ये हमले अदालतों का भी अपमान


14 अक्टूबर 2011

दो दिनों से टीवी की खबरों में भारत की राजधानी दिल्ली में एक ऐसी हिंसा दिख रही है जिस पर दिल्ली की अदालतों को खुद होकर कोई कार्रवाई करनी चाहिए थी। उग्र हिन्दू विचारधारा वाले कुछ नौजवानों ने सुप्रीम कोर्ट के एक बहुत सक्रिय और प्रमुख वकील प्रशांत भूषण के उस दफ्तर में घुसकर उन पर हमला किया जो सुप्रीम कोर्ट के अहाते में है। फिर कल जब अदालत में इन हमलावरों को पेश किया जाना था तो फिर अदालत के बाहर प्रशांत भूषण-अन्ना हजारे के समर्थकों पर इन्हीं लोगों ने सड़क पर फिर हमला किया। हमें हैरानी यह है कि ये दोनों बातें अदालतों से जुड़ी होने के बाद भी अदालतों ने हमलावरों की हिंसा को अदालत का अपमान नहीं माना।
यह तो एक बात हुई। लेकिन दूसरी बात यह है कि जब कोई ऐसी हिंसा कैमरों पर दर्ज हो रही है तो उन पर बरसों तक सजा न मिलने से देश में हिंसक तेवर रखने वाले बाकी लोगों की हौसलाअफजाई होती है। यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि देश की शायद अधिकतर आबादी अमन-चैन से रहना चाहती है और उसके इस हक को छीनने वाले गिने-चुने अपराधियों की वजह से लोग अपने इस हक के इस्तेमाल से डरने लगते हैं। उत्तरप्रदेश में जब आए दिन राजनीति और सत्ता से जुड़े हुए दबंग अपराधी बलात्कार करते हैं और विरोध करने वाले शिकार महिला को मार भी डालते हैं तो उससे बलात्कार की और शिकार महिलाओं का मुंह खुलना भी बंद हो जाता है। छत्तीसगढ़ में भी हम देख रहे हैं कि किस तरह लड़कियों को टेलीफोन करके परेशान करने के मामले बढ़ते जा रहे हैं और ऐसे लोगों को अब तक कोई सजा मिली हो, तो कम से कम उसकी चर्चा तो सुनाई नहीं पड़ी है। इसलिए यह तो सोचा ही नहीं जा सकता कि बढ़ते हुए टेलीफोन और बढ़ते हुए दुस्साहस से लड़कियां बच पाएंगी।
इसी सिलसिले में हम ऐसे आंदोलनों की बात करना चाहेंगे जो जनता पर हमला करते हों, सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को तबाह करते हैं, और फिर उनके आंदोलनों को ठंडा करने के लिए सरकारें उनके खिलाफ कार्रवाई न करने का फैसला लेती हैं। यह सिलसिला भी इसी तरह का खतरनाक है कि एक अपराधी के बच जाने के बाद और लोगों को भी वैसे, या किसी और किस्म के अपराध करने में कोई हिचक नहीं होती। इसलिए सरकारों के पास यह पसंद या नापसंद नहीं होनी चाहिए कि ऐसे अपराधियों, या किसी भी किस्म के अपराधियों पर वे मुकदमा चलाएं, या न चलाएं। अदालतों के बाहर अगर अपराधी गिरोहबंद होकर एक बार फिर इसी विचारधारा पर हमला करते हैं तो यह उनके दबदबे का एक सुबूत है और सरकार, अदालत दोनों के बेअसर होने का भी। जब अदालतों के जज छोटी-छोटी बातों को अपना अपमान मानकर लोगों को अदालत की अवमानना के नोटिस देते हैं, तो फिर अदालत परिसर में जजों से परे लोगों पर होने वाले हमले, अदालत में पेश किए जाने वाले आरोपियों के पक्ष मेें फिर अदालत के बाहर हमले, इन सब पर अदालत की अवमानना क्यों नहीं मानी जाती? किसी जज को एक व्यक्ति के रूप में ही अपनी बेईज्जती नहीं मानना चाहिए बल्कि उसे अदालत के अपमान की परिभाषा में सारी अदालती कार्रवाई, उससे जुड़े हुए लोगों के मान-अपमान को शामिल करना चाहिए।
पाठकों को याद होगा कि एक-दो बरस पहले कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में श्रीराम सेना नाम के हिंसक और हमलावर संगठन ने नौजवान लड़के-लड़कियों पर खुले हमले टीवी के कैमरों के सामने किए थे। वैसे ही हमले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी उसी किस्म की हिंसक विचारधारा वाले संगठन करते आए हैं। लेकिन ऐसे लोगों को चूंकि अदालत से सजा नहीं मिल पाती, उनके साथ हमदर्दी रखने वाली विचारधारा की सरकारें कोई कार्रवाई नहीं करतीं, इसलिए ऐसे हमले बढ़ते चलते हैं। एक लोकतंत्र में किसी विचार का जवाब जो लोग लाठी मानते हैं, उन लोगों की जगह सिर्फ जेल होनी चाहिए और ऐसे लोगों के संगठनों की जगह भी घूरे पर होनी चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि दिल्ली में जिन अदालतों के बाहर और जिनके अहाते में ये ताजा हमले हुए हैं, उन अदालतों में कोई वकील जाकर यह पिटीशन लगाएगा कि ऐसे हमलावरों पर अदालत के अपमान का जुर्म भी दर्ज किया जाए और अदालतें उन पर तुरंत कार्रवाई भी शुरू करें।

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