छोटी सी बात


16 अक्टूबर
अगर इंटरनेट तक आपकी पहुंच है, और फिर भी आप वहां किसी जानकारी को तलाशने के बजाय किसी व्यस्त व्यक्ति से उसे पूछते हैं, तो यह ज्यादती है। पहले तलाश कर लें, जब कहीं न मिले, तो फिर लोगों को परेशान करें।

कमल के भीतर के कांटे

16 अक्टूबर 2011
संपादकीय
भारतीय जनता पार्टी के हमलावर तेवर अब एकदम से बचाव की नौबत में आ गए हैं। और इसकी वजह कर्नाटक में कल पिछले भाजपाई मुख्यमंत्री का भ्रष्टाचार गिरफ्तार होना भर नहीं है, वह तो लंबे समय से तय माना जा रहा था, उसकी बहुत सी वजहें हैं। पिछले कुछ हफ्तों में भाजपा पर न तो अपनी खुद की लीडरशिप की लगाम दिख रही और न ही इस पार्टी पर लगाम रखने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बेमौसम, बेजरूरत के जलसे की तरह अपने साम्राज्य में एक शाही उपवास रखा और देश भर से भाजपा की नेताओं को वहां या तो पहुंचना पड़ा या उन्हें उनको बुलवा लिया। इस आयोजन को लेकर और इसके साथ-साथ एक राष्ट्रीय नेता के रूप में, भावी संभावित प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के रूप में मोदी की आमद संघ से लेकर भाजपा तक हर कहीं खलबली खड़ी कर गई। यह बात भी ध्यान देने की रही कि गुजरात के संघ परिवार के कुछ संगठन और बहुत से नेता मोदी से अपने लंबे समय से चले आ रहे परहेज को जारी रखते हुए मोदी के शाही उपवास से दूर रहे और इससे हिंदू ताकतों के बीच एक दरार और खुलकर सामने आई। लेकिन भाजपा का धर्मसंकट महज इतने से नहीं निपट गया। चुनाव अभी दूर हैं, एनडीए के साथियों का मिजाज उस आने वाले बरसों बाद के चुनाव के वक्त कैसा होगा इसकी अटकल लगाना आज आसान नहीं है लेकिन मोदी की, एकला चालो रे,   इस कार्रवाई से देश भर में यह बात उभरकर खड़ी हो गई कि मोदी भाजपा के भीतर रहते हुए भी भाजपा से बड़े या तो सचमुच हैं, या फिर वे अपने-आपको ऐसा साबित कर रहे हैं। दूसरी बात यह साबित हुई कि मोदी और लालकृष्ण आडवानी के बीच का तालमेल पार्टी के व्यापक हितों से परे का और गड़बड़ है। लेकिन मोदी कांड निपट पाता उसके पहले ही आडवानी ने रथयात्रा का ऐलान अपने स्तर पर ही कर दिया, जिसे कि बाद में जाकर पार्टी को अपना ठप्पा देना पड़ा। ये सारी खबरें भाजपा के भीतर के सत्तासंघर्ष की खबरें सामने लाती रहीं, और एक निहायत ही गैरजरूरी बहस छिड़ गई कि भाजपा का अगला प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी कौन होगा?
मानो इतना काफी नहीं था, और आडवानी की भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा के मध्यप्रदेश पहुंचने के पहले ही, मध्यप्रदेश की एक आग उगलती भाजपाई नेता उमा भारती ने वाराणसी में यह शिगूफा छोड़ दिया कि आडवानी अगले प्रधानमंत्री होंगे। इस बात को उन्होंने कई तरह से घुमा-फिराकर मजबूती से सामने रखा और भाजपा के आडवानी से एक पीढ़ी नीचे के साठे पे पाठे लोग बेचैन हो गए कि क्या 2014 में भी उनके नाम पर भाजपा का यह चुस्त-दुरूस्त, सेहतमंद बरगद छाया रहेगा? इसलिए जब सतना में भाजपा के एक नेता आडवानी की यात्रा की बेहतर रिपोर्टिंग के लिए मीडिया को नगद रिश्वत देते कैमरों पर कैद हुए, और पार्टी से निलंबित किए गए तो साजिशों की कल्पना करने वाले लोगों को यह भी लगा कि क्या भाजपा के भीतर के आडवानी विरोधियों ने ही मिलकर उनकी यह ताजा फजीहत खड़ी नहीं की है? लेकिन मानो इतना कुछ काफी नहीं था इसलिए ऐसे ही वक्त कर्नाटक से भाजपा के लिए रूका हुआ एक सदमा बैंड बजाते पहुंचा कि वहां पर भाजपा की सरकार के संस्थापक और पार्टी के सबसे बड़े नेता, भूतपूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा को अदालत ने गिरफ्तार करवाकर जेल भेज दिया। देश के जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ आडवानी एक जनचेतना यात्रा निकालकर प्रधानमंत्री पद की अटकलें बढ़ाते चल रहे हैं, वही भ्रष्टाचार सतना से लेकर बेंगलुरू तक बांस की ऊंची गेड़ी पर चढ़कर-चलकर उनकी यात्रा की राह पर खबरें गढ़ रहा है। दूसरी तरफ गुजरात के मुख्यमंत्री लगातार इंटरनेट पर अपने-आपको और अपने राज्य को भ्रष्टाचारमुक्त, भारी कामयाब साबित करते हुए अपना बुत पार्टी से बहुत ऊंचा खड़ा करते चल रहे हैं।
यह सोचना मुश्किल है कि भाजपा के भीतर के इन दो बड़े नेताओं के ऐसे दो बड़े जलसे करने की क्या जरूरत थी जिनको पार्टी ने घोषित नहीं किया था और जिन्हें इन दोनों ने अपने-अपने बूते खुद ही तय किया, खुद ही मुनादी की और बाद में पार्टी जाकर एक बेबस और मजबूर की तरह इनसे जुड़ी। ये दोनों ही कार्यक्रम ऐसे वक्त पर हुए या घोषित हुए जब पार्टी के एक, इन दोनों से बहुत छोटे, नेता भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी एक ऑपरेशन के बाद आराम पर थे। हम भाजपा की इस नौबत का विश्लेषण करते हुए किसी भी बात का अतिसरलीकरण करना नहीं चाहते और न ही कूदकर किसी नतीजे पर पहुंचना नहीं चाहते, लेकिन यह बात साफ है कि आडवानी और मोदी इन दोनों के इन जलसों में भाजपा को ताकतवर बनाने के बजाय उसके भीतर की दरारों को और गहरा कर दिया और उस पर रौशनी का घेरा भी डालकर देश भर के सामने इस पार्टी की ऐसी तस्वीर रखी कि इसके नेता प्रधानमंत्री बनने के लिए उतावले हो रखे हैं। देश में, और भाजपा में, आज यह नौबत सूत न कपास, जुलाहों में ल_मल_ा जैसी तस्वीर पेश कर रही है और इससे भाजपा का भला कुछ भी नहीं हो रहा।
यह नौबत भाजपा के भीतर अध्यक्ष नितिन गडकरी की उदारता है, या कमजोर पकड़ है, यह तो बाद की बात है, पहली बात तो यह है कि प्रधानमंत्री के पद को लेकर अगर इस पार्टी मेें बावलेपन का संक्रमण इसी तरह बढ़ेगा तो एनडीए के भीतर भी इसकी फजीहत बढ़ेगी और इस पार्टी, इस गठबंधन की संभावनाएं घटेंगी।

छोटी सी बात

15 अक्टूबर
जो लोग अखबारों को पन्नों से गिनकर उनकी अहमियत आंकते हैं, वे पढऩे वाले नहीं, तौलने वाले होते हैं। अच्छा पढऩे, और आसपास के लोगों के पढ़ाने में दिलचस्पी लें। इसी से दुनिया बेहतर हो जाएगी। अच्छे अखबार, अच्छी पत्रिकाएं और अच्छी किताबें खत्म हो जाएं, तो दुनिया बुरी ही बच जाएगी? अच्छे और बुरे में फर्क करना सीखें।

माया-प्रतिमा के इर्दगिर्द सलाखों का खर्चा कहां से आएगा?

15 अक्टूबर
उत्तरप्रदेश में मायावती ने दलित अधिकारों और उनके बढ़ावे के नाम पर एक ऐसा घोर अश्लील और हिंसक काम किया है जिसकी मिसाल चापलूसी पर जिंदा रहने वाली कांगे्रस जैसी पार्टी में भी नहीं मिलती और भारत की किसी दूसरी पार्टी में भी नहीं मिलती। करीब सात सौ करोड़ की लागत से उन्होंने उत्तरप्रदेश और दिल्ली की सरहद पर एक ऐसा स्मारक खड़ा किया है जिसे वे दलित प्रेरणा स्थल कह रही हैं। लेकिन इसमें देश के सबसे प्रमुख दलित नेता डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर, मायावती की सत्तारूढ़ पार्टी के संस्थापक और मायावती को यहां तक पहुंचाने वाले कांशीराम के साथ-साथ मायावती ने अपनी खुद की भी वैसी ही आसमान की ओर खड़ी, बड़ी सी प्रतिमा बनवाई है जिसके लिए सरकारी खजाने से रकम निकली। कुछ लोगों का यह मानना है कि भारत में सदियों से कुचले जाते रहे दलित समाज के लोगों के हाथ जब सत्ता आती है तो वे अपने पुरखों के जख्मों पर इसी किस्म का महंगा मरहम लगाने का काम कर बैठते हैं। हो सकता है कि मायावती के मन में भारत की, हिंदू समाज की मनुवादी जाति व्यवस्था के खिलाफ इसी किस्म का एक आक्रोश हो और वे प्रतिमाएं, वहां पर आसपास कोई छत्तीस एकड़ जमीन पर बनने वाला पार्क इसी किस्म की एक सोच का नतीजा हो लेकिन क्या लोकतंत्र में एक गरीब प्रदेश की जनता के हक को सत्तारूढ़ पार्टी अपने चुनाव चिन्ह हाथियों की प्रतिमाओं से इस तरह भर सकती है?
यह बात अधिक चुभने वाली तब हो जाती है जब इसी उत्तरप्रदेश में इसी दिन अदालत राज्य सरकार को यह नोटिस जारी करती है कि वहां बीमारी से मारे गए सैकड़ों बच्चों की मौतों के बारे में सरकार जवाब दे। यह उत्तरप्रदेश देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक है। और जब इसी राज्य में समाजवादी पार्टी मायावती से अपनी राजनीतिक कड़वाहट के चलते यह कहती है कि माया के सत्ता से हटने के बाद जनता इन प्रतिमाओं को उखाड़ फेंकेगी, तो यह बात हमें तर्कसंगत और न्यायसंगत लगती है। पिछली चौथाई सदी का दुनिया का इतिहास है कि किस तरह लेनिन और स्तालिन की प्रतिमाएं उखाड़कर फेंकी गईं, और किस तरह सद्दाम हुसैन की प्रतिमा को गिराकर लोग उस पर नाचे। हम इन तमाम मामलों की सीधे-सीधे कोई तुलना नहीं कर रहे लेकिन अपने जीते जी, अपने हाथों, जनता के पैसों से, भूख-बीमारी-कुपोषण से मरते हुए बच्चों की जिंदगी की कीमत पर अगर कोई नेता अपनी कांसे की प्रतिमाएं बनवाकर सजावट में सात सौ करोड़ रूपए खर्च करती है तो हम उसे आत्ममुग्ध, महत्वोन्मादी, तानाशाह और अलोकतांत्रिक ही कहेंगे। दलित समाज का हजारों बरस का शोषण और उस पर हुए जुल्म आज के आजाद भारत में ऐसे अश्लील, भौंडे और हिंसक फिजूलखर्च को सही नहीं ठहरा सकते। हमें थोड़ी सी हैरानी इस बात की होती है कि यह मामला पर्यावरण के कुछ दूसरे पहलुओं के लिए सुप्रीम कोर्ट तक गया और देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी इस बर्बादी को रोकने का कोई रास्ता नहीं निकाला। मायावती का यह कहना बहुत ही गैरजिम्मेदारी का है कि इस स्मारक पर राज्य के बजट का एक फीसदी भी खर्च नहीं हुआ है। देश की सबसे अधिक, बीस करोड़ से अधिक, आबादी वाले इस राज्य की जनता के हक में से एक फीसदी भी अपनी मनमानी पर खर्च करने का हक किसी एक इंसान को कौन सा लोकतंत्र दे सकता है? यह प्रदेश पूरी दुनिया का सबसे बड़ा प्रदेश है और मायावती चौथी बार इस प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी है और अपनी निजी अनुपातहीन संपत्ति को लेकर वे देश की सबसे अधिक दौलतमंद मुख्यमंत्री भी बन चुकी हैं। अदालत में वे इस दौलत को लेकर कटघरे में हैं और अपनी अथाह रहस्यमयी दौलत को लेकर वे कुछ बरस पहले छब्बीस करोड़ रूपए इनकमटैक्स दे चुकी हैं। वे देश की अकेली ऐसी मुख्यमंत्री हैं जो कि देश के बीस सबसे बड़े आयकरदाताओं में आती हैं। ये सारी बातें उन्हें दलित परिवार में पैदा होने के बाद भी एक बादशाह की तरह का बना देती हैं और वे किसी भी दलित-रियायत के नैतिक हक से ऊपर उठ चुकी हैं। उनका पूरा तौर-तरीका एक खूंखार तानाशाह जैसा है और वे सरकार को जिस मनमाने तरीके से चलाती हैं वह लोकतंत्र से बहुत परे का है। भारत के चुनावों के जातिगत गणित के चलते यह तानाशाह हो सकता है कि फिर जीतकर आ जाए लेकिन यह इस देश में राजनीतिक चेतना की कंगाली का सुबूत है और रहेगा। हम जनता के पैसों से ऐसी किसी भी बर्बादी के सख्त खिलाफ हैं और कल के दिन अगर अनुपातहीन दौलत और भ्रष्टाचार की वजह से मायावती को जेल होती है तो फिर उनकी प्रतिमा के इर्दगिर्द सलाखों को खड़ा करने का खर्चा उनकी निजी दौलत से आएगा, उनकी पार्टी यह लागत उठाएगी या फिर उत्तरप्रदेश के कई हजार और बच्चों की जिंदगी बेचकर वे सलाखें खरीदी जाएंगी? यह मामला संसद और सुप्रीम कोर्ट दोनों के सोचने का है और इसमें देर इसलिए नहीं करनी चाहिए कि आगे चलकर कोई दूसरा तानाशाह इसी तरह का काम कर सकता है। एक मिसाल के तौर पर अगर उत्तरप्रदेश की अगली सरकार मायावती की प्रतिमा को गिराकर उसे मटियामेट करती है तो उस फैसले को गलत कैसे कहा जाएगा, हम अभी यही सोच रहे हैं।

छोटी सी बात

14 अक्टूबर
अधिक खाने से पहले सोचें कि धरती पर बहुत से लोग भूख से मरते भी हैं। बिना किसी बीमारी अगर आपको खा-खाकर मोटापा है, तो यह दुनिया के भूखों के खिलाफ हिंसा है।

ये हमले अदालतों का भी अपमान


14 अक्टूबर 2011

दो दिनों से टीवी की खबरों में भारत की राजधानी दिल्ली में एक ऐसी हिंसा दिख रही है जिस पर दिल्ली की अदालतों को खुद होकर कोई कार्रवाई करनी चाहिए थी। उग्र हिन्दू विचारधारा वाले कुछ नौजवानों ने सुप्रीम कोर्ट के एक बहुत सक्रिय और प्रमुख वकील प्रशांत भूषण के उस दफ्तर में घुसकर उन पर हमला किया जो सुप्रीम कोर्ट के अहाते में है। फिर कल जब अदालत में इन हमलावरों को पेश किया जाना था तो फिर अदालत के बाहर प्रशांत भूषण-अन्ना हजारे के समर्थकों पर इन्हीं लोगों ने सड़क पर फिर हमला किया। हमें हैरानी यह है कि ये दोनों बातें अदालतों से जुड़ी होने के बाद भी अदालतों ने हमलावरों की हिंसा को अदालत का अपमान नहीं माना।
यह तो एक बात हुई। लेकिन दूसरी बात यह है कि जब कोई ऐसी हिंसा कैमरों पर दर्ज हो रही है तो उन पर बरसों तक सजा न मिलने से देश में हिंसक तेवर रखने वाले बाकी लोगों की हौसलाअफजाई होती है। यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि देश की शायद अधिकतर आबादी अमन-चैन से रहना चाहती है और उसके इस हक को छीनने वाले गिने-चुने अपराधियों की वजह से लोग अपने इस हक के इस्तेमाल से डरने लगते हैं। उत्तरप्रदेश में जब आए दिन राजनीति और सत्ता से जुड़े हुए दबंग अपराधी बलात्कार करते हैं और विरोध करने वाले शिकार महिला को मार भी डालते हैं तो उससे बलात्कार की और शिकार महिलाओं का मुंह खुलना भी बंद हो जाता है। छत्तीसगढ़ में भी हम देख रहे हैं कि किस तरह लड़कियों को टेलीफोन करके परेशान करने के मामले बढ़ते जा रहे हैं और ऐसे लोगों को अब तक कोई सजा मिली हो, तो कम से कम उसकी चर्चा तो सुनाई नहीं पड़ी है। इसलिए यह तो सोचा ही नहीं जा सकता कि बढ़ते हुए टेलीफोन और बढ़ते हुए दुस्साहस से लड़कियां बच पाएंगी।
इसी सिलसिले में हम ऐसे आंदोलनों की बात करना चाहेंगे जो जनता पर हमला करते हों, सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को तबाह करते हैं, और फिर उनके आंदोलनों को ठंडा करने के लिए सरकारें उनके खिलाफ कार्रवाई न करने का फैसला लेती हैं। यह सिलसिला भी इसी तरह का खतरनाक है कि एक अपराधी के बच जाने के बाद और लोगों को भी वैसे, या किसी और किस्म के अपराध करने में कोई हिचक नहीं होती। इसलिए सरकारों के पास यह पसंद या नापसंद नहीं होनी चाहिए कि ऐसे अपराधियों, या किसी भी किस्म के अपराधियों पर वे मुकदमा चलाएं, या न चलाएं। अदालतों के बाहर अगर अपराधी गिरोहबंद होकर एक बार फिर इसी विचारधारा पर हमला करते हैं तो यह उनके दबदबे का एक सुबूत है और सरकार, अदालत दोनों के बेअसर होने का भी। जब अदालतों के जज छोटी-छोटी बातों को अपना अपमान मानकर लोगों को अदालत की अवमानना के नोटिस देते हैं, तो फिर अदालत परिसर में जजों से परे लोगों पर होने वाले हमले, अदालत में पेश किए जाने वाले आरोपियों के पक्ष मेें फिर अदालत के बाहर हमले, इन सब पर अदालत की अवमानना क्यों नहीं मानी जाती? किसी जज को एक व्यक्ति के रूप में ही अपनी बेईज्जती नहीं मानना चाहिए बल्कि उसे अदालत के अपमान की परिभाषा में सारी अदालती कार्रवाई, उससे जुड़े हुए लोगों के मान-अपमान को शामिल करना चाहिए।
पाठकों को याद होगा कि एक-दो बरस पहले कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में श्रीराम सेना नाम के हिंसक और हमलावर संगठन ने नौजवान लड़के-लड़कियों पर खुले हमले टीवी के कैमरों के सामने किए थे। वैसे ही हमले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी उसी किस्म की हिंसक विचारधारा वाले संगठन करते आए हैं। लेकिन ऐसे लोगों को चूंकि अदालत से सजा नहीं मिल पाती, उनके साथ हमदर्दी रखने वाली विचारधारा की सरकारें कोई कार्रवाई नहीं करतीं, इसलिए ऐसे हमले बढ़ते चलते हैं। एक लोकतंत्र में किसी विचार का जवाब जो लोग लाठी मानते हैं, उन लोगों की जगह सिर्फ जेल होनी चाहिए और ऐसे लोगों के संगठनों की जगह भी घूरे पर होनी चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि दिल्ली में जिन अदालतों के बाहर और जिनके अहाते में ये ताजा हमले हुए हैं, उन अदालतों में कोई वकील जाकर यह पिटीशन लगाएगा कि ऐसे हमलावरों पर अदालत के अपमान का जुर्म भी दर्ज किया जाए और अदालतें उन पर तुरंत कार्रवाई भी शुरू करें।

छोटी सी बात


13 अक्टूबर
कभी किसी डॉक्टर से पूछ कर समझें कि एक्सपायर हो चुकी (मियाद खत्म होने के बाद की) दवाईयां, दवा न रहने से बेहतर हैं या नहीं? जब तक ताजा दवा न आ जाएं, तब तक पुरानी पड़ गई दवा को इमरजेंसी में काम ले आएं या फिर बिना दवा के रहें? एक्सपायर दवा का असर कम हो जाता है? या फिर वह नुकसानदेह भी हो जाती है?

प्रशांत भूषण पर हमला

13 अक्टूबर 2011
सुप्रीम कोर्ट के एक प्रमुख वकील और लोकतंत्र की अनगिनत खामियों के खिलाफ अदालत से लेकर सड़कों तक लगातार लड़ाई लडऩे वाले प्रशांत भूषण पर कल एक शर्मनाक हमला हुआ जब उनके दफ्तर पहुंचकर लोगों ने उन्हें मारा क्योंकि उन्होंने कश्मीर की जनता के जनमत संग्रह के अधिकार की बात कही थी। देश के उस उग्रवादी तबके ने यह हमला किया है जो कश्मीर को समझे बिना कश्मीर को भारत का एक हिस्सा बनाए रखने का हिमायती है और वह कश्मीर के किसी दर्जे, वहां की स्थिति, वहां की भावनाओं पर कोई चर्चा भी देशद्रोह मानता है। अभी जो तथ्य सामने आए हैं वे इसके पीछे हिंदू भावनाओं वाले एक उग्रवादी संगठन श्रीराम सेना का नाम इससे जुड़ा हुआ बताते हैं, और पाठकों को यह याद होगा कि यह श्रीराम सेना किस तरह कर्नाटक में पे्रमी नौजवान जोड़ों पर, स्कर्ट पहनने वाली लड़कियों पर खुला हिंसक हमला करके उन्हें घायल कर चुकी है। घोर साम्प्रदायिक यह संगठन, बहुत ही कट्टर हिंदूवादी, कथित भारतीय संस्कृतिवादी और आक्रामक राष्ट्रवादी विचारधारा का है जिस पर कर्नाटक की भाजपा सरकार ने कार्रवाई करने से मुंह चुराया था। ऐसे लोग अगर अब दिल्ली में शोहरत पाने के लिए ऐसे चर्चित वकील पर हमला करते हैं जो कि अन्ना हजारे का एक प्रमुख साथी होने के नाते भी इन दिनों बहुत अधिक चर्चा में है तो ऐसी आक्रामकता पूरे देश में रोकने की जरूरत है।
भारत में एक तरफ बाबा रामदेव से लेकर अन्ना हजारे तक लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपने जूते की नोंक पर रखकर जनता की मानसिकता को बुरी तरह से अराजक बनाने के काम में लगे हैं, और इस काम में प्रशांत भूषण भी अन्ना के साथ हैं। जब कभी लोकतंत्र को नीचे रखकर एक व्यक्तिवादी सोच और आंदोलन को आगे बढ़ाया जाता है, जब ऐसी मूर्खता की बातें की जाती हैं कि अन्ना हजारे इस देश की संसद से ऊपर हैं तो फिर हर किसी को अपनी-अपनी सोच को लोकतंत्र से ऊपर रखने का बढ़ावा मिलता है। ऐसी ही सोच इस देश में एक समय इस बात को बढ़ावा देते आई है कि धार्मिक आस्था संविधान से ऊपर है और अदालत का फैसला चाहे जो हो, मंदिर वहीं बनाएंगे। यही सोच बिना साम्प्रदायिकता के लेकिन उसी किस्म की अराजकता के साथ लोकपाल के बैनर तले यूपीए सरकार, और खासकर कांगे्रस पार्टी पर हमला बोलने के लिए पिछले छह महीनों से ओवरटाईम कर रही है। प्रशांत भूषण को कानून का जानकार होने की वजह से इस बात को समझना था कि चाहे एक नया कानून बनाने के लिए हो, चाहे एक मंदिर बनाने के लिए, लोकतंत्र के रास्ते को छोड़कर मनमर्जी की पगडंडी पर देश को धकेल देने से यह अराजकता लुढ़ककर सुप्रीम कोर्ट के वकील के चैंबर तक पहुंच सकती है, और कल पहुंच गई है।
भारत में लोकतंत्र को खारिज करके, तरह-तरह के शॉर्टकट भारी पड़ रहे हैं। यह सिलसिला तुरंत रोकने की जरूरत है और हमारा मानना है कि किसी एक सरकार के कुकर्मों से न तो लोकतंत्र में सरकार नाम की संस्था बुरी हो जाती, और न ही कुछ सांसदों के रिश्वत लेने से संसद खराब हो जाती और न ही कुछ जजों के भ्रष्ट होने से न्यायपालिका गैरजरूरी हो जाती। किसी भी एनजीओ के भ्रष्ट हो जाने से क्या अन्ना हजारे को भी कोई उसी कतार में खड़ा कर सकता है? अनास्था का यह सैलाब खतरनाक है और इसे इस हद तक बढ़ाना नहीं चाहिए।
प्रशांत भूषण ने कश्मीर के बारे में जो कहा है वह पूरी तरह देश के संविधान और देश के हित के बहुत से विकल्पों में से एक है और इसे देशद्रोह मानने वाले लोग ऐसे फर्जी राष्ट्रवादी लोग हैं जो भगत सिंह जैसे महान शहीद के नाम पर कालिख पोत रहे हैं। ऐसी ताकतों पर अगर तुरंत कार्रवाई नहीं होगी तो बरसों तक चलने वाले ऐसे मामलों के दौरान ये लोग साम्प्रदायिक की नफरत को और अधिक फैलाते रहेंगे। देश में ऐसे नए कानून की चर्चा चल रही है जो साम्प्रदायिक पर कड़ी कार्रवाई करे। हम इसके प्रावधानों पर जो बहस चल रही है उस बारीकी में अभी नहीं जा रहे, लेकिन ऐसा कानून जरूरी है जो साम्प्रदायिकता को जड़ से कुचल सके, और तुरंत कुचल सके। साथ ही प्रशांत भूषण को भी अपने तौर-तरीकों पर यह सोचना चाहिए कि वे जिस विचारों की आजादी के आज हकदार हैं, वैसी ही विचारों की आजादी की हकदार कांगे्रस पार्टी है, दूसरी राजनीतिक पार्टियां हैं, लोकपाल विधेयक के बारे में।

छोटी सी बात


12 अक्टूबर
जिंदगी में रोज ही कई अच्छी और कई बुरी बातें सामने आती हैं। अपने बच्चों को इनकी मिसाल देकर समझाना चाहिए ताकि वे सबक ले सकें। किताबी नसीहतों के मुकाबले मिसालें अधिक असरदार होती हैं और उन्हें समझाते हुए आप खुद भी सबक और नसीहत पाते ही हैं।

जगजीत कोई शून्य नहीं छोड़ गए

12 अक्टूबर 2011
भारत के आज के सबसे लोकप्रिय गजल गायक जगजीत सिंह के गुजर जाने से किसी तरह का कोई शून्य खड़ा नहीं हो गया है। उनका गाया हुआ इतना कुछ, इतने किस्मों का आज भारत के दसियों करोड़ घरों में होगा कि वह आने वाली कई पीढिय़ों को सुख और खुशी देने के लिए काफी है। एक इंसान का बदन इसके मुकाबले इतना छोटा होता है कि उसके जाने से जगजीत सिंह को चाहने वालों को तकलीफ के बावजूद किसी तरह का खालीपन खड़ा नहीं हो गया। जब किसी का काम उसकी जिंदगी से बढ़कर हो जाए, तो वही जिंदगी काम की होती है। जिसका जिंदा रहना जरूरी हो, उसका एक मतलब यह भी निकलता है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में अब तक दुनिया के लिए इतना कुछ जोड़ा नहीं है कि वह उनकी जिंदगी से बढ़कर हो जाए।
जगजीत सिंह पर लिखने को दिल इसलिए चाहता है कि इस गायक ने अपनी बनाई धुनों पर अपनी आवाज से उन सैकड़ों शायरों को करोड़ों लोगों तक पहुंचाया जो शायद किसी किताब के मार्फत उनकी गजलों को न पढ़े होते। और आज के जमाने में जब संगीत का मतलब शोर सा हो गया है, जब शब्दों की जरूरत और अहमियत किसी भी किस्म के गाने में बहुत कम मान ली गई है, तब जगजीत सिंह ने अपनी आवाज और अपनी संगीत से लोगों को उन शब्दों पर सोचने के लिए भी मौका दिया, मजबूर किया, जो शब्द उनके खुद के लिखे हुए नहीं थे।  दरअसल गाई हुई एक गजल उसे लिखने वाले शायर की ही नहीं रह जाती, उस संगीत और आवाज की भी हो जाती है। गाई हुई गजल के मायने, लिखे हुए शब्दों के मायने से कुछ बढ़ जाते हैं और उनकी अहमियत भी बढ़ जाती है। जगजीत सिंह ने अपनी गाई गजलों में कवियों और शायरों के शब्दों में एक बहुत बड़ा वैल्यू एडीशन किया और श्रोताओं के रूप में उन्हें पाठक नसीब कराए। इसलिए भारत के शायद सबसे मशहूर और चहेते, शायद सबसे सुरीले और खासा अधिक गाने वाले जगजीत सिंह उर्दू और हिंदी कविता का, कई क्षेत्रीय भाषाओं के गीतों का इतना भला कर गए हैं जितना शायद किसी और गायक-संगीतकार ने न किया हो।
कानों के रास्ते दिल और दिमाग तक इतनी मिठास घोलने, गानों में रची-बसी कल्पनाओं में लोगों को डुबा देने का महत्व बहुत अधिक है। इसलिए कि आज की जिंदगी में तेज रफ्तार तकलीफें मानसून की बारिश की तरह लोगों पर बरसती हैं और हर कुछ घंटों में कोई न कोई ऐसी खबर आती है जिससे कि लोगों के दिल-दिमाग और उनकी जुबान पर कड़वाहट बिखर जाए। हताशा और नफरत में फिसलते चली जा रही हिन्दुस्तानी जिंदगी और सोच को अगर कोई एक आवाज और उसके पीछे के दिल से रचा गया संगीत मिठास से भर देता है तो यह सुनने वालों को दिमागी रूप से सेहतमंद बनाए रखने के लिए एक बड़ा काम है। और यह काम जगजीत सिंह के जाने से जरा भी कम नहीं होने जा रहा, उनका गाया हुआ इतना कुछ है कि हर किसी को उसमें अपनी पसंद की धुन, अपनी पसंद का संगीत, अपनी पसंद के लफ्ज मिल ही जाते हैं, आवाज तो हर किसी गाने में बेमिसाल है ही। जगजीत सिंह में परदे के पीछे से, और स्टेज पर बैठकर भी लोगों को बांध लेने की एक बेमिसाल खूबी थी। जिन लोगों ने उन्हें सामने बैठकर सुनने का सुख पाया है वे हमारी इस बात को कुछ और अधिक दूर तक समझ और महसूस कर पाएंगे। लेकिन पिछली चौथाई सदी से अधिक से एक से अधिक पीढिय़ों ने जगजीत सिंह के रिकॉर्ड सुने, फिर कैसेट, सीडी और फिर डीवीडी से होते हुए इंटरनेट तक जगजीत सिंह का संगीत लोगों को लुभाते रहा, मोहते रहा और अब आने वाली पीढिय़ां भी उन्हें देखे बिना, टेक्नालॉजी की मेहरबानी से, यह सुख पाते रहेंगी।
किसी एक इंसान के बारे में इसी जगह पर हमने दो-चार दिन पहले ही लिखा था जब एप्पल कंपनी के स्टीव जॉब्स गुजर गए। उस चर्चा को आज हम दो वजहों से कर रहे हैं, एक तो इसलिए कि स्टीव के आईपॉड ने संगीत को लोगों के कानों तक एक अलग ही तरह से पहुंचा दिया था और हमारे जैसे करोड़ों लोग जेब में जगजीत सिंह के लगभग तमाम संगीत को लेकर चलने के लायक हुए। लेकिन एक दूसरी खराब वजह यह भी थी कि स्टीव जॉब्स ने खरबपति होने के बावजूद समाज के लिए कुछ नहीं किया। जगजीत सिंह के बारे में ऐसा कहने की नौबत नहीं आ रही क्योंकि उन्होंने बच्चों के संगठनों, स्कूलों और अस्पतालों के लिए मदद के बहुत सारे काम भी किए। लेकिन एक तकलीफदेह बात उनके साथ यह भी लगी कि उनका बेटा एक सड़क हादसे का शिकार हुआ, उनकी पत्नी की पहली शादी की बेटी ने खुदकुशी कर ली और अब वे एक ऐसे बे्रन हैमरेज का शिकार हुए जो कि बहुत अधिक लोगों की मौत की वजह नहीं बनता है, खासकर बिना किसी एक्सीडेंट के।
लोगों को इतना सुख और इतनी खुशी देने वाले जगजीत सिंह को अपनी जिंदगी में कुछ अधिक ही तकलीफें मिलीं, क्यों? इसका कोई जवाब हमें नहीं सूझता।