समाज पर बालिग-मनोरंजन का हमला, और उसका इलाज

संपादकीय
3 फरवरी 2015
महाराष्ट्र सरकार मुंबई में हुए एक मनोरंजन-कार्यक्रम में अश्लीलता की जांच कर रही है। एक बड़े स्टेडियम जैसी जगह पर हुए इस कार्यक्रम में हजारों लोग मौजूद थे, और मंच पर हिन्दी फिल्मों के बड़े-बड़े, नामी-गिरामी कलाकार थे। इन लोगों ने इस तरह का वयस्क मनोरंजन पेश किया कि इंटरनेट पर इस कार्यक्रम का वीडियो वयस्क लोगों के लिए चेतावनी के साथ ही पोस्ट किया गया है। इसका कुछ हिस्सा हमने देखा है, और करण जौहर जैसा नामी-गिरामी फिल्मकार यह जानकारी देते हुए बहुत ही फूहड़ और गंदी जुबान में मजाक पेश करता है कि जिन लोगों को ऐसी बातों से दिक्कत हो, वे तुरंत छोड़कर जा सकते हैं। इसके अलावा वह दर्शकों में सामने बैठी अपनी मां की तरफ इशारा करते हुए कहता है कि कार्यक्रम खत्म होने के पहले उसकी मां को एम्बुलेंस में वहां से ले जाना होगा। इस पर कुछ लोगों ने इंटरनेट पर यह लिखा भी है कि अपनी मां के सामने बहुत ही गंदी बातें अगर करनी ही थीं, तो करण जौहर ने मंच तक आने की जहमत क्यों उठाई, उन्हें यह गंदगी अपने घर पर ही बिखेर देनी थी। महाराष्ट्र सरकार ने इंटरनेट पर मौजूद इस अश्लीलता के खिलाफ जांच शुरू की है।
भारत में वयस्क मनोरंजन की एक जरूरत है, और उसे पेश करने की तरकीब निकालने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक फिल्म और टीवी के पुरस्कार और सम्मान समारोह अश्लीलता से भरे रहते हैं, और टीवी पर कुछ कॉमेडी कार्यक्रम भी कम या अधिक वयस्क मजाकों से भरे रहते हैं। धीरे-धीरे घरों में बैठे हुए परिवार भी टीवी पर इन तमाम बातों को साथ-साथ देखने के आदी होते जा रहे हैं, और ऐसी सामाजिक मान्यता मिलने पर मनोरंजन बालिग से और अधिक बालिग होते चल रहा है। ऐसी हालत में सरकार कहां पर काबू की एक लकीर खींचेगी, यह कहना और समझना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन हमारा अपना अनुभव यह कहता है कि आज टीवी और फिल्म समारोहों का, और फिल्मों का बहुत सा वयस्क हिस्सा आम दर्शकों से हटाने की जरूरत है। दो अलग-अलग मतलबों वाली जुबान कहना भी अब पुरानी बात हो गई है। अब तो लोग सीधे-सीधे सेक्स से जुड़ी हुई बात कहने लगे हैं, और यह सिलसिला बढ़ते ही चल रहा है। 
एक तरफ तो यह देश वयस्क लोगों को डॉंस बार जैसे कम नुकसानदेह मनोरंजन देने के भी खिलाफ है, और कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने महाराष्ट्र में अदालती आदेश के खिलाफ कानून बनाकर भी इन्हें रोकने की कार्रवाई की थी। दूसरी तरफ गैरवयस्क और सभी उम्र के लोगों के लिए बिना रोकटोक वाले कार्यक्रम, टीवी प्रसारण, फिल्में, और चमकदार पत्रिकाओं को देखें, तो वे फूहड़ और बालिग मनोरंजन, उकसाने और भड़काने वाले कार्यक्रम-तस्वीरें पेश करने में जुटी हुई हैं। चूंकि हिन्दुस्तान में बालिग मनोरंजन की अलग से कोई जगह नहीं बनाई गई है, टीवी पर कोई बालिग चैनल नहीं है, इसलिए मनोरंजन की दुनिया आम चैनलों पर आम घंटों के बीच ही बालिग लोगों के लिए बनाए गए कार्यक्रम प्रसारित करती है। बालिग मनोरंजन की जरूरत को अनदेखा करने का पाखंड इस देश में नाबालिग लोगों पर भी बालिग मजाक, और जुबान थोप रहा है। कुछ महीने पहले सरकार को यह दखल देनी पड़ी थी कि एक फिल्म पुरस्कार समारोह का प्रसारण उसके वयस्क मजाकों की वजह से देर रात ही किया जाए। ऐसा सिलसिला खत्म होना चाहिए। जिस तरह वयस्क फिल्मों को अलग से सर्टिफिकेट मिलता है, उसी तरह वयस्क टीवी कार्यक्रमों का अलग से चैनल होना चाहिए, या आम चैनलों पर उनको अलग वक्त पर ताला खोलकर देखने तकनीक और सहूलियत का इस्तेमाल करना चाहिए। सरकार के लिए ऐसे फैसले आसान नहीं होंगे, क्योंकि सांस्कृतिक-नैतिकता के ठेकेदार तुरंत लाठी लेकर चढ़ बैठेंगे। लेकिन इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं है। सरकार एक सेंसरशिप लागू करके टीवी कार्यक्रमों और मंच के कार्यक्रमों पर कार्रवाई तो कर सकती है, लेकिन अब चैनल इतने बढ़ गए हैं, कि सरकार की निगरानी रखने वाली मशीनरी के काबू में कभी भी सारे चैनल, सारे प्रसारण नहीं आ सकते। 
समाज की बालिग-मनोरंजन की जरूरत को समझते हुए उसके लिए अलग रास्ता बनाना चाहिए, वरना बाकी परिवार पर ऐसा बालिग-मनोरंजन तो बरस ही रहा है। 

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