वे करें तो लीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला है...



20 अक्टूबर
संपादकीय
अन्ना हजारे के साथ इन दिनों जमकर खड़ी हुईं किरण बेदी को लेकर एक नया मामला अभी उजागर हुआ है कि वे जिन कार्यक्रमों में जाती हैं, उनके आयोजकों से विमान का सबसे महंगा भाड़ा लेती हैं लेकिन वे सस्ती टिकट पर सफर करती हैं। इस रिपोर्ट के छपने पर उन्होंने यह सफाई दी है कि ऐसी बचत को वे अपने एनजीओ में लगा देती हैं और बहुत से आयोजकों को यह बात मालूम भी रहती है। यह मामला 'छत्तीसगढ़Ó के पास कई महीने पहले आया था जब वे रायपुर के दो-तीन कार्यक्रमों में आकर लौटी थीं। लेकिन उस समय देश में अन्ना हजारे का आंदोलन जोरों पर था और इस अखबार ने सोच-समझकर उस समय इस रिपोर्ट को रोका था क्योंकि उसे छापने का एक असर अन्ना हजारे के आंदोलन को नुकसान पहुंचाना भी हो सकता था और उस समय जिन बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के मामले हवा में थे, उनके मुकाबले किरण बेदी का यह मामला उस वक्त अधिक चर्चा का हकदार नहीं था। लेकिन आज जब दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस ने इस बारे में पूरी रिपोर्ट छापी है तो उस समय से हमारे पास रखी हुई जानकारी की खबर भी हम बनाकर एक्सप्रेस की रिपोर्ट के साथ-साथ आज छाप रहे हैं। इस पूरे मामले को देश के अन्ना-समर्थक उनकी टोली पर एक और हमला मान रहे हैं लेकिन हमारा यह मानना है कि ईमानदारी और पारदर्शिता का झंडा उठाकर जो लोग पूरे देश को जगाने में लगे हैं, जो लोकतंत्र के सभी संगठनों को आरोपों के घेरे में खड़ा करके उनसे जवाब-तलब कर रहे हैं, उन लोगों को अपने सार्वजनिक कामकाज के बारे में जवाबदेह तो रहना ही चाहिए। इसलिए किरण बेदी से उनके सार्वजनिक हिसाब-किताब को लेकर अगर मीडिया कुछ पूछ रहा है, उनके अपने तरीके के हिसाब-किताब और किफायत को गलत मान रहा है तो इस पर उन्हें तो सफाई देनी ही चाहिए, किसी और को इसमें साजिश नहीं देखनी चाहिए। आखिर ये पूरे हिसाब-किताब तो किरण बेदी और उनके उस संगठन के हैं जो कि अपने सार्वजनिक कामकाज, कमाई और खर्च के लिए देश के कानून के तहत सरकार और जनता दोनों के प्रति जवाबदेह हैं। यह किरण बेदी का कोई निजी कारोबार तो है नहीं जिसके लिए कि वे सिर्फ टैक्स विभागों के प्रति जवाबदेह हों, इसलिए हम अभी उनकी सामने आई सफाई को काफी नहीं मानते और पूरे हिसाब-किताब के खुलासे की उम्मीद करते हैं।
उनका यह तर्क सही और सच शायद हो सकता है कि ऐसी बचत को वे अपने एनजीओ को दे देती हैं, और यह तर्क भी शायद सही और सच हो सकता है कि उनका एनजीओ समाजसेवा में इसे खर्च करता हो, लेकिन देश के कानून के मुताबिक दान या खर्च लेने और उसे खर्च करने के कुछ नियम बने हुए हैं। और देश के कानून और नियमों की जिन कसौटियों पर राजा, कलमाड़ी या अमर सिंह को कसा जा रहा है, वही कसौटियां तो नेहरू, गांधी या अन्ना-बाबा की टोलियों के लिए रहेंगी। दो अलग किस्म के कानून तो इस देश में नहीं हो सकते, जिनमें से एक उन लोगों पर लागू हो जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, और दूसरा उन लोगों पर लागू हो जो भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं। केन्द्र सरकार अगर अन्ना हजारे और उनके साथियों से नाखुश है तो वह उनके मामलों की जांच करा सकती है, किरण बेदी ने अपने सफर के लिए अगर पिछले बरसों में संस्थाओं से जरूरत से कई गुना पैसे लिए तो यह तो केन्द्र सरकार की किसी साजिश के तहत नहीं हो सकता, यह किरण बेदी का अपना फैसला था। अब अपने इस फैसले को नैतिक और वैधानिक साबित करने की जिम्मेदारी भी उनकी इसलिए है क्योंकि वे पूरे देश को नैतिकता और वैधानिकता की पटरियों पर चलाने के लिए रात-दिन एक कर रही हैं।
हमारे पास अपने समाचार की जो जानकारी है और जो इंडियन एक्सप्रेस ने छापा है उन दोनों को देखते हुए हमें किरण बेदी का यह फैसला नैतिक और सही तो नहीं लगता कि वे एक सफर का पैसा दो-दो संस्थाओं से मांगें, सस्ता सफर करके महंगा भाड़ा वसूलें। वे अपने एनजीओ में कोई नेक काम करती हो सकती हैं, लेकिन उन्हें बुलाने वाली संस्थाएं भी जब नेक काम करने वाली हों तो उनसे अधिक वसूली करके उसके अपनी मर्जी के इस्तेमाल का कोई नैतिक हक उन्हें हो सकता है? अन्ना हजारे नैतिकता की बात करते हुए एक बहुत ही बुजुर्ग और समझदार इंसान हैं। इसी टीम में कर्नाटक में हाईकोर्ट के जज रहे हुए और लोकायुक्त रहे हुए संतोष हेगड़े भी हैं। अब देखना यह है कि गांधीवादी नैतिकता और पारदर्शिता की कसौटी पर पूरे देश को रगड़ते हुए बैठे अन्ना हजारे किरण बेदी के इस काम को किस रंग का और कितना खरा सोना पाते हैं। दूसरी तरफ जस्टिस हेगड़े इस मामले को कानून और लोकायुक्त के पैमानों पर नाप सकते हैं कि यही काम अगर किसी नेता या अधिकारी ने किया होता तो एक जज या लोकायुक्त इस मामले को कैसा पाता।
जब सार्वजनिक जीवन में बहुत ऊंचे नैतिक मूल्यों को लेकर लोग आंदोलन करते हैं, बेईमानों के खिलाफ पूरे देश के सामने मसखरी के अंदाज में उनका मखौल उड़ाते हैं तो वे अपने आपको भी कांच के एक मर्तबान में जनता के सामने रखने को मजबूर रहते हैं। किरण बेदी के साथ भी आज यही दिक्कत है। उनका किया हुआ काम किसी साधारण इंसान के लिए तो बच निकलने का तर्क हो सकता था, लेकिन उन्होंने रामलीला मैदान से देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की खिल्ली उड़ाते हुए घूंघट काढ़ कर जिस तरह जनता का मनोरंजन किया था, उससे वे सार्वजनिक जीवन के प्रति कुछ अधिक जवाबदेह हैं। और हम उम्मीद करते हैं कि उनके जवाब देश के कानून, नियम और नैतिक मूल्यों, सबको चुप करा पाएं।
इस बारे में इंटरनेट पर कुछ लोगों का लिखा हुआ यह ट्वीट हमें दिलचस्प लगा- वे करें तो लीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला है...

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