यूपीए और मोदी, दोनों सरकारों के तहत बरसों की सीबीआई जांच, 2जी में हाथ आया शून्य

संपादकीय
21 दिसम्बर 2017


सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का जिक्र करते हुए पौन दो लाख करोड़ रूपए के एक संभावित-नुकसान का हिसाब लगाया था। इस रिपोर्ट को लेकर उस वक्त की यूपीए सरकार और उसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर एनडीए गठबंधन के दलों ने जमकर हमला किया था, और एक हिसाब से ऐसा माना जाता है कि यूपीए की आम चुनाव की शिकस्त में इन आरोपों का खासा बड़ा योगदान था। ऐसे में 2011 से अदालत में चल रहे इस मामले में आज सभी सत्रह आरोपी बरी कर दिए गए, और जज ने कुल एक लाईन का फैसला सुनाया कि सीबीआई कोई भी लेन-देन साबित नहीं कर सकी, इसलिए सभी लोगों को बरी किया जा रहा है। इस फैसले के बाद कांग्रेस ने संसद के भीतर और बाहर यह कहा है कि जिस कथित भ्रष्टाचार को लेकर यूपीए को हरा दिया गया था, आज वह भ्रष्टाचार का मामला गलत साबित हुआ है।
यह मामला यूपीए सरकार के दौरान स्पेक्ट्रम आबंटन में घोटाले के आरोपों के साथ सामने आया था, और उसी वक्त इस मामले की सेंट्रल विजिलेंस कमीशन के हुक्म पर सीबीआई जांच शुरू हो गई थी। इस वक्त दूरसंचार मंत्री रहे, कांग्रेस के एक सहयोगी दल तमिलाडु के डीएमके के ए.राजा सहित, डीएमके के मुखिया करूणानिधि के परिवार के और लोगों को, बड़ी-बड़ी दूरसंचार कंपनियों के बड़े अफसरों को इसमें आरोपी बनाया गया था। भारत का 2014 का आम चुनाव इस कथित भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा बनाकर लड़ा गया था, और कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए का इसमें सफाया हो गया था। तब से अब तक मोदी सरकार के मातहत काम करने वाली सीबीआई को इस फैसले के आने के पहले जांच और मुकदमे के लिए तेरह सौ से अधिक दिन और मिले थे। इस तरह यूपीए और एनडीए सरकार के तहत साढ़े सात बरसों से चले आ रहा इस मामले में सीबीआई कुछ भी साबित नहीं कर सकी। इसलिए यह अटकल लगाना गलत होगा कि उस वक्त सीबीआई ने यूपीए के मातहत हजार दिनों में जांच में बेईमानी की, या कि अब मोदी सरकार के तहत इन तेरह सौ से अधिक दिनों में बेईमानी की। ऐसे में आज डीएमके और कांग्रेस के नेताओं के खुश होने का हक बनता है, और यूपीए दलों का यह कहने का हक बनता है कि जो भ्रष्टाचार हुआ ही नहीं है, उस मुद्दे पर उनकी सरकार चली गई।
कुछ लोग सीबीआई की इस विशेष अदालत में सीबीआई के केस हार जाने को इस बात से जोड़कर देख रहे हैं कि क्या एनडीए तमिलनाडु में डीएमके के साथ अदालत में नरमी बरतवाकर आगे उससे गठबंधन या तालमेल का रास्ता तैयार कर रही है? अगर ऐसा है भी, तो भी यह कोई अनहोनी बात नहीं होगी क्योंकि सीबीआई पर इस तरह की तोहमतें अलग-अलग समय पर अलग-अलग पार्टियों से लगती ही रही हैं। फिलहाल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर डीएमके के नेताओं और पारिवारिक सदस्यों तक के लिए यह एक राहत की बात है, और बहुत बड़ी राहत की बात है। अब सीबीआई इस फैसले के खिलाफ आगे अपील करती भी है, तो ऊपर की किसी अदालत में इसका फैसला आने के पहले शायद देश का अगला आम चुनाव हो चुका रहेगा। सीबीआई की इस मामले में नाकामयाबी थोड़ा सा हैरान जरूर करती हैं कि विशेष अदालत ने उसके मामले में कुछ भी साबित होते नहीं पाया। हमारा ख्याल है कि गुजरात के चुनाव में बेहतर नतीजों के बाद कांग्रेस पार्टी के लिए आज का दिन एक और नया उत्साह लेकर आया है जब उसकी सरकार के खिलाफ चल रहा देश का भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा मामला अदालत में औंधे मुंह गिर गया।
यह मामला भारत के इतिहास में एक अनोखे किस्म का मामला इसलिए था कि इस स्पेक्ट्रम आबंटन में गड़बड़ी का आरोप लगाने वाली जनहित याचिकाओं पर सेंट्रल विजिलेंस कमीशन ने 2009 में सीबीआई को जांच शुरू करने का आदेश दिया था। इसके बाद 2010 में सीएजी की रिपोर्ट आई, जिसमें संभावित-नुकसान के सीएजी के निष्कर्ष पर आगे बढ़ा यह मामला आज पहली अदालत में फैसले तक पहुंचा। इस जांच ने अपना लगभग आधा हिस्सा यूपीए सरकार के कार्यकाल में पूरा किया, और आधे से कुछ अधिक हिस्सा मोदी सरकार के कार्यकाल में। आठ बरस से अधिक  लंबी जांच और मुकदमेबाजी से आज हासिल आया शून्य, सिवाय यूपीए सरकार के हाथ शिकस्त, और मोदी के सिर पर ताज के। (Daily Chhattisgarh)

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