संपादकीय
5 फरवरी 2015
जॉर्डन के शासक किंग अब्दुल्ला की एक तस्वीर कुछ मिनट पहले ही इंटरनेट पर आई है जिसमें वे अपनी वायुसेना के पायलट की पोशाक पहने हुए दिख रहे हैं, और यह घोषणा की गई है कि आतंकियों पर आज होने वाले हवाई हमले में वे अपने लड़ाकू विमान में सहायक पायलट बनकर जा रहे हैं। लोगों को याद होगा कि दो दिन पहले इस्लामी आतंकियों ने जॉर्डन के उस फौजी पायलट को जिंदा जला दिया था, जिसे कि कुछ दिन पहले उन्होंने पकड़ा था। इसका वीडियो सामने आते ही जॉर्डन की सरकार का विचलित होना जायज था, और बाकी दुनिया भी इसे देखकर सहम गई थी। खासकर मुस्लिम देशों में यह सोच शुरू हो गई है कि इस्लाम के नाम पर जिस दर्जे की दहशतगर्दी की जा रही है उससे इस्लाम का कितना नुकसान हो रहा है, दुनिया भर में मुस्लिमों की कैसी तस्वीर बन रही है। मुस्लिम देश कई वजहों से एक-दूसरे के खिलाफ भी रहते हैं, लेकिन आज आतंक के चलते वे सब फिक्रमंद हैं कि बेकाबू आतंक कहां जाकर, कितना नुकसान करके थमेगा।
लेकिन आज हम यहां यह चर्चा करना चाहते हैं कि जॉर्डन के शासक का यह फौजी अंदाज क्या कहता है। यह एक अलग बात है कि किसी देश के शासक को खुद लड़ाकू विमान में इस तरह जाना चाहिए, या नहीं। लेकिन यह बात अपनी जगह सही है कि जब देश पूरे का पूरा हिल गया है, विचलित है, तो देश के प्रमुख को कुछ तो ऐसा करना चाहिए जिससे कि जनता का भरोसा बचा रह सके। अब उसका एक तरीका हवाई हमले में शामिल होना है, लेकिन जॉर्डन से परे दुनिया में अधिक विकसित लोकतंत्र वाले जो देश हैं, वहां भी इस बात की जरूरत रहती है कि देश या प्रदेश के नेता मुसीबत के मौके पर, नाजुक मुद्दों पर कुछ बोलें, और देश की जनता का भरोसा कायम रखें। कुछ महीने पहले की बात है कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इबोला की शिकार होकर ठीक हुई एक नर्स को गले लगाकर उस तस्वीर को फैलने दिया था ताकि लोगों का भरोसा इलाज पर कायम हो सके। माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के मालिक बिल गेट्स ने अभी पखाने के पानी को साफ करके पीने लायक बनाने वाली एक मशीन को बढ़ावा देने के लिए उससे निकले हुए पानी को खुद पीकर दिखाया और वे तस्वीरें भी चारों तरफ फैलीं।
हम भारत के संदर्भ में अगर बात करें तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक बहुत से ऐसे नेता हैं जो कि नाजुक मुद्दों पर बोलने से बचते हैं। अब जैसे भाजपा और उसके साथी संगठनों के लोग देश में जिस तरह घोर साम्प्रदायिक और हिंसक बातें कर रहे हैं, उनके खिलाफ अगर प्रधानमंत्री खुद कुछ नहीं कहते, तो इससे देश के लोगों का भरोसा हिलता है। दूसरी तरफ आज पूरे देश में साम्प्रदायिक संगठनों ने भारतीय संस्कृति को बचाने के नाम पर आने वाले वेलेंटाइन डे पर नौजवान पीढ़ी को हिंसक धमकियां देना शुरू कर दिया है, लेकिन इस बारे में कोई सरकार, कोई राजनीतिक दल कुछ नहीं कह रहे हैं। चुप्पी का मतलब मौन सहमति भी होता है, और जिन लोगों पर देश-प्रदेश में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है, उनकी चुप्पी का मतलब हिंसक-आतंकियों को बढ़ावा देना भी होता है। हम किसी एक पार्टी या एक प्रदेश की बात नहीं करते, अलग-अलग बहुत सी पार्टियों के राज में, बहुत से प्रदेशों में नफरत को जब बढ़ावा दिया जाता है, तब भी नेता चुप रहते हैं, और जब प्रेम पर हमला किया जाता है, तब भी नेता चुप रहते हैं। ऐसे में हमको लगता है कि वायुसेना के लड़ाकू विमान में सहायक पायलट बनकर जाने जैसा दुस्साहस भारत जैसे लोकतंत्र में गैरजरूरी है, लेकिन वैचारिक-आतंकियों पर संवैधानिक और प्रशासनिक कार्रवाई करने के लिए एक साहस जरूरी है। आने वाला हफ्ता देश भर में साम्प्रदायिक संगठनों के जुबानी और लाठियों के हमले देखने जा रहा है, और ऐसे में प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्रियों तक जो लोग भी इसको अनदेखा करेंगे, वे बिना कहे हुए भी ऐसी हिंसा को बढ़ावा देने के जिम्मेदार दर्ज होंगे।

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