पुरानी शहरी बसाहट की दिक्कत, पीलिया और...

2 फरवरी 2015
संपादकीय

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जिस तरह से पीलिया फैल रहा है, और खुद सरकार की जांच में यह पता लग रहा है कि पानी के पाईप किस कदर सड़ गए हैं, और किस तरह वे गंदी नालियों के भीतर से होते हुए जाते हैं, उसकी तस्वीरें देखना डरावना रहता है। यह तो शहर के लोगों की मजबूरी है कि उनको म्युनिसिपल के नलों से आए हुए पानी पर जिंदा रहना होता है, लेकिन जिस तरह किसी भी सरकारी काम में घटिया सामान इस्तेमाल होता है, उसी तरह के पाईप नगर निगम से लगे होंगे, और वक्त के साथ वे सड़कर अब नाली के पानी के साथ लोगों के घड़ों तक पहुंच रहे हैं। 
लेकिन यह पूरा मामला सिर्फ सरकारी भ्रष्टाचार या लापरवाही का नहीं है। किसी भी शहर में विकास एक सदी में धीरे-धीरे होता है, और वह योजनाबद्ध नहीं होता है, तो इस तरह की कई दिक्कतें सामने आती हैं। नाली को लेकर भी, पानी को लेकर भी, बिजली के तारों को लेकर भी, और संकरी गलियों को लेकर भी। ऐसे में नए शहरों या नई बसाहट के फायदे दिखते हैं, जो कि रायपुर शहर के चारों तरफ काफी हद तक पुराने शहर से बेहतर हैं। सरकार की कॉलोनियां भी हैं, और बहुत से निजी कारोबारियों ने भी अच्छी बसाहट का काम किया है, और वहां पर रहते हुए लोग एक बेहतर जिंदगी गुजारते हैं। पुराने शहर से लेकर नई योजनाओं तक का यह सफर इसी तरह की दिक्कतों से हर जगह भरा रहता है, और सक्षम लोग इसीलिए नई कॉलोनियों में रहना पसंद करते हैं। लेकिन रायपुर जैसे शहर की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा पुरानी बस्तियों में और गलियों में रहता है, गरीबों की बस्तियां किसी योजनाबद्ध बसाहट का हिस्सा नहीं है, और इसीलिए ऐसी जगहों पर पिछले कुछ दशकों से सड़ते-सड़ते पानी के पाईप अब पानी के साथ बीमारियां भी पहुंचाने लगे हैं। 
सरकार के स्तर पर एक बात अच्छी यह हुई है कि आवास और पर्यावरण के नियम-कायदों को लेकर जागरूकता बढ़ी है, और नियमों का तोडऩा घटा है। खुद सरकार ने कई बस्तियों को बेहतर बनाने के लिए कहीं कमल विहार जैसी योजना बनाई, तो कहीं केन्द्र सरकार की योजनाओं के तहत गंदी बस्ती उन्मूलन का काम किया। इनकी वजह से लोगों की जिंदगी कुछ सुधरी तो है, लेकिन बहुत से लोग ऐसी बसाहट में रहते हैं, जहां पर अधिक सुधार की गुंजाइश नहीं है। इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि राज्य सरकार और स्थानीय संस्थाओं को आने वाली किसी भी बसाहट को बहुत ही योजनाबद्ध बनाना ही होगा, वरना कहीं पीलिया, तो कहीं गंदगी, और कहीं दूसरे किस्म के खतरे खड़े ही रहेंगे। आज छत्तीसगढ़ में एक बात यह भी अच्छी है कि निजी कॉलोनाइजर और बिल्डर बड़ी संख्या में चारों तरफ अपनी योजनाएं लाते हैं, और सरकार की एजेंसियां भी उनके मुकाबले लोगों के सामने सुविधाओं से संपन्न कॉलोनियां पेश करती जा रही हैं। हम पुरानी बसाहट की जिन दिक्कतों की बात कर रहे हैं वे कुछ हद तक तो ऐसी हैं कि उनका कोई आसान इलाज नहीं हो सकता। दुनिया की हर दिक्कत दूर नहीं की जा सकती, लेकिन उसके लिए अधिक से अधिक कोशिश जरूर की जा सकती है। आज भारत में शहरी लोगों को जितनी सहूलियतों की उम्मीद है, वह नई बसाहट में ही पूरी हो सकती है, और सरकार को ऐसे रिहायशी इलाकों का विस्तार करते हुए पुराने इलाकों पर से आबादी का बोझ घटाना चाहिए, तभी वहां पर थोड़ी-बहुत सुविधाएं बढ़ सकेंगी। 
आज की हमारी यह बात पीलिया के मौजूदा हमले से निपटने से परे की भी है, और लंबे समय में सरकार और जनता को किस तरफ बढऩा है, उसकी चर्चा हम आगे लोगों पर छोड़ रहे हैं। 

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