अब समाचार-विचार का संपादक बाजार ही है...

संपादकीय
20 दिसम्बर 2017


इन दिनों दुनिया में सबसे लोकप्रिय बने हुए सोशल मीडिया, फेसबुक ने एक नया फीचर जोड़ा है कि आप अपने किसी फेसबुक-दोस्त की पोस्ट से अगर थके हुए हैं, तो आप अगले तीस दिनों के लिए उसकी तमाम पोस्ट देखने से बच सकते हैं। बस एक क्लिक, और एक महीने की नापसंदगी नजरों से परे। यह तो फेसबुक पर है, लेकिन असल जिंदगी में ऐसा थोड़ा मुश्किल है। हम सोचें कि अखबारों में अगले तीस दिन हम किसी एक घटिया बात को न देखें, तो वह मुमकिन नहीं है, हम यह सोचें कि टीवी चैनलों पर किसी एक चीज को न देखें, तो आज वह भी मुमकिन नहीं है, टीवी के न्यूज-बुलेटिन पर वहां के संपादक जो तय करते हैं, उसे उतनी देर और उसी सिलसिले से देखना जरूरी होता है।
लेकिन खबरों के डिजिटल मीडिया में धीरे-धीरे यह सहूलियत बढ़ती जा रही है। लोग अब गूगल के समाचार-पन्ने पर यह तय कर सकते हैं कि वे किन खबरों को अधिक देखना चाहते हैं, और किन खबरों को कम। लोग इन पन्नों को अपने हिसाब से डिजाइन भी कर सकते हैं कि वे किस तरह से इन्हें देखना चाहते हैं। बहुत सी समाचार वेबसाइटें भी यह सहूलियत देती हैं कि वहां पहुंचने वाले लोग किन विषयों को अधिक देखना चाहते हैं, और किनको देखना नहीं चाहते हैं। और यह बात दो हिसाब से अधिक मायने रखने लगी है। एक तो इसलिए कि अखबार हो या टीवी, या फिर वेबसाइट हो, उन पर विज्ञापनदाता वहीं पर अपना खर्च करना चाहते हैं जहां पर लोग अपना समय गुजारते हैं, जहां पर खबरों को देखते हैं। इसलिए अब मीडिया की यह मजबूरी भी हो रही है कि वह जनहित के मुद्दों को छोड़कर, महज जनरूचि के मुद्दों को छूते चले, उन्हें ही जगह दे। एक वक्त पब्लिक इंटरेस्ट की खबरों को दिखाया जाता था, या छापा जाता था कि वे जनता के हित में हैं। अब पब्लिक-इंटरेस्ट का मतलब महज जनता की दिलचस्पी की खबरें हो गया है।
दरअसल टीवी के दर्शक हों, अखबारों के पाठक हों, या कि डिजिटल मीडिया, ऑनलाईन मीडिया, या फोन पर आधारित मीडिया को देखने वाले लोग हों, अब लोगों के पास वक्त की कमी होने लगी है, समाचार माध्यम बढ़ते चले गए हैं, मूलधारा के समाचार माध्यमों से परे भी बहुत से नए-नए ऐसे समाचार-स्रोत हो गए हैं जिनसे लोगों का काम चलता है, बेहतर चलता है, इसलिए अब पूरे के पूरे मीडिया को अपने तौर-तरीकों को पूरी तरह बदलना भी पड़ रहा है। हम यह तो नहीं कहते कि यह नौबत लोगों का भला करने जा रही है, क्योंकि अब जो बिकता है वह दिखता है की नौबत साबित करने में अब हर किसी के पास कम्प्यूटर से मिलने वाले आंकड़े हैं कि किस खबर को लोग देखते हैं, कितनी देर देखते हैं, और किस खबर को छोड़ देते हैं। जब किसी समाचार या किसी विचार का महत्व उसे पढऩे वालों की गिनती, या उसके साथ मिलने वाले इश्तहार से तय होने लगी है, तो फिर अखबारनवीसी की पुरानी और परंपरागत सोच पूरी तरह से खारिज हो चुकी है। अब इंटरनेट पर समाचार-विचार का महत्व उन्हें लिखने वाले लोग तय नहीं करते, बल्कि कम्प्यूटर ही मालिक को यह बता देता है कि किस बात को कितने लोग देख या पढ़ रहे हैं, और इंटरनेट के कम्प्यूटर यह बता देते हंै कि वे देखने-पढऩे वाले लोग खरीददार हैं या नहीं, वे कितनी खर्च की ताकत रखते हैं।
इस सिलसिले ने एक वक्त की पत्रकारिता को, आज बहुत ही बुरी और गलाकाट स्पर्धा में बदलकर रख दिया है, इससे लोगों को एक क्लिक पर ही मनपसंद पढऩे तो मिल रहा है, लेकिन वह उनके लिए कितना अच्छा है, यह तय करने वाला बाजार है, कोई संपादक नहीं। (Daily Chhattisgarh)

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन अंतरराष्ट्रीय मानव एकता दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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