अविश्वास प्रस्ताव, चुनाव के पहले सत्ता के लिए चेतावनी

संपादकीय
22 दिसम्बर 2017


छत्तीसगढ़ विधानसभा में इस वक्त विपक्षी कांग्रेस पार्टी रमन सरकार के खिलाफ अपना अविश्वास प्रस्ताव पेश कर चुकी है, और उस पर आगे चर्चा जारी है। सदन के भीतर कोई भी फैसला विधायकों के आंकड़ों से होता है, इसलिए इस अविश्वास प्रस्ताव के पारित होने की संभावना या आशंका शून्य रहते हुए भी, इसका एक महत्व है। संसदीय लोकतंत्र में संसद या विधानसभाओं का इस्तेमाल मुद्दों को उठाने के लिए, सरकार को घेरने के लिए, उससे जवाब मांगने के लिए होना चाहिए, न कि नारेबाजी और बहिर्गमन के लिए। इसलिए जब कभी सदन में गंभीर चर्चा होती है, हम उसे वहां पर विपक्षी शक्ति प्रदर्शन के मुकाबले बेहतर मानते हैं, और अभी छत्तीसगढ़ विधानसभा में ऐसा ही चल रहा है। कांग्रेस ने राज्य सरकार के मौजूदा कार्यकाल में शायद अपने इस आखिरी शक्ति प्रदर्शन पर बड़ी मेहनत की है, और करीब डेढ़ सौ मुद्दों को उसने अविश्वास प्रस्ताव में रखा है। हर मंत्री, हर विधायक के खिलाफ भ्रष्टाचार या दूसरे किस्म के आरोप लगाए हैं, और आने वाले कुछ घंटों में सरकार उनका जवाब देगी, और फिर शायद ध्वनिमत से या मतदान से अविश्वास प्रस्ताव का फैसला होगा।
कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव को देखें, तो यह सदन से बाहर राज्य सरकार के लिए एक अच्छी नसीहत भी है कि अगले चुनाव में कांग्रेस किन बातों को मुद्दा बनाएगी, इसकी एक झलक उसे अभी मिल जा रही है, और इसमें अगर किसी सुधार की गुंजाइश है, तो सरकार अगले नौ महीनों में इन आरोपों के जवाब ढूंढ सकती है, महज सदन में बताने को नहीं, जनता के बीच उसे सहमत कराने के लिए भी। सरकार हो या विपक्ष, हर राजनीतिक दल को किसी भी मौके में संभावनाएं ढूंढनी चाहिए। आरोपों के बीच भी इस आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन की संभावना बनती है कि क्या सचमुच ही सरकार ने ऐसी गलती की है, या कि ऐसे गलत काम किए हैं, जिनसे कि बचा जाना चाहिए था, बचा जा सकता था, और अब उनके हो जाने के बाद वे दुहराए न जाएं, इसकी गारंटी कैसे की जाए। हम जब इन डेढ़ सौ मुद्दों को देखते हैं, तो लगता है कि इनमें सभी किस्म की मिलीजुली बातें हैं, बहुत सी बातें गलत काम हैं, बहुत सी बातें गलतियां हैं, और बहुत सी बातें सरकार के खिलाफ एक जनधारणा है। यह अविश्वास प्रस्ताव रमन सरकार के मौजूदा कार्यकाल के आखिरी बरस में तब आया है जब चुनाव का माहौल पूरी तरह से जोर पकड़ चुका है। सरकार के भीतर के लोग भी इसे कांग्रेस का चुनावी बिगुल मानकर चल रहे हैं, और ऐसे आसार दिख रहे हैं कि सरकार सदन में जवाब देने के बाद भी इस दस्तावेज को लेकर बैठेगी, और डैमेज-कंट्रोल की कोशिश करेगी। और ऐसा होना भी चाहिए।
हमारा मानना है कि विधानसभा के भीतर या विधानसभा के बाहर, किसी पार्टी के नफे-नुकसान से परे राज्य के हित में तमाम किस्म की गलतियां उजागर होनी चाहिए, और गलत कामों का भांडाफोड़ भी होना चाहिए। ऐसी उम्मीद है कि अगले नौ महीने में ऐसी कोई नई बातें सरकार सामने नहीं आने देगी, लेकिन अभी जो बातें सामने आई हैं, उनमें से कोई चुनावी मुद्दा न बन सके, इसके लिए सरकार को मेहनत भी करनी होगी, और कार्यकाल का आखिरी का छोटा सा हिस्सा बिना ऐसे किसी विवाद के ठीक से गुजारने की कोशिश भी करनी होगी। इस आरोप पत्र के साथ कांग्रेस पार्टी पूरे आक्रामक तेवर लेकर मैदान में है। और इस आरोप पत्र से परे प्रदेश में इन दिनों लगातार गुंज रहे सेक्स-सीडी कांड में कांग्रेस जांच में घिरी हुई है, और उसके प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल पर भी आरोप लगे हैं। आने वाले दिनों में सीबीआई की जांच भूपेश बघेल तक पहुंच सकती है, ऐसी आशंका बहुत से लोगों को है। ऐसे में सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़वाहट और टकराहट और आगे बढ़ेगी। फिलहाल हमारी सलाह यही है कि छत्तीसगढ़ सरकार को, और सत्तारूढ़ भाजपा को इस आरोप पत्र की तमाम बातों को लेकर एक आत्ममंथन करना चाहिए कि ऐसी नौबत क्यों आई, और जनता को इसके खिलाफ सहमत कराने के लिए क्या-क्या करना होगा। (Daily Chhattisgarh)

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