संपादकीय
25 दिसम्बर 2017

पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में कैद, और मौत की सजा पाए हुए कुलभूषण जाधव की मां और पत्नी इस वक्त वहां जेल में उससे मुलाकात कर रहे हैं। पाकिस्तान की फौजी अदालत द्वारा कुलभूषण को दी गई इस सजा के खिलाफ भारत में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में अपील की हुई है, जिस पर सुनवाई जारी है। इस बीच यह पहला मौका है कि पाक सरकार से वीजा पाकर कुलभूषण का परिवार वहां पहुंचा है, और उससे मिल पा रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच आमतौर पर ऐसा तनाव चलते रहता है कि वीजा की अर्जियों में से बहुत से लोगों को इजाजत नहीं मिलती, और इस मामले में अगर ऐसा हुआ होता तो फांसी की सजा में कैद इस हिन्दुस्तानी को परिवार से मिलना नसीब नहीं हो पाता। लेकिन दो-चार दिन पहले ही हमने इसी जगह यह लिखा है कि किस तरह भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भारत के पाकिस्तान-विरोधियों के फतवों को अनसुना करके वहां के सारे मरीजों को भारत में इलाज के लिए आने का वीजा देती हैं, और हर दिन ट्विटर पर ऐसी एक सद्भावना दिखती ही है जिसमें उनका दिया वीजा दिखता है, या कि भारत से इलाज कराकर लौटते हुए पाकिस्तानी परिवारों का शुक्रिया दिखता है।
जिन लोगों को भारत और पाकिस्तान की जेलों में कैद दूसरे लोगों की हालत का अंदाज नहीं है, उन्हें सआदत हसन मंटो की कहानी, टोबा टेकसिंह, जरूर पढऩी चाहिए कि विभाजन के वक्त जब जेल के कैदियों के बारे में यह तय नहीं हो पा रहा था कि वे किधर जाएंगे, तो उनमें से एक कैदी शायद मानसिक रूप से विचलित था, और उसकी दिमागी हालत ऐसे असमंजस में किस तरह की रहती है उसका जैसा भयानक ब्यौरा मंटो ने लिखा है, वह दिल दहला देता है। आज मंटो जैसे मजबूत कोई लेखक नहीं बचे, और शायद वैसा पढऩे की तकलीफ करने वाले लोग भी नहीं बचे, लेकिन फिर भी दोनों देशों में कैदियों के प्रति एक उदारता दिखाने की जरूरत है। हमारा यह मानना है कि राजधानियों में दोनों सरकारों के बीच बातचीत का माहौल आज चाहे न बन पा रहा हो, लेकिन अगर छोटी-छोटी कोशिशें होती रहेंगी, तो माहौल एक दिन ऐसा बदलेगा कि सरकारों को मजबूर होकर बात करनी पड़ेगी, और जंग का खतरा खत्म होगा।
हम लोगों को भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के कुछ पहलू दिखाने वाली एक हिन्दी फिल्म भी याद दिलाना चाहते हैं, बजरंगी भाईजान। इस फिल्म में पाकिस्तान से भारत में भटक गई एक बच्ची की कहानी है जिसे एक हिन्दुस्तानी नौजवान उसके घर तक पहुंचाने का बीड़ा उठाता है, और तमाम किस्म के खतरे उठाते हुए, परेशानियां उठाते हुए उसे उसके परिवार तक पहुंचाकर ही दम लेता है। ऐसा करते हुए उसकी अपनी जान खतरे में पड़ती है, लेकिन वह उस मूक बच्ची को परिवार तक पहुंचाना अपनी जिंदगी का मकसद बनाकर उसमें कामयाब भी होता है। यह है तो एक फिल्म, लेकिन इसमें जो संदेश छुपा हुआ है, उसे अगर देखें तो समझ आएगा कि सरहद के दोनों तरफ भलमनसाहत की कितनी इज्जत है। और यह बात सिर्फ फिल्मी कहानी में नहीं है, दोनों तरफ के लोग जब सरहद पार करके जाते हैं, तो वे दोस्ती की गर्मजोशी पाते हैं। आज की पाकिस्तान जेल की यह मुलाकात कुलभूषण की जान बचा पाएगी या नहीं, हम अभी उस पर नहीं जा रहे हैं। लेकिन यह बात कम नहीं होती है कि मौत की सजा पाए हुए एक कैदी को उसके परिवार से मिलने का एक मौका मिले। यह सद्भावना आगे बढऩी चाहिए और भारत-पाक को कैदियों की अदला-बदली के बारे में भी सोचना चाहिए। एक-दो दिन पहले ही हमने पाकिस्तानी फौज के मुखिया के एक बयान पर लिखा था जिन्होंने भारत के साथ अच्छे रिश्तों की वकालत की थी, और आज का यह कदम उसी सिलसिले की एक कड़ी है। दुश्मनी बहुत भारी पड़ती है, और सबसे अधिक भारी सबसे अधिक गरीब पर पड़ती है। इसलिए अपने-अपने गरीबों की फिक्र करते हुए इन दोनों देशों को दोस्त बनना चाहिए, या कि कम से कम दुश्मनी भुलानी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
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