खारिज कर दी गई कांग्रेस के आत्ममंथन का वक्त

17 अक्टूबर
संपादकीय
हरियाणा के हिसार उपचुनाव की खबर चर्चा में कुछ अधिक रही वरना देशभर में अलग-अलग राज्यों में होने वाले इक्का-दुक्का उपचुनाव इतनी बड़ी खबर नहीं बनते। लेकिन सभी राज्यों के करीब आधा दर्जन उपचुनावों के नतीजे पूरी तरह कांग्रेस के खिलाफ गए हैं। मतदाताओं ने एक किस्म से पंजे को मरोड़कर रख दिया है। इससे देशभर में कांग्रेस के खिलाफ चल रही एक लहर, एक जनमत दोनों का एक संकेत मिलता है। हम अकेले हिसार के नतीजों को महत्वपूर्ण इसलिए नहीं मानते क्योंकि वहां पर चुनाव शुरू होने के पहले ही कांग्रेस हारी हुई थी और कोई अगर यह सोचता है कि अन्ना हजारे की टोली के प्रचार से वहां जीती हुई कांग्रेस बाजी हार गई, तो ऐसा सोचना एक नासमझी होगी। लेकिन दो हिसाब से उपचुनावों के इन नतीजों को देखने की जरूरत है। एक तो यह कि कांग्रेस कैसे अपना घर सुधारे जो कि घरवाली के बाहर रहने से महीने दो महीने में ही उजाड़-बर्बाद हो गया है, दूसरी बात यह कि राजनीतिक चुनावों में जब गैर राजनीतिक ताकतें, संगठन और लोग किसी को जिताने और हराने पर अमादा हो जाते हैं तो उसे लोकतंत्र पर किस तरह का खतरा खड़ा हो सकता है। इन उपचुनावों से किसी भी प्रदेश या देश में कोई संतुलन नहीं बिगड़ रहा, लेकिन चुनावों को अपनी जिद्द से प्रभावित करने का सिलसिला आगे भी चल सकता है और वह अपनी बदनीयत तो पूरी कर सकता है, लोकतंत्र का कोई भला नहीं कर सकता।
यह दूसरी बात हम इसलिए कर रहे हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ झंडा लेकर उत्पात कर रही अन्ना टोली ने हरियाणा के चुनाव में कांग्रेस को हरवाने का काम नहीं किया है बल्कि वहां पर कांग्रेस के सबसे बुरे नाम वाले नेताओं में से एक, आयाराम गयाराम शब्दावली को जन्म देने वाले दलबदल के जन्मदाता भजनलाल के बेटे को जिताने का काम किया है। बिना किसी कारोबार के भजनलाल का बेटा आधे अरब का तो घोषित रूप से मालिक हैं और अघोषित की बात का अंदाज जनता खुद लगा सकती है। ऐसे में बेईमान और भ्रष्ट पार्टी को हराने का सारा नारा बोगस रहा और जैसा कि एक टीवी पत्रकार ने अभी-अभी इंटरनेट पर लिखा कि अरविंद केजरीवाल अपने खुद के शहर हिसार से लड़कर जीतकर बताते तो वह अन्ना टोली की जीत होती। हम पिछले दिनों में लगातार अन्ना हजारे के अभियान को उजागर करते आए हैं, भाजपा के भ्रष्टों के खिलाफ अन्ना हजारे की चुप्पी को कोई भी समझदार एक मौन व्रत नहीं मानेगा इसलिए उनकी चुनावी कोशिशों को हम कोशिश के बजाए साजिश मानने को बेबस हैं।
लेकिन दूसरी बात यह भी है कि कांग्रेस पार्टी को यह देखना है कि आज पूरे देश के तेवर उसके खिलाफ क्यों हैं? उसके अगुवाई वाले यूपीए गठबंधन की चोरी और डकैती को देखकर देश हक्का-बक्का है और ऐसी भ्रष्ट पार्टी के लोगों का बड़बोलापन देख-देखकर लोग और हक्का-बक्का हैं। उस वक्त तो सोनिया गांधी देश में नहीं थीं जब उनकी पार्टी के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने दाऊद इब्राहिम की डी कंपनी की तर्ज पर अन्ना हजारे की टोली को ए कंपनी कहा था और इतनी भद्दी जुबान का इस्तेमाल किया था कि बाद में उन्हें अदालती मुकदमे से बचने के लिए और प्रवक्ता का पद बचाने के लिए लिखकर अन्ना हजारे से माफी मांगनी पड़ी थी। लेकिन आज तो सोनिया गांधी बैठकर टीवी देखती होंगी जब उनके निजी सिपाही दिग्विजय सिंह अन्ना हजारे को आरएसएस का एहसानफरामोश करार दे रहे हैं, बयान के अलावा ऐसी चिट्ठी भी लिख रहे हैं। दिग्विजय सिंह के तर्क और उनके तीर वैचारिक आधार पर कोई जायज चाहे ठहरा ले, भारतीय संस्कृति और भारतीय उदारता के हिसाब से दिग्विजय के हमले बहुत ओछे और घटिया माने जा रहे हैं। अब सोनिया गांधी अगर इस पर चुप हंै तो हम इस चुप्पी को कर्नाटक के भाजपाई भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे की चुप्पी से अलग किस्म की चुप्पी कैसे मान लें?
कांग्रेस को यह भी सोचना चाहिए कि एक अर्थशास्त्री के प्रधानमंत्री रहते हुए आज पूरे देश में महंगाई को लेकर यह बुरा हाल क्यों हैं? गांधी और नेहरू के वारिस होने का दावा करने वाली इस पार्टी के इतने लोग और इतने साथी जेलों में क्यों हैं? इस पार्टी के इतने नेता बिना कारोबार भजनलाल और वाईएसआर कैसे बन जाते हैं? और क्या भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में कोई पार्टी अपने मुखिया और अपने प्रधानमंत्री दोनों की चुप्पी के साथ जनता का विश्वास जीत सकती है, उसे भरोसा दिला सकती है? इन उपचुनावों से कांग्रेस को आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन का एक मौका मिल रहा है और उसे अपना घर, अपनी भाषा और अपनी नीयत इन सबको सुधारना चाहिए वरना अगले आमचुनाव के नतीजे तो अभी से देश की दीवारों पर लिखे हुए दिख रहे हैं।

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