मांझी और बेदी के बीच एक सी कौन सी बात है?

संपादकीय
8 फरवरी 2015
बिहार में जनता दल यूनाइटेड के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के तेवर इस कदर बागी हैं, कि भाजपा को दिल्ली से कई गुना अधिक उम्मीद पटना में दिख रही है। कुछ महीने पहले नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रीय जीत के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी की दुर्गति की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद छोड़ा था, और उन्होंने या पार्टी ने मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था, जो कि वहां की महादलित जाति के हैं, और इससे जदयू ने एक राजनीतिक संदेश भी दिया था। लेकिन जाति की राजनीति में दिया गया यह संदेश इस तरह उल्टा पड़ेगा यह अंदाज किसी को नहीं था, उस भाजपा को भी नहीं जो कि नीतीश से तलाक के बाद मांझी के बयानों पर भी भारी हमलावर तेवर रखती थी। आज वही भाजपा मांझी पर डोरे डालकर नीतीश को नीचा दिखाने के लिए पटना से लेकर दिल्ली तक एक पैर पर खड़ी है, क्योंकि  एनडीए के भीतर मोदी को नीचा दिखाने का काम, या उनके खिलाफ खड़े होने का काम अकेले नीतीश कुमार ने किया था। तो अब कर्ज को सूद सहित चुकाने का वक्त आ गया है। 
राजनीति के बारे में गाली-गलौज की जुबान में कहा जाता है कि यह बहुत कुत्ती चीज होती है। इंसान अपने घटिया कामों के लिए जानवरों की मिसाल ढूंढते हैं, और ऐसी कहावतें या मुहावरे गढ़ते हैं जो उन जानवरों पर तो लागू होते ही नहीं हैं। ऐसी राजनीति के बारे में थोड़ी सी बेहतर जुबान में कहा जाता है कि इसमें बड़े अजीब-अजीब हमबिस्तर होते रहते हैं। बरसों तक बिहार में नीतीश की पार्टी जदयू का भाजपा के साथ शादीशुदा रिश्ता रहा, और वह इतना मजबूत था कि 2002 के गुजरात के दंगे भी उस रिश्ते पर खरोंच नहीं डाल पाए। अब पिछले बरस के आम चुनावों के पहले नीतीश कुमार की धर्मनिरपेक्षता की नींद टूटी, और वे मोदी की राष्ट्रीय लीडरशिप की संभावनाओं के खिलाफ खड़े हुए, और एनडीए से बाहर आए। अब यह बात सिद्धांतों की कसौटी पर कुछ अजीब रंग छोड़ती है कि 2002 से 2013 तक नीतीश को गुजरात दंगों में मोदी की भूमिका बुरी नहीं लगी, लेकिन उसके बाद गुजरात के दो-दो चुनाव जीत चुके मोदी देश की लीडरशिप के लायक नीतीश को नहीं लगे। 
खैर, आज का मुद्दा भाजपा के साथ जदयू के रिश्तों की नहीं है, बल्कि जदयू के घर के भीतर का है। बिहार की जातिवादी राजनीति में एक महादलित को मुख्यमंत्री के पद से हटाना अगर जदयू के लिए मुमकिन भी है, तो भी वह कुछ महंगा जुआ होगा। और जदयू की हालत उस अजगर सरीखी हो गई है जो कि इतना बड़ा जानवर निगल चुका है कि वह न पूरी तरह निगल पा रहा है, और न ही उगल पा रहा है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने मांझी की कही हुई बेदिमाग की बातों को लेकर एक से अधिक बार इसी जगह पर लिखा था कि ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाना न सिर्फ जदयू के लिए नुकसानदेह है, बल्कि इससे महादलित तबके की साख पर भी आंच आती है कि ऐसे तबके से ऐसे ही लोग आते हैं। एक तो दलितों को लेकर समाज के बाकी तबकों में बहुत बुरा पूर्वाग्रह बैठा हुआ है और उस पर जब मांझी जैसी खतरनाक बात बोलने वाले लोग आ जाते हैं, तो फिर वह पूर्वाग्रह सिर चढ़कर बोलने लगता है। लोगों को याद होगा कि जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष, और देश के सबसे समझदार नेताओं में से एक शरद यादव ने भी अपनी ही पार्टी के इस महादलित मुख्यमंत्री के खिलाफ नाराजगी में कुछ शब्द जातिगत आलोचना के कहे थे जिसे लेकर उनके खिलाफ पुलिस और शायद अदालत में भी शिकायत की गई है। 
किसी पार्टी के भीतर जब संगठन एक-दो लोगों की जेब में ही होता है, तो इस तरह की चूक होती है। जदयू में शरद यादव और नीतीश कुमार के बाद कोई तीसरा नेता सुनाई नहीं पड़ता है, और इसलिए एक ऐसे मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया गया था, जिसने हर किस्म की गैरजिम्मेदारी के सार्वजनिक बयान दिए थे। तकरीबन कुछ ऐसी ही हालत दिल्ली में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी को चुनने के मामले में हुई। आज वहां पर किरण बेदी की वजह से भाजपा की संभावनाओं को नुकसान के आसार लोगों को दिख रहे हैं। और किरण बेदी को भी भाजपा के भीतर एक-दो लोगों ने ही अचानक लाकर, दिल्ली के बड़े-बड़े पार्टी नेताओं के ऊपर उम्मीदवार बना दिया था। जब फैसला लेने का तरीका एक-दो लोगों तक ही सीमित रहता है, तो मांझी या बेदी जैसी गलतियां होती हैं। आजकल में जदयू के मामले पटना राजभवन से लेकर दिल्ली में प्रधानमंत्री के कमरे तक कोई मोड़ ले सकते हैं, लेकिन हम आज की बात को यहीं पर छोड़ रहे हैं कि फैसले लेने का तरीका अधिक लोकतांत्रिक और अधिक व्यापक बुनियाद पर टिका हुआ होना चाहिए। 

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