18 अक्टूबर 20111
मध्य-पूर्व एशिया में इस वक्त एक ऐतिहासिक घटना घट रही है। एक इजराइली सैनिक बरसों के बाद फिलस्तीन के गाजा वाले हिस्से से रिहा किया जा रहा है और इसके बदले इजराइल की जेलों से सरकार और वहां की अदालत दोनों की मंजूरी से करीब हजार फिलस्तीनी कैदी रिहा किए जा रहे हैं। सात बरस से यह इजराइली सैनिक फिलस्तीन के इस हिस्से पर काबिज और राज कर रहे वहां के हथियारबंद संगठन हमास का कैदी था। हमास इजराइल के साथ फिलस्तीन के ऐतिहासिक झगड़े को निपटाने में सैनिक कार्रवाई पर भरोसा रखने वाला संगठन है और उसे कुछ लोग एक आतंकी संगठन भी गिनते हैं। हमास के रिश्ते फिलस्तीन के दूसरे हिस्से, पश्चिम तट, के प्रधानमंत्री महमूद अब्बास से बहुत खराब हैं और अब्बास की बातचीत से समझौते की सोच को हमास खारिज करता है। पिछले दिनों अब्बास ने संयुक्त राष्ट्र संघ में फिलस्तीन को एक देश का दर्जा देने का जो प्रस्ताव रखा था, उस पर हमास असहमत था, और यह माना जा रहा है कि कैदियों की अदला-बदली का यह ताजा काम हमास ने अब्बास की संयुक्त राष्ट्र पहल का मुकाबला करने के लिए और अपने अस्तित्व को दिखाते चलने के लिए किया है। जो भी हो, फिलस्तीन और इसराइल के बीच सरहद के दोनों तरफ हथियारबंद हमलों और जवाबी हमलों में पिछले दशकों में अनगिनत मौतें हुई हैं और इजराइल की फौजी ताकत के मुकाबले गाजा के नौसिखिए लड़के बहुत अधिक जानें खो चुके हैं।
लेकिन हम उस मुद्दे की अधिक बारीकियों में जाने के बजाय कैदियों की अदला-बदली की इस पहल पर बात करना चाहते हैं। दो देश हों या एक देश के भीतर किसी सरकार या किसी संगठन के बीच का तनाव हो, उसे कम करने के जो-जो रास्ते हो सकते हैं, उनका इस्तेमाल होना चाहिए। भारत और पाकिस्तान के बीच कैदियों को लेकर आधी सदी से कई किस्म के तनाव चल रहे हैं। दोनों तरफ से दिल छू लेने वाली तकलीफदेह असली कहानियां आती ही रहती हैं। पाकिस्तान का एक मरणासन्न, बहुत बूढ़ा प्रोफेसर भारत में एक मामले में फंसकर यहां की जेल में मर जाने के करीब है, और ऐसी ही बहुत सी जिंदगियां पाकिस्तान की जेलों में कैद है। सआदत हसन मंटो अब नहीं रहे नहीं तो वे 'टोबा टेकसिंहÓ जैसी और बहुत सी कहानियां लिख पाते। दुनिया में आज सरहद के आरपार जो सबसे बुरे किस्म की दुश्मनी की मिसाल है वह इजराइल और फिलस्तीन की है। और अगर आज उनके बीच इंसानी जिंदगियों के लेन-देन का कोई रास्ता निकल सकता है, तो भारत और पाकिस्तान के बीच की दुश्मनी तो उनके मुकाबले कुछ भी नहीं है।
अब दूसरा सवाल यह उठता है कि सरहदों से परे भी, एक ही देश और एक ही जमीन पर, दो राजनीतिक दलों के बीच, अन्ना और यूपीए सरकार के बीच, कांगे्रस और भाजपा के बीच, कुकुरहाव किस्म की नोंक-झोंक के बिना क्या सभ्य, समझदार और जिम्मेदार इंसानों की तरह बातचीत नहीं हो सकती? आज मुलाकात की जहां जरूरत है वहां मुक्कालात के अलावा कुछ नहीं दिखता, और बहुत आम लोग भी जहां यह देखकर महसूस करते हैं कि अपने-आपको दिल-दिमाग वाला होने का दावा करने वाले इंसान, पूरी बेदिली से सांडों की तरह सिर टकराते हुए यह साबित करते हैं कि खोपड़ी की कड़ी खोल अधिक महत्वपूर्ण है बजाय भीतर के नरम दिमाग के। पहले भी हमने एक-दो बार यह लिखने की कोशिश की कि जो लोग अपने-आपको राजनीति, सरकार या समाज के नेता कहते हैं वे अपने अहंकार को छोड़कर व्यापक जनहित में समझदारी की बात करने को तैयार क्यों नहीं होते? हमारा ऐसा भरोसा है कि आने वाले बरसों में भारत की शब्दावली में जिद, बददिमागी और घमंड के समानार्थी शब्दों में केजरीवालिज्म जैसा एक शब्द और जुडऩे जा रहा है। कुछ अरसा पहले अन्ना को लेकर हमने कुछ शब्द सुझाए थे लेकिन अब पिछले महीने इस बात के गवाह हैं कि केजरीवाल अन्ना की चीनी मिट्टी के बरतनों की दूकान में उनके अपने पालतू सांड हैं। कैसे भारत की जहरीली हवा साफ हो और कैसे इस किस्म के पचीस-पचास बकवासी लोग देश के वक्त को बर्बाद करने के ओवरटाईम काम से बेदखल किए जाएं, और कैसे गांधी के नामलेवा इस लोकतंत्र में गांधीवाद और लोकतांत्रिक तरीके से आपस में बातचीत हो सके, इसके बारे में इन गिरोहबंदियों से आजाद होकर इस देश को व्यापक जनकल्याण के रास्ते निकालने चाहिए। उदार और खुली समझ और सोच रखने वाले लोगों को मनीष तिवारी, केजरीवाल जैसे लोगों को हाशिए पर धकेलने के लिए सार्वजनिक बहस छेड़कर कोशिश करनी चाहिए।
मध्य-पूर्व एशिया में इस वक्त एक ऐतिहासिक घटना घट रही है। एक इजराइली सैनिक बरसों के बाद फिलस्तीन के गाजा वाले हिस्से से रिहा किया जा रहा है और इसके बदले इजराइल की जेलों से सरकार और वहां की अदालत दोनों की मंजूरी से करीब हजार फिलस्तीनी कैदी रिहा किए जा रहे हैं। सात बरस से यह इजराइली सैनिक फिलस्तीन के इस हिस्से पर काबिज और राज कर रहे वहां के हथियारबंद संगठन हमास का कैदी था। हमास इजराइल के साथ फिलस्तीन के ऐतिहासिक झगड़े को निपटाने में सैनिक कार्रवाई पर भरोसा रखने वाला संगठन है और उसे कुछ लोग एक आतंकी संगठन भी गिनते हैं। हमास के रिश्ते फिलस्तीन के दूसरे हिस्से, पश्चिम तट, के प्रधानमंत्री महमूद अब्बास से बहुत खराब हैं और अब्बास की बातचीत से समझौते की सोच को हमास खारिज करता है। पिछले दिनों अब्बास ने संयुक्त राष्ट्र संघ में फिलस्तीन को एक देश का दर्जा देने का जो प्रस्ताव रखा था, उस पर हमास असहमत था, और यह माना जा रहा है कि कैदियों की अदला-बदली का यह ताजा काम हमास ने अब्बास की संयुक्त राष्ट्र पहल का मुकाबला करने के लिए और अपने अस्तित्व को दिखाते चलने के लिए किया है। जो भी हो, फिलस्तीन और इसराइल के बीच सरहद के दोनों तरफ हथियारबंद हमलों और जवाबी हमलों में पिछले दशकों में अनगिनत मौतें हुई हैं और इजराइल की फौजी ताकत के मुकाबले गाजा के नौसिखिए लड़के बहुत अधिक जानें खो चुके हैं।
लेकिन हम उस मुद्दे की अधिक बारीकियों में जाने के बजाय कैदियों की अदला-बदली की इस पहल पर बात करना चाहते हैं। दो देश हों या एक देश के भीतर किसी सरकार या किसी संगठन के बीच का तनाव हो, उसे कम करने के जो-जो रास्ते हो सकते हैं, उनका इस्तेमाल होना चाहिए। भारत और पाकिस्तान के बीच कैदियों को लेकर आधी सदी से कई किस्म के तनाव चल रहे हैं। दोनों तरफ से दिल छू लेने वाली तकलीफदेह असली कहानियां आती ही रहती हैं। पाकिस्तान का एक मरणासन्न, बहुत बूढ़ा प्रोफेसर भारत में एक मामले में फंसकर यहां की जेल में मर जाने के करीब है, और ऐसी ही बहुत सी जिंदगियां पाकिस्तान की जेलों में कैद है। सआदत हसन मंटो अब नहीं रहे नहीं तो वे 'टोबा टेकसिंहÓ जैसी और बहुत सी कहानियां लिख पाते। दुनिया में आज सरहद के आरपार जो सबसे बुरे किस्म की दुश्मनी की मिसाल है वह इजराइल और फिलस्तीन की है। और अगर आज उनके बीच इंसानी जिंदगियों के लेन-देन का कोई रास्ता निकल सकता है, तो भारत और पाकिस्तान के बीच की दुश्मनी तो उनके मुकाबले कुछ भी नहीं है।
अब दूसरा सवाल यह उठता है कि सरहदों से परे भी, एक ही देश और एक ही जमीन पर, दो राजनीतिक दलों के बीच, अन्ना और यूपीए सरकार के बीच, कांगे्रस और भाजपा के बीच, कुकुरहाव किस्म की नोंक-झोंक के बिना क्या सभ्य, समझदार और जिम्मेदार इंसानों की तरह बातचीत नहीं हो सकती? आज मुलाकात की जहां जरूरत है वहां मुक्कालात के अलावा कुछ नहीं दिखता, और बहुत आम लोग भी जहां यह देखकर महसूस करते हैं कि अपने-आपको दिल-दिमाग वाला होने का दावा करने वाले इंसान, पूरी बेदिली से सांडों की तरह सिर टकराते हुए यह साबित करते हैं कि खोपड़ी की कड़ी खोल अधिक महत्वपूर्ण है बजाय भीतर के नरम दिमाग के। पहले भी हमने एक-दो बार यह लिखने की कोशिश की कि जो लोग अपने-आपको राजनीति, सरकार या समाज के नेता कहते हैं वे अपने अहंकार को छोड़कर व्यापक जनहित में समझदारी की बात करने को तैयार क्यों नहीं होते? हमारा ऐसा भरोसा है कि आने वाले बरसों में भारत की शब्दावली में जिद, बददिमागी और घमंड के समानार्थी शब्दों में केजरीवालिज्म जैसा एक शब्द और जुडऩे जा रहा है। कुछ अरसा पहले अन्ना को लेकर हमने कुछ शब्द सुझाए थे लेकिन अब पिछले महीने इस बात के गवाह हैं कि केजरीवाल अन्ना की चीनी मिट्टी के बरतनों की दूकान में उनके अपने पालतू सांड हैं। कैसे भारत की जहरीली हवा साफ हो और कैसे इस किस्म के पचीस-पचास बकवासी लोग देश के वक्त को बर्बाद करने के ओवरटाईम काम से बेदखल किए जाएं, और कैसे गांधी के नामलेवा इस लोकतंत्र में गांधीवाद और लोकतांत्रिक तरीके से आपस में बातचीत हो सके, इसके बारे में इन गिरोहबंदियों से आजाद होकर इस देश को व्यापक जनकल्याण के रास्ते निकालने चाहिए। उदार और खुली समझ और सोच रखने वाले लोगों को मनीष तिवारी, केजरीवाल जैसे लोगों को हाशिए पर धकेलने के लिए सार्वजनिक बहस छेड़कर कोशिश करनी चाहिए।
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