प्रशांत भूषण पर हमला

13 अक्टूबर 2011
सुप्रीम कोर्ट के एक प्रमुख वकील और लोकतंत्र की अनगिनत खामियों के खिलाफ अदालत से लेकर सड़कों तक लगातार लड़ाई लडऩे वाले प्रशांत भूषण पर कल एक शर्मनाक हमला हुआ जब उनके दफ्तर पहुंचकर लोगों ने उन्हें मारा क्योंकि उन्होंने कश्मीर की जनता के जनमत संग्रह के अधिकार की बात कही थी। देश के उस उग्रवादी तबके ने यह हमला किया है जो कश्मीर को समझे बिना कश्मीर को भारत का एक हिस्सा बनाए रखने का हिमायती है और वह कश्मीर के किसी दर्जे, वहां की स्थिति, वहां की भावनाओं पर कोई चर्चा भी देशद्रोह मानता है। अभी जो तथ्य सामने आए हैं वे इसके पीछे हिंदू भावनाओं वाले एक उग्रवादी संगठन श्रीराम सेना का नाम इससे जुड़ा हुआ बताते हैं, और पाठकों को यह याद होगा कि यह श्रीराम सेना किस तरह कर्नाटक में पे्रमी नौजवान जोड़ों पर, स्कर्ट पहनने वाली लड़कियों पर खुला हिंसक हमला करके उन्हें घायल कर चुकी है। घोर साम्प्रदायिक यह संगठन, बहुत ही कट्टर हिंदूवादी, कथित भारतीय संस्कृतिवादी और आक्रामक राष्ट्रवादी विचारधारा का है जिस पर कर्नाटक की भाजपा सरकार ने कार्रवाई करने से मुंह चुराया था। ऐसे लोग अगर अब दिल्ली में शोहरत पाने के लिए ऐसे चर्चित वकील पर हमला करते हैं जो कि अन्ना हजारे का एक प्रमुख साथी होने के नाते भी इन दिनों बहुत अधिक चर्चा में है तो ऐसी आक्रामकता पूरे देश में रोकने की जरूरत है।
भारत में एक तरफ बाबा रामदेव से लेकर अन्ना हजारे तक लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपने जूते की नोंक पर रखकर जनता की मानसिकता को बुरी तरह से अराजक बनाने के काम में लगे हैं, और इस काम में प्रशांत भूषण भी अन्ना के साथ हैं। जब कभी लोकतंत्र को नीचे रखकर एक व्यक्तिवादी सोच और आंदोलन को आगे बढ़ाया जाता है, जब ऐसी मूर्खता की बातें की जाती हैं कि अन्ना हजारे इस देश की संसद से ऊपर हैं तो फिर हर किसी को अपनी-अपनी सोच को लोकतंत्र से ऊपर रखने का बढ़ावा मिलता है। ऐसी ही सोच इस देश में एक समय इस बात को बढ़ावा देते आई है कि धार्मिक आस्था संविधान से ऊपर है और अदालत का फैसला चाहे जो हो, मंदिर वहीं बनाएंगे। यही सोच बिना साम्प्रदायिकता के लेकिन उसी किस्म की अराजकता के साथ लोकपाल के बैनर तले यूपीए सरकार, और खासकर कांगे्रस पार्टी पर हमला बोलने के लिए पिछले छह महीनों से ओवरटाईम कर रही है। प्रशांत भूषण को कानून का जानकार होने की वजह से इस बात को समझना था कि चाहे एक नया कानून बनाने के लिए हो, चाहे एक मंदिर बनाने के लिए, लोकतंत्र के रास्ते को छोड़कर मनमर्जी की पगडंडी पर देश को धकेल देने से यह अराजकता लुढ़ककर सुप्रीम कोर्ट के वकील के चैंबर तक पहुंच सकती है, और कल पहुंच गई है।
भारत में लोकतंत्र को खारिज करके, तरह-तरह के शॉर्टकट भारी पड़ रहे हैं। यह सिलसिला तुरंत रोकने की जरूरत है और हमारा मानना है कि किसी एक सरकार के कुकर्मों से न तो लोकतंत्र में सरकार नाम की संस्था बुरी हो जाती, और न ही कुछ सांसदों के रिश्वत लेने से संसद खराब हो जाती और न ही कुछ जजों के भ्रष्ट होने से न्यायपालिका गैरजरूरी हो जाती। किसी भी एनजीओ के भ्रष्ट हो जाने से क्या अन्ना हजारे को भी कोई उसी कतार में खड़ा कर सकता है? अनास्था का यह सैलाब खतरनाक है और इसे इस हद तक बढ़ाना नहीं चाहिए।
प्रशांत भूषण ने कश्मीर के बारे में जो कहा है वह पूरी तरह देश के संविधान और देश के हित के बहुत से विकल्पों में से एक है और इसे देशद्रोह मानने वाले लोग ऐसे फर्जी राष्ट्रवादी लोग हैं जो भगत सिंह जैसे महान शहीद के नाम पर कालिख पोत रहे हैं। ऐसी ताकतों पर अगर तुरंत कार्रवाई नहीं होगी तो बरसों तक चलने वाले ऐसे मामलों के दौरान ये लोग साम्प्रदायिक की नफरत को और अधिक फैलाते रहेंगे। देश में ऐसे नए कानून की चर्चा चल रही है जो साम्प्रदायिक पर कड़ी कार्रवाई करे। हम इसके प्रावधानों पर जो बहस चल रही है उस बारीकी में अभी नहीं जा रहे, लेकिन ऐसा कानून जरूरी है जो साम्प्रदायिकता को जड़ से कुचल सके, और तुरंत कुचल सके। साथ ही प्रशांत भूषण को भी अपने तौर-तरीकों पर यह सोचना चाहिए कि वे जिस विचारों की आजादी के आज हकदार हैं, वैसी ही विचारों की आजादी की हकदार कांगे्रस पार्टी है, दूसरी राजनीतिक पार्टियां हैं, लोकपाल विधेयक के बारे में।

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