संपादकीय
7 फरवरी 2015
छत्तीसगढ़ में ऐसे बच्चों के ऑपरेशन हुए हैं, जिनके होंठ कटे हुए थे, या जिनके तालू में जन्म से ही खामी थी। ऐसे बच्चे स्कूल से लेकर मोहल्ले तक एक सामाजिक तनाव झेलते हैं, और इससे उनके व्यक्तित्व का विकास बहुत बुरी तरह प्रभावित होता है। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि यहां रोटरी क्लब के बैनर तले व्हील चेयर पर चलने वाले डॉ. शरद दीक्षित बरसों तक यहां आकर इलाज करते थे और उन्होंने हजारों बच्चों को मुस्कुराहट लौटाई थी। अब सरकार ने इस तरह के कटे होंठ वाले बच्चों के अलावा दूसरे कई किस्म के ऐसे बच्चों के ऑपरेशन करवाए हैं, जिनको ऑपरेशन की जरूरत थी। और इनमें एक ऐसी बच्ची भी है जिसने अपनी तकलीफ से परेशान होकर कुछ अरसा पहले सरकार से इच्छा मृत्यु की इजाजत मांगी थी, ऐसी स्कूली बच्ची को आज मंच पर ऑपरेशन के बाद देखकर आंखें भर आती हैं।
लोकतंत्र और जनकल्याणकारी सरकार का कोई मतलब नहीं है, अगर छोटे-छोटे बच्चों को सर्जरी की जरूरत हो, और परिवार, समाज, या सरकार से यह काम न हो पाए। तकलीफ के साथ जीने वाले और बड़े होने वाले बच्चे समाज के उस तरह काम भी नहीं आ पाते, जिस तरह सेहतमंद, खुश, और आत्मविश्वास से भरे हुए बच्चे आ सकते हैं। पिछले बरसों में हमने छत्तीसगढ़ में कुछ सामाजिक संगठनों के भी बड़े-बड़े कार्यक्रम देखे हैं जिनमें कहीं बच्चों के ऑपरेशन हुए, तो कहीं शारीरिक विकलांगता से तकलीफ पा रहे हर उम्र के लोगों के ऑपरेशन हुए। सरकार से अधिक ताकत ऐसे मामलों में समाज की होती है, और समाज के भीतर दान की भावना को बढ़ाने और उसके इस्तेमाल को संगठित करने की जरूरत रहती है। अगर दान का उपयोग करने वाले लोग भरोसेमंद हों, तो लोग दान देने भी लगते हैं। बड़े-बड़े समाजसेवी संस्थान लोगों के दान से खड़े होते हैं, अगर उनके पीछे के लोगों पर समाज का भरोसा होता है। इसलिए छत्तीसगढ़ में अलग-अलग समाज के लोगों को चाहें तो अलग-अलग, और चाहें तो एक साथ मिलकर कुछ बड़े काम करने चाहिए। और इनमें सबसे बड़ा काम गरीब-जरूरतमंद के इलाज का ही हो सकता है।
हमने कुछ बरस पहले भी इसी जगह पर लिखा था कि कुछ धर्मों या जातियों के लोग ऐसे हैं जो कि छत्तीसगढ़ में उद्योग-व्यापार में खासे कामयाब हुए हैं। ऐसे लोगों को अपनी आस्था के किसी प्रतीक के नाम पर बड़े अस्पताल बनाने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि वे मेडिकल पढ़ाई से भी जोड़े जा सकें, और वहां पर गरीबों का मुफ्त या सस्ता इलाज भी हो सके। हम यहां पर रायपुर के एक उद्योगपति सुभाष अग्रवाल के नाम सहित जिक्र करना चाहेंगे जिन्होंने मेडिकल जांच का एक बड़ा केन्द्र अपने ही पैसों से शुरू किया है, और अपने से अधिक आर्थिक ताकत रखने वाले लोगों के सामने एक चुनौती पेश की है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपने साम्राज्य को बढ़ाने के बजाय अकेले ही इलाज या जांच के कोई केन्द्र बना सकते हैं, और किसी समाज के लोग मिलकर तो बहुत बड़े केन्द्र खड़े कर सकते हैं।
छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था में अग्रवाल समाज, जैन समाज, सिक्ख समाज, और सिंधी समाज के व्यापारी-उद्योगपति सबसे आगे हैं। और इनमें से हर किसी की धार्मिक आस्था के प्रतीक भी हैं। उनके नाम पर इन समाजों के लोग बड़ी आसानी से सैकड़ों करोड़ के अलग-अलग अस्पताल-मेडिकल कॉलेज शुरू कर सकते हैं, और इनमें अलग-अलग खूबियां भी विकसित की जा सकती हैं। राज्य के मुख्यमंत्री भी इन समाजों के लोगों के साथ अलग-अलग बैठकर उनका उत्साह बढ़ा सकते हैं, और राज्य सरकार की तरफ से समाजसेवा के ऐसे काम के लिए जमीन भी मुफ्त में दे सकते हैं। सरकार और समाज को मिलकर हर गरीब के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की कोशिश करनी चाहिए, उसी में सत्ता की ताकत का सम्मान है, और उसी में आर्थिक संपन्नता का भी सम्मान है।

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