तीन तलाक विरोधी कानून का साथ देने की जरूरत

संपादकीय
28 दिसम्बर 2017


भारतीय संसद में इस वक्त मुस्लिम महिला के अधिकारों के लिए एक नया कानून बनाने पर चर्चा चल रही है। भारत की कानूनी व्यवस्था के मुताबिक एक मुस्लिम मर्द को यह धार्मिक अधिकार प्राप्त है कि वह तीन बार तलाक कहकर अपनी बीवी को छोड़ दे। और समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते भी हैं। मुस्लिम विवाह कानून या इस्लाम के नियमों के मुताबिक कई देशों में इस किस्म के तलाक पर रोक लग चुकी है क्योंकि कई बार पुरूष प्रधान समाज में एक आदमी तैश में आकर अपनी पत्नी पर नाराजगी उतारने पर उतारू हो जाता है, और ऐसे में वह शादी खत्म हो जाती है, और फिर अगर वह आदमी दुबारा उसी औरत से शादी करना भी चाहे, तो भी उसके लिए बहुत ही जटिल और सामाजिक रूप से खराब नियम हैं। लेकिन हम अभी मुस्लिम विवाह, तलाक, और पुनर्विवाह की जटिलताओं की चर्चा में वक्त जाया करना नहीं चाहते, बल्कि आज संसद में पेश हुए इस कानून की बात करना चाहते हैं।
भारत में किसी भी मौजूदा कानून में फेरबदल या कि नया कानून बनाने के लिए संसद या विधानसभाएं ही एक जगह होती हैं, और कई धर्मों के कानूनों को लेकर पहले भी ऐसा होते आया है। भारत में ही सतीप्रथा को रोकने के लिए कानून बना, बालविवाह को रोकने के लिए कानून बना, और ये दोनों ही बुरी प्रथाएं हिन्दू समाज में ही चल रही थीं। बालविवाह हिन्दुओं से परे आदिवासियों के बीच भी आज भी जारी एक प्रथा है, लेकिन कानून की मदद से बच्चों की ऐसी शादियां रोकने की कोशिशें लगातार होती हैं। इसलिए हम यह बिल्कुल नहीं मानते कि किसी समाज के बहुमत को सहमत करने के बाद ही उस समाज में सुधार का कोई कानून बनना चाहिए। समाज में अधिकतर लोग ऐसे मौन रहने वाले होते हैं कि कोई जनमतसंग्रह भी हो जाए, तो भी वे चुप्पी ही साधे रखेंगे। और समाज के जो ठेकेदार रहते हैं, वे लगातार कट्टरता को बढ़ावा देकर, पुरानी रूढिय़ों को बढ़ावा देकर समाज को अपने कब्जे में रखने की कोशिश जारी रखते हैं। हमने कुछ दशक पहले इसी भारतीय संसद में एक मुस्लिम महिला शाहबानो के जायज हक कुचलने के लिए राजीव गांधी की अस्वाभाविक बहुमत वाले संसदीय बाहुबल का इस्तेमाल देखा था जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए कट्टरपंथियों के दबाव में राजीव गांधी ने आत्मसमर्पण कर दिया था, और एक विदेश-शिक्षित, पायलट, नौजवान, और धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री ने मुस्लिम कट्टरता के सामने संसद को झोंक दिया था।
हमारा मानना है कि देश में धर्मों से परे कुछ ऐसे बुनियादी मुद्दे तय होने चाहिए जो कि इंसान को इंसान की तरह मानने वाले हों। कल अगर हिन्दू औरत को सती होने से रोकने का कानून बनाया गया था, तो आज एक मुस्लिम महिला को तलाक देने के खिलाफ ऐसा कानून बनाने में क्या हर्ज है? आज संसद में जो लोग इस कानून का विरोध करेंगे, वे लोग न केवल मुस्लिम महिलाओं की नाराजगी झेलेंगे, बल्कि वे देश की तमाम महिलाओं को भी नाराज करेंगे। और इतिहास में ऐसे लोगों का नाम दर्ज होगा। हम आज महज इस बिना पर इस प्रस्तावित कानून के विरोध के खिलाफ हैं कि इस कानून को लाने वाली सरकार की छवि एक हिन्दू सरकार की है, या कि एक मुस्लिम-विरोधी सरकार की है। छवि की ऐसी समस्या से परे आज यह सोचने की जरूरत है कि न्यायसंगत और तर्कसंगत बात क्या है, और उसी का साथ देने के लिए लोगों को खड़ा होना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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