दिल्ली में भाजपा की जमानत जब्त होने पर कुछ बातें...

10 फरवरी 2015
संपादकीय

यूं तो पूरा देश आज अरविन्द केजरीवाल की जीत की उम्मीद में तैयार बैठा था, और भाजपा के लोगों को भी ऐसी नौबत का अहसास था। लेकिन यह अंदाज किसी को नहीं था, चुनावी सर्वे करने वालों को भी नहीं था कि हाल ही मोदी की थमाई झाड़ू को लेकर दिल्ली की जनता भाजपा को बुहारकर फेंक देगी। कांगे्रस तो वैसे भी चुनाव से बाहर थी, लेकिन दिल्ली में आज नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, और भाजपा की जमानत ही जब्त हो गई। कुछ ही महीने पहले जिस दिल्ली में लोकसभा चुनाव में भाजपा को सात की सात सीटें मिली थीं, आज वहां विधानसभा की सत्तर सीटों में भी भाजपा को सात सीटें नहीं मिली हैं, और अभी तक के आंकड़े भाजपा को कुल तीन सीटें देते दिख रहे हैं। दूसरी तरफ कांगे्रस दिल्ली विधानसभा में अब सिर्फ दर्शकदीर्घा में बैठ सकती है, अगर उसके किसी नेता ने इतना साहस बचा हो तो। 
अब हम पहली नजर में उन वजहों को देखें जो कि भाजपा की ऐसी बुरी हार या कि केजरीवाल की, उनकी आम आदमी पार्टी की ऐसी अविश्वसनीय जीत के लिए जिम्मेदार हैं। दरअसल लोकतंत्र में जब चुनावों में दो पार्टियां आमने-सामने होती हैं, तो चुनावी नतीजे ऊपर की इन दो बातों में से किसी एक पर टिके हुए नहीं रहते, और दोनों ही बातों का मिला-जुला असर होता है। फिर भी हम यह देखें कि दिल्ली विधानसभा में एक बरस पहले मुख्यमंत्री बनकर आए, और 49 दिन में सरकार छोड़कर चले गए अल्पमत वाले केजरीवाल के पास इस एक बरस में ऐसा कोई करिश्मा करने की ताकत नहीं थी कि दिल्ली में इतिहास की सबसे बड़ी जीत उन्हें मिले। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के संपूर्ण एकाधिकार के तहत न सिर्फ दिल्ली के इस चुनाव में जो फैसले लिए, बल्कि पूरे देश में जिस तरह के तनाव के लिए भाजपा आज जिम्मेदार है, उसका भी नतीजा आज सुबह से चल रही वोटों की गिनती में सामने आया है। 
जिस तरह आखिरी हफ्तों में दिल्ली के भले या बुरे जैसे भी हों, पुराने भाजपा नेताओं को मानो राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान के तहत झाड़ू से घूरे पर डाल दिया गया, और जिस तरह राजनीति से बाहर की किरण बेदी को लाकर सीधे मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया गया, उसी दिन से भाजपा की जीत खतरे में पड़ गई थी। लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं थी। दिल्ली में कई जातियों और धर्मों के लोग बसते हैं, इन तमाम लोगों ने भाजपा के मंत्रियों, सांसदों, नेताओं, और दूसरे हिंदू संगठनों की भयानक हिंसक, साम्प्रदायिक, अवैज्ञानिक, और पाखंडी बातें पिछले आधे-एक बरस में सुनी हैं, उनसे मोदी-सरकार और उनकी पार्टी का भारी नुकसान हुआ है। दिल्ली में दसियों लाख नौजवान भी रहते, पढ़ते, और काम करते हैं। इस पीढ़ी के मन में पे्रम भी बसता है, और जिस तरह अचानक इस देश में लव जिहाद नाम का एक नारा गढ़कर धर्म, जाति, और पे्रम के खिलाफ हिंसा फैलाई गई, उससे नौजवान पीढ़ी के मन में हिकारत पैदा होना जायज और जरूरी था, और आज के नतीजों ने भाजपा की जो जमानत जब्त हुई है, उसके पीछे ऊपर की ये दोनों बातें भी हैं।
एक तीसरी बात जो कि छोटी सी है, लेकिन जिसकी चर्चा खूब हुई, और नुकसान का कुछ हिस्सा इस वजह से भी हुआ, वह नरेन्द्र मोदी का एक कोट था, जिस पर उनका नाम बुना गया था, जिसके बारे में चर्चा थी कि उसका कपड़ा दस लाख का होगा, और जिसके बारे में मोदी की तरफ से कोई सफाई नहीं आई थी, उससे भी मोदी की सादगी, किफायत, और ईमानदारी की तस्वीर को नुकसान पहुंचा। पूरी दुनिया ने उनके अपने नाम वाले कपड़े पहनने को आत्ममुग्ध होना बताया, और ऐन चुनाव प्रचार के बीच अमरीकी राष्ट्रपति के दिल्ली के लंबे कार्यक्रम से जो फायदा मोदी की पार्टी को होना था, उसे एक कोट ने ढांककर रख दिया। सार्वजनिक जीवन में उठने वाले ऐसे सवालों पर जननेता के पास चुप्पी का कोई विकल्प नहीं होता है, लेकिन मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक अपने पूरे दायरे की हिंसक बातों सहित दूसरे असुविधाजनक सवालों पर चुप्पी का सिलसिला जारी रखा है, और हमारा मानना है कि चुनावों के मौकों पर लोग ऐसी चुप्पी के अपने-अपने मतलब निकालते हैं। 
दिल्ली में भाजपा की हार बहुत ही बड़ी है, और इसके पीछे हम इन वजहों में से किसी एक को अकेले जिम्मेदार नहीं मानते। जिस तरह यूपीए की गलतियों और गलत कामों की वजह से मोदी और एनडीए को एक शून्य में धमाके के साथ दाखिल होने का मौका मिला था, कुछ वैसा ही शून्य दिल्ली में मोदी, भाजपा, और आसपास के लोगों के अहंकार की वजह से, हिंसक बातों की वजह से, साम्प्रदायिकता की वजह से बन गया था। और इस शून्य में अरविन्द केजरीवाल ठीक उसी तरह दाखिल हुए और समा गए, जिस तरह यूपीए राज के बाद मोदी लोकसभा में समा गए। 
हमारा ऐसा मानना है कि भाजपा के लिए इससे अच्छी कोई बात नहीं हो सकती थी कि उसके अपार बहुमत वाले राष्ट्रीय शासन के चलते हुए, पहले बरस में ही उसे ऐसी ठोकर लगी है जिसकी मलहम-पट्टी आज आसान है। आज का मौका मोदी और भाजपा के आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन का है, और इसमें अगर देश में भड़काई जा रही साम्प्रदायिक हिंसा, नफरत और पाखंड के बारे में सोचा जाएगा, उसे रोका जाएगा, तो भाजपा अगले आम चुनाव के पहले उबर भी सकती है। अगर इस पार्टी के लोगों ने अपने तौर-तरीके बदले और सहयोगी संगठनों को लोकतंत्र और इंसानियत की हत्या करने, और गोडसे को महिमामंडित करने से रोका, तो अगली लोकसभा में भाजपा की संभावना बच भी सकती है। ऐसा न करने पर चुप्पी और सोची-समझी अनदेखी से देश भर में भाजपा को इसी तरह का नुकसान हो सकता है क्योंकि कई जगहों पर स्थानीय और भरोसेमंद विकल्प सामने आ सकते हैं। दो बरस पहले तक किसने सोचा था कि अपने से बड़े आकार के कपड़े पहनने वाला अरविन्द केजरीवाल नाम का एक छोटा सा घोड़ा अश्वमेध यज्ञ के विशाल घोड़े को इतनी बुरी तरह पीछे छोड़ेगा।
अब आखिर में उस कांगे्रस पार्टी की बात की जाए जो कि अभी साल भर पहले तक दिल्ली में पन्द्रह बरस से काबिज थी। यह पार्टी जिस हद तक खत्म हो चुकी है, उसे देखते हुए उसकी चर्चा पर फिलहाल जगह बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। बाद में फिर कभी यह पार्टी प्रासंगिक होगी, तो फिर उस बारे में बात करेंगे।

छत्तीसगढ़ के बाद ओडिशा में भी छात्राएं मां बनीं

9 फरवरी 2015
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के सरगुजा के बाद ओडिशा के दो सरकारी छात्रावासों में स्कूली बच्चियों ने बच्चों को जन्म दिया। वहां की राज्य सरकार भी छत्तीसगढ़ की सरकार की तरह स्कूल और छात्रावास के प्रभारी अधिकारियों पर कार्रवाई कर रही है। लेकिन यह सोचें कि इन लड़कियों के मामले मां बनने की हद तक नहीं बढ़े होते, तो क्या हुआ होता? या तो स्कूल और हॉस्टल में इनका शोषण हुआ होगा, या फिर कम उम्र की इन नाबालिग बच्चियों का स्कूल के बाहर शोषण हुआ होगा या उनके किसी से संबंध बने होंगे। इन तमाम ही मामलों में एक बात साफ है कि स्कूलों और हॉस्टलों में बच्चों की जागरूकता का कोई ठिकाना नहीं है, और न ही समाज में उनको कोई हिफाजत हासिल है। इस मुद्दे पर हमने कुछ दिन पहले ही इसी जगह पर खुलासे से लिखा था, लेकिन आज फिर इस बात को इसलिए दुहरा रहे हैं क्योंकि जरूरत एक अधिक जागरूकता और अधिक असरदार कार्रवाई की है। 
आज देश को अंधेरे में डुबाकर रखने के काम में जुटे हुए दकियानूसी लोग हैं, जो कि लड़कियों को किसी भी तरह की जागरूकता से, बराबरी के हक से, हिफाजत से दूर रखना चाहते हैं। यह समाज जब कोई खबर बलात्कार तक पहुंचती है, या फिर किसी कम उम्र की गैरशादीशुदा लड़की के मां बनने तक पहुंचती है, तब उस पर कार्रवाई करता है, या चाहता है। सरकार का हाल भी कमोबेश ऐसा ही है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री घूम-घूमकर लड़कियों को बचाने की बात करते हैं, दूसरी तरफ देश भर में पांच बरस से भी कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार शुरू हो जाता है। इसके साथ-साथ सत्ता से जुड़े हुए अगर बलात्कारी हैं, तो उनको बचाने का काम भी शुरू हो जाता है। आज भी केन्द्र सरकार में एक मंत्री ऐसा है जिस पर बलात्कार का आरोप है, और ऐसा ही हाल कई दूसरे प्रदेशों के मंत्रिमंडलों में भी होगा। और दूसरी तरफ महिलाओं और बच्चों को बचाने के लिए संविधान के तहत जो राष्ट्रीय और प्रादेशिक आयोग बनाए जाते हैं, उनमें सत्ता से जुड़े नेता-अफसर ही मनोनीत होते हैं, जो कि अपने को कुर्सी पर बिठाने वाले लोगों के लिए किसी तरह की दिक्कत खड़ी करना नहीं चाहते। ऐसे में गिने-चुने मामले ही किसी धमाके के पहले कोई ध्यान खींच पाते हैं। समाज में और स्कूल-हॉस्टल में लड़कियां अगर गर्भवती न हो जाएं, अगर उनके साथ बलात्कार के बाद उनकी हत्या न हो जाए, तो उनके मामले न सुर्खियों में आते, और न चर्चा में आते। 
हमारा यह मानना है कि सरकारें तो धमाकों के बाद ही कुछ सुन पाती हैं। भगत सिंह के वक्त की अंग्रेज सरकार से लेकर आज की निर्वाचित और लोकतांत्रिक होने का दावा करने वाली सरकारों तक हाल इसी तरह का है। इसलिए समाज को अधिक सक्रिय होना पड़ेगा, और ऐसे हर मामले को सड़कों तक लाना पड़ेगा, सरकार और सत्ता को, ताकतवर तबकों को घेरना पड़ेगा, मीडिया का इस्तेमाल करना पड़ेगा, अदालतों तक जनहित याचिका लेकर जाना पड़ेगा, तब जाकर शायद सरकारें कार्रवाई करने को मजबूर होंगी। ये वही राज्य हैं, छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, जहां से बंधुआ मजदूर बनाकर बच्चे और औरत-मर्द बाहर ले जाए जाते हैं, मानव तस्करी होती है, लोगों को देह के धंधे के लिए मजबूर किया जाता है। ऐसे तमाम मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक आज चौकन्ना होकर देख रहा है, और राज्यों के सबसे बड़े अफसरों को उसने सीधे जवाबदेह ठहराया है। इसलिए इस लोकतंत्र में यह नहीं कहा जा सकता कि अदालतें भी नहीं सुनती हैं। आवाज उठाने की जरूरत है, लोगों को खुद उठने की जरूरत है, और आज अंग्रेज सरकारें नहीं हैं कि हथगोले फेंकने पड़ें, लोगों को मौजूद लोकतांत्रिक औजार उठाकर ऐसे जुर्म से निपटना चाहिए। 

Bat ke bat, बात की बात,

8 feb 2015

मांझी और बेदी के बीच एक सी कौन सी बात है?

संपादकीय
8 फरवरी 2015
बिहार में जनता दल यूनाइटेड के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के तेवर इस कदर बागी हैं, कि भाजपा को दिल्ली से कई गुना अधिक उम्मीद पटना में दिख रही है। कुछ महीने पहले नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रीय जीत के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी की दुर्गति की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद छोड़ा था, और उन्होंने या पार्टी ने मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था, जो कि वहां की महादलित जाति के हैं, और इससे जदयू ने एक राजनीतिक संदेश भी दिया था। लेकिन जाति की राजनीति में दिया गया यह संदेश इस तरह उल्टा पड़ेगा यह अंदाज किसी को नहीं था, उस भाजपा को भी नहीं जो कि नीतीश से तलाक के बाद मांझी के बयानों पर भी भारी हमलावर तेवर रखती थी। आज वही भाजपा मांझी पर डोरे डालकर नीतीश को नीचा दिखाने के लिए पटना से लेकर दिल्ली तक एक पैर पर खड़ी है, क्योंकि  एनडीए के भीतर मोदी को नीचा दिखाने का काम, या उनके खिलाफ खड़े होने का काम अकेले नीतीश कुमार ने किया था। तो अब कर्ज को सूद सहित चुकाने का वक्त आ गया है। 
राजनीति के बारे में गाली-गलौज की जुबान में कहा जाता है कि यह बहुत कुत्ती चीज होती है। इंसान अपने घटिया कामों के लिए जानवरों की मिसाल ढूंढते हैं, और ऐसी कहावतें या मुहावरे गढ़ते हैं जो उन जानवरों पर तो लागू होते ही नहीं हैं। ऐसी राजनीति के बारे में थोड़ी सी बेहतर जुबान में कहा जाता है कि इसमें बड़े अजीब-अजीब हमबिस्तर होते रहते हैं। बरसों तक बिहार में नीतीश की पार्टी जदयू का भाजपा के साथ शादीशुदा रिश्ता रहा, और वह इतना मजबूत था कि 2002 के गुजरात के दंगे भी उस रिश्ते पर खरोंच नहीं डाल पाए। अब पिछले बरस के आम चुनावों के पहले नीतीश कुमार की धर्मनिरपेक्षता की नींद टूटी, और वे मोदी की राष्ट्रीय लीडरशिप की संभावनाओं के खिलाफ खड़े हुए, और एनडीए से बाहर आए। अब यह बात सिद्धांतों की कसौटी पर कुछ अजीब रंग छोड़ती है कि 2002 से 2013 तक नीतीश को गुजरात दंगों में मोदी की भूमिका बुरी नहीं लगी, लेकिन उसके बाद गुजरात के दो-दो चुनाव जीत चुके मोदी देश की लीडरशिप के लायक नीतीश को नहीं लगे। 
खैर, आज का मुद्दा भाजपा के साथ जदयू के रिश्तों की नहीं है, बल्कि जदयू के घर के भीतर का है। बिहार की जातिवादी राजनीति में एक महादलित को मुख्यमंत्री के पद से हटाना अगर जदयू के लिए मुमकिन भी है, तो भी वह कुछ महंगा जुआ होगा। और जदयू की हालत उस अजगर सरीखी हो गई है जो कि इतना बड़ा जानवर निगल चुका है कि वह न पूरी तरह निगल पा रहा है, और न ही उगल पा रहा है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने मांझी की कही हुई बेदिमाग की बातों को लेकर एक से अधिक बार इसी जगह पर लिखा था कि ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाना न सिर्फ जदयू के लिए नुकसानदेह है, बल्कि इससे महादलित तबके की साख पर भी आंच आती है कि ऐसे तबके से ऐसे ही लोग आते हैं। एक तो दलितों को लेकर समाज के बाकी तबकों में बहुत बुरा पूर्वाग्रह बैठा हुआ है और उस पर जब मांझी जैसी खतरनाक बात बोलने वाले लोग आ जाते हैं, तो फिर वह पूर्वाग्रह सिर चढ़कर बोलने लगता है। लोगों को याद होगा कि जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष, और देश के सबसे समझदार नेताओं में से एक शरद यादव ने भी अपनी ही पार्टी के इस महादलित मुख्यमंत्री के खिलाफ नाराजगी में कुछ शब्द जातिगत आलोचना के कहे थे जिसे लेकर उनके खिलाफ पुलिस और शायद अदालत में भी शिकायत की गई है। 
किसी पार्टी के भीतर जब संगठन एक-दो लोगों की जेब में ही होता है, तो इस तरह की चूक होती है। जदयू में शरद यादव और नीतीश कुमार के बाद कोई तीसरा नेता सुनाई नहीं पड़ता है, और इसलिए एक ऐसे मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया गया था, जिसने हर किस्म की गैरजिम्मेदारी के सार्वजनिक बयान दिए थे। तकरीबन कुछ ऐसी ही हालत दिल्ली में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी को चुनने के मामले में हुई। आज वहां पर किरण बेदी की वजह से भाजपा की संभावनाओं को नुकसान के आसार लोगों को दिख रहे हैं। और किरण बेदी को भी भाजपा के भीतर एक-दो लोगों ने ही अचानक लाकर, दिल्ली के बड़े-बड़े पार्टी नेताओं के ऊपर उम्मीदवार बना दिया था। जब फैसला लेने का तरीका एक-दो लोगों तक ही सीमित रहता है, तो मांझी या बेदी जैसी गलतियां होती हैं। आजकल में जदयू के मामले पटना राजभवन से लेकर दिल्ली में प्रधानमंत्री के कमरे तक कोई मोड़ ले सकते हैं, लेकिन हम आज की बात को यहीं पर छोड़ रहे हैं कि फैसले लेने का तरीका अधिक लोकतांत्रिक और अधिक व्यापक बुनियाद पर टिका हुआ होना चाहिए। 

सरकार और समाज मिलकर बीमार-गरीब के लिए कुछ करें

संपादकीय
7 फरवरी 2015
छत्तीसगढ़ में ऐसे बच्चों के ऑपरेशन हुए हैं, जिनके होंठ कटे हुए थे, या जिनके तालू में जन्म से ही खामी थी। ऐसे बच्चे स्कूल से लेकर मोहल्ले तक एक सामाजिक तनाव झेलते हैं, और इससे उनके व्यक्तित्व का विकास बहुत बुरी तरह प्रभावित होता है। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि यहां रोटरी क्लब के बैनर तले व्हील चेयर पर चलने वाले डॉ. शरद दीक्षित बरसों तक यहां आकर इलाज करते थे और उन्होंने हजारों बच्चों को मुस्कुराहट लौटाई थी। अब सरकार ने इस तरह के कटे होंठ वाले बच्चों के अलावा दूसरे कई किस्म के ऐसे बच्चों के ऑपरेशन करवाए हैं, जिनको ऑपरेशन की जरूरत थी। और इनमें एक ऐसी बच्ची भी है जिसने अपनी तकलीफ से परेशान होकर कुछ अरसा पहले सरकार से इच्छा मृत्यु की इजाजत मांगी थी, ऐसी स्कूली बच्ची को आज मंच पर ऑपरेशन के बाद देखकर आंखें भर आती हैं। 
लोकतंत्र और जनकल्याणकारी सरकार का कोई मतलब नहीं है, अगर छोटे-छोटे बच्चों को सर्जरी की जरूरत हो, और परिवार, समाज, या सरकार से यह काम न हो पाए। तकलीफ के साथ जीने वाले और बड़े होने वाले बच्चे समाज के उस तरह काम भी नहीं आ पाते, जिस तरह सेहतमंद, खुश, और आत्मविश्वास से भरे हुए बच्चे आ सकते हैं। पिछले बरसों में हमने छत्तीसगढ़ में कुछ सामाजिक संगठनों के भी बड़े-बड़े कार्यक्रम देखे हैं जिनमें कहीं बच्चों के ऑपरेशन हुए, तो कहीं शारीरिक विकलांगता से तकलीफ पा रहे हर उम्र के लोगों के ऑपरेशन हुए। सरकार से अधिक ताकत ऐसे मामलों में समाज की होती है, और समाज के भीतर दान की भावना को बढ़ाने और उसके इस्तेमाल को संगठित करने की जरूरत रहती है। अगर दान का उपयोग करने वाले लोग भरोसेमंद हों, तो लोग दान देने भी लगते हैं। बड़े-बड़े समाजसेवी संस्थान लोगों के दान से खड़े होते हैं, अगर उनके पीछे के लोगों पर समाज का भरोसा होता है। इसलिए छत्तीसगढ़ में अलग-अलग समाज के लोगों को चाहें तो अलग-अलग, और चाहें तो एक साथ मिलकर कुछ बड़े काम करने चाहिए। और इनमें सबसे बड़ा काम गरीब-जरूरतमंद के इलाज का ही हो सकता है। 
हमने कुछ बरस पहले भी इसी जगह पर लिखा था कि कुछ धर्मों या जातियों के लोग ऐसे हैं जो कि छत्तीसगढ़ में उद्योग-व्यापार में खासे कामयाब हुए हैं। ऐसे लोगों को अपनी आस्था के किसी प्रतीक के नाम पर बड़े अस्पताल बनाने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि वे मेडिकल पढ़ाई से भी जोड़े जा सकें, और वहां पर गरीबों का मुफ्त या सस्ता इलाज भी हो सके। हम यहां पर रायपुर के एक उद्योगपति सुभाष अग्रवाल के नाम सहित जिक्र करना चाहेंगे जिन्होंने मेडिकल जांच का एक बड़ा केन्द्र अपने ही पैसों से शुरू किया है, और अपने से अधिक आर्थिक ताकत रखने वाले लोगों के सामने एक चुनौती पेश की है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपने साम्राज्य को बढ़ाने के बजाय अकेले ही इलाज या जांच के कोई केन्द्र बना सकते हैं, और किसी समाज के लोग मिलकर तो बहुत बड़े केन्द्र खड़े कर सकते हैं। 
छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था में अग्रवाल समाज, जैन समाज, सिक्ख समाज, और सिंधी समाज के व्यापारी-उद्योगपति सबसे आगे हैं। और इनमें से हर किसी की धार्मिक आस्था के प्रतीक भी हैं। उनके नाम पर इन समाजों के लोग बड़ी आसानी से सैकड़ों करोड़ के अलग-अलग अस्पताल-मेडिकल कॉलेज शुरू कर सकते हैं, और इनमें अलग-अलग खूबियां भी विकसित की जा सकती हैं। राज्य के मुख्यमंत्री भी इन समाजों के लोगों के साथ अलग-अलग बैठकर उनका उत्साह बढ़ा सकते हैं, और राज्य सरकार की तरफ से समाजसेवा के ऐसे काम के लिए जमीन भी मुफ्त में दे सकते हैं। सरकार और समाज को मिलकर हर गरीब के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की कोशिश करनी चाहिए, उसी में सत्ता की ताकत का सम्मान है, और उसी में आर्थिक संपन्नता का भी सम्मान है। 

भारत की साम्प्रदायिकता पर ओबामा के कहे का मतलब

संपादकीय
6 फरवरी 2015
अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत में भी अपने एक भाषण में धार्मिक विविधता जैसी एक बात कही थी। लेकिन अमरीका लौटने के बाद एक हफ्ते के भीतर उन्होंने भारत में साम्प्रदायिक तनाव को लेकर दो अलग-अलग मौकों पर दो बातें खुद होकर कही हैं, और इनमें से एक बात तो उन्होंने दलाई लामा की मौजूदगी में कही है। उन्होंने यह भी कहा कि गांधी आज होते तो भारत की धार्मिक असहिष्णुता को देखकर उन्हें सदमा लगता। इन बातों का एक अलग मतलब और महत्व है। भारत में पिछले कुछ महीनों में जिस तरह से मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक माहौल खड़ा किया जा रहा है, मुस्लिम और ईसाई धर्म से लोगों को हिन्दू बनाने का अभियान चलाया जा रहा है, उसे पूरी दुनिया गौर से देख रही है। दुनिया के अधिकतर देशों में मुस्लिम और ईसाई लोग बसे हैं, और करीब-करीब हर देश के राजकाज में इन दो धर्मों के लोग भी सबसे बड़ी संख्या में शामिल है। ऐसे में बराक ओबामा भारत आकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पीठ थपथपाकर जब लौटते हैं, तो अपने खुद के देश और बाकी दुनिया के बीच उन्हें इन निगाहों का सामना भी करना पड़ता है कि भारत में आक्रामक हो रही साम्प्रदायिकता के बारे में उनकी क्या सोच है? भारत के इस तनाव को अनदेखा करके अमरीकी राष्ट्रपति आसानी से नहीं रह सकते, इसलिए उन्हें अपनी सोच को, या कम से कम अपने बयान को, बिना किसी मौके की जरूरत के खुद होकर कहना पड़ा। 
इस बात से वह ताजा इतिहास भी याद पड़ता है जब गुजरात दंगों को लेकर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लंबे समय तक अमरीकी वीजा नहीं मिल पाया। और यह फैसला अमरीकी सरकार का नहीं था, अमरीका में धार्मिक स्वतंत्रता के लिए जो एक संवैधानिक आयोग बना हुआ है, उसने गुजरात में धार्मिक स्वतंत्रता न होने का तर्क देकर मोदी के वीजा का विरोध किया था। अब प्रधानमंत्री बनने के बाद इस हैसियत से नरेन्द्र मोदी अमरीका का वीजा बिना किसी अड़चन के पाकर वहां हो आए हैं, लेकिन अमरीका में धार्मिक स्वतंत्रता और बराबरी एक बड़ा मुद्दा है। इसके पहले कि बराक ओबामा को वहां आलोचना झेलनी पड़ती, उन्होंने हफ्ते भर में दो बयान देकर अपनी सरकार, अपने देश, और अपनी सोच सामने रख दी है। 
इधर भारत में भी बिना किसी ठोस हवाले के अचानक ऐसी खबरें आने लगती हैं कि भाजपा के सांसद साक्षी महाराज जैसे लोगों पर पार्टी कार्रवाई करने जा रही है। जिस हमलावर और हिंसक तेवर के साथ साक्षी महाराज जैसे लोग घोर साम्प्रदायिक नफरत की बातें करते हैं, उन पर आधा-आधा साल गुजर जाने पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई, और राजनीति के कई जानकारों का यह भी मानना है कि कश्मीर में भाजपा का खाता न खुलने के पीछे चुनाव के ठीक पहले उसके ऐसे नेताओं द्वारा मुस्लिमों के खिलाफ हिंसक-साम्प्रदायिक बयान देना रहा, जिनकी वजह से घाटी में भाजपा की संभावनाएं खराब हुईं। हम ओबामा की कही बातों से आज शुरुआत इसलिए कर रहे हैं कि खुद प्रधानमंत्री मोदी अमरीका को और बराक ओबामा को अपना दोस्त कहते हुए अमरीका से बहुत सी उम्मीदें कर रहे हैं, और दुनिया भर से वे भारत में पूंजीनिवेश की उम्मीद भी कर रहे हैं। उनकी अपनी पार्टी और उनके सहयोगी संगठनों के लोग जिस तरह से एक निहायत गैरजरूरी धर्मान्धता और कट्टरता के साथ हिंसा फैला रहे हैं, उनसे मोदी के ही सरकारी सपने चूर-चूर हो रहे हैं। देश का विकास और साम्प्रदायिकता इनमें से किसी एक चीज को ही चुनना होगा। यहां पर हम याद दिलाना चाहेंगे कि मोदी के एक सबसे वरिष्ठ मंत्री अरूण जेटली ने पिछले दिनों मीडिया से बातचीत में यह मंजूर किया कि गैरजरूरी साम्प्रदायिकता की वजह से सरकार के अच्छे काम खबरों से दूर हैं, और फिजूल की बातें खबरों में जगह पा रही हैं। हिन्दुस्तानी मीडिया के कहे हुए उस पर अमल करना मोदी को ठीक लगे या न लगे, उन्हें बराक ओबामा की कही हुई बात पर तो गौर करना चाहिए, और यह सोचना चाहिए कि कब तक वे विकास की अपनी सोच को साम्प्रदायिकता की वजह से खबरों में पिछड़ते हुए देखना चाहेंगे? 

सरकार के मुखिया के लड़ाकू तेवर से नसीहत

संपादकीय
5 फरवरी 2015

जॉर्डन के शासक किंग अब्दुल्ला की एक तस्वीर कुछ मिनट पहले ही इंटरनेट पर आई है जिसमें वे अपनी वायुसेना के पायलट की पोशाक पहने हुए दिख रहे हैं, और यह घोषणा की गई है कि आतंकियों पर आज होने वाले हवाई हमले में वे अपने लड़ाकू विमान में सहायक पायलट बनकर जा रहे हैं। लोगों को याद होगा कि दो दिन पहले इस्लामी आतंकियों ने जॉर्डन के उस फौजी पायलट को जिंदा जला दिया था, जिसे कि कुछ दिन पहले उन्होंने पकड़ा था। इसका वीडियो सामने आते ही जॉर्डन की सरकार का विचलित होना जायज था, और बाकी दुनिया भी इसे देखकर सहम गई थी। खासकर मुस्लिम देशों में यह सोच शुरू हो गई है कि इस्लाम के नाम पर जिस दर्जे की दहशतगर्दी की जा रही है उससे इस्लाम का कितना नुकसान हो रहा है, दुनिया भर में मुस्लिमों की कैसी तस्वीर बन रही है। मुस्लिम देश कई वजहों से एक-दूसरे के खिलाफ भी रहते हैं, लेकिन आज आतंक के चलते वे सब फिक्रमंद हैं कि बेकाबू आतंक कहां जाकर, कितना नुकसान करके थमेगा। 
लेकिन आज हम यहां यह चर्चा करना चाहते हैं कि जॉर्डन के शासक का यह फौजी अंदाज क्या कहता है। यह एक अलग बात है कि किसी देश के शासक को खुद लड़ाकू विमान में इस तरह जाना चाहिए, या नहीं। लेकिन यह बात अपनी जगह सही है कि जब देश पूरे का पूरा हिल गया है, विचलित है, तो देश के प्रमुख को कुछ तो ऐसा करना चाहिए जिससे कि जनता का भरोसा बचा रह सके। अब उसका एक तरीका हवाई हमले में शामिल होना है, लेकिन जॉर्डन से परे दुनिया में अधिक विकसित लोकतंत्र वाले जो देश हैं, वहां भी इस बात की जरूरत रहती है कि देश या प्रदेश के नेता मुसीबत के मौके पर, नाजुक मुद्दों पर कुछ बोलें, और देश की जनता का भरोसा कायम रखें। कुछ महीने पहले की बात है कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इबोला की शिकार होकर ठीक हुई एक नर्स को गले लगाकर उस तस्वीर को फैलने दिया था ताकि लोगों का भरोसा इलाज पर कायम हो सके। माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के मालिक बिल गेट्स ने अभी पखाने के पानी को साफ करके पीने लायक बनाने वाली एक मशीन को बढ़ावा देने के लिए उससे निकले हुए पानी को खुद पीकर दिखाया और वे तस्वीरें भी चारों तरफ फैलीं। 
हम भारत के संदर्भ में अगर बात करें तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक बहुत से ऐसे नेता हैं जो कि नाजुक मुद्दों पर बोलने से बचते हैं। अब जैसे भाजपा और उसके साथी संगठनों के लोग देश में जिस तरह घोर साम्प्रदायिक और हिंसक बातें कर रहे हैं, उनके खिलाफ अगर प्रधानमंत्री खुद कुछ नहीं कहते, तो इससे देश के लोगों का भरोसा हिलता है। दूसरी तरफ आज पूरे देश में साम्प्रदायिक संगठनों ने भारतीय संस्कृति को बचाने के नाम पर आने वाले वेलेंटाइन डे पर नौजवान पीढ़ी को हिंसक धमकियां देना शुरू कर दिया है, लेकिन इस बारे में कोई सरकार, कोई राजनीतिक दल कुछ नहीं कह रहे हैं। चुप्पी का मतलब मौन सहमति भी होता है, और जिन लोगों पर देश-प्रदेश में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है, उनकी चुप्पी का मतलब हिंसक-आतंकियों को बढ़ावा देना भी होता है। हम किसी एक पार्टी या एक प्रदेश की बात नहीं करते, अलग-अलग बहुत सी पार्टियों के राज में, बहुत से प्रदेशों में नफरत को जब बढ़ावा दिया जाता है, तब भी नेता चुप रहते हैं, और जब प्रेम पर हमला किया जाता है, तब भी नेता चुप रहते हैं। ऐसे में हमको लगता है कि वायुसेना के लड़ाकू विमान में सहायक पायलट बनकर जाने जैसा दुस्साहस भारत जैसे लोकतंत्र में गैरजरूरी है, लेकिन वैचारिक-आतंकियों पर संवैधानिक और प्रशासनिक कार्रवाई करने के लिए एक साहस जरूरी है। आने वाला हफ्ता देश भर में साम्प्रदायिक संगठनों के जुबानी और लाठियों के हमले देखने जा रहा है, और ऐसे में प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्रियों तक जो लोग भी इसको अनदेखा करेंगे, वे बिना कहे हुए भी ऐसी हिंसा को बढ़ावा देने के जिम्मेदार दर्ज होंगे।

समाज पर बालिग-मनोरंजन का हमला, और उसका इलाज

संपादकीय
3 फरवरी 2015
महाराष्ट्र सरकार मुंबई में हुए एक मनोरंजन-कार्यक्रम में अश्लीलता की जांच कर रही है। एक बड़े स्टेडियम जैसी जगह पर हुए इस कार्यक्रम में हजारों लोग मौजूद थे, और मंच पर हिन्दी फिल्मों के बड़े-बड़े, नामी-गिरामी कलाकार थे। इन लोगों ने इस तरह का वयस्क मनोरंजन पेश किया कि इंटरनेट पर इस कार्यक्रम का वीडियो वयस्क लोगों के लिए चेतावनी के साथ ही पोस्ट किया गया है। इसका कुछ हिस्सा हमने देखा है, और करण जौहर जैसा नामी-गिरामी फिल्मकार यह जानकारी देते हुए बहुत ही फूहड़ और गंदी जुबान में मजाक पेश करता है कि जिन लोगों को ऐसी बातों से दिक्कत हो, वे तुरंत छोड़कर जा सकते हैं। इसके अलावा वह दर्शकों में सामने बैठी अपनी मां की तरफ इशारा करते हुए कहता है कि कार्यक्रम खत्म होने के पहले उसकी मां को एम्बुलेंस में वहां से ले जाना होगा। इस पर कुछ लोगों ने इंटरनेट पर यह लिखा भी है कि अपनी मां के सामने बहुत ही गंदी बातें अगर करनी ही थीं, तो करण जौहर ने मंच तक आने की जहमत क्यों उठाई, उन्हें यह गंदगी अपने घर पर ही बिखेर देनी थी। महाराष्ट्र सरकार ने इंटरनेट पर मौजूद इस अश्लीलता के खिलाफ जांच शुरू की है।
भारत में वयस्क मनोरंजन की एक जरूरत है, और उसे पेश करने की तरकीब निकालने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक फिल्म और टीवी के पुरस्कार और सम्मान समारोह अश्लीलता से भरे रहते हैं, और टीवी पर कुछ कॉमेडी कार्यक्रम भी कम या अधिक वयस्क मजाकों से भरे रहते हैं। धीरे-धीरे घरों में बैठे हुए परिवार भी टीवी पर इन तमाम बातों को साथ-साथ देखने के आदी होते जा रहे हैं, और ऐसी सामाजिक मान्यता मिलने पर मनोरंजन बालिग से और अधिक बालिग होते चल रहा है। ऐसी हालत में सरकार कहां पर काबू की एक लकीर खींचेगी, यह कहना और समझना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन हमारा अपना अनुभव यह कहता है कि आज टीवी और फिल्म समारोहों का, और फिल्मों का बहुत सा वयस्क हिस्सा आम दर्शकों से हटाने की जरूरत है। दो अलग-अलग मतलबों वाली जुबान कहना भी अब पुरानी बात हो गई है। अब तो लोग सीधे-सीधे सेक्स से जुड़ी हुई बात कहने लगे हैं, और यह सिलसिला बढ़ते ही चल रहा है। 
एक तरफ तो यह देश वयस्क लोगों को डॉंस बार जैसे कम नुकसानदेह मनोरंजन देने के भी खिलाफ है, और कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने महाराष्ट्र में अदालती आदेश के खिलाफ कानून बनाकर भी इन्हें रोकने की कार्रवाई की थी। दूसरी तरफ गैरवयस्क और सभी उम्र के लोगों के लिए बिना रोकटोक वाले कार्यक्रम, टीवी प्रसारण, फिल्में, और चमकदार पत्रिकाओं को देखें, तो वे फूहड़ और बालिग मनोरंजन, उकसाने और भड़काने वाले कार्यक्रम-तस्वीरें पेश करने में जुटी हुई हैं। चूंकि हिन्दुस्तान में बालिग मनोरंजन की अलग से कोई जगह नहीं बनाई गई है, टीवी पर कोई बालिग चैनल नहीं है, इसलिए मनोरंजन की दुनिया आम चैनलों पर आम घंटों के बीच ही बालिग लोगों के लिए बनाए गए कार्यक्रम प्रसारित करती है। बालिग मनोरंजन की जरूरत को अनदेखा करने का पाखंड इस देश में नाबालिग लोगों पर भी बालिग मजाक, और जुबान थोप रहा है। कुछ महीने पहले सरकार को यह दखल देनी पड़ी थी कि एक फिल्म पुरस्कार समारोह का प्रसारण उसके वयस्क मजाकों की वजह से देर रात ही किया जाए। ऐसा सिलसिला खत्म होना चाहिए। जिस तरह वयस्क फिल्मों को अलग से सर्टिफिकेट मिलता है, उसी तरह वयस्क टीवी कार्यक्रमों का अलग से चैनल होना चाहिए, या आम चैनलों पर उनको अलग वक्त पर ताला खोलकर देखने तकनीक और सहूलियत का इस्तेमाल करना चाहिए। सरकार के लिए ऐसे फैसले आसान नहीं होंगे, क्योंकि सांस्कृतिक-नैतिकता के ठेकेदार तुरंत लाठी लेकर चढ़ बैठेंगे। लेकिन इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं है। सरकार एक सेंसरशिप लागू करके टीवी कार्यक्रमों और मंच के कार्यक्रमों पर कार्रवाई तो कर सकती है, लेकिन अब चैनल इतने बढ़ गए हैं, कि सरकार की निगरानी रखने वाली मशीनरी के काबू में कभी भी सारे चैनल, सारे प्रसारण नहीं आ सकते। 
समाज की बालिग-मनोरंजन की जरूरत को समझते हुए उसके लिए अलग रास्ता बनाना चाहिए, वरना बाकी परिवार पर ऐसा बालिग-मनोरंजन तो बरस ही रहा है। 

पुरानी शहरी बसाहट की दिक्कत, पीलिया और...

2 फरवरी 2015
संपादकीय

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जिस तरह से पीलिया फैल रहा है, और खुद सरकार की जांच में यह पता लग रहा है कि पानी के पाईप किस कदर सड़ गए हैं, और किस तरह वे गंदी नालियों के भीतर से होते हुए जाते हैं, उसकी तस्वीरें देखना डरावना रहता है। यह तो शहर के लोगों की मजबूरी है कि उनको म्युनिसिपल के नलों से आए हुए पानी पर जिंदा रहना होता है, लेकिन जिस तरह किसी भी सरकारी काम में घटिया सामान इस्तेमाल होता है, उसी तरह के पाईप नगर निगम से लगे होंगे, और वक्त के साथ वे सड़कर अब नाली के पानी के साथ लोगों के घड़ों तक पहुंच रहे हैं। 
लेकिन यह पूरा मामला सिर्फ सरकारी भ्रष्टाचार या लापरवाही का नहीं है। किसी भी शहर में विकास एक सदी में धीरे-धीरे होता है, और वह योजनाबद्ध नहीं होता है, तो इस तरह की कई दिक्कतें सामने आती हैं। नाली को लेकर भी, पानी को लेकर भी, बिजली के तारों को लेकर भी, और संकरी गलियों को लेकर भी। ऐसे में नए शहरों या नई बसाहट के फायदे दिखते हैं, जो कि रायपुर शहर के चारों तरफ काफी हद तक पुराने शहर से बेहतर हैं। सरकार की कॉलोनियां भी हैं, और बहुत से निजी कारोबारियों ने भी अच्छी बसाहट का काम किया है, और वहां पर रहते हुए लोग एक बेहतर जिंदगी गुजारते हैं। पुराने शहर से लेकर नई योजनाओं तक का यह सफर इसी तरह की दिक्कतों से हर जगह भरा रहता है, और सक्षम लोग इसीलिए नई कॉलोनियों में रहना पसंद करते हैं। लेकिन रायपुर जैसे शहर की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा पुरानी बस्तियों में और गलियों में रहता है, गरीबों की बस्तियां किसी योजनाबद्ध बसाहट का हिस्सा नहीं है, और इसीलिए ऐसी जगहों पर पिछले कुछ दशकों से सड़ते-सड़ते पानी के पाईप अब पानी के साथ बीमारियां भी पहुंचाने लगे हैं। 
सरकार के स्तर पर एक बात अच्छी यह हुई है कि आवास और पर्यावरण के नियम-कायदों को लेकर जागरूकता बढ़ी है, और नियमों का तोडऩा घटा है। खुद सरकार ने कई बस्तियों को बेहतर बनाने के लिए कहीं कमल विहार जैसी योजना बनाई, तो कहीं केन्द्र सरकार की योजनाओं के तहत गंदी बस्ती उन्मूलन का काम किया। इनकी वजह से लोगों की जिंदगी कुछ सुधरी तो है, लेकिन बहुत से लोग ऐसी बसाहट में रहते हैं, जहां पर अधिक सुधार की गुंजाइश नहीं है। इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि राज्य सरकार और स्थानीय संस्थाओं को आने वाली किसी भी बसाहट को बहुत ही योजनाबद्ध बनाना ही होगा, वरना कहीं पीलिया, तो कहीं गंदगी, और कहीं दूसरे किस्म के खतरे खड़े ही रहेंगे। आज छत्तीसगढ़ में एक बात यह भी अच्छी है कि निजी कॉलोनाइजर और बिल्डर बड़ी संख्या में चारों तरफ अपनी योजनाएं लाते हैं, और सरकार की एजेंसियां भी उनके मुकाबले लोगों के सामने सुविधाओं से संपन्न कॉलोनियां पेश करती जा रही हैं। हम पुरानी बसाहट की जिन दिक्कतों की बात कर रहे हैं वे कुछ हद तक तो ऐसी हैं कि उनका कोई आसान इलाज नहीं हो सकता। दुनिया की हर दिक्कत दूर नहीं की जा सकती, लेकिन उसके लिए अधिक से अधिक कोशिश जरूर की जा सकती है। आज भारत में शहरी लोगों को जितनी सहूलियतों की उम्मीद है, वह नई बसाहट में ही पूरी हो सकती है, और सरकार को ऐसे रिहायशी इलाकों का विस्तार करते हुए पुराने इलाकों पर से आबादी का बोझ घटाना चाहिए, तभी वहां पर थोड़ी-बहुत सुविधाएं बढ़ सकेंगी। 
आज की हमारी यह बात पीलिया के मौजूदा हमले से निपटने से परे की भी है, और लंबे समय में सरकार और जनता को किस तरफ बढऩा है, उसकी चर्चा हम आगे लोगों पर छोड़ रहे हैं। 

जब दिल्ली से नफरत का लावा फैलाने की कोशिश होती है, तब हौसला बंधाने वाली मिसालें

संपादकीय
1 फरवरी 2015
चारों तरफ बुरी खबरों के बीच कुछ अच्छी खबरें आती हैं, तो दिल को भरोसा होता है कि दुनिया खत्म होने नहीं जा रही है। अब यह मीडिया की मेहरबानी है कि बुरी खबरों को भली जगह मिलती है, और भली खबरों को कोई कोना मिलता है, तो मिल जाता है, वरना वह भी नहीं। अब ऐसी दो-चार खबरों को देखें जो कल और आज में ही सामने आई हैं। राजस्थान की एक खबर है कि वहां सरपंच का चुनाव लडऩे के लिए आस्ट्रेलिया में काम कर रहा एक प्रवासी भारतीय नौकरी छोड़कर वापिस आया है। लोगों को याद होगा कि इसी राजस्थान में एक महिला सरपंच छवि राजावत भी ऐसी है, जिसने मैनेजमेंट की बड़ी नौकरी छोड़कर सरपंच का चुनाव लड़ा और जीतकर वह गांव में काम कर रही है, और वह पहली एमपीए सरपंच है।
लेकिन ऐसी निजी पसंद से परे सामाजिक योगदान और दरियादिली की कुछ खबरें देखें, तो कल ही महाराष्ट्र के उल्हासनगर से खबर आई है कि वहां के मुस्लिम समाज ने एक हिन्दू जमीन-कारोबारी का आभार माना है क्योंकि दशकों से वहां का मुस्लिम समाज कब्रिस्तान की जमीन के लिए तरस रहा था, और हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी राज्य सरकार और म्युनिसिपल जमीन दे नहीं पा रहे थे, ऐसे में इस हिन्दू-कारोबारी ने मुस्लिम कब्रिस्तान के लिए अपनी खुद की दस करोड़ दाम वाली दो एकड़ जमीन दी है। एक दूसरी खबर महाराष्ट्र से ही यह आई है कि सूखे के शिकार वहां के बीड़-इलाके में एक मुस्लिम परिवार ऐसा है जो डेढ़-दो सौ गायों और उनके बच्चों के लिए चारे और पानी का इंतजाम कर रहा है। एक खबर गुजरात से आई है कि वहां किस तरह एक मुस्लिम व्यापारी छह सौ आदिवासी लड़कियों को पढ़ाई-लिखाई के लिए गोद लेकर उनका खर्च उठा रहा है। गुजरात के ही कच्छ में अमरीका से आकर एक स्पेनी महिला ने एक ऐसी बच्ची को गोद लिया है जिसे कोई मरघट के बाहर फेंक गया था, और कीड़े-मकोड़ों ने उस नवजात बच्ची की नाक काट ली थी। अब यह महिला इस बच्ची को कानूनी रूप से गोद लेकर अमरीका जा रही है जहां उसकी एक और दत्तक पुत्री के साथ यह बच्ची भी बड़ी होगी। उसकी पहली बेटी भी पांच बरस पहले हैदराबाद से गोद ली गई थी, और इन बच्चियों को बड़ा करते हुए यह महिला हिन्दुस्तानी त्यौहार मनाती है, और हिन्दी सीख रही है। एक तरफ तो अपनी खुद की बच्ची को लोग मरघट के बाहर फेंक गए, और दूसरी तरफ एक विदेशी महिला आकर उनको ले जा रही है, उसकी नाक की प्लास्टिक सर्जरी करवाकर उसे भारतीय संस्कृति के साथ ही बड़ा करने के लिए। अभी एक-दो हफ्ते पहले ही एक ऐसी खबर आई थी कि एक मुस्लिम परिवार ने पाल-पोसकर बड़ी की गई अपनी हिन्दू दत्तक पुत्री का कन्यादान किया और हिन्दू रीति-रिवाजों से ही उसकी शादी भी की। 
ऐसी मिसालों के जिक्र के बाद यहां पर हमारे लिखने के लिए अधिक कुछ बचता नहीं है। ये तमाम ऐसे लोग हैं जिनको न मंच मिलता है, न माला, न माईक, और न ही महत्व। लेकिन अपनी जिंदगी का एक मकसद मानकर ये लोग दूसरों के काम आते हैं, और इनके नेक काम ही इस महान देश में साम्प्रदायिक नफरत फैलाने वालों के मुंह पर जूता हैं। ऐसी मिसालों को महत्व के साथ दूर-दूर तक पहुंचाने की जरूरत इसलिए है कि बुरी बातें सिर चढ़कर बोलती हैं, तो लगता है कि चारों तरफ बुरा ही बुरा हो रहा है। भारत में तो जगह-जगह अलग-अलग धर्मों के लोग, अलग-अलग जातियों के लोग एक-दूसरे के लिए, एक-दूसरे की बिरादरी के लिए, एक-दूसरे के धर्म स्थानों के लिए सेवा करते हुए पूरी जिंदगी ही गुजार देते हैं। हर बरस कई ऐसी सच्ची कहानियां सामने आती हैं कि किस तरह एक मुस्लिम अकेले ही एक मंदिर की देखरेख कर रहा है, और किस तरह कहीं और एक हिन्दू परिवार किसी दरगाह की सफाई और चौकीदारी करने में लगा रहता है। ये लोग राजनीति से परे, राजधानियों से परे, चुनाव की हिंसा से परे, और समुदायों को बांटने साजिश से परे के आम लोग हैं, और ऐसी सच्ची कहानियां हर उस मौके पर याद रखने की जरूरत है जब दिल्ली से पूरे देश में नफरत का लावा फैलाने की कोशिश होती है।