डूब चुके केरल को उबरने में मदद करना सबका जिम्मा...

संपादकीय
18 अगस्त 2018


केरल में पिछले करीब सौ बरसों की सबसे भयानक बाढ़ में अब तक सैकड़ों लोगों की मारे जाने की खबर है, और लाखों लोग बेघर हो गए हैं। तबाही का जो नजारा देखने मिल रहा है उससे लगता है कि केरल को फिर से सम्हलने, सैलानियों की मेजबानी करने, और अपना रोजगार चलाने में लंबा वक्त लगेगा। एक अंदाज यह है कि राज्य का करीब बीस हजार करोड़ रूपए का नुकसान हुआ है, और कल वहां के दौरे के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पांच सौ करोड़ की सहायता मंजूर की है। 
जब कुदरत की इतनी बड़ी मार किसी एक राज्य पर पड़ती है, तो वह बरसों की विकास की संभावनाओं को खो बैठता है, और बरसों का किया कराया पानी में बह जाता है। अब अलग-अलग वक्त पर भारत के कुछ राज्यों में इस तरह की तबाही पहले भी आई है। गुजरात एक वक्त भूकंप के नुकसान से गुजरा था, उत्तराखंड में बाढ़ से तबाही आई थी, ओडिशा में कई बार समुद्री चक्रवाती तूफान से तबाही हो चुकी है, असम और बिहार हर बरस बाढ़ की मार झेलते हैं, और अभी केरल में बाढ़ का जो नजारा देखने मिल रहा है वह शायद इन सबके मुकाबले अधिक भयानक है। पूरी तरह समंदर के किनारे बसा हुआ केरल समुद्री पानी से परे बैकवॉटर से भी घिरा रहता है, और केरल का कोई भी हिस्सा पानी से बहुत दूर नहीं है। इसलिए जब ऐतिहासिक भयानक बारिश हुई, और बांध नाकामयाब रह गए, तो पूरा प्रदेश डूब गया, और घर-दुकान बचाना तो दूर रहा, जान बचाना भी भारी पड़ रहा है। पानी के थम जाने के बाद, उतर जाने के बाद भी नुकसान लंबे समय तक जारी रहेगा। 
अब ऐसे में भारत जैसे देश में कोई राज्य इतने बड़े नुकसान से उबरे तो कैसे उबरे? यहां पर उस प्रदेश से बाहर गए हुए और बाहर कमाने वाले लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपनी मातृभूमि की मदद के लिए आगे आएं। इस मामले में केरल से विदेशों में और देश के भीतर भी दूसरे प्रदेशों में गए हुए लोग देश के बाकी प्रदेशों के लोगों के मुकाबले अधिक सक्षम हैं, और वे अपने घर पर हुए इस नुकसान के मौके पर मदद करने के लिए आगे आएंगे ही। लेकिन इससे परे भी कुछ ऐसा इंतजाम रहना चाहिए कि जिससे किसी प्रदेश पर आई इतनी बड़ी मुसीबत के मौके पर दूसरे प्रदेशों के हिस्से का कुछ-कुछ पैसा केन्द्र सरकार ऐसे राज्य को भेज सके। इसके लिए एक ऐसा फॉर्मूला तैयार होना चाहिए जिससे कि केन्द्र सरकार किसी दान या अनुदान की तरह पैसा न दे, बल्कि राज्य अपने हक का पैसा पाए। इसके लिए राज्यों की औसत आय की क्षमता को देखते हुए उस अनुपात में राज्य के बजट से एक मदद अपने आप ऐसे मुसीबतजदा राज्य के लिए जानी चाहिए, और केन्द्र सरकार राज्यों को जो पैसा देती है, उसमें से यह पैसा सीधे जा सकता है। इसके लिए साल भर की तमाम राज्यों की ऐसी औसत मुसीबत, औसत नुकसान को देखकर राष्ट्रीय स्तर पर एक नीति बनानी चाहिए। 
ऐसे मौके पर माटी संतानों और सरकारों से परे, कारोबार और आम लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए, और एक-दूसरे का हाथ बंटाना चाहिए। ऐसा होने पर मुसीबत का ऐसा मौका राष्ट्रीय एकता की एक नई भावना भी पैदा कर सकता है, या उसे मजबूत कर सकता है। एक दिक्कत यह है कि जो राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर की समाजसेवी संस्थाएं हैं, वे भी ऐसे मौकों पर लोगों से दान की अपील करती हैं, लेकिन उनके अपने खुद के खर्चे काफी रहते हैं, और दान का एक बड़ा हिस्सा ये संस्थाएं अपने आपको चलाने में खर्च करती हैं। एक दूसरी दिक्कत यह रहती है कि लोग केन्द्र या राज्य सरकार को सीधे दान देना नहीं चाहते क्योंकि सरकारों के भ्रष्टाचार देखकर थकी हुई जनता को यह लगता है कि उसका दिया हुआ दान या योगदान भ्रष्टाचार में चले जाएगा। ये दोनों ही आशंकाएं, और दोनों ही खतरे कम नहीं हैं, और विश्वसनीयता का यह संकट लोगों को दान देने से रोकता भी है। 
लेकिन देश को ऐसे माहौल के बीच भी एक-दूसरे की मदद करना सीखना चाहिए, और आज हर प्रदेश को, तमाम सक्षम लोगों को केरल की मदद के लिए आगे आना चाहिए, और जब कभी कोई भी राज्य ऐसी परेशानी में फंसे, इतनी बड़ी मुसीबत में फंसे, उसे उबरने में मदद करने के लिए सबको साथ देना चाहिए। 
-सुनील कुमार 

(Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें