संपन्न लोगों को हज-अनुदान क्यों?

18 अक्टूबर 20111
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह नोटिस जारी किया है कि वह वीआईपी कहे जाने वाले प्रभावशाली लोगों की हज यात्रा पर सबसिडी क्यों दे रही है? अल्पसंख्यक धर्मों के धार्मिक रीति-रिवाजों में सरकारी खर्च से अनुदान देने के भारत के संवैधानिक प्रावधान के चलते भारत के संपन्न मुसलमान भी हज जाने के लिए सरकारी अनुदान पा रहे हैं। हम सुप्रीम कोर्ट की इस आपत्ति से पूरी तरह सहमत हैं। पहले भी हम कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि धार्मिक कार्यक्रमों के लिए सरकारी पैसों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। कानून के कुछ जानकार लोगों का यह कहना है कि बहुसंख्यक धर्मों के लिए संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है लेकिन अल्पसंख्यक धर्मों के लोगों के लिए ऐसा इसलिए जरूरी है कि वे भारत में आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए भी हैं और बहुसंख्यक समाज की तरह वे अपने धार्मिक कार्यक्रम नहीं कर पाते।
जब कभी जनता के पैसों से किसी धर्म को बढ़ावा देने की बात आती है तो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले या धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करने वाले देश में राज करने वाली सरकारें अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधाराओं के मुताबिक या अपनी-अपनी चुनावी प्राथमिकताओं के मुताबिक खर्च करने में जुट जाती हैं। छत्तीसगढ़ में हम राजिम कुंभ के नाम पर सरकार का बहुत बड़ा खर्च होते देखते हैं और हिंदू धर्म के कार्यक्रम सरकारी खर्च पर इस राज्य में इतने अधिक होते हैं कि बाकी धर्मों के लोगों को एक शिकायत बनी ही रहती है। भारत की संवैधानिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों के धर्म के लिए सरकारी खर्च की जो बात रखी गई है उसमें यह फेरबदल करने की जरूरत है कि ऐसी कोई भी मदद सिर्फ उसी काम के लिए की जाए जो कि उस धर्म के बहुत गरीब लोगों के लिए जरूरी हो। गरीबी की रेखा के नीचे के किसी इंसान के लिए अगर सरकार हज जाने के लिए कुछ अनुदान देती है तो उसे एक बार समझा जा सकता है। लेकिन बाकी लोगों को, जिनके पास अपने खर्च से हज करने की ताकत है, उनको क्यों सरकार हज कराए? नतीजा यह होता है कि भाजपा के राज वाले छत्तीसगढ़ सहित शायद एक-दो और राज्यों में भी अब मानसरोवर की यात्रा के लिए हिंदुओं को (या शायद सभी को) अनुदान देना शुरू किया गया है। और यह अनुदान सभी आय वर्ग के लोगों को मिल रहा है। सरकार को धर्म से अपने-आपको अलग करना चाहिए। जो संपन्न लोग हैं उनको अपनी निजी आस्था के लिए, अपने निजी इलाज के लिए सरकारी मदद क्यों लेनी चाहिए?
दूसरी तरफ देश भर में सुप्रीम कोर्ट इस बात की निगरानी कर रहा है कि सार्वजनिक जगहों पर धार्मिक अवैध कब्जे और अवैध निर्माण सरकारें हटा रही हैं या नहीं? इसके बावजूद हम लगातार यह देख रहे हैं कि सड़कों की चौड़ाई बढ़ाने के लिए जहां मजबूरी में किसी धार्मिक स्थल को हटाना पड़े तो भी शासन-प्रशासन इससे बचकर रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं। जनता की जिंदगी को जहां धर्म के नाम पर गैरकानूनी काम मुश्किल कर रहे हैं, वहां भी नेता-अफसर डरे-सहमे दिखते हैं। सरकार के इस तरह दहशत में रहने से धार्मिक कट्टरता, आक्रामकता, हिंसा और बाकी किस्म के धार्मिक अपराध बढ़ते चलते हैं। ऐसी बातों से यह भी स्थापित होता है कि धर्म कानून से ऊपर है। और यह सोच आगे बढ़कर धार्मिक हमलों और दंगों तक पहुंचती है। सरकार की धर्मनिरपेक्षता का यह मतलब नहीं होना चाहिए कि वह सभी धर्मों की धर्मान्धता को एक बराबरी से बर्दाश्त करे।
दूसरी गड़बड़ी हम यह देख रहे हैं कि भारत में सरकारी कुर्सियों पर मजा करने वाले लोगों से लेकर सभी धर्मों के मठाधीशों तक, किसी की भी दिलचस्पी सुधारवाद और उदारवाद में नहीं दिखती। पे्रम के बजाय नफरत का जोड़ अधिक मजबूत मानकर ऐसे तमाम धार्मिक लोग अपने लोगों को किसी दूसरे अज्ञात, काल्पनिक या झूठे दुश्मन के खिलाफ डराते हुए जोड़कर रखते हैं। धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और जाति आधारित संगठन सुधार की बातें करते शायद ही दिखते हैं। यह सिलसिला इस देश को पत्थर युग की तरफ ले जाने की कोशिश करता है। सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा नोटिस से एक बहस शुरू होनी चाहिए और अल्पसंख्यक समुदायों के ताकतवर और संपन्न लोगों से सरकारी खर्च पर दी जाने वाली सारी रियायतें छीन लेनी चाहिए। यह बात हमारी उसी सोच से उपजी हुई है कि आरक्षण का फायदा भी मलाईदार तबके को नहीं मिलना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें