डूब चुके केरल को उबरने में मदद करना सबका जिम्मा...
संपादकीय
18 अगस्त 2018

केरल में पिछले करीब सौ बरसों की सबसे भयानक बाढ़ में अब तक सैकड़ों लोगों की मारे जाने की खबर है, और लाखों लोग बेघर हो गए हैं। तबाही का जो नजारा देखने मिल रहा है उससे लगता है कि केरल को फिर से सम्हलने, सैलानियों की मेजबानी करने, और अपना रोजगार चलाने में लंबा वक्त लगेगा। एक अंदाज यह है कि राज्य का करीब बीस हजार करोड़ रूपए का नुकसान हुआ है, और कल वहां के दौरे के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पांच सौ करोड़ की सहायता मंजूर की है।
जब कुदरत की इतनी बड़ी मार किसी एक राज्य पर पड़ती है, तो वह बरसों की विकास की संभावनाओं को खो बैठता है, और बरसों का किया कराया पानी में बह जाता है। अब अलग-अलग वक्त पर भारत के कुछ राज्यों में इस तरह की तबाही पहले भी आई है। गुजरात एक वक्त भूकंप के नुकसान से गुजरा था, उत्तराखंड में बाढ़ से तबाही आई थी, ओडिशा में कई बार समुद्री चक्रवाती तूफान से तबाही हो चुकी है, असम और बिहार हर बरस बाढ़ की मार झेलते हैं, और अभी केरल में बाढ़ का जो नजारा देखने मिल रहा है वह शायद इन सबके मुकाबले अधिक भयानक है। पूरी तरह समंदर के किनारे बसा हुआ केरल समुद्री पानी से परे बैकवॉटर से भी घिरा रहता है, और केरल का कोई भी हिस्सा पानी से बहुत दूर नहीं है। इसलिए जब ऐतिहासिक भयानक बारिश हुई, और बांध नाकामयाब रह गए, तो पूरा प्रदेश डूब गया, और घर-दुकान बचाना तो दूर रहा, जान बचाना भी भारी पड़ रहा है। पानी के थम जाने के बाद, उतर जाने के बाद भी नुकसान लंबे समय तक जारी रहेगा।
अब ऐसे में भारत जैसे देश में कोई राज्य इतने बड़े नुकसान से उबरे तो कैसे उबरे? यहां पर उस प्रदेश से बाहर गए हुए और बाहर कमाने वाले लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपनी मातृभूमि की मदद के लिए आगे आएं। इस मामले में केरल से विदेशों में और देश के भीतर भी दूसरे प्रदेशों में गए हुए लोग देश के बाकी प्रदेशों के लोगों के मुकाबले अधिक सक्षम हैं, और वे अपने घर पर हुए इस नुकसान के मौके पर मदद करने के लिए आगे आएंगे ही। लेकिन इससे परे भी कुछ ऐसा इंतजाम रहना चाहिए कि जिससे किसी प्रदेश पर आई इतनी बड़ी मुसीबत के मौके पर दूसरे प्रदेशों के हिस्से का कुछ-कुछ पैसा केन्द्र सरकार ऐसे राज्य को भेज सके। इसके लिए एक ऐसा फॉर्मूला तैयार होना चाहिए जिससे कि केन्द्र सरकार किसी दान या अनुदान की तरह पैसा न दे, बल्कि राज्य अपने हक का पैसा पाए। इसके लिए राज्यों की औसत आय की क्षमता को देखते हुए उस अनुपात में राज्य के बजट से एक मदद अपने आप ऐसे मुसीबतजदा राज्य के लिए जानी चाहिए, और केन्द्र सरकार राज्यों को जो पैसा देती है, उसमें से यह पैसा सीधे जा सकता है। इसके लिए साल भर की तमाम राज्यों की ऐसी औसत मुसीबत, औसत नुकसान को देखकर राष्ट्रीय स्तर पर एक नीति बनानी चाहिए।
ऐसे मौके पर माटी संतानों और सरकारों से परे, कारोबार और आम लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए, और एक-दूसरे का हाथ बंटाना चाहिए। ऐसा होने पर मुसीबत का ऐसा मौका राष्ट्रीय एकता की एक नई भावना भी पैदा कर सकता है, या उसे मजबूत कर सकता है। एक दिक्कत यह है कि जो राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर की समाजसेवी संस्थाएं हैं, वे भी ऐसे मौकों पर लोगों से दान की अपील करती हैं, लेकिन उनके अपने खुद के खर्चे काफी रहते हैं, और दान का एक बड़ा हिस्सा ये संस्थाएं अपने आपको चलाने में खर्च करती हैं। एक दूसरी दिक्कत यह रहती है कि लोग केन्द्र या राज्य सरकार को सीधे दान देना नहीं चाहते क्योंकि सरकारों के भ्रष्टाचार देखकर थकी हुई जनता को यह लगता है कि उसका दिया हुआ दान या योगदान भ्रष्टाचार में चले जाएगा। ये दोनों ही आशंकाएं, और दोनों ही खतरे कम नहीं हैं, और विश्वसनीयता का यह संकट लोगों को दान देने से रोकता भी है।
लेकिन देश को ऐसे माहौल के बीच भी एक-दूसरे की मदद करना सीखना चाहिए, और आज हर प्रदेश को, तमाम सक्षम लोगों को केरल की मदद के लिए आगे आना चाहिए, और जब कभी कोई भी राज्य ऐसी परेशानी में फंसे, इतनी बड़ी मुसीबत में फंसे, उसे उबरने में मदद करने के लिए सबको साथ देना चाहिए।
-सुनील कुमार
(Daily Chhattisgarh)
न रहकर अटलजी याद दिला गए कि उनके बाद क्या-क्या अब बाकी नहीं रह गया है...
संपादकीय
17 अगस्त 2018

कल इसी वक्त इसी जगह हम अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में लिख रहे थे, और तब भी यह एहसास था कि उनके रहने की उम्मीद अब न के बराबर है। परिवार और सरकार जिस तरह एम्स पहुंचे थे, उससे जाहिर था कि यह आखिरी विदाई का वक्त चल रहा था। आज उनके न रहने पर इस वक्त उनकी अंतिम यात्रा शुरू हो रही है, और इस अखबार के छपने तक वे पंचतत्वों में विलीन हो चुके रहेंगे। यह समय वाजपेयी जैसे विशाल जीवन के बारे में सही मूल्यांकन का नहीं रहता है क्योंकि यह वक्त लोगों की श्रद्धांजलि और सुखद संस्मरणों का रहता है जिससे परे की किसी बात के लिए लोगों में बर्दाश्त कम से कम इस वक्त तो नहीं रहता।
फिर भी यह सोचना जरूरी है कि आज अटलजी को पूरे देश में इस तरह क्यों याद किया जा रहा है, उनकी महानता की इतनी चर्चा क्यों हो रही है जितनी कि उनके पांच बरस के प्रधानमंत्री रहने के बाद भी नहीं हुई थी, और इंडिया शाईनिंग के नारों के बीच वे चुनाव हार गए थे। दरअसल किसी भी ऐसे बड़े नेता का मूल्यांकन महज उनके कार्यकाल के आधार पर नहीं होता है, उसके लिए उनके पहले के इतिहास, और उनके बाद आने वाले इतिहास दोनों एक बुनियाद बनाते हैं। अटलजी के जाने के बाद, और इस जाने का मतलब दुनिया से जाना नहीं है, सरकार से जाना है, इस जाने के बाद का वक्त लोगों को यह याद दिला रहा है कि उनकी कौन-कौनसी खूबियां थीं जो कि उनकी पार्टी के किसी भी नेता में उनके बाद लापता हो गईं? लोगों को यह भी याद पड़ता है कि जिस गठबंधन के वे मुखिया थे, उसी गठबंधन की दिल्ली की आज की सरकार किन मायनों में उनकी सरकार से अलग है, और गठबंधन के सहयोगियों के साथ उनके रिश्ते आज के गठबंधन से किस तरह अलग थे, उनके वक्त की भाजपा से आज की भाजपा किस तरह अलग है। उनके वक्त देश का जो माहौल था, और आज जो नहीं है, वह फर्क लोगों को अटलजी का अधिक सम्मान करने के लिए बेबस कर रहा है, उनके कार्यकाल के वक्त के काम के सम्मान से कहीं अधिक।
वक्त बहुत अधिक नहीं गुजरा है, अटल सरकार के बाद दस बरस ही गुजरे थे कि फिर एनडीए की, भाजपा की अगुवाई वाली, मोदी सरकार सत्ता में आ गई थी। लेकिन इस सरकार के देश के भीतर, सरकार के भीतर, गठबंधन के भीतर, सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर, और लोकतंत्र की बाकी संस्थाओं के साथ संबंधों को देखते हुए लोग चाहे-अनचाहे इसकी तुलना वाजपेयी सरकार से, और अटलजी से करने लगते हैं। आज देश भर में भाजपा से परे भी बहुत सी पार्टियों के नेता, और गैरराजनीतिक लोग, पेशेवर अखबारनवीस, इन सबका जो दर्द सामने आ रहा है, वह बहुत से लोगों को चौंका सकता है कि वैचारिक रूप से बिल्कुल ही विपरीत रहते हुए भी ये तमाम लोग अटलजी के इतने प्रशंसक कैसे हो गए हैं। दरअसल उनके पहले के प्रधानमंत्रियों के साथ उनकी तमाम किस्म की तुलना उनके कार्यकाल में ही हो चुकी थी। उनकी सरकार जाने के बाद से वे अपनी सेहत के चलते सार्वजनिक जीवन से ओझल हो चुके थे, और उनकी किसी किस्म की तुलना उनके बाद के प्रधानमंत्रियों से करने की न कोई जरूरत आई थी, न कोई मौका आया था। लेकिन उनके गुजर जाने के बाद आज जिस तल्खी के साथ लोग लिख रहे हैं, बोल रहे हैं, वह कुछ हद तक हैरान करने वाला भी है। और यहीं पर यह साफ दिखता है कि प्रधानमंत्री रहते हुए उनकी जो कमजोरियां और खामियां रहीं, उनकी जो गलतियां हुईं, और उन्होंने जो गलत किया, वह सब कुछ उनके बाद के बरसों को देखते हुए महत्वहीन हो चुका है। आज देश भर के तमाम पार्टियों के नेताओं को और राजनीतिक टिप्पणीकारों को अटलजी की जो खूबियां दिख रही हैं, और उनकी जो खामियां अनदेखी करने लायक लग रही हैं, वह भाजपा के भीतर दस बरसों में ही एक पूरे युग के गुजर जाने, और बदल जाने की वजह से है। उनके जाने से आज लोगों को यकायक यह याद पड़ रहा है कि लोकतांत्रिक-सार्वजनिक जीवन की कौन-कौन सी खूबियां उनके बीमार होते ही ओझल हो चुकी थीं, और अब आज मानो वे पंचतत्व में विलीन हो रही है। उनके कामों का मूल्यांकन अलग से कई लोग लेखों में करेंगे, लेकिन उनके रहने और न रहने के बीच के इस महीन फर्क पर आज लिखना जरूरी था। (Daily Chhattisgarh)
हालत नाजुक होने पर देश अटल-स्मृतियों में डूबा...
संपादकीय
16 अगस्त 2018

भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की हालत बहुत ही नाजुक है, और दिल्ली के एम्स में उन्हें देखने के लिए दिल्ली में मौजूद देश के तकरीबन हर बड़े नेता पहुंचे हुए हैं। उनके साथ काम कर चुके कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी दिल्ली पहुंच रहे हैं, और हिन्दुस्तानी मीडिया उनकी स्मृतियों को लेकर जुट गया है। अटलजी बरसों से बिस्तर पर ही हैं, और ऐसी धारणा है कि वे कई बरस से कुछ समझने की हालत में भी नहीं हैं। जब तक शरीर ने उनका साथ दिया, वे देश के सबसे सक्रिय नेताओं में से एक रहे, लेकिन बीते बरसों में महज उनकी धड़कन जारी रही, और अब वह धड़कन भी अस्पताल की मशीनों की वजह से चल रही है। आज हिन्दुस्तान के मीडिया में उन्हें जिस तरह याद किया जा रहा है, और देश के भाजपाई, गैरभाजपाई नेता जिस जुबान में उनके बारे में बातें कर रहे हैं, उनसे यह साफ होता है कि भाजपा के भीतर भी उतना बड़ा, उतना महान, और उतना उदार कोई नेता नहीं हुआ।
आज से कोई डेढ़ दशक पहले अटलजी ने देश के एक सबसे बड़े गठबंधन, एनडीए की सरकार चलाई थी, और उस वक्त भाजपा-संघ की विचारधारा से असहमति रखने वाली पार्टियां भी जिस तरह उनकी लीडरशिप में सहूलियत महसूस करती थीं, वैसा उसके बाद फिर कभी नहीं हो पाया। भाजपा के भीतर रहते हुए भी अटलजी अपनी पूरी जिंदगी से एक उदारवादी और नर्म मिजाज छवि वाले थे, और नफरत या कट्टरता की बातें उनके मुंह से अपवाद के रूप में ही कभी-कभार निकली थीं, आमतौर पर वे भारत की मिलीजुली संस्कृति का सम्मान करते हुए सबको साथ लेकर चलते थे, और कई जगहों पर उन्हें भाजपा के भीतर एक नेहरूवादी नेता भी लिखा गया था। राजनीतिक विरोधियों के साथ अटलजी के रिश्ते तमाम वैचारिक असहमति के बावजूद कड़वे नहीं रहते थे, अनबोला नहीं रहता था, और पार्टी के भीतर किसी दूसरे नेता को तबाह करने का उनका कोई मिजाज कभी नहीं रहा। उन्हें भाजपा का पोस्टरब्वॉय कहा जाता था, और उनके चेहरे को देखकर ही भाजपा को, या इस पार्टी के बनने के पहले जनसंघ को, वोट मिला करते थे।
आज जब अटलजी मशीनों के सहारे जिंदा हैं, तो उनका परिवार भी अस्पताल में है, और प्रधानमंत्री सहित भाजपा के सारे बड़े नेता, पार्टी से रिटायर हो गए लालकृष्ण अडवानी सरीखे पुराने साथी, तमाम लोग वहां पर हैं। जिस तरह की तैयारी दिल्ली में दिख रही है, उससे यह समझ पड़ता है कि उनकी हालत सुधरने की अब कोई उम्मीद नहीं दिख रही है, और इस मौके पर उनके संस्मरण, उनकी स्मृतियों का प्रसारण चल रहा है। अस्पताल में मौजूद अविवाहित रहे अटलजी के परिवार को देखकर यह याद पड़ता है कि उनकी दत्तक पुत्री और उसके पति ही उनका परिवार रह गया था, और ऐसे पारिवारिक ढांचे पर भी देश में कभी कोई उंगली नहीं उठाई गई थी। अटलजी का व्यक्तित्व इतना विशाल और उदार रहा, कि उनके खिलाफ निजी आलोचना का हौसला कभी किसी का नहीं रहा। हिन्दूवादी राजनीति करने वाले तमाम राजनीतिक दलों के बीच अटलजी सबसे उदार नेता रहे, और अपनी धार्मिक-राजनीतिक विचारधारा को उन्होंने कभी भी एक धर्मनिरपेक्ष, न्यायसंगत, और लोकतांत्रिक सरकार चलाने में बाधा नहीं बनने दिया।
आज उनकी नाजुक हालत के मौके पर इन बातों को याद करना जायज इसलिए है कि सार्वजनिक जीवन की सक्रियता में वे कई बरस से महज स्मृति बनकर रह गए थे, और शारीरिक रूप से उनकी कोई सक्रियता न थी, न आगे आने की कोई उम्मीद है। उनकी सोच और उदारता को इसलिए भी याद करना जरूरी है कि आज देश में जिस तरह का माहौल है, उस माहौल में लोगों को अटल बिहारी वाजपेयी की याद कुछ और अधिक आ रही है, और आज जो लोग भाजपा या एनडीए के साथ नहीं भी रह गए हैं, वे लोग भी अटलजी को याद करके यह कह रहे हैं कि देश में ऐसे नेता की आज बहुत जरूरत है जो सबको लेकर, सबको बांधकर चल सके। अब न उनकी तरह के कोई नेता एनडीए में रह गए, और न ही एनडीए का, या भाजपा का वैसा मिजाज ही रह गया, इसलिए अटलजी की स्मृतियां भारतीय राजनीति के चाल-चलन की स्मृतियां हैं, और इन्हें याद करते हुए लोगों को यह कामना करनी चाहिए कि उनके हित में जो हो, उनकी सेहत का वही हो। (Daily Chhattisgarh)
आजादी की सालगिरह का जलसा उधेड़ देता है कुछ जख्म भी...
संपादकीय
14 अगस्त 2018

आज पाकिस्तान अपनी आजादी की सालगिरह मना रहा है, और हिन्दुस्तान इसे कल मनाने के लिए आज तैयारी में जुट गया है। लेकिन जब-जब ऐसा कोई मौका आता है जब किसी सालगिरह का जलसा होता है, तो उस सालगिरह के पीछे की वजह और आज उसकी हालत इन दोनों पर भी ध्यान जाता ही है। जब लोग गांधी जयंती या गांधी पुण्यतिथि मनाते हैं, तो यह याद पड़ता है कि देश गांधी की नसीहतों से इतनी दूर जा चुका है कि गांधी की प्रतिमा तक लौटने के लिए भी नेताओं को बहुत लंबा चलना पड़ता है। और इस रस्मी सालाना जलसे के बाद लोग फिर यह साबित करने में जुट जाते हैं कि गांधी को खारिज किस तरह से किया जाए। ठीक इसी तरह आजादी के जलसे के वक्त यह बात बड़ी तल्खी के साथ चुभती है कि आज देश में आजादी कैसे-कैसे खत्म हो गई है, और अधिक खत्म हो रही है, और किस तरह ऐसे देश में आजादी का जलसा एक बड़े आंतरिक विरोधाभास की याद दिलाता है।
आज इस देश में आदिवासियों को अपनी जमीन, अपनी जिंदगी, अपने जंगल, और अपने जल, इन सब पर काबिज और कायम रहने की आजादी कितनी रह गई है? आज दलितों को देखें तो उन्हें खानपान की, अपने परंपरागत कामकाज की, अपने रीति-रिवाजों की आजादी कितनी रह गई है? आजादी की करीब पौन सदी के बाद आज भी एक दलित दूल्हे को घोड़े पर चढऩे की आजादी आखिर कितनी रह गई है? इस देश में गरीबों को बराबरी के हक से इंसाफ पाने की, अदालतों में जीतने की आजादी कितनी रह गई है? औरतों को मर्दों के बराबर हक पाने की आजादी कितनी रह गई है? देश की बच्चियों को गाय जितनी महफूज रहने की आजादी कितनी रह गई है? महंगे कोचिंग इंस्टीट्यूट्स में इम्तिहान के मुकाबलों की तैयारी करके निकलने वाले संपन्न बच्चों के मुकाबले पढ़ाई या नौकरी में जगह पाने की गरीब बच्चों को आजादी कितनी रह गई है? इसके अलावा भी कोई फिल्म बनाने की, कोई नाटक लिखने की, इतिहास को दर्ज करने के आजादी कितनी रह गई है?
आजादी की सालगिरह के मौके पर जब चारों तरफ आजाद-आजाद, स्वतंत्रता-स्वतंत्रता के लफ्ज गूंजते हैं, तो इनका खोखलापन और अधिक जाहिर होता है, सिर चढ़कर बोलता है। आज इस देश में कई धर्मोँ के लोगों की धार्मिक आजादी पर बुरी तरह वार हो रहा है, और देश के आजाद रहने से ऐसा लगता है कि मानो कोई जमीन तो आजाद हो गई है, हिन्दुस्तान मानो महज एक नक्शा है जो कि अंग्रेजों के कब्जे से आजाद हो गया है, लेकिन इससे परे क्या यहां के इंसान अंग्रेजों के परे के हुक्मरानों से, ताकतवर कारोबारियों से, मवालियों से, क्या सचमुच आजाद हो पाए हैं? और दूसरी बात यह भी कि इस तकरीबन पौन सदी में आम लोगों की, दबे-कुचले लोगों की जिंदा रहने के हक की आजादी क्या बढ़ी है, उतनी की उतनी रह गई है, या घट गई है? यह सवाल पूछने के लिए शहरी, संपन्न, शिक्षित, सवर्ण, और सत्तारूढ़ तबके से दूर के तबकों तक जाना होगा, और उनकी बात को सुनना, समझना, और मानना होगा, तब जाकर यह समझ आएगा कि आजाद हिन्दुस्तान के भीतर आजाद कहे जाने वाले हिन्दुस्तानी का सफर आजादी की तरफ बढ़ा है, या कि आजादी के खिलाफ बढ़ा है?
एक दिक्कत यह है कि जब आजादी को एक ऐसे उन्मादी और आक्रामक राष्ट्रवाद के साथ जोड़ दिया जाता है जो कि बिना किसी काल्पनिक दुश्मन के न जन्म पाता, न पनप पाता, तो उस राष्ट्रवादी उन्माद को, उसके प्रतीकों को लोग आजादी मान लेते हैं, और उन प्रतीकों को ढोना, बाहर के या भीतर के दुश्मनों को ढूंढना, और मारना लोग राष्ट्रवाद की आजादी, या आजादी का राष्ट्रवाद मान लेते हैं। आजादी की सालगिरह पर यह बात सिर चढ़कर बोलती है कि इस देश में अब भीड़ को चिथड़े उड़ाने की आजादी है, लेकिन कमजोर को साबुत रहने की आजादी नहीं है।
आजादी के मौके पर बाकी दिनों के मुकाबले अदम गोंडवी कुछ अधिक याद पड़ते हैं, जिनकी कुछ मिसालें शब्दों में अब बदली हुई नजर आ सकती हैं, लेकिन जिनके इन लफ्जों की हकीकत पूरी तरह सिर चढ़कर बोलती है।
सौ में सत्तर आदमी, फिलहाल जब नाशाद है,
दिल पे रखकर हाथ कहिये, देश क्या आजाद है।
सौ में सत्तर...
कोठियों से मुल्क के, मेयार को मत आंकिये,
असली हिंदुस्तान तो, फुटपाथ पर आबाद है।
सौ में सत्तर आदमी...
सत्ताधारी लड़ पड़े हैं, आज कुत्तों की तरह,
सूखी रोटी देखकर, हम मुफ्लिसों के हाथ में!
सौ में सत्तर आदमी...
जो मिटा पाया न अब तक, भूख के अवसाद को,
दफन कर दो आज उस, मफ्लूश पूंजीवाद को।
सौ में सत्तर आदमी...
बूढ़ा बरगद साक्षी है, गांव की चौपाल पर,
रमसुदी की झोपड़ी भी, ढह गई चौपाल में।
सौ में सत्तर आदमी...
जिस शहर के मुन्तजिम, अंधे हों जलवामाह के,
उस शहर में रोशनी की, बात बेबुनियाद है।
सौ में सत्तर आदमी...
जो उलझ कर रह गई है, फाइलों के जाल में,
रोशनी वो गांव तक, पहुँचेगी कितने साल में।
सौ में सत्तर आदमी...
(Daily Chhattisgarh)
पश्चिम में बुर्के के खिलाफ सोच.., बुनियादी हक के साथ, या खिलाफ?
13 अगस्त 2018

ब्रिटेन में सत्तारूढ़ पार्टी के एक भूतपूर्व मंत्री बोरिस जॉनसन ने हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के बुर्के पर एक बयान देकर अपनी पार्टी को दुविधा में डाल दिया है, और पार्टी ने इस बयान से किनारा भी कर लिया है। बोरिस ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि बुर्का पहनी हुई महिलाएं लैटरबॉक्स की तरह लगती हैं (मानो आंखों की खुली जगह चिट्ठी डालने के लिए बनी हो), या बैंक डकैतों जैसी लगती हैं। इस बात को पार्टी की घोषित रीति-नीति के खिलाफ माना गया, और सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर यह बात भी चल रही है कि क्या अपने इस नेता की सोच को ठीक करने के लिए उसे किसी परामर्श केन्द्र भेजा जाए।
दूसरी तरफ कुछ दूसरे लोगों का यह भी कहना है कि योरप के कुछ देशों ने बुर्के के खिलाफ कानून बना लिया है, और ब्रिटेन को भी ऐसा ही करना चाहिए, इसलिए बोरिस जॉनसन को अपने बयान पर न अफसोस जाहिर करना चाहिए, न माफी मांगनी चाहिए। मिस्टर बीन के किरदार के विख्यात एक कलाकार रोवान एटकिनसन ने बोरिस जॉनसन के बयान का समर्थन किया है, और कहा है कि अगर कोई लतीफा खराब है, तो ही आपको माफी मांगनी चाहिए, और उस पैमाने पर इस बुर्का-बयान के लिए बोरिस को माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं है। इस अभिनेता ने चिट्ठी लिखकर कहा है- पूरी जिंदगी मैं धर्म के बारे में लतीफे बनाने की आजादी का मजा लेते रहा, और मेरा कहना है कि बोरिस जॉनसन का बुर्के वाला लतीफा खासा अच्छा था। धर्म के बारे में सारे ही लतीफे लोगों को आहत करते हैं, इसलिए उनके बारे में किसी को माफी नहीं मांगनी चाहिए। माफी तो तब मांगनी चाहिए जब लतीफा खराब हो।
यह अभिनेता इसके पहले भी अभिव्यक्ति की आजादी के अभियान में शामिल रहा है, और बरसों तक उसने ऐसे एक कानून के खिलाफ अभियान छेड़ा हुआ था जो कि धार्मिक भावनाएं भड़काने को अपराध बनाने वाला था। उसका कहना था कि ऐसे कानून से बोलने की आजादी खत्म होती है। किसी धर्म की आलोचना एक बुनियादी अधिकार है।
इन बयानों की बात अगर छोड़ दें तो एक बुनियादी बात यह रह जाती है कि बुर्के पर रोक लगानी चाहिए या नहीं? योरप के कुछ देशों ने ऐसा किया है, और अपनी संसद से कानून बनाकर किया है, वहां की अदालतों में भी यह कानून जायज ठहराया गया है। इन देशों का तर्क है कि वहां की संस्कृति में सार्वजनिक जगहों पर बुर्के से एक अलग किस्म का भेदभाव पैदा होता है जो कि सामाजिक समरसता के खिलाफ है। कुछ देशों का यह भी तर्क है कि महिला पर ही लादे गए ऐसे नियम से महिलाओं का समानता का अधिकार खत्म होता है जो कि इन देशों में संविधान के तहत दी गई औरत-मर्द की समानता की गारंटी के खिलाफ है।
हाल के बरसों में, या यह कहें कि पिछले दो दशकों में दुनिया में इस्लाम को मानने वाले लोगों के रीति-रिवाज सहित उनकी धार्मिक मान्यताओं के दीगर पहलुओं पर बहस बढ़ती चली गई है क्योंकि बाकी दुनिया में बाहर से गए हुए मुस्लिमों का समाज में घुलना-मिलना इससे प्रभावित हो रहा था। बहुत से ईसाई या गोरे देशों में, पश्चिमी संस्कृतियों में बुर्के या हिजाब, नकाब या किसी और किस्म के पर्दे को लेकर वहां की स्थानीय बहुसंख्यक संस्कृति की नापसंदगी, शरणार्थियों या आप्रवासियों के लिए नापसंदगी की एक बड़ी वजह बन रही थी। दूसरी बात यह कि दुनिया में हो रहे बहुत से आतंकी हमलों के पीछे मुस्लिम आतंकी समूहों का हाथ होने से भी बहुत सी जगहों पर इस्लामोफोबिया बढ़ रहा था। मुस्लिमों या इस्लाम से दहशत की एक वजह यह भी थी कि अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, या पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों में मुस्लिम आतंकी संगठन जिस दर्जे की हिंसा कर रहे थे, वैसी हिंसा इक्कीसवीं सदी में किसी और जगह पर देखी नहीं गई थी, इसलिए भी योरप और पश्चिम के देशों में इन देशों से आने वाले मुस्लिम शरणार्थियों के खिलाफ दहशत और नापसंदगी का मिलाजुला प्रतिरोध सामने आ रहा था। कई जगहों पर मुस्लिम समाज और खासकर मुस्लिम महिलाओं के हिमायती लोग भी यह चाहते थे कि मुस्लिम लोगों के बीच की इस पर्दा प्रथा को खत्म किया जाए, और मुस्लिम औरत को बराबरी के हक दिलवाए जाएं। इसी सोच के साथ योरप के कुछ देशों ने ऐसे कानून बनाए।
अब यहां पर कुछ बुनियादी बातें खड़ी होती हैं जिन पर सोचने की जरूरत है। पहली बात तो यह कि बुर्का या ऐसा कोई दूसरा पर्दा पहन-ओढ़कर रहना यह मुस्लिम महिला की गुलामी का प्रतीक है, या कि मुस्लिम महिला की आजादी का प्रतीक है? क्या मुस्लिम महिला पर यह बोझ उस समाज के मर्दों की सोच से तय हुए रीति-रिवाजों के तहत डालकर उसे एक गुलाम की तरह रखा जाता है? या फिर मुस्लिम महिला को योरप या बाकी गोरे-ईसाई देशों में भी यह आजादी मिलनी चाहिए कि वह अपनी मर्जी से चाहे तो बुर्का पहने। यह बुनियादी सवाल आसान नहीं है कि बुर्का मुस्लिम महिला की अपनी पसंद की आजादी का प्रतीक है, या कि उसकी गुलामी का। अगर हम किसी धर्म के दायरे से बाहर निकलकर सोचें तो यह लगता है कि संभावनाओं को सीमित करने वाला ऐसा बोझ अगर केवल महिलाओं पर लादा गया है, और धर्म के बाकी रीति-रिवाजों, सामाजिक संस्कृतियों में भी केवल महिला के हक ही कम रखे गए हैं, तो यह गैरबराबरी की सोच से उपजा हुआ बोझ है, और यह किसी भी हालत में किसी महिला की पसंद नहीं हो सकता। मुस्लिम समाज के भीतर के कुछ लोग यह जरूर कह सकते हैं कि योरप के देशों में भी कानून बनाने के पहले यह सोचना चाहिए कि मुस्लिम महिला अगर अपनी पसंद से बुर्का पहनना चाहती है, तो उसे उसकी आजादी होना चाहिए।
अब सवाल यह उठता है कि एक वक्त भारत के हिन्दू समाज में महिला को सती होने की आजादी हासिल थी। लेकिन सामाजिक हकीकत यह थी कि महिला अपने गुजरे हुए पति की चिता पर खुद होकर चढऩा चाहे या नहीं, उसे पारिवारिक और सामाजिक दबाव के तहत चढ़ा दिया जाता था, और जला दिया जाता था। इसी तरह हिन्दू समाज में बाल विवाह कायम था, और इसे मां-बाप का हक माना जाता था कि वे अपने छोटे-छोटे बच्चों की शादी कर दें। लेकिन कानून बनाकर इन दोनों बातों को रोकना पड़ा क्योंकि समाज के रीति-रिवाज दकियानूसी और हिंसक अधिक रहते हैं, लोकतांत्रिक, मानवीय, और संवेदनशील कम रहते हैं। ऐसे रीति-रिवाज बहुत से समाजों में कायम हैं, और अभी-अभी जैन समाज के भीतर लगातार यह बात उठ रही है कि कमउम्र के बच्चों का सन्यास लेना तो बंद करना ही चाहिए, कमउम्र के बच्चों को छोड़कर सन्यासी बनने वाले मां-बाप के सन्यास पर भी रोक लगना चाहिए।
हिन्दुस्तान से फिलीस्तीन तक के महीने भर के सड़क सफर में मेरा यह देखना हुआ था कि ईरान, टर्की, सीरिया, इजिप्ट और फिलीस्तीन जैसे बहुत से देशों में छोटे-छोटे बच्चों को भी बुर्का या हिजाब पहनाकर स्कूल भेजा जाता है, और पोशाक के मामले में एक गैरबराबरी इन तमाम मुस्लिम देशों में कायम थी। धीरे-धीरे ऐसे सामाजिक माहौल में लड़कियों या महिलाओं को यह भी लग सकता है कि वे इसी में सुरक्षित हैं, और यह उन पर बोझ नहीं है, यह उनका हक है। लेकिन हकीकत तो यही है कि महज महिलाओं के लिए बनाए गए ऐसे पोशाक-नियमों से उनकी आगे बढऩे की संभावनाएं कम होती हैं, वे गैरबराबरी की वजह से पिछड़ती हैं।
लैटरबॉक्स या बैंक डकैत जैसी संवेदनाशून्य भाषा को अगर छोड़ भी दें, तो यह दुनिया के सभी समाजों की जिम्मेदारी है कि वे धार्मिक या सामाजिक आधार पर जहां-जहां औरत या मर्द में भेदभाव किया जाता है, उसे खत्म करने की कोशिश करें। इसके तौर-तरीके अलग हो सकते हैं, कुछ लोगों का यह मानना हो सकता है कि इसे मुस्लिम महिला की निजी पसंद-नापसंद पर छोड़ दिया जाए, लेकिन जो देश समानता को राजनीतिक हौसले के साथ लागू करने की समझ रखते हैं, उन्हें चाहिए कि वे मुस्लिम महिला को इससे आजादी दिलाएं। बोझ किसी की पसंद नहीं हो सकता, और एक वक्त तो वह भी था जब अलग-अलग बहुत से धर्मों के समुदायों में तरह-तरह की हिंसा को कानूनी मंजूरी थी, और अमरीका जैसे देश में भी महिलाओं को वोट डालने का हक नहीं था। महज सामाजिक बदलाव से हालात नहीं सुधरते, उसके लिए कई बार कानून की भी जरूरत पड़ती है।
अभी जब यह कॉलम लिखा ही जा रहा है, तभी ब्रिटेन से एक खबर आई है कि वहां एक मुसाफिर बस में एक गोरे ड्राइवर ने एक मुस्लिम महिला के चेहरे को ढांके हुए निकाब पर आपत्ति की, और उसे हटाने के लिए कहा। इस बात का भूतपूर्व ब्रिटिश मंत्री के छेड़े गए विवाद से सीधा-सीधा रिश्ता दिखता है कि उस बात की वजह से यह नया तनाव खड़ा हो रहा है।
इन तमाम बातों से परे, दुनिया के इतिहास में एक दिलचस्प मामला दर्ज है जिसे स्टॉकहोम सिन्ड्रोम कहते हैं। स्वीडन के स्टॉकहोम में 1973 में एक बैंक डकैती हुई, और डकैतों ने अपने एक साथी को जेल से रिहा कराने के लिए जेल के तिजोरी के भीतर ही कई लोगों को छह दिन तक कैद करके रखा ताकि उनकी जान की कीमत पर जेल से रिहाई कराई जा सके। डकैत इन लोगों को फांसी का फंदा और डायनामाइट दिखाकर-डराकर भी रख रहे थे। उसके बाद जब इन लोगों की रिहाई हुई, तो इनमें से किसी ने भी इन डकैतों के खिलाफ बयान देने से इंकार कर दिया, बल्कि उनके मुकदमे के लिए पैसे जुटाने में भी लग गए। बाद में मनोवैज्ञानिकों ने उनकी दिमागी हालत का अध्ययन किया और पाया कि इस कैद के शिकार लोगों ने अपनी आत्मरक्षा के लिए उन्हें कैद करके रखने वाले लोगों के साथ ऐसी हमदर्दी विकसित कर ली थी कि उनकी जान बच सके। और बाद में यह हमदर्दी रिहाई के बाद भी जारी रही। इसे ही तब से अब तक स्टॉकहोम सिन्ड्रोम कहा जाता है जिसमें कैद करके रखने वाले लोगों के साथ कैद किए गए लोगों की हमदर्दी हो जाती है। यह मिसाल कुछ अटपटी सी लग सकती है, लेकिन हकीकत यही है कि कुछ मामलों में लोगों को उनके साथ होती ज्यादती का अंदाज नहीं लगता, और वे ज्यादती के बावजूद अपने उस हाल को पसंद करने लगते हैं। महिलाओं के बारे में यह समझने की जरूरत है कि क्या वे बुर्का या हिजाब पहनने, या सती होने, या घूंघट निकालने को स्टॉकहोम सिन्ड्रोम की तरह अपने भले के लिए मानने लगी हैं! (Daily Chhattisgarh)
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