आजादी की सालगिरह का जलसा उधेड़ देता है कुछ जख्म भी...

संपादकीय
14 अगस्त 2018


आज पाकिस्तान अपनी आजादी की सालगिरह मना रहा है, और हिन्दुस्तान इसे कल मनाने के लिए आज तैयारी में जुट गया है। लेकिन जब-जब ऐसा कोई मौका आता है जब किसी सालगिरह का जलसा होता है, तो उस सालगिरह के पीछे की वजह और आज उसकी हालत इन दोनों पर भी ध्यान जाता ही है। जब लोग गांधी जयंती या गांधी पुण्यतिथि मनाते हैं, तो यह याद पड़ता है कि देश गांधी की नसीहतों से इतनी दूर जा चुका है कि गांधी की प्रतिमा तक लौटने के लिए भी नेताओं को बहुत लंबा चलना पड़ता है। और इस रस्मी सालाना जलसे के बाद लोग फिर यह साबित करने में जुट जाते हैं कि गांधी को खारिज किस तरह से किया जाए। ठीक इसी तरह आजादी के जलसे के वक्त यह बात बड़ी तल्खी के साथ चुभती है कि आज देश में आजादी कैसे-कैसे खत्म हो गई है, और अधिक खत्म हो रही है, और किस तरह ऐसे देश में आजादी का जलसा एक बड़े आंतरिक विरोधाभास की याद दिलाता है। 
आज इस देश में आदिवासियों को अपनी जमीन, अपनी जिंदगी, अपने जंगल, और अपने जल, इन सब पर काबिज और कायम रहने की आजादी कितनी रह गई है? आज दलितों को देखें तो उन्हें खानपान की, अपने परंपरागत कामकाज की, अपने रीति-रिवाजों की आजादी कितनी रह गई है? आजादी की करीब पौन सदी के बाद आज भी एक दलित दूल्हे को घोड़े पर चढऩे की आजादी आखिर कितनी रह गई है? इस देश में गरीबों को बराबरी के हक से इंसाफ पाने की, अदालतों में जीतने की आजादी कितनी रह गई है? औरतों को मर्दों के बराबर हक पाने की आजादी कितनी रह गई है? देश की बच्चियों को गाय जितनी महफूज रहने की आजादी कितनी रह गई है? महंगे कोचिंग इंस्टीट्यूट्स में इम्तिहान के मुकाबलों की तैयारी करके निकलने वाले संपन्न बच्चों के मुकाबले पढ़ाई या नौकरी में जगह पाने की गरीब बच्चों को आजादी कितनी रह गई है? इसके अलावा भी कोई फिल्म बनाने की, कोई नाटक लिखने की, इतिहास को दर्ज करने के आजादी कितनी रह गई है? 
आजादी की सालगिरह के मौके पर जब चारों तरफ आजाद-आजाद, स्वतंत्रता-स्वतंत्रता के लफ्ज गूंजते हैं, तो इनका खोखलापन और अधिक जाहिर होता है, सिर चढ़कर बोलता है। आज इस देश में कई धर्मोँ के लोगों की धार्मिक आजादी पर बुरी तरह वार हो रहा है, और देश के आजाद रहने से ऐसा लगता है कि मानो कोई जमीन तो आजाद हो गई है, हिन्दुस्तान मानो महज एक नक्शा है जो कि अंग्रेजों के कब्जे से आजाद हो गया है, लेकिन इससे परे क्या यहां के इंसान अंग्रेजों के परे के हुक्मरानों से, ताकतवर कारोबारियों से, मवालियों से, क्या सचमुच आजाद हो पाए हैं? और दूसरी बात यह भी कि इस तकरीबन पौन सदी में आम लोगों की, दबे-कुचले लोगों की जिंदा रहने के हक की आजादी क्या बढ़ी है, उतनी की उतनी रह गई है, या घट गई है? यह सवाल पूछने के लिए शहरी, संपन्न, शिक्षित, सवर्ण, और सत्तारूढ़ तबके से दूर के तबकों तक जाना होगा, और उनकी बात को सुनना, समझना, और मानना होगा, तब जाकर यह समझ आएगा कि आजाद हिन्दुस्तान के भीतर आजाद कहे जाने वाले हिन्दुस्तानी का सफर आजादी की तरफ बढ़ा है, या कि आजादी के खिलाफ बढ़ा है?
एक दिक्कत यह है कि जब आजादी को एक ऐसे उन्मादी और आक्रामक राष्ट्रवाद के साथ जोड़ दिया जाता है जो कि बिना किसी काल्पनिक दुश्मन के न जन्म पाता, न पनप पाता, तो उस राष्ट्रवादी उन्माद को, उसके प्रतीकों को लोग आजादी मान लेते हैं, और उन प्रतीकों को ढोना, बाहर के या भीतर के दुश्मनों को ढूंढना, और मारना लोग राष्ट्रवाद की आजादी, या आजादी का राष्ट्रवाद मान लेते हैं। आजादी की सालगिरह पर यह बात सिर चढ़कर बोलती है कि इस देश में अब भीड़ को चिथड़े उड़ाने की आजादी है, लेकिन कमजोर को साबुत रहने की आजादी नहीं है। 
आजादी के मौके पर बाकी दिनों के मुकाबले अदम गोंडवी कुछ अधिक याद पड़ते हैं, जिनकी कुछ मिसालें शब्दों में अब बदली हुई नजर आ सकती हैं, लेकिन जिनके इन लफ्जों की हकीकत पूरी तरह सिर चढ़कर बोलती है। 
सौ में सत्तर आदमी, फिलहाल जब नाशाद है,
दिल पे रखकर हाथ कहिये, देश क्या आजाद है। 
सौ में सत्तर...

कोठियों से मुल्क के, मेयार को मत आंकिये,
असली हिंदुस्तान तो, फुटपाथ पर आबाद है। 
सौ में सत्तर आदमी...

सत्ताधारी लड़ पड़े हैं, आज कुत्तों की तरह,
सूखी रोटी देखकर, हम मुफ्लिसों के हाथ में! 
सौ में सत्तर आदमी...

जो मिटा पाया न अब तक, भूख के अवसाद को,
दफन कर दो आज उस, मफ्लूश पूंजीवाद को। 
सौ में सत्तर आदमी...

बूढ़ा बरगद साक्षी है, गांव की चौपाल पर,
रमसुदी की झोपड़ी भी, ढह गई चौपाल में। 
सौ में सत्तर आदमी...

जिस शहर के मुन्तजिम, अंधे हों जलवामाह के,
उस शहर में रोशनी की, बात बेबुनियाद है। 
सौ में सत्तर आदमी...

जो उलझ कर रह गई है, फाइलों के जाल में,
रोशनी वो गांव तक, पहुँचेगी कितने साल में। 
सौ में सत्तर आदमी...
(Daily Chhattisgarh)

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