संपादकीय
16 अगस्त 2018

भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की हालत बहुत ही नाजुक है, और दिल्ली के एम्स में उन्हें देखने के लिए दिल्ली में मौजूद देश के तकरीबन हर बड़े नेता पहुंचे हुए हैं। उनके साथ काम कर चुके कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी दिल्ली पहुंच रहे हैं, और हिन्दुस्तानी मीडिया उनकी स्मृतियों को लेकर जुट गया है। अटलजी बरसों से बिस्तर पर ही हैं, और ऐसी धारणा है कि वे कई बरस से कुछ समझने की हालत में भी नहीं हैं। जब तक शरीर ने उनका साथ दिया, वे देश के सबसे सक्रिय नेताओं में से एक रहे, लेकिन बीते बरसों में महज उनकी धड़कन जारी रही, और अब वह धड़कन भी अस्पताल की मशीनों की वजह से चल रही है। आज हिन्दुस्तान के मीडिया में उन्हें जिस तरह याद किया जा रहा है, और देश के भाजपाई, गैरभाजपाई नेता जिस जुबान में उनके बारे में बातें कर रहे हैं, उनसे यह साफ होता है कि भाजपा के भीतर भी उतना बड़ा, उतना महान, और उतना उदार कोई नेता नहीं हुआ।
आज से कोई डेढ़ दशक पहले अटलजी ने देश के एक सबसे बड़े गठबंधन, एनडीए की सरकार चलाई थी, और उस वक्त भाजपा-संघ की विचारधारा से असहमति रखने वाली पार्टियां भी जिस तरह उनकी लीडरशिप में सहूलियत महसूस करती थीं, वैसा उसके बाद फिर कभी नहीं हो पाया। भाजपा के भीतर रहते हुए भी अटलजी अपनी पूरी जिंदगी से एक उदारवादी और नर्म मिजाज छवि वाले थे, और नफरत या कट्टरता की बातें उनके मुंह से अपवाद के रूप में ही कभी-कभार निकली थीं, आमतौर पर वे भारत की मिलीजुली संस्कृति का सम्मान करते हुए सबको साथ लेकर चलते थे, और कई जगहों पर उन्हें भाजपा के भीतर एक नेहरूवादी नेता भी लिखा गया था। राजनीतिक विरोधियों के साथ अटलजी के रिश्ते तमाम वैचारिक असहमति के बावजूद कड़वे नहीं रहते थे, अनबोला नहीं रहता था, और पार्टी के भीतर किसी दूसरे नेता को तबाह करने का उनका कोई मिजाज कभी नहीं रहा। उन्हें भाजपा का पोस्टरब्वॉय कहा जाता था, और उनके चेहरे को देखकर ही भाजपा को, या इस पार्टी के बनने के पहले जनसंघ को, वोट मिला करते थे।
आज जब अटलजी मशीनों के सहारे जिंदा हैं, तो उनका परिवार भी अस्पताल में है, और प्रधानमंत्री सहित भाजपा के सारे बड़े नेता, पार्टी से रिटायर हो गए लालकृष्ण अडवानी सरीखे पुराने साथी, तमाम लोग वहां पर हैं। जिस तरह की तैयारी दिल्ली में दिख रही है, उससे यह समझ पड़ता है कि उनकी हालत सुधरने की अब कोई उम्मीद नहीं दिख रही है, और इस मौके पर उनके संस्मरण, उनकी स्मृतियों का प्रसारण चल रहा है। अस्पताल में मौजूद अविवाहित रहे अटलजी के परिवार को देखकर यह याद पड़ता है कि उनकी दत्तक पुत्री और उसके पति ही उनका परिवार रह गया था, और ऐसे पारिवारिक ढांचे पर भी देश में कभी कोई उंगली नहीं उठाई गई थी। अटलजी का व्यक्तित्व इतना विशाल और उदार रहा, कि उनके खिलाफ निजी आलोचना का हौसला कभी किसी का नहीं रहा। हिन्दूवादी राजनीति करने वाले तमाम राजनीतिक दलों के बीच अटलजी सबसे उदार नेता रहे, और अपनी धार्मिक-राजनीतिक विचारधारा को उन्होंने कभी भी एक धर्मनिरपेक्ष, न्यायसंगत, और लोकतांत्रिक सरकार चलाने में बाधा नहीं बनने दिया।
आज उनकी नाजुक हालत के मौके पर इन बातों को याद करना जायज इसलिए है कि सार्वजनिक जीवन की सक्रियता में वे कई बरस से महज स्मृति बनकर रह गए थे, और शारीरिक रूप से उनकी कोई सक्रियता न थी, न आगे आने की कोई उम्मीद है। उनकी सोच और उदारता को इसलिए भी याद करना जरूरी है कि आज देश में जिस तरह का माहौल है, उस माहौल में लोगों को अटल बिहारी वाजपेयी की याद कुछ और अधिक आ रही है, और आज जो लोग भाजपा या एनडीए के साथ नहीं भी रह गए हैं, वे लोग भी अटलजी को याद करके यह कह रहे हैं कि देश में ऐसे नेता की आज बहुत जरूरत है जो सबको लेकर, सबको बांधकर चल सके। अब न उनकी तरह के कोई नेता एनडीए में रह गए, और न ही एनडीए का, या भाजपा का वैसा मिजाज ही रह गया, इसलिए अटलजी की स्मृतियां भारतीय राजनीति के चाल-चलन की स्मृतियां हैं, और इन्हें याद करते हुए लोगों को यह कामना करनी चाहिए कि उनके हित में जो हो, उनकी सेहत का वही हो। (Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें