सबसे बुनियादी जरूरतों पर आधार-अनिवार्यता खत्म हो
संपादकीय
30 दिसम्बर 2017

हरियाणा की खबर है कि वहां पर एक निजी अस्पताल में एक महिला मरीज को ले जाया गया, लेकिन उसका आधार कार्ड न होने से इलाज नहीं हुआ, और उसकी मौत हो गई। यह बात खबर इसलिए भी बनी कि यह महिला कारगिल युद्ध के एक शहीद की पत्नी थी, और उसके बेटे ने मीडिया के सामने यह पूरा मामला उजागर किया। अस्पताल का कहना है कि आधार कार्ड औपचारिकताओं के लिए जरूरी है, और उसके बिना वे दाखिले के कागज पूरे नहीं कर सकते थे। लोगों को याद होगा कि अभी दो-तीन महीने के भीतर ही झारखंड में एक महिला की मौत हो गई थी क्योंकि आधार कार्ड न होने से उसके परिवार को राशन मिलना बंद हो गया था। भुखमरी से मौत हिन्दुस्तान में अब आम बात नहीं रह गई है, लेकिन झारखंड के इस हादसे से केन्द्र और राज्य सरकार को जो झटका लगना था, वह नहीं लगा, और बाकी देश के लिए भी, बाकी कामों के लिए भी सरकारों ने सबक नहीं लिया। अभी दो दिन पहले ही देश के मुख्य सूचना आयुक्त ने यह फैसला दिया है कि आरटीआई अर्जी देने वाले के पास आधार कार्ड न होने से उसे सूचना देने से मना करना कानून के खिलाफ है, और सूचना पाने के लिए आधार कार्ड की कोई जरूरत नहीं है।
हमारे सरीखे अनगिनत हिन्दुस्तानी आज ऐसे हैं जिन्हें दिन में कई बार टेलीफोन पर यह घोषणा सुननी पड़ती है कि 31 मार्च के पहले अपने सिमकार्ड को आधार कार्ड से जुड़वा लें। इसी तरह की घोषणा बैंक खातों को आधार से लिंक करवाने के लिए एसएमएस पर आती रहती है। अभी सुप्रीम कोर्ट में आधार कार्ड की अनिवार्यता को लेकर एक मामले की सुनवाई जारी ही है, और वहां केन्द्र सरकार आधार कार्ड को हर बात के लिए जरूरी करने पर आमादा है, दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट लोगों के ऐसे शक को भी ध्यान से सुन रहा है जो यह मानते हैं कि हर बात के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य करने से लोगों की निजी जिंदगी की गोपनीयता खत्म ही हो जाएगी। इस सिलसिले में यह याद रखने की जरूरत है कि यूपीए सरकार के वक्त जब आधार कार्ड पर काम शुरू हुआ तो भाजपा ने ही उसका सबसे अधिक विरोध किया था, और मोदी सरकार बनने के बाद आधार कार्ड योजना के मुखिया नंदन निलेकेणि से एक मुलाकात के बाद ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सोच बदल गई थी, और उन्होंने आधार कार्ड को बढ़ावा देने के लिए पूरी ताकत लगा दी।
हमारा मानना है कि आज सरकार और कारोबार, इन दोनों ही जगहों में आधार कार्ड की अनिवार्यता को लेकर जितने तरह की गलतफहमी फैली हुई है, उसे देखते हुए केन्द्र सरकार को ही यह खुलासा करना होगा कि किसी भी बुनियादी जरूरत के लिए, किसी भी इलाज के लिए, किसी भी सफर के लिए आधार कार्ड को मुद्दा नहीं बनाया जाएगा, और लोगों के इलाज के हक, जिंदा रहने के हक, खाने के हक के ऊपर आधार कार्ड बिल्कुल भी लागू नहीं होगा। अगर केन्द्र सरकार, और राज्य सरकारें ऐसा खुलासा नहीं करती हैं, तो इससे सबसे गरीब और सबसे बेबस जनता का सबसे बड़ा नुकसान होगा। आज तो कारगिल के एक शहीद की पत्नी की बेइलाज मौत की वजह से हम इस पर लिख रहे हैं, लेकिन पिछले महीनों में जगह-जगह से ऐसी खबरें सामने आई हैं कि कुष्ठ रोगियों की गली हुई उंगलियों की वजह से उनके निशान नहीं लिए जा सकते, उनके आधार कार्ड नहीं बन पा रहे हैं, और जगह-जगह उनको बिना राशन रहना पड़ रहा है। हमारा बड़ा साफ मानना है कि चाहे सौ लोग बिना आधार कार्ड कोई रियायत पा जाएं, लेकिन आधार कार्ड की कमी से किसी एक जरूरतमंद को भी तकलीफ नहीं होनी चाहिए। आधार कार्ड को लेकर दो बिल्कुल अलग-अलग पहलू हैं, एक तो जिंदगी की निजता और गोपनीयता की बात है, और दूसरी बात लोगों के न्यूनतम बुनियादी हक और जरूरत की है। अगर सरकारों को आधार की अनिवार्यता की ऐसी हड़बड़ी है, तो सुप्रीम कोर्ट को एक कड़ा रूख दिखाते हुए पूरे देश में एकदम बुनियादी बातों के लिए आधार को एकदम ही गैरअनिवार्य घोषित करना चाहिए। इस काम में कोई भी देरी सबसे कमजोर तबके के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनने से कम और कुछ नहीं होगा। (Daily Chhattisgarh)
नए साल का मौका नए इरादों और नए संकल्पों का बनाएं
संपादकीय
29 दिसम्बर 2017

नए साल का मौका अपने आपसे बहुत सी नई बातें तय करने का होता है। लोग इसे नए बरस के संकल्प कहते हैं, और यह भी मानते हैं कि ये संकल्प टिकते नहीं क्योंकि इन्हें नए साल के मौके पर महज एक औपचारिकता के लिए लिया जाता है। लेकिन फिर भी कैलेंडर बदलने का यह मौका इस काम में लाया जा सकता है कि लोग पिछले बरस तय की गई बातों को एक बार फिर गौर कर लें कि उनमें से कौन-कौन सी बातों पर वे कायम रह पाए हैं, और कौन सी बातों पर वे नहीं टिक सके। अभी दो-चार दिन पहले ही विख्यात फिल्म निर्देशक शेखर कपूर ने यह लिखा है कि लोगों को दिन में कुछ वक्त बिना कुछ किए हुए अकेले और शांत गुजारना चाहिए, अपने आपसे मिलना चाहिए। हर दिन तो पता नहीं कितने लोगों के लिए यह मुमकिन हो पाएगा, लेकिन नए साल के पहले हर किसी को इसके लिए जरा सा वक्त निकालना चाहिए, साल भर की अपनी चूक के बारे में भी सोच लेना चाहिए, और अगले बरस के लिए सावधानी की बात भी तय कर लेनी चाहिए।
हर किसी की जिंदगी में कोई न कोई खामी दूर करने, और कोई न कोई खूबी बढ़ाने की गुंजाइश तो रहती ही है। इसलिए बहुत सी ऐसी छोटी-छोटी बातें हैं जिनका जरा सा जिक्र हम यहां कर रहे हैं, और लोग उनमें से जो बातें उन पर लागू होती हों, उनके बारे में सोच-विचार सकते हैं, और अपने आपसे कुछ वायदे भी कर सकते हैं। हम यहां पर यह याद दिलाना चाहेंगे कि मन के भीतर के वायदे तोडऩा बड़ा आसान होता है, और लोगों को यह सोचना चाहिए कि वे अपने आपको आसानी से धोखा न दे पाएं, इसके लिए उन्हें अपने नए साल के वायदों को अपने आसपास के लोगों को जरूर बताना चाहिए, ताकि उनसे फिरने पर वे लोग रोक-टोक सकें। घर-परिवार के लोग, दफ्तर या स्कूल-कॉलेज के लोग, दोस्तों की टोली, इन सबके बीच अगर लोग अपने फैसले बता देते हैं, तो उन पर कायम रहने की संभावना बढ़ जाती है।
हममें से कई लोग सिगरेट-बीड़ी, तम्बाखू खाते-चबाते या पीते हैं, और कैंसर से इसका बड़ा सीधा-सीधा रिश्ता सबकी जानकारी में हैं। छोडऩे के लिए यह एक सबसे जरूरी चीज है जो कि जिंदगी और मौत का फर्क ला सकती है। ऐसी ही एक दूसरी बात कोई नशा करना है, और नशा करके किसी भी तरह की गाड़ी चलाना है। इन दोनों ही बातों से बचने की कोशिश करनी चाहिए। बहुत सी बातें संपन्नता से जुड़ी हुई हैं, लोगों का खान-पान ऐसा हो गया है कि वह उनके बाहर चर्बी बढ़ाते चलता है, और उनके भीतर दिल की धमनियों को संकरा बनाते चलता है। खून में शक्कर बढ़ाते चलता है, कोलेस्ट्राल बढ़ाता है, कई लोगों का बीपी भी बढ़ा देता है। नया साल अपने खानपान के बारे में सोचने का एक अच्छा मौका है, लोगों को यह तय करना चाहिए कि वे बेहतर सेहत के लिए खानपान पर कैसा काबू करें। सेहत से ही जुड़ी हुई एक दूसरी बात कसरत की है। सुबह या शाम की सैर, हल्की-फुल्की कसरत, थोड़ा-बहुत योग या प्राणायाम लोगों की सेहत को अच्छा बनाकर रखने में मददगार होता है, इसमें कोई शक नहीं है। और इनमें से किसी भी बात पर एक धेला भी खर्च नहीं होता। इसलिए लोगों को इस बारे में जरूर-जरूर सोचना चाहिए, और यह भी याद रखना चाहिए कि परिवार के भीतर अगर एक सदस्य भी ऐसी मिसाल पेश करते हैं, तो वह मिसाल बाकी लोगों को भी एक बेहतर जिंदगी की तरफ ले जाती है। इससे इलाज पर होने वाले खर्च की बचत भी होती है, उत्पादकता भी बढ़ती है, और परिवार के भीतर दुख-तकलीफ का खतरा भी घटता है।
सड़कों पर कुछ और किस्म की सावधानी जरूरी होती है, नशे से बचने के अलावा भी। दुपहिया चलाते हुए लोगों को हेलमेट का इस्तेमाल करना चाहिए, और अगर चारपहियों की गाड़ी में बैठे हैं, तो हर सीट पर मौजूद सीट बेल्ट का इस्तेमाल बहुत से हादसों में जिंदगी बचा सकता है। इन दो बातों के अलावा किसी भी तरह के वाहन पर महिलाओं और बच्चों को लेकर चलने में एक अतिरिक्त सावधानी की जरूरत रहती है, और हम अपने आसपास हर दिन हादसों में कई मौतों को देखते हुए भी ऐसी सावधानी अगर नहीं बरतते हैं, तो हम ऐसी गैरजिम्मेदारी अपनी अगली पीढ़ी को भी विरासत में दे जाते हैं। यहां पर हम कुछ ही बातों को लिख पा रहे हैं कि लोगों को नए साल को बेहतर बनाने के लिए, जिंदगी को सुरक्षित और सेहतमंद बनाने के लिए क्या-क्या करना चाहिए, और लोग अपने हिसाब से ऐसी लिस्ट बना सकते हैं, पूरे परिवार के साथ बैठ सकते हैं, और नए साल को एक बेहतर तरीके से मना सकते हैं। कोई भी बात अगर मुश्किल लगती है तो यह याद रखने की जरूरत है कि हजार मील का सफर भी पहले कदम के बाद ही शुरू होता है। (Daily Chhattisgarh)
तीन तलाक विरोधी कानून का साथ देने की जरूरत
संपादकीय
28 दिसम्बर 2017

भारतीय संसद में इस वक्त मुस्लिम महिला के अधिकारों के लिए एक नया कानून बनाने पर चर्चा चल रही है। भारत की कानूनी व्यवस्था के मुताबिक एक मुस्लिम मर्द को यह धार्मिक अधिकार प्राप्त है कि वह तीन बार तलाक कहकर अपनी बीवी को छोड़ दे। और समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते भी हैं। मुस्लिम विवाह कानून या इस्लाम के नियमों के मुताबिक कई देशों में इस किस्म के तलाक पर रोक लग चुकी है क्योंकि कई बार पुरूष प्रधान समाज में एक आदमी तैश में आकर अपनी पत्नी पर नाराजगी उतारने पर उतारू हो जाता है, और ऐसे में वह शादी खत्म हो जाती है, और फिर अगर वह आदमी दुबारा उसी औरत से शादी करना भी चाहे, तो भी उसके लिए बहुत ही जटिल और सामाजिक रूप से खराब नियम हैं। लेकिन हम अभी मुस्लिम विवाह, तलाक, और पुनर्विवाह की जटिलताओं की चर्चा में वक्त जाया करना नहीं चाहते, बल्कि आज संसद में पेश हुए इस कानून की बात करना चाहते हैं।
भारत में किसी भी मौजूदा कानून में फेरबदल या कि नया कानून बनाने के लिए संसद या विधानसभाएं ही एक जगह होती हैं, और कई धर्मों के कानूनों को लेकर पहले भी ऐसा होते आया है। भारत में ही सतीप्रथा को रोकने के लिए कानून बना, बालविवाह को रोकने के लिए कानून बना, और ये दोनों ही बुरी प्रथाएं हिन्दू समाज में ही चल रही थीं। बालविवाह हिन्दुओं से परे आदिवासियों के बीच भी आज भी जारी एक प्रथा है, लेकिन कानून की मदद से बच्चों की ऐसी शादियां रोकने की कोशिशें लगातार होती हैं। इसलिए हम यह बिल्कुल नहीं मानते कि किसी समाज के बहुमत को सहमत करने के बाद ही उस समाज में सुधार का कोई कानून बनना चाहिए। समाज में अधिकतर लोग ऐसे मौन रहने वाले होते हैं कि कोई जनमतसंग्रह भी हो जाए, तो भी वे चुप्पी ही साधे रखेंगे। और समाज के जो ठेकेदार रहते हैं, वे लगातार कट्टरता को बढ़ावा देकर, पुरानी रूढिय़ों को बढ़ावा देकर समाज को अपने कब्जे में रखने की कोशिश जारी रखते हैं। हमने कुछ दशक पहले इसी भारतीय संसद में एक मुस्लिम महिला शाहबानो के जायज हक कुचलने के लिए राजीव गांधी की अस्वाभाविक बहुमत वाले संसदीय बाहुबल का इस्तेमाल देखा था जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए कट्टरपंथियों के दबाव में राजीव गांधी ने आत्मसमर्पण कर दिया था, और एक विदेश-शिक्षित, पायलट, नौजवान, और धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री ने मुस्लिम कट्टरता के सामने संसद को झोंक दिया था।
हमारा मानना है कि देश में धर्मों से परे कुछ ऐसे बुनियादी मुद्दे तय होने चाहिए जो कि इंसान को इंसान की तरह मानने वाले हों। कल अगर हिन्दू औरत को सती होने से रोकने का कानून बनाया गया था, तो आज एक मुस्लिम महिला को तलाक देने के खिलाफ ऐसा कानून बनाने में क्या हर्ज है? आज संसद में जो लोग इस कानून का विरोध करेंगे, वे लोग न केवल मुस्लिम महिलाओं की नाराजगी झेलेंगे, बल्कि वे देश की तमाम महिलाओं को भी नाराज करेंगे। और इतिहास में ऐसे लोगों का नाम दर्ज होगा। हम आज महज इस बिना पर इस प्रस्तावित कानून के विरोध के खिलाफ हैं कि इस कानून को लाने वाली सरकार की छवि एक हिन्दू सरकार की है, या कि एक मुस्लिम-विरोधी सरकार की है। छवि की ऐसी समस्या से परे आज यह सोचने की जरूरत है कि न्यायसंगत और तर्कसंगत बात क्या है, और उसी का साथ देने के लिए लोगों को खड़ा होना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
बच्चों का यौन शोषण और पोर्नोग्राफी की भयानक कहानी
संपादकीय
27 दिसम्बर 2017

केरल में अभी पुलिस ने लोगों के एक ऐसे समूह को पकड़ा है जो कि आपस में अपने बच्चों के अश्लील वीडियो बनाकर, उनकी नग्न तस्वीरें खींचकर शेयर करते थे, और इस समूह को चलाने वाले ने ऐसे पांच हजार लोगों को जुटा लिया। यह मुस्लिम नौजवान इस बात की वकालत करता था कि जब तक बच्चियां चार बरस की रहें, उनसे बलात्कार करने में कोई हर्ज नहीं है क्योंकि इस उम्र की बातें उनको याद नहीं रहती। यह आदमी अपनी ही बच्चियों से बलात्कार करते उनके भी वीडियो पोस्ट करता था। केरल पुलिस ने इन पांच हजार लोगों को पकडऩे की पूरी कोशिश की है, लेकिन ये लोग मोबाइल फोन के एक ऐसे मैसेंजर, सिग्नल, का इस्तेमाल करते हुए जहां किसी को पकड़ा नहीं जा सक रहा है। इन लोगों ने अपने सरीखे हजारों लोगों के साथ ऐसे वीडियो शेयर करने का काम कर रखा था और इसमें गिरफ्तारियां शुरू हो गई है।
बच्चों के साथ बलात्कार के मामले तो सामने आते रहते हैं, लेकिन जब उनके मां-बाप ही उनसे बलात्कार करने लगें, और उसकी फोटो या वीडियो दूसरों में बांटने लगें, तो यह एक बहुत ही गंभीर जुर्म भी है, और शायद मानसिक बीमारी भी है। भारत में अधिकतर लोगों का यह मानना रहता है कि बच्चों के साथ आसपास के लोग, परिवार के लोग ऐसा सुलूक नहीं कर सकते और महज अनजान लोग ही उनका यौन शोषण कर सकते हैं। अधिकतर परिवारों में अगर बच्चे किसी पारिवारिक सदस्य या करीबी के बारे में कोई शिकायत भी करते हैं, तो मां-बाप उन्हें डांटकर चुप कर देते हैं। ऐसे में बच्चों के पास कहीं और जाकर शिकायत करने की कोई गुंजाइश बचती नहीं है। लेकिन पूरी दुनिया की तरह भारत में भी चाईल्ड पोर्नोग्राफी का खतरा है जो कि मौजूद है, और बच्चों का यौन शोषण एक हकीकत है। दुनिया के किसी भी दूसरे गरीब देश की तरह भारत में भी गरीब बच्चे इसके शिकार अधिक होते हैं, लेकिन केरल से यह जो मामला सामने आया है, इसमें वहां तो ऐसी गरीबी भी नहीं है, वहां तो लोग पढ़े-लिखे भी हैं, और अगर ऐसे गिरोह में मुस्लिम लोग ही सरगना हैं, तो फिर उनके धर्म की रोक-टोक भी उनके गलत कामों को नहीं रोक पाई। इसलिए बच्चों का यौन शोषण संपन्नता से परे, शिक्षा से परे, धर्म से परे एक अलग किस्म का खतरा है जिससे कोई भी बच्चा सुरक्षित नहीं है।
बच्चों को ऐसे शोषण से बचाने के लिए उनको जागरूक बनाना, उनके आसपास के माहौल को तरह-तरह की निगरानी से सुरक्षित रखना, और बच्चों के मां-बाप को भी जागरूक करना एक समाधान हो सकता है। इस बारे में सरकारों को पहल करनी चाहिए, समाज को शामिल करना चाहिए, और फिर अलग-अलग किस्म के संगठन अपने-अपने सदस्यों को इस खतरे की तरफ से जागरूक करते चलें, इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। श्रीलंका या बैंकाक की तरह ही भारत में भी गोवा में पर्यटकों की बड़ी मौजूदगी के बीच बच्चों के यौन शोषण की बड़ी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। अब एक दूसरा बड़ा पर्यटक-राज्य केरल ऐसी भयानक खबर लेकर आया है। पूरे देश को इससे चौकन्ना होने की जरूरत है, ऐसी खबरों को अनदेखा करना कोई इलाज नहीं होगा, लोगों को अपने आसपास के लोगों से इस खतरे के बारे में खुलकर बात करनी होगी, और हर किसी को अपने आसपास के बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए कोशिश करनी होगी। हर राज्य सरकार को अपने नागरिक संगठनों को साथ लेकर तुरंत ही ऐसी जागरूकता का अभियान चलाना चाहिए। दूसरी बात यह कि देश में आईटी एक्ट तो बहुत मजबूत है, लेकिन वह अदालत में किसी को सजा नहीं दिला पा रहा है। ऐसे में इंटरनेट या सोशल मीडिया पर, या कि किसी मैसेंजर सर्विस पर इस तरह के वीडियो आगे बढ़ाकर जो लोग समाज को एक खतरनाक जगह बना रहे हैं, उन्हें अपने बच्चों के बारे में भी सोचना चाहिए। कुल मिलाकर यह दुनिया एक भयानक जगह है, और लोगों को अपने बच्चों को बचाने के लिए इस पूरी दुनिया को सुरक्षित बनाना पड़ेगा, महज अपने घर को सुरक्षित रखकर, महज अपने बच्चों को सुरक्षित रखकर कुछ भी नहीं हो सकेगा। (Daily Chhattisgarh)
शहरी विकास में बेदखल ठीक तरह से बसाए जाएं
संपादकीय
26 दिसम्बर 2017

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज सुबह कई दर्जन छोटी दुकानें गिराकर शहर के बीच बनने जा रहे एक बड़े जंगल के लिए जगह बनाई गई। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां की पिछले डेढ़ दशक में शहरों का बड़ा विकास हुआ है, वहां इस तरह की बात कभी आ सकती है कि लोगों को बेदखल करके एक बड़ी योजना के लिए जगह बनाई जाए। शहर के बीच से 70 छोटी दुकानों को हटाया गया है और शासन-प्रशासन से यह उम्मीद की जाती है कि इन छोटे कारोबारियों को नुकसान न होने देकर इन्हें कहीं ऐसी जगह फिर से बसाया जाए, जहां कि इनका काम चल सके। हमने शहर के कई दूसरों हिस्सों से लोगों के घर हटाए जाते देखे हैं जहां पर तालाब था और उसे फिर से तालाब कायम करने के लिए लोगों को हटाया गया, और बेहतर मकान बनाकर दिए गए।
रायपुर में नया रायपुर तो एक नियोजित शहर है, जो कि पूरी योजना के साथ अगले सौ बरस की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। लेकिन पुराना रायपुर तो बिना किसी योजना के टुकड़े-टुकड़े में बना और बसा है। ऐसे में यह दिक्कत ऐसे किसी भी दूसरे शहर की तरह इस शहर पर भी आ रही है कि नई योजनाओं के लिए सरकार के ही बसाये गए दूसरे हिस्सों को तोड़ा जा रहा है। इस एक पहलू को देखते हुए हमको लगता है कि न सिर्फ इस शहर में, बल्कि राज्य के दूसरे शहरों में भी सरकार को किसी भी तरह का खर्च करने के पहले यह देख लेना चाहिए कि अगले पच्चीस-पचास बरस की कौन सी जरूरतें हो सकती हैं। इसी तरह सड़क-फुटपाथ, डिवाइडर और चौक बनाते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि क्या कुछ बरस के भीतर उनको फिर हटाने या तोडऩे की जरूरत पड़ेगी? यह सोचना इसलिए जरूरी है कि यह सब इस राज्य की उस आधी आबादी के पैसों से भी हो रहा है जो कि गरीबी की रेखा के नीचे जी रही है। आज भी प्रदेश में जरूरतें कम नहीं हैं, लेकिन वे जरूरतें लगातार बढ़ रहे, विकसित हो रहे ढांचे को देखते हुए दिखाई नहीं पड़ती हैं। हम पिछले बरसों में रायपुर में ही लगातार सड़कों और डिवाइडरों को टूटते हुए देख रहे हैं, और कांक्रीट का मलबा पहाड़ सरीखा इकट्ठा हो जाता है। यह एक बड़ा नुकसान है, और बिना योजना के तेज रफ्तार से खर्च का यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।
रायपुर शहर के बीच जिस तरह से सरकार अपनी खुद की कॉलोनी को हटाकर एक बड़ा जंगल बना रही है, जिस तरह से शहर में एक से अधिक जगहों पर हरियाली के बीच लाइब्रेरी विकसित हो रही है, उससे पूरे शहर का नक्शा बदलेगा, और लोगों की जरूरतें पूरी होंगी। लोगों ने शहर में ऐसी सहूलियत अभी तक देखी नहीं है, इसलिए आज बहुत से लोगों को यह अंदाज नहीं है कि आबादी के बीच हरियाली का इतना बड़ा इलाका विकसित होना क्या मायने रखता है। ऐसे में जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है, उन लोगों को बसाने के लिए प्रशासन को पर्याप्त ध्यान देना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
पाक जेल में पहुंची मां-पत्नी सद्भावना का एक कदम...
संपादकीय
25 दिसम्बर 2017

पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में कैद, और मौत की सजा पाए हुए कुलभूषण जाधव की मां और पत्नी इस वक्त वहां जेल में उससे मुलाकात कर रहे हैं। पाकिस्तान की फौजी अदालत द्वारा कुलभूषण को दी गई इस सजा के खिलाफ भारत में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में अपील की हुई है, जिस पर सुनवाई जारी है। इस बीच यह पहला मौका है कि पाक सरकार से वीजा पाकर कुलभूषण का परिवार वहां पहुंचा है, और उससे मिल पा रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच आमतौर पर ऐसा तनाव चलते रहता है कि वीजा की अर्जियों में से बहुत से लोगों को इजाजत नहीं मिलती, और इस मामले में अगर ऐसा हुआ होता तो फांसी की सजा में कैद इस हिन्दुस्तानी को परिवार से मिलना नसीब नहीं हो पाता। लेकिन दो-चार दिन पहले ही हमने इसी जगह यह लिखा है कि किस तरह भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भारत के पाकिस्तान-विरोधियों के फतवों को अनसुना करके वहां के सारे मरीजों को भारत में इलाज के लिए आने का वीजा देती हैं, और हर दिन ट्विटर पर ऐसी एक सद्भावना दिखती ही है जिसमें उनका दिया वीजा दिखता है, या कि भारत से इलाज कराकर लौटते हुए पाकिस्तानी परिवारों का शुक्रिया दिखता है।
जिन लोगों को भारत और पाकिस्तान की जेलों में कैद दूसरे लोगों की हालत का अंदाज नहीं है, उन्हें सआदत हसन मंटो की कहानी, टोबा टेकसिंह, जरूर पढऩी चाहिए कि विभाजन के वक्त जब जेल के कैदियों के बारे में यह तय नहीं हो पा रहा था कि वे किधर जाएंगे, तो उनमें से एक कैदी शायद मानसिक रूप से विचलित था, और उसकी दिमागी हालत ऐसे असमंजस में किस तरह की रहती है उसका जैसा भयानक ब्यौरा मंटो ने लिखा है, वह दिल दहला देता है। आज मंटो जैसे मजबूत कोई लेखक नहीं बचे, और शायद वैसा पढऩे की तकलीफ करने वाले लोग भी नहीं बचे, लेकिन फिर भी दोनों देशों में कैदियों के प्रति एक उदारता दिखाने की जरूरत है। हमारा यह मानना है कि राजधानियों में दोनों सरकारों के बीच बातचीत का माहौल आज चाहे न बन पा रहा हो, लेकिन अगर छोटी-छोटी कोशिशें होती रहेंगी, तो माहौल एक दिन ऐसा बदलेगा कि सरकारों को मजबूर होकर बात करनी पड़ेगी, और जंग का खतरा खत्म होगा।
हम लोगों को भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के कुछ पहलू दिखाने वाली एक हिन्दी फिल्म भी याद दिलाना चाहते हैं, बजरंगी भाईजान। इस फिल्म में पाकिस्तान से भारत में भटक गई एक बच्ची की कहानी है जिसे एक हिन्दुस्तानी नौजवान उसके घर तक पहुंचाने का बीड़ा उठाता है, और तमाम किस्म के खतरे उठाते हुए, परेशानियां उठाते हुए उसे उसके परिवार तक पहुंचाकर ही दम लेता है। ऐसा करते हुए उसकी अपनी जान खतरे में पड़ती है, लेकिन वह उस मूक बच्ची को परिवार तक पहुंचाना अपनी जिंदगी का मकसद बनाकर उसमें कामयाब भी होता है। यह है तो एक फिल्म, लेकिन इसमें जो संदेश छुपा हुआ है, उसे अगर देखें तो समझ आएगा कि सरहद के दोनों तरफ भलमनसाहत की कितनी इज्जत है। और यह बात सिर्फ फिल्मी कहानी में नहीं है, दोनों तरफ के लोग जब सरहद पार करके जाते हैं, तो वे दोस्ती की गर्मजोशी पाते हैं। आज की पाकिस्तान जेल की यह मुलाकात कुलभूषण की जान बचा पाएगी या नहीं, हम अभी उस पर नहीं जा रहे हैं। लेकिन यह बात कम नहीं होती है कि मौत की सजा पाए हुए एक कैदी को उसके परिवार से मिलने का एक मौका मिले। यह सद्भावना आगे बढऩी चाहिए और भारत-पाक को कैदियों की अदला-बदली के बारे में भी सोचना चाहिए। एक-दो दिन पहले ही हमने पाकिस्तानी फौज के मुखिया के एक बयान पर लिखा था जिन्होंने भारत के साथ अच्छे रिश्तों की वकालत की थी, और आज का यह कदम उसी सिलसिले की एक कड़ी है। दुश्मनी बहुत भारी पड़ती है, और सबसे अधिक भारी सबसे अधिक गरीब पर पड़ती है। इसलिए अपने-अपने गरीबों की फिक्र करते हुए इन दोनों देशों को दोस्त बनना चाहिए, या कि कम से कम दुश्मनी भुलानी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
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