15 अक्टूबर
उत्तरप्रदेश में मायावती ने दलित अधिकारों और उनके बढ़ावे के नाम पर एक ऐसा घोर अश्लील और हिंसक काम किया है जिसकी मिसाल चापलूसी पर जिंदा रहने वाली कांगे्रस जैसी पार्टी में भी नहीं मिलती और भारत की किसी दूसरी पार्टी में भी नहीं मिलती। करीब सात सौ करोड़ की लागत से उन्होंने उत्तरप्रदेश और दिल्ली की सरहद पर एक ऐसा स्मारक खड़ा किया है जिसे वे दलित प्रेरणा स्थल कह रही हैं। लेकिन इसमें देश के सबसे प्रमुख दलित नेता डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर, मायावती की सत्तारूढ़ पार्टी के संस्थापक और मायावती को यहां तक पहुंचाने वाले कांशीराम के साथ-साथ मायावती ने अपनी खुद की भी वैसी ही आसमान की ओर खड़ी, बड़ी सी प्रतिमा बनवाई है जिसके लिए सरकारी खजाने से रकम निकली। कुछ लोगों का यह मानना है कि भारत में सदियों से कुचले जाते रहे दलित समाज के लोगों के हाथ जब सत्ता आती है तो वे अपने पुरखों के जख्मों पर इसी किस्म का महंगा मरहम लगाने का काम कर बैठते हैं। हो सकता है कि मायावती के मन में भारत की, हिंदू समाज की मनुवादी जाति व्यवस्था के खिलाफ इसी किस्म का एक आक्रोश हो और वे प्रतिमाएं, वहां पर आसपास कोई छत्तीस एकड़ जमीन पर बनने वाला पार्क इसी किस्म की एक सोच का नतीजा हो लेकिन क्या लोकतंत्र में एक गरीब प्रदेश की जनता के हक को सत्तारूढ़ पार्टी अपने चुनाव चिन्ह हाथियों की प्रतिमाओं से इस तरह भर सकती है?
यह बात अधिक चुभने वाली तब हो जाती है जब इसी उत्तरप्रदेश में इसी दिन अदालत राज्य सरकार को यह नोटिस जारी करती है कि वहां बीमारी से मारे गए सैकड़ों बच्चों की मौतों के बारे में सरकार जवाब दे। यह उत्तरप्रदेश देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक है। और जब इसी राज्य में समाजवादी पार्टी मायावती से अपनी राजनीतिक कड़वाहट के चलते यह कहती है कि माया के सत्ता से हटने के बाद जनता इन प्रतिमाओं को उखाड़ फेंकेगी, तो यह बात हमें तर्कसंगत और न्यायसंगत लगती है। पिछली चौथाई सदी का दुनिया का इतिहास है कि किस तरह लेनिन और स्तालिन की प्रतिमाएं उखाड़कर फेंकी गईं, और किस तरह सद्दाम हुसैन की प्रतिमा को गिराकर लोग उस पर नाचे। हम इन तमाम मामलों की सीधे-सीधे कोई तुलना नहीं कर रहे लेकिन अपने जीते जी, अपने हाथों, जनता के पैसों से, भूख-बीमारी-कुपोषण से मरते हुए बच्चों की जिंदगी की कीमत पर अगर कोई नेता अपनी कांसे की प्रतिमाएं बनवाकर सजावट में सात सौ करोड़ रूपए खर्च करती है तो हम उसे आत्ममुग्ध, महत्वोन्मादी, तानाशाह और अलोकतांत्रिक ही कहेंगे। दलित समाज का हजारों बरस का शोषण और उस पर हुए जुल्म आज के आजाद भारत में ऐसे अश्लील, भौंडे और हिंसक फिजूलखर्च को सही नहीं ठहरा सकते। हमें थोड़ी सी हैरानी इस बात की होती है कि यह मामला पर्यावरण के कुछ दूसरे पहलुओं के लिए सुप्रीम कोर्ट तक गया और देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी इस बर्बादी को रोकने का कोई रास्ता नहीं निकाला। मायावती का यह कहना बहुत ही गैरजिम्मेदारी का है कि इस स्मारक पर राज्य के बजट का एक फीसदी भी खर्च नहीं हुआ है। देश की सबसे अधिक, बीस करोड़ से अधिक, आबादी वाले इस राज्य की जनता के हक में से एक फीसदी भी अपनी मनमानी पर खर्च करने का हक किसी एक इंसान को कौन सा लोकतंत्र दे सकता है? यह प्रदेश पूरी दुनिया का सबसे बड़ा प्रदेश है और मायावती चौथी बार इस प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी है और अपनी निजी अनुपातहीन संपत्ति को लेकर वे देश की सबसे अधिक दौलतमंद मुख्यमंत्री भी बन चुकी हैं। अदालत में वे इस दौलत को लेकर कटघरे में हैं और अपनी अथाह रहस्यमयी दौलत को लेकर वे कुछ बरस पहले छब्बीस करोड़ रूपए इनकमटैक्स दे चुकी हैं। वे देश की अकेली ऐसी मुख्यमंत्री हैं जो कि देश के बीस सबसे बड़े आयकरदाताओं में आती हैं। ये सारी बातें उन्हें दलित परिवार में पैदा होने के बाद भी एक बादशाह की तरह का बना देती हैं और वे किसी भी दलित-रियायत के नैतिक हक से ऊपर उठ चुकी हैं। उनका पूरा तौर-तरीका एक खूंखार तानाशाह जैसा है और वे सरकार को जिस मनमाने तरीके से चलाती हैं वह लोकतंत्र से बहुत परे का है। भारत के चुनावों के जातिगत गणित के चलते यह तानाशाह हो सकता है कि फिर जीतकर आ जाए लेकिन यह इस देश में राजनीतिक चेतना की कंगाली का सुबूत है और रहेगा। हम जनता के पैसों से ऐसी किसी भी बर्बादी के सख्त खिलाफ हैं और कल के दिन अगर अनुपातहीन दौलत और भ्रष्टाचार की वजह से मायावती को जेल होती है तो फिर उनकी प्रतिमा के इर्दगिर्द सलाखों को खड़ा करने का खर्चा उनकी निजी दौलत से आएगा, उनकी पार्टी यह लागत उठाएगी या फिर उत्तरप्रदेश के कई हजार और बच्चों की जिंदगी बेचकर वे सलाखें खरीदी जाएंगी? यह मामला संसद और सुप्रीम कोर्ट दोनों के सोचने का है और इसमें देर इसलिए नहीं करनी चाहिए कि आगे चलकर कोई दूसरा तानाशाह इसी तरह का काम कर सकता है। एक मिसाल के तौर पर अगर उत्तरप्रदेश की अगली सरकार मायावती की प्रतिमा को गिराकर उसे मटियामेट करती है तो उस फैसले को गलत कैसे कहा जाएगा, हम अभी यही सोच रहे हैं।
उत्तरप्रदेश में मायावती ने दलित अधिकारों और उनके बढ़ावे के नाम पर एक ऐसा घोर अश्लील और हिंसक काम किया है जिसकी मिसाल चापलूसी पर जिंदा रहने वाली कांगे्रस जैसी पार्टी में भी नहीं मिलती और भारत की किसी दूसरी पार्टी में भी नहीं मिलती। करीब सात सौ करोड़ की लागत से उन्होंने उत्तरप्रदेश और दिल्ली की सरहद पर एक ऐसा स्मारक खड़ा किया है जिसे वे दलित प्रेरणा स्थल कह रही हैं। लेकिन इसमें देश के सबसे प्रमुख दलित नेता डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर, मायावती की सत्तारूढ़ पार्टी के संस्थापक और मायावती को यहां तक पहुंचाने वाले कांशीराम के साथ-साथ मायावती ने अपनी खुद की भी वैसी ही आसमान की ओर खड़ी, बड़ी सी प्रतिमा बनवाई है जिसके लिए सरकारी खजाने से रकम निकली। कुछ लोगों का यह मानना है कि भारत में सदियों से कुचले जाते रहे दलित समाज के लोगों के हाथ जब सत्ता आती है तो वे अपने पुरखों के जख्मों पर इसी किस्म का महंगा मरहम लगाने का काम कर बैठते हैं। हो सकता है कि मायावती के मन में भारत की, हिंदू समाज की मनुवादी जाति व्यवस्था के खिलाफ इसी किस्म का एक आक्रोश हो और वे प्रतिमाएं, वहां पर आसपास कोई छत्तीस एकड़ जमीन पर बनने वाला पार्क इसी किस्म की एक सोच का नतीजा हो लेकिन क्या लोकतंत्र में एक गरीब प्रदेश की जनता के हक को सत्तारूढ़ पार्टी अपने चुनाव चिन्ह हाथियों की प्रतिमाओं से इस तरह भर सकती है?
यह बात अधिक चुभने वाली तब हो जाती है जब इसी उत्तरप्रदेश में इसी दिन अदालत राज्य सरकार को यह नोटिस जारी करती है कि वहां बीमारी से मारे गए सैकड़ों बच्चों की मौतों के बारे में सरकार जवाब दे। यह उत्तरप्रदेश देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक है। और जब इसी राज्य में समाजवादी पार्टी मायावती से अपनी राजनीतिक कड़वाहट के चलते यह कहती है कि माया के सत्ता से हटने के बाद जनता इन प्रतिमाओं को उखाड़ फेंकेगी, तो यह बात हमें तर्कसंगत और न्यायसंगत लगती है। पिछली चौथाई सदी का दुनिया का इतिहास है कि किस तरह लेनिन और स्तालिन की प्रतिमाएं उखाड़कर फेंकी गईं, और किस तरह सद्दाम हुसैन की प्रतिमा को गिराकर लोग उस पर नाचे। हम इन तमाम मामलों की सीधे-सीधे कोई तुलना नहीं कर रहे लेकिन अपने जीते जी, अपने हाथों, जनता के पैसों से, भूख-बीमारी-कुपोषण से मरते हुए बच्चों की जिंदगी की कीमत पर अगर कोई नेता अपनी कांसे की प्रतिमाएं बनवाकर सजावट में सात सौ करोड़ रूपए खर्च करती है तो हम उसे आत्ममुग्ध, महत्वोन्मादी, तानाशाह और अलोकतांत्रिक ही कहेंगे। दलित समाज का हजारों बरस का शोषण और उस पर हुए जुल्म आज के आजाद भारत में ऐसे अश्लील, भौंडे और हिंसक फिजूलखर्च को सही नहीं ठहरा सकते। हमें थोड़ी सी हैरानी इस बात की होती है कि यह मामला पर्यावरण के कुछ दूसरे पहलुओं के लिए सुप्रीम कोर्ट तक गया और देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी इस बर्बादी को रोकने का कोई रास्ता नहीं निकाला। मायावती का यह कहना बहुत ही गैरजिम्मेदारी का है कि इस स्मारक पर राज्य के बजट का एक फीसदी भी खर्च नहीं हुआ है। देश की सबसे अधिक, बीस करोड़ से अधिक, आबादी वाले इस राज्य की जनता के हक में से एक फीसदी भी अपनी मनमानी पर खर्च करने का हक किसी एक इंसान को कौन सा लोकतंत्र दे सकता है? यह प्रदेश पूरी दुनिया का सबसे बड़ा प्रदेश है और मायावती चौथी बार इस प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी है और अपनी निजी अनुपातहीन संपत्ति को लेकर वे देश की सबसे अधिक दौलतमंद मुख्यमंत्री भी बन चुकी हैं। अदालत में वे इस दौलत को लेकर कटघरे में हैं और अपनी अथाह रहस्यमयी दौलत को लेकर वे कुछ बरस पहले छब्बीस करोड़ रूपए इनकमटैक्स दे चुकी हैं। वे देश की अकेली ऐसी मुख्यमंत्री हैं जो कि देश के बीस सबसे बड़े आयकरदाताओं में आती हैं। ये सारी बातें उन्हें दलित परिवार में पैदा होने के बाद भी एक बादशाह की तरह का बना देती हैं और वे किसी भी दलित-रियायत के नैतिक हक से ऊपर उठ चुकी हैं। उनका पूरा तौर-तरीका एक खूंखार तानाशाह जैसा है और वे सरकार को जिस मनमाने तरीके से चलाती हैं वह लोकतंत्र से बहुत परे का है। भारत के चुनावों के जातिगत गणित के चलते यह तानाशाह हो सकता है कि फिर जीतकर आ जाए लेकिन यह इस देश में राजनीतिक चेतना की कंगाली का सुबूत है और रहेगा। हम जनता के पैसों से ऐसी किसी भी बर्बादी के सख्त खिलाफ हैं और कल के दिन अगर अनुपातहीन दौलत और भ्रष्टाचार की वजह से मायावती को जेल होती है तो फिर उनकी प्रतिमा के इर्दगिर्द सलाखों को खड़ा करने का खर्चा उनकी निजी दौलत से आएगा, उनकी पार्टी यह लागत उठाएगी या फिर उत्तरप्रदेश के कई हजार और बच्चों की जिंदगी बेचकर वे सलाखें खरीदी जाएंगी? यह मामला संसद और सुप्रीम कोर्ट दोनों के सोचने का है और इसमें देर इसलिए नहीं करनी चाहिए कि आगे चलकर कोई दूसरा तानाशाह इसी तरह का काम कर सकता है। एक मिसाल के तौर पर अगर उत्तरप्रदेश की अगली सरकार मायावती की प्रतिमा को गिराकर उसे मटियामेट करती है तो उस फैसले को गलत कैसे कहा जाएगा, हम अभी यही सोच रहे हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें