बाजवा ने कुछ बातें भारत के खिलाफ भी कही हैं, लेकिन हम उन पर जाना नहीं चाहते। तनाव बढ़ाने के लिए तो किसी की भी कुछ बातों को पकड़ा ही जा सकता है, लेकिन तनाव घटाने के लिए जब कभी कोई बात सामने आती है तो उसका इस्तेमाल करना चाहिए। हमारा यह मानना है कि किसी भी देश की फौज को बहुत सारे मुद्दों का इलाज जंग में दिखता है क्योंकि उनकी पूरी ट्रेनिंग और उनकी पूरी सोच उसी किस्म से बनी रहती है। इसके साथ-साथ फौज का अस्तित्व भी जंग के समय ही लोगों को दिखता है, इसलिए भी भारत और पाकिस्तान के बहुत से मौजूदा फौजी अफसर, और अधिकतर रिटायर्ड फौजी अफसर टीवी के चैनलों पर जंग के फतवे देते दिखते हैं। हमारा मानना है कि ऐसी बकवास से दोनों ही देश अपने गरीबों को अनदेखा करते हुए फौज पर अंधाधुंध खर्च करते हैं जो कि इन दोनों ही देशों के लिए आत्मघाती है, लेकिन उसे आत्मगौरव से और राष्ट्रवाद से इस तरह जोड़ दिया गया है कि देश के लोगों को भूखे रहकर भी सरहद के लिए फौजी सामान खरीदना चाहिए।
भारत और पाकिस्तान के बीच कई जंग हो चुकी हैं, लेकिन उससे न तो कोई नतीजा निकला है, और न ही निकलेगा। इन दोनों ही देशों ने परमाणु हथियार बना रखे हैं, लेकिन आज के अंतरराष्ट्रीय माहौल में किसी भी लोकतांत्रिक देश के फौजी हथियार उसके अपने अहंकार की सेवा करने के अलावा और किसी काम के हैं नहीं। भारत और पाकिस्तान के बीच किसी तरह की परमाणु जंग न चीन होने देगा, और न अमरीका, और न ही रूस। ऐसे में इन दोनों देशों को सरहद पर तनाव घटाना चाहिए, दोनों देशों के बीच आम लोगों के रिश्ते लगातार बढ़ाना चाहिए, कारोबार लगातार बढ़ाना चाहिए, खेलकूद से लेकर संगीत और कला तक का आना-जाना बढ़ाना चाहिए। यहां पर हम एक खास जिक्र भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का करना चाहेंगे जो कि लगातार ट्विटर पर दिखती हैं और पाकिस्तान के लोगों को इलाज के लिए भारत आने का वीजा मंजूर करते हुए उन्हें बेहतर सेहत के लिए शुभकामनाएं भी देती हैं। हमारा मानना है कि ऐसी ही सद्भावना से हम सरहद के दोनों तरफ के सबसे गरीब लोगों को उनका बेहतर हक दे पाएंगे। इसके अलावा और कोई जरिया आज दुनिया में नहीं है। फौजी तनाव किसी के काम का नहीं है। और भारत और पाकिस्तान के बीच तो कारोबार की इतनी गुंजाइश है कि दोनों तरफ के बहुत से लोगों को इससे फायदा होगा।
जनरल बाजवा ने जो कहा वह पाकिस्तान में बहुत लोकप्रिय बात नहीं मानी जाएगी, लेकिन वह बात बहुत महत्वपूर्ण है, और भारत की तरफ से उसका कोई फौजी जवाब न जाकर, लोकतांत्रिक जवाब जाना चाहिए। जब-जब कोई देश अपनी विदेश नीति को, पड़ोसियों से अपने रिश्तों को फौजी अफसरों पर छोड़ते हैं, तो वे आमतौर पर जंग की बातें करने लगते हैं। भारत एक अधिक मजबूत लोकतंत्र है, और उसे ऐसी बातों से बचना चाहिए। किसी भी तरफ से एक सकारात्मक पहल हुई है, और उसे आगे बढ़ाने की जरूरत है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 दिसंबर

अविश्वास प्रस्ताव, चुनाव के पहले सत्ता के लिए चेतावनी

संपादकीय
22 दिसम्बर 2017


छत्तीसगढ़ विधानसभा में इस वक्त विपक्षी कांग्रेस पार्टी रमन सरकार के खिलाफ अपना अविश्वास प्रस्ताव पेश कर चुकी है, और उस पर आगे चर्चा जारी है। सदन के भीतर कोई भी फैसला विधायकों के आंकड़ों से होता है, इसलिए इस अविश्वास प्रस्ताव के पारित होने की संभावना या आशंका शून्य रहते हुए भी, इसका एक महत्व है। संसदीय लोकतंत्र में संसद या विधानसभाओं का इस्तेमाल मुद्दों को उठाने के लिए, सरकार को घेरने के लिए, उससे जवाब मांगने के लिए होना चाहिए, न कि नारेबाजी और बहिर्गमन के लिए। इसलिए जब कभी सदन में गंभीर चर्चा होती है, हम उसे वहां पर विपक्षी शक्ति प्रदर्शन के मुकाबले बेहतर मानते हैं, और अभी छत्तीसगढ़ विधानसभा में ऐसा ही चल रहा है। कांग्रेस ने राज्य सरकार के मौजूदा कार्यकाल में शायद अपने इस आखिरी शक्ति प्रदर्शन पर बड़ी मेहनत की है, और करीब डेढ़ सौ मुद्दों को उसने अविश्वास प्रस्ताव में रखा है। हर मंत्री, हर विधायक के खिलाफ भ्रष्टाचार या दूसरे किस्म के आरोप लगाए हैं, और आने वाले कुछ घंटों में सरकार उनका जवाब देगी, और फिर शायद ध्वनिमत से या मतदान से अविश्वास प्रस्ताव का फैसला होगा।
कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव को देखें, तो यह सदन से बाहर राज्य सरकार के लिए एक अच्छी नसीहत भी है कि अगले चुनाव में कांग्रेस किन बातों को मुद्दा बनाएगी, इसकी एक झलक उसे अभी मिल जा रही है, और इसमें अगर किसी सुधार की गुंजाइश है, तो सरकार अगले नौ महीनों में इन आरोपों के जवाब ढूंढ सकती है, महज सदन में बताने को नहीं, जनता के बीच उसे सहमत कराने के लिए भी। सरकार हो या विपक्ष, हर राजनीतिक दल को किसी भी मौके में संभावनाएं ढूंढनी चाहिए। आरोपों के बीच भी इस आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन की संभावना बनती है कि क्या सचमुच ही सरकार ने ऐसी गलती की है, या कि ऐसे गलत काम किए हैं, जिनसे कि बचा जाना चाहिए था, बचा जा सकता था, और अब उनके हो जाने के बाद वे दुहराए न जाएं, इसकी गारंटी कैसे की जाए। हम जब इन डेढ़ सौ मुद्दों को देखते हैं, तो लगता है कि इनमें सभी किस्म की मिलीजुली बातें हैं, बहुत सी बातें गलत काम हैं, बहुत सी बातें गलतियां हैं, और बहुत सी बातें सरकार के खिलाफ एक जनधारणा है। यह अविश्वास प्रस्ताव रमन सरकार के मौजूदा कार्यकाल के आखिरी बरस में तब आया है जब चुनाव का माहौल पूरी तरह से जोर पकड़ चुका है। सरकार के भीतर के लोग भी इसे कांग्रेस का चुनावी बिगुल मानकर चल रहे हैं, और ऐसे आसार दिख रहे हैं कि सरकार सदन में जवाब देने के बाद भी इस दस्तावेज को लेकर बैठेगी, और डैमेज-कंट्रोल की कोशिश करेगी। और ऐसा होना भी चाहिए।
हमारा मानना है कि विधानसभा के भीतर या विधानसभा के बाहर, किसी पार्टी के नफे-नुकसान से परे राज्य के हित में तमाम किस्म की गलतियां उजागर होनी चाहिए, और गलत कामों का भांडाफोड़ भी होना चाहिए। ऐसी उम्मीद है कि अगले नौ महीने में ऐसी कोई नई बातें सरकार सामने नहीं आने देगी, लेकिन अभी जो बातें सामने आई हैं, उनमें से कोई चुनावी मुद्दा न बन सके, इसके लिए सरकार को मेहनत भी करनी होगी, और कार्यकाल का आखिरी का छोटा सा हिस्सा बिना ऐसे किसी विवाद के ठीक से गुजारने की कोशिश भी करनी होगी। इस आरोप पत्र के साथ कांग्रेस पार्टी पूरे आक्रामक तेवर लेकर मैदान में है। और इस आरोप पत्र से परे प्रदेश में इन दिनों लगातार गुंज रहे सेक्स-सीडी कांड में कांग्रेस जांच में घिरी हुई है, और उसके प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल पर भी आरोप लगे हैं। आने वाले दिनों में सीबीआई की जांच भूपेश बघेल तक पहुंच सकती है, ऐसी आशंका बहुत से लोगों को है। ऐसे में सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़वाहट और टकराहट और आगे बढ़ेगी। फिलहाल हमारी सलाह यही है कि छत्तीसगढ़ सरकार को, और सत्तारूढ़ भाजपा को इस आरोप पत्र की तमाम बातों को लेकर एक आत्ममंथन करना चाहिए कि ऐसी नौबत क्यों आई, और जनता को इसके खिलाफ सहमत कराने के लिए क्या-क्या करना होगा। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 दिसंबर

यूपीए और मोदी, दोनों सरकारों के तहत बरसों की सीबीआई जांच, 2जी में हाथ आया शून्य

संपादकीय
21 दिसम्बर 2017


सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का जिक्र करते हुए पौन दो लाख करोड़ रूपए के एक संभावित-नुकसान का हिसाब लगाया था। इस रिपोर्ट को लेकर उस वक्त की यूपीए सरकार और उसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर एनडीए गठबंधन के दलों ने जमकर हमला किया था, और एक हिसाब से ऐसा माना जाता है कि यूपीए की आम चुनाव की शिकस्त में इन आरोपों का खासा बड़ा योगदान था। ऐसे में 2011 से अदालत में चल रहे इस मामले में आज सभी सत्रह आरोपी बरी कर दिए गए, और जज ने कुल एक लाईन का फैसला सुनाया कि सीबीआई कोई भी लेन-देन साबित नहीं कर सकी, इसलिए सभी लोगों को बरी किया जा रहा है। इस फैसले के बाद कांग्रेस ने संसद के भीतर और बाहर यह कहा है कि जिस कथित भ्रष्टाचार को लेकर यूपीए को हरा दिया गया था, आज वह भ्रष्टाचार का मामला गलत साबित हुआ है।
यह मामला यूपीए सरकार के दौरान स्पेक्ट्रम आबंटन में घोटाले के आरोपों के साथ सामने आया था, और उसी वक्त इस मामले की सेंट्रल विजिलेंस कमीशन के हुक्म पर सीबीआई जांच शुरू हो गई थी। इस वक्त दूरसंचार मंत्री रहे, कांग्रेस के एक सहयोगी दल तमिलाडु के डीएमके के ए.राजा सहित, डीएमके के मुखिया करूणानिधि के परिवार के और लोगों को, बड़ी-बड़ी दूरसंचार कंपनियों के बड़े अफसरों को इसमें आरोपी बनाया गया था। भारत का 2014 का आम चुनाव इस कथित भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा बनाकर लड़ा गया था, और कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए का इसमें सफाया हो गया था। तब से अब तक मोदी सरकार के मातहत काम करने वाली सीबीआई को इस फैसले के आने के पहले जांच और मुकदमे के लिए तेरह सौ से अधिक दिन और मिले थे। इस तरह यूपीए और एनडीए सरकार के तहत साढ़े सात बरसों से चले आ रहा इस मामले में सीबीआई कुछ भी साबित नहीं कर सकी। इसलिए यह अटकल लगाना गलत होगा कि उस वक्त सीबीआई ने यूपीए के मातहत हजार दिनों में जांच में बेईमानी की, या कि अब मोदी सरकार के तहत इन तेरह सौ से अधिक दिनों में बेईमानी की। ऐसे में आज डीएमके और कांग्रेस के नेताओं के खुश होने का हक बनता है, और यूपीए दलों का यह कहने का हक बनता है कि जो भ्रष्टाचार हुआ ही नहीं है, उस मुद्दे पर उनकी सरकार चली गई।
कुछ लोग सीबीआई की इस विशेष अदालत में सीबीआई के केस हार जाने को इस बात से जोड़कर देख रहे हैं कि क्या एनडीए तमिलनाडु में डीएमके के साथ अदालत में नरमी बरतवाकर आगे उससे गठबंधन या तालमेल का रास्ता तैयार कर रही है? अगर ऐसा है भी, तो भी यह कोई अनहोनी बात नहीं होगी क्योंकि सीबीआई पर इस तरह की तोहमतें अलग-अलग समय पर अलग-अलग पार्टियों से लगती ही रही हैं। फिलहाल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर डीएमके के नेताओं और पारिवारिक सदस्यों तक के लिए यह एक राहत की बात है, और बहुत बड़ी राहत की बात है। अब सीबीआई इस फैसले के खिलाफ आगे अपील करती भी है, तो ऊपर की किसी अदालत में इसका फैसला आने के पहले शायद देश का अगला आम चुनाव हो चुका रहेगा। सीबीआई की इस मामले में नाकामयाबी थोड़ा सा हैरान जरूर करती हैं कि विशेष अदालत ने उसके मामले में कुछ भी साबित होते नहीं पाया। हमारा ख्याल है कि गुजरात के चुनाव में बेहतर नतीजों के बाद कांग्रेस पार्टी के लिए आज का दिन एक और नया उत्साह लेकर आया है जब उसकी सरकार के खिलाफ चल रहा देश का भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा मामला अदालत में औंधे मुंह गिर गया।
यह मामला भारत के इतिहास में एक अनोखे किस्म का मामला इसलिए था कि इस स्पेक्ट्रम आबंटन में गड़बड़ी का आरोप लगाने वाली जनहित याचिकाओं पर सेंट्रल विजिलेंस कमीशन ने 2009 में सीबीआई को जांच शुरू करने का आदेश दिया था। इसके बाद 2010 में सीएजी की रिपोर्ट आई, जिसमें संभावित-नुकसान के सीएजी के निष्कर्ष पर आगे बढ़ा यह मामला आज पहली अदालत में फैसले तक पहुंचा। इस जांच ने अपना लगभग आधा हिस्सा यूपीए सरकार के कार्यकाल में पूरा किया, और आधे से कुछ अधिक हिस्सा मोदी सरकार के कार्यकाल में। आठ बरस से अधिक  लंबी जांच और मुकदमेबाजी से आज हासिल आया शून्य, सिवाय यूपीए सरकार के हाथ शिकस्त, और मोदी के सिर पर ताज के। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 दिसंबर

अब समाचार-विचार का संपादक बाजार ही है...

संपादकीय
20 दिसम्बर 2017


इन दिनों दुनिया में सबसे लोकप्रिय बने हुए सोशल मीडिया, फेसबुक ने एक नया फीचर जोड़ा है कि आप अपने किसी फेसबुक-दोस्त की पोस्ट से अगर थके हुए हैं, तो आप अगले तीस दिनों के लिए उसकी तमाम पोस्ट देखने से बच सकते हैं। बस एक क्लिक, और एक महीने की नापसंदगी नजरों से परे। यह तो फेसबुक पर है, लेकिन असल जिंदगी में ऐसा थोड़ा मुश्किल है। हम सोचें कि अखबारों में अगले तीस दिन हम किसी एक घटिया बात को न देखें, तो वह मुमकिन नहीं है, हम यह सोचें कि टीवी चैनलों पर किसी एक चीज को न देखें, तो आज वह भी मुमकिन नहीं है, टीवी के न्यूज-बुलेटिन पर वहां के संपादक जो तय करते हैं, उसे उतनी देर और उसी सिलसिले से देखना जरूरी होता है।
लेकिन खबरों के डिजिटल मीडिया में धीरे-धीरे यह सहूलियत बढ़ती जा रही है। लोग अब गूगल के समाचार-पन्ने पर यह तय कर सकते हैं कि वे किन खबरों को अधिक देखना चाहते हैं, और किन खबरों को कम। लोग इन पन्नों को अपने हिसाब से डिजाइन भी कर सकते हैं कि वे किस तरह से इन्हें देखना चाहते हैं। बहुत सी समाचार वेबसाइटें भी यह सहूलियत देती हैं कि वहां पहुंचने वाले लोग किन विषयों को अधिक देखना चाहते हैं, और किनको देखना नहीं चाहते हैं। और यह बात दो हिसाब से अधिक मायने रखने लगी है। एक तो इसलिए कि अखबार हो या टीवी, या फिर वेबसाइट हो, उन पर विज्ञापनदाता वहीं पर अपना खर्च करना चाहते हैं जहां पर लोग अपना समय गुजारते हैं, जहां पर खबरों को देखते हैं। इसलिए अब मीडिया की यह मजबूरी भी हो रही है कि वह जनहित के मुद्दों को छोड़कर, महज जनरूचि के मुद्दों को छूते चले, उन्हें ही जगह दे। एक वक्त पब्लिक इंटरेस्ट की खबरों को दिखाया जाता था, या छापा जाता था कि वे जनता के हित में हैं। अब पब्लिक-इंटरेस्ट का मतलब महज जनता की दिलचस्पी की खबरें हो गया है।
दरअसल टीवी के दर्शक हों, अखबारों के पाठक हों, या कि डिजिटल मीडिया, ऑनलाईन मीडिया, या फोन पर आधारित मीडिया को देखने वाले लोग हों, अब लोगों के पास वक्त की कमी होने लगी है, समाचार माध्यम बढ़ते चले गए हैं, मूलधारा के समाचार माध्यमों से परे भी बहुत से नए-नए ऐसे समाचार-स्रोत हो गए हैं जिनसे लोगों का काम चलता है, बेहतर चलता है, इसलिए अब पूरे के पूरे मीडिया को अपने तौर-तरीकों को पूरी तरह बदलना भी पड़ रहा है। हम यह तो नहीं कहते कि यह नौबत लोगों का भला करने जा रही है, क्योंकि अब जो बिकता है वह दिखता है की नौबत साबित करने में अब हर किसी के पास कम्प्यूटर से मिलने वाले आंकड़े हैं कि किस खबर को लोग देखते हैं, कितनी देर देखते हैं, और किस खबर को छोड़ देते हैं। जब किसी समाचार या किसी विचार का महत्व उसे पढऩे वालों की गिनती, या उसके साथ मिलने वाले इश्तहार से तय होने लगी है, तो फिर अखबारनवीसी की पुरानी और परंपरागत सोच पूरी तरह से खारिज हो चुकी है। अब इंटरनेट पर समाचार-विचार का महत्व उन्हें लिखने वाले लोग तय नहीं करते, बल्कि कम्प्यूटर ही मालिक को यह बता देता है कि किस बात को कितने लोग देख या पढ़ रहे हैं, और इंटरनेट के कम्प्यूटर यह बता देते हंै कि वे देखने-पढऩे वाले लोग खरीददार हैं या नहीं, वे कितनी खर्च की ताकत रखते हैं।
इस सिलसिले ने एक वक्त की पत्रकारिता को, आज बहुत ही बुरी और गलाकाट स्पर्धा में बदलकर रख दिया है, इससे लोगों को एक क्लिक पर ही मनपसंद पढऩे तो मिल रहा है, लेकिन वह उनके लिए कितना अच्छा है, यह तय करने वाला बाजार है, कोई संपादक नहीं। (Daily Chhattisgarh)