21 अक्टूबर 20111
संपादकीय
यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी को उटपटांग बातें कहने और खुद के लिए परेशानी खड़ी करने की एक लत पड़ गई है। सुबह से शाम हो जाए और अगर यह पार्टी या सरकार अगर इस किस्म का कोई आत्मघाती काम न करे तो यह मानना चाहिए कि इसके नेता, मंत्री और अफसर छुट्टी मना रहे होंगे। और लोगों को तो छोड़ दें, अब तो लगभग मौनव्रत पर चलने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अपने ही गोल पोस्ट में गोल दागने की कोशिश करते हुए दिख रहे हैं। पिछले एक हफ्ते में उन्होंने दो ऐसे काम किए। सूचना के अधिकार पर एक सरकारी संबोधन में उन्होंने कहा कि इस अधिकार से ईमानदार और अच्छी नीयत वाले जनसेवकों का हौसला पस्त होने का एक खतरा है और इस कानून पर एक आलोचनात्मक नजर डालने की जरूरत है। उनकी इस बात पर सोनिया गांधी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की एक प्रमुख सदस्य अरूणा राय ने मनमोहन सिंह की धज्जियां उड़ाते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री का यह बयान पूरी तरह से गलत है। अरूणा राय इस कानून का मसौदा बनाने वाली प्रमुख व्यक्ति रही हैं और उन्होंने कहा कि सरकारी व्यवस्था को सूचना के अधिकार में नहीं उसके भीतर के भ्रष्टाचार ने प्रभावित करके रखा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को फिक्र तो उन मौतों की करनी चाहिए जो कि सूचना के अधिकार कार्यकर्ताओं को जगह-जगह मिल रही है, न कि नौकरशाहों की असुविधा की।
मनमोहन सिंह का यह बयान एक ऐसे वक्त आया है जब ईमानदारी और बेईमानी की बहस में उनकी सरकार की विश्वसनीयता आजादी के बाद से अब तक किसी भी सरकार की सबसे कम विश्वसनीयता है, और जब उनकी खुद की अगुवाई वाली केंद्र सरकार चोर, बेईमान और डकैत की तरह जनता की नजरों में गिर चुकी है, तब उस सूचना के अधिकार को कोसना हैरान करने वाला लगता है जिसने कि सारे बड़े भांडाफोड़ के पीछे अपना योगदान दिया है। फिर मानो गुपचुप रहने वाले मनमोहन सिंह के लिए अरूणा राय का कहना काफी नहीं था तो उन्होंने भाजपा के लाल कृष्ण आडवानी को यह नसीहत दे डाली कि वे अपनी रथयात्रा के दौरान कड़े या कड़वे शब्द कहने से बचें। अब राजनीति में कोई एक-दूसरे को कड़े या कड़वे शब्द से बचने को कहे, तो यह बात राजनीति से अनजान कोई इंसान ही कर सकता है। इसके जवाब में आडवानी ने जो कहा वह बहुत जायज बात थी कि उन्होंने तो महज इतना कहा था कि नेहरू से लेकर आज तक तमाम प्रधानमंत्री उन्होंने देखे हैं और मनमोहन सिंह उनमें से सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं। आडवानी ने पूछा कि इसमें कड़ी या कड़वी बात क्या है?
इस बात पर भी आज हम शायद यह संपादकीय नहीं लिखते लेकिन कल की एक दूसरी खबर और चौंकाने वाली है। अमरीका और पाकिस्तान के रिश्ते आज सबसे भयानक हालत में हैं। अमरीका ने आतंकियों की सरकारी मदद के लिए पाकिस्तान को बुरी तरह से घेर लिया है और अमरीकी सरकार के भीतर उस पाकिस्तानी आतंक पर भारी तमतमाए हुए तेवर हैं, जिस आतंक ने भारत पर हमले करके सैकड़ों जानें ले ली हैं। ऐसे मौके पर जब अमरीकी विदेश मंत्री पाकिस्तान पहुंच रही हैं और भारत की जनता सहित बाकी दुनिया भी यह देख रही है कि एक नाकामयाब लोकतंत्र पाकिस्तान को उसके अन्नदाता अमरीका की लताड़ कैसे पड़ती है तब भारतीय विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने बेमौके का यह बयान दिया है कि भारत अमरीका और पाकिस्तान जैसे दोस्त देशों के बीच कोई मतभेद देखना नहीं चाहता और इन दोनों को बातचीत की मेज पर अपने मतभेद निपटा लेना चाहिए जिससे कि दूसरे देशों, खासकर भारत के लिए दिक्कतें खड़ी न हों। भारतीय विदेश मंत्री का यह बयान हाल के महीनों में उनकी पाकिस्तान की एक खूबसूरत, नौजवान और नई विदेश मंत्री से कुछ बार की मुलाकातों के उत्साह से पैदा हुआ अधिक दिख रहा है, भारत की विदेश नीति की समझदारी से उपजा हुआ कम। सच तो यह है कि यह बयान भारत के राष्ट्रीय और विदेशी हितों के ठीक खिलाफ है और यह पाकिस्तानी आतंक के खिलाफ भारत के लगातार खड़े किए जा रहे एक ठोस मामले को किनारे करते हुए एक ऐसी नौबत ला रहा है जिसके चलते अमरीका पाकिस्तान के खिलाफ अधिक खफा होने से बच भी सकता है। अमरीका और पाकिस्तान के बीच मतभेद अगर अमरीकियों पर पाकिस्तानी मदद से होने वाले आतंकी हमलों की वजह से खड़े हुए हैं, तो उन पर नरमी बरतकर भारत का विदेश मंत्री क्या साबित कर रहा है? आज तो पाकिस्तान जब सरकार, सेना और खुफिया एजेंसियों की आतंक में भागीदारी के सुबूतों से घिरते चले गया है तब भारत को अपनी पूरी कूटनीतिक ताकत इस बात में लगा देनी थी कि पाकिस्तान का सबसे बड़ा फौजी मददगार अमरीका उसके सिर पर से अपना हाथ हटाए। एक तरफ पाकिस्तानी फौज और कुख्यात पाकिस्तानी फौजी खुफिया एजेंसी, आईएसआई, अमरीका के साथ एक टकराव का दंभ भरते हुए खड़े हैं, खुद अमरीकी विदेश मंत्री अभी कुछ घंटे पहले पाकिस्तान में वहां की सरकार को यह कह चुकी है कि आप अपने घर के पिछवाड़े में सांप पालकर यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह सिर्फ आपके पड़ोसी को डसेगा, ऐसे में भारत की पाकिस्तान के साथ हमदर्दी और नरमी हक्का-बक्का कर देने वाली है। अब तक पता नहीं क्यों भाजपा के भी किसी भूतपूर्व विदेश मंत्री का ध्यान इस पर नहीं गया है, लेकिन हम इसे मनमोहन सरकार का एक और आत्मघाती बयान मानते हैं जो पूरी तरह से भारत के लिए आत्मघाती है। एस.एम. कृष्णा इसके पहले भी कई किस्म की कूटनीतिक चूकें कर चुके हैं और अब तो जब प्रधानमंत्री कई किस्म के अवांछित बयान देना शुरू कर चुके हैं तो फिर बाकी मंत्रियों को तो मानो गलतियां और गलत काम करने का एक हक ही मिल जा रहा है।
संपादकीय
यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी को उटपटांग बातें कहने और खुद के लिए परेशानी खड़ी करने की एक लत पड़ गई है। सुबह से शाम हो जाए और अगर यह पार्टी या सरकार अगर इस किस्म का कोई आत्मघाती काम न करे तो यह मानना चाहिए कि इसके नेता, मंत्री और अफसर छुट्टी मना रहे होंगे। और लोगों को तो छोड़ दें, अब तो लगभग मौनव्रत पर चलने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अपने ही गोल पोस्ट में गोल दागने की कोशिश करते हुए दिख रहे हैं। पिछले एक हफ्ते में उन्होंने दो ऐसे काम किए। सूचना के अधिकार पर एक सरकारी संबोधन में उन्होंने कहा कि इस अधिकार से ईमानदार और अच्छी नीयत वाले जनसेवकों का हौसला पस्त होने का एक खतरा है और इस कानून पर एक आलोचनात्मक नजर डालने की जरूरत है। उनकी इस बात पर सोनिया गांधी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की एक प्रमुख सदस्य अरूणा राय ने मनमोहन सिंह की धज्जियां उड़ाते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री का यह बयान पूरी तरह से गलत है। अरूणा राय इस कानून का मसौदा बनाने वाली प्रमुख व्यक्ति रही हैं और उन्होंने कहा कि सरकारी व्यवस्था को सूचना के अधिकार में नहीं उसके भीतर के भ्रष्टाचार ने प्रभावित करके रखा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को फिक्र तो उन मौतों की करनी चाहिए जो कि सूचना के अधिकार कार्यकर्ताओं को जगह-जगह मिल रही है, न कि नौकरशाहों की असुविधा की।
मनमोहन सिंह का यह बयान एक ऐसे वक्त आया है जब ईमानदारी और बेईमानी की बहस में उनकी सरकार की विश्वसनीयता आजादी के बाद से अब तक किसी भी सरकार की सबसे कम विश्वसनीयता है, और जब उनकी खुद की अगुवाई वाली केंद्र सरकार चोर, बेईमान और डकैत की तरह जनता की नजरों में गिर चुकी है, तब उस सूचना के अधिकार को कोसना हैरान करने वाला लगता है जिसने कि सारे बड़े भांडाफोड़ के पीछे अपना योगदान दिया है। फिर मानो गुपचुप रहने वाले मनमोहन सिंह के लिए अरूणा राय का कहना काफी नहीं था तो उन्होंने भाजपा के लाल कृष्ण आडवानी को यह नसीहत दे डाली कि वे अपनी रथयात्रा के दौरान कड़े या कड़वे शब्द कहने से बचें। अब राजनीति में कोई एक-दूसरे को कड़े या कड़वे शब्द से बचने को कहे, तो यह बात राजनीति से अनजान कोई इंसान ही कर सकता है। इसके जवाब में आडवानी ने जो कहा वह बहुत जायज बात थी कि उन्होंने तो महज इतना कहा था कि नेहरू से लेकर आज तक तमाम प्रधानमंत्री उन्होंने देखे हैं और मनमोहन सिंह उनमें से सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं। आडवानी ने पूछा कि इसमें कड़ी या कड़वी बात क्या है?
इस बात पर भी आज हम शायद यह संपादकीय नहीं लिखते लेकिन कल की एक दूसरी खबर और चौंकाने वाली है। अमरीका और पाकिस्तान के रिश्ते आज सबसे भयानक हालत में हैं। अमरीका ने आतंकियों की सरकारी मदद के लिए पाकिस्तान को बुरी तरह से घेर लिया है और अमरीकी सरकार के भीतर उस पाकिस्तानी आतंक पर भारी तमतमाए हुए तेवर हैं, जिस आतंक ने भारत पर हमले करके सैकड़ों जानें ले ली हैं। ऐसे मौके पर जब अमरीकी विदेश मंत्री पाकिस्तान पहुंच रही हैं और भारत की जनता सहित बाकी दुनिया भी यह देख रही है कि एक नाकामयाब लोकतंत्र पाकिस्तान को उसके अन्नदाता अमरीका की लताड़ कैसे पड़ती है तब भारतीय विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने बेमौके का यह बयान दिया है कि भारत अमरीका और पाकिस्तान जैसे दोस्त देशों के बीच कोई मतभेद देखना नहीं चाहता और इन दोनों को बातचीत की मेज पर अपने मतभेद निपटा लेना चाहिए जिससे कि दूसरे देशों, खासकर भारत के लिए दिक्कतें खड़ी न हों। भारतीय विदेश मंत्री का यह बयान हाल के महीनों में उनकी पाकिस्तान की एक खूबसूरत, नौजवान और नई विदेश मंत्री से कुछ बार की मुलाकातों के उत्साह से पैदा हुआ अधिक दिख रहा है, भारत की विदेश नीति की समझदारी से उपजा हुआ कम। सच तो यह है कि यह बयान भारत के राष्ट्रीय और विदेशी हितों के ठीक खिलाफ है और यह पाकिस्तानी आतंक के खिलाफ भारत के लगातार खड़े किए जा रहे एक ठोस मामले को किनारे करते हुए एक ऐसी नौबत ला रहा है जिसके चलते अमरीका पाकिस्तान के खिलाफ अधिक खफा होने से बच भी सकता है। अमरीका और पाकिस्तान के बीच मतभेद अगर अमरीकियों पर पाकिस्तानी मदद से होने वाले आतंकी हमलों की वजह से खड़े हुए हैं, तो उन पर नरमी बरतकर भारत का विदेश मंत्री क्या साबित कर रहा है? आज तो पाकिस्तान जब सरकार, सेना और खुफिया एजेंसियों की आतंक में भागीदारी के सुबूतों से घिरते चले गया है तब भारत को अपनी पूरी कूटनीतिक ताकत इस बात में लगा देनी थी कि पाकिस्तान का सबसे बड़ा फौजी मददगार अमरीका उसके सिर पर से अपना हाथ हटाए। एक तरफ पाकिस्तानी फौज और कुख्यात पाकिस्तानी फौजी खुफिया एजेंसी, आईएसआई, अमरीका के साथ एक टकराव का दंभ भरते हुए खड़े हैं, खुद अमरीकी विदेश मंत्री अभी कुछ घंटे पहले पाकिस्तान में वहां की सरकार को यह कह चुकी है कि आप अपने घर के पिछवाड़े में सांप पालकर यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह सिर्फ आपके पड़ोसी को डसेगा, ऐसे में भारत की पाकिस्तान के साथ हमदर्दी और नरमी हक्का-बक्का कर देने वाली है। अब तक पता नहीं क्यों भाजपा के भी किसी भूतपूर्व विदेश मंत्री का ध्यान इस पर नहीं गया है, लेकिन हम इसे मनमोहन सरकार का एक और आत्मघाती बयान मानते हैं जो पूरी तरह से भारत के लिए आत्मघाती है। एस.एम. कृष्णा इसके पहले भी कई किस्म की कूटनीतिक चूकें कर चुके हैं और अब तो जब प्रधानमंत्री कई किस्म के अवांछित बयान देना शुरू कर चुके हैं तो फिर बाकी मंत्रियों को तो मानो गलतियां और गलत काम करने का एक हक ही मिल जा रहा है।