16 अक्टूबर 2011
संपादकीय
भारतीय जनता पार्टी के हमलावर तेवर अब एकदम से बचाव की नौबत में आ गए हैं। और इसकी वजह कर्नाटक में कल पिछले भाजपाई मुख्यमंत्री का भ्रष्टाचार गिरफ्तार होना भर नहीं है, वह तो लंबे समय से तय माना जा रहा था, उसकी बहुत सी वजहें हैं। पिछले कुछ हफ्तों में भाजपा पर न तो अपनी खुद की लीडरशिप की लगाम दिख रही और न ही इस पार्टी पर लगाम रखने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बेमौसम, बेजरूरत के जलसे की तरह अपने साम्राज्य में एक शाही उपवास रखा और देश भर से भाजपा की नेताओं को वहां या तो पहुंचना पड़ा या उन्हें उनको बुलवा लिया। इस आयोजन को लेकर और इसके साथ-साथ एक राष्ट्रीय नेता के रूप में, भावी संभावित प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के रूप में मोदी की आमद संघ से लेकर भाजपा तक हर कहीं खलबली खड़ी कर गई। यह बात भी ध्यान देने की रही कि गुजरात के संघ परिवार के कुछ संगठन और बहुत से नेता मोदी से अपने लंबे समय से चले आ रहे परहेज को जारी रखते हुए मोदी के शाही उपवास से दूर रहे और इससे हिंदू ताकतों के बीच एक दरार और खुलकर सामने आई। लेकिन भाजपा का धर्मसंकट महज इतने से नहीं निपट गया। चुनाव अभी दूर हैं, एनडीए के साथियों का मिजाज उस आने वाले बरसों बाद के चुनाव के वक्त कैसा होगा इसकी अटकल लगाना आज आसान नहीं है लेकिन मोदी की, एकला चालो रे, इस कार्रवाई से देश भर में यह बात उभरकर खड़ी हो गई कि मोदी भाजपा के भीतर रहते हुए भी भाजपा से बड़े या तो सचमुच हैं, या फिर वे अपने-आपको ऐसा साबित कर रहे हैं। दूसरी बात यह साबित हुई कि मोदी और लालकृष्ण आडवानी के बीच का तालमेल पार्टी के व्यापक हितों से परे का और गड़बड़ है। लेकिन मोदी कांड निपट पाता उसके पहले ही आडवानी ने रथयात्रा का ऐलान अपने स्तर पर ही कर दिया, जिसे कि बाद में जाकर पार्टी को अपना ठप्पा देना पड़ा। ये सारी खबरें भाजपा के भीतर के सत्तासंघर्ष की खबरें सामने लाती रहीं, और एक निहायत ही गैरजरूरी बहस छिड़ गई कि भाजपा का अगला प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी कौन होगा?
मानो इतना काफी नहीं था, और आडवानी की भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा के मध्यप्रदेश पहुंचने के पहले ही, मध्यप्रदेश की एक आग उगलती भाजपाई नेता उमा भारती ने वाराणसी में यह शिगूफा छोड़ दिया कि आडवानी अगले प्रधानमंत्री होंगे। इस बात को उन्होंने कई तरह से घुमा-फिराकर मजबूती से सामने रखा और भाजपा के आडवानी से एक पीढ़ी नीचे के साठे पे पाठे लोग बेचैन हो गए कि क्या 2014 में भी उनके नाम पर भाजपा का यह चुस्त-दुरूस्त, सेहतमंद बरगद छाया रहेगा? इसलिए जब सतना में भाजपा के एक नेता आडवानी की यात्रा की बेहतर रिपोर्टिंग के लिए मीडिया को नगद रिश्वत देते कैमरों पर कैद हुए, और पार्टी से निलंबित किए गए तो साजिशों की कल्पना करने वाले लोगों को यह भी लगा कि क्या भाजपा के भीतर के आडवानी विरोधियों ने ही मिलकर उनकी यह ताजा फजीहत खड़ी नहीं की है? लेकिन मानो इतना कुछ काफी नहीं था इसलिए ऐसे ही वक्त कर्नाटक से भाजपा के लिए रूका हुआ एक सदमा बैंड बजाते पहुंचा कि वहां पर भाजपा की सरकार के संस्थापक और पार्टी के सबसे बड़े नेता, भूतपूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा को अदालत ने गिरफ्तार करवाकर जेल भेज दिया। देश के जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ आडवानी एक जनचेतना यात्रा निकालकर प्रधानमंत्री पद की अटकलें बढ़ाते चल रहे हैं, वही भ्रष्टाचार सतना से लेकर बेंगलुरू तक बांस की ऊंची गेड़ी पर चढ़कर-चलकर उनकी यात्रा की राह पर खबरें गढ़ रहा है। दूसरी तरफ गुजरात के मुख्यमंत्री लगातार इंटरनेट पर अपने-आपको और अपने राज्य को भ्रष्टाचारमुक्त, भारी कामयाब साबित करते हुए अपना बुत पार्टी से बहुत ऊंचा खड़ा करते चल रहे हैं।
यह सोचना मुश्किल है कि भाजपा के भीतर के इन दो बड़े नेताओं के ऐसे दो बड़े जलसे करने की क्या जरूरत थी जिनको पार्टी ने घोषित नहीं किया था और जिन्हें इन दोनों ने अपने-अपने बूते खुद ही तय किया, खुद ही मुनादी की और बाद में पार्टी जाकर एक बेबस और मजबूर की तरह इनसे जुड़ी। ये दोनों ही कार्यक्रम ऐसे वक्त पर हुए या घोषित हुए जब पार्टी के एक, इन दोनों से बहुत छोटे, नेता भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी एक ऑपरेशन के बाद आराम पर थे। हम भाजपा की इस नौबत का विश्लेषण करते हुए किसी भी बात का अतिसरलीकरण करना नहीं चाहते और न ही कूदकर किसी नतीजे पर पहुंचना नहीं चाहते, लेकिन यह बात साफ है कि आडवानी और मोदी इन दोनों के इन जलसों में भाजपा को ताकतवर बनाने के बजाय उसके भीतर की दरारों को और गहरा कर दिया और उस पर रौशनी का घेरा भी डालकर देश भर के सामने इस पार्टी की ऐसी तस्वीर रखी कि इसके नेता प्रधानमंत्री बनने के लिए उतावले हो रखे हैं। देश में, और भाजपा में, आज यह नौबत सूत न कपास, जुलाहों में ल_मल_ा जैसी तस्वीर पेश कर रही है और इससे भाजपा का भला कुछ भी नहीं हो रहा।
यह नौबत भाजपा के भीतर अध्यक्ष नितिन गडकरी की उदारता है, या कमजोर पकड़ है, यह तो बाद की बात है, पहली बात तो यह है कि प्रधानमंत्री के पद को लेकर अगर इस पार्टी मेें बावलेपन का संक्रमण इसी तरह बढ़ेगा तो एनडीए के भीतर भी इसकी फजीहत बढ़ेगी और इस पार्टी, इस गठबंधन की संभावनाएं घटेंगी।
संपादकीय
भारतीय जनता पार्टी के हमलावर तेवर अब एकदम से बचाव की नौबत में आ गए हैं। और इसकी वजह कर्नाटक में कल पिछले भाजपाई मुख्यमंत्री का भ्रष्टाचार गिरफ्तार होना भर नहीं है, वह तो लंबे समय से तय माना जा रहा था, उसकी बहुत सी वजहें हैं। पिछले कुछ हफ्तों में भाजपा पर न तो अपनी खुद की लीडरशिप की लगाम दिख रही और न ही इस पार्टी पर लगाम रखने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बेमौसम, बेजरूरत के जलसे की तरह अपने साम्राज्य में एक शाही उपवास रखा और देश भर से भाजपा की नेताओं को वहां या तो पहुंचना पड़ा या उन्हें उनको बुलवा लिया। इस आयोजन को लेकर और इसके साथ-साथ एक राष्ट्रीय नेता के रूप में, भावी संभावित प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के रूप में मोदी की आमद संघ से लेकर भाजपा तक हर कहीं खलबली खड़ी कर गई। यह बात भी ध्यान देने की रही कि गुजरात के संघ परिवार के कुछ संगठन और बहुत से नेता मोदी से अपने लंबे समय से चले आ रहे परहेज को जारी रखते हुए मोदी के शाही उपवास से दूर रहे और इससे हिंदू ताकतों के बीच एक दरार और खुलकर सामने आई। लेकिन भाजपा का धर्मसंकट महज इतने से नहीं निपट गया। चुनाव अभी दूर हैं, एनडीए के साथियों का मिजाज उस आने वाले बरसों बाद के चुनाव के वक्त कैसा होगा इसकी अटकल लगाना आज आसान नहीं है लेकिन मोदी की, एकला चालो रे, इस कार्रवाई से देश भर में यह बात उभरकर खड़ी हो गई कि मोदी भाजपा के भीतर रहते हुए भी भाजपा से बड़े या तो सचमुच हैं, या फिर वे अपने-आपको ऐसा साबित कर रहे हैं। दूसरी बात यह साबित हुई कि मोदी और लालकृष्ण आडवानी के बीच का तालमेल पार्टी के व्यापक हितों से परे का और गड़बड़ है। लेकिन मोदी कांड निपट पाता उसके पहले ही आडवानी ने रथयात्रा का ऐलान अपने स्तर पर ही कर दिया, जिसे कि बाद में जाकर पार्टी को अपना ठप्पा देना पड़ा। ये सारी खबरें भाजपा के भीतर के सत्तासंघर्ष की खबरें सामने लाती रहीं, और एक निहायत ही गैरजरूरी बहस छिड़ गई कि भाजपा का अगला प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी कौन होगा?
मानो इतना काफी नहीं था, और आडवानी की भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा के मध्यप्रदेश पहुंचने के पहले ही, मध्यप्रदेश की एक आग उगलती भाजपाई नेता उमा भारती ने वाराणसी में यह शिगूफा छोड़ दिया कि आडवानी अगले प्रधानमंत्री होंगे। इस बात को उन्होंने कई तरह से घुमा-फिराकर मजबूती से सामने रखा और भाजपा के आडवानी से एक पीढ़ी नीचे के साठे पे पाठे लोग बेचैन हो गए कि क्या 2014 में भी उनके नाम पर भाजपा का यह चुस्त-दुरूस्त, सेहतमंद बरगद छाया रहेगा? इसलिए जब सतना में भाजपा के एक नेता आडवानी की यात्रा की बेहतर रिपोर्टिंग के लिए मीडिया को नगद रिश्वत देते कैमरों पर कैद हुए, और पार्टी से निलंबित किए गए तो साजिशों की कल्पना करने वाले लोगों को यह भी लगा कि क्या भाजपा के भीतर के आडवानी विरोधियों ने ही मिलकर उनकी यह ताजा फजीहत खड़ी नहीं की है? लेकिन मानो इतना कुछ काफी नहीं था इसलिए ऐसे ही वक्त कर्नाटक से भाजपा के लिए रूका हुआ एक सदमा बैंड बजाते पहुंचा कि वहां पर भाजपा की सरकार के संस्थापक और पार्टी के सबसे बड़े नेता, भूतपूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा को अदालत ने गिरफ्तार करवाकर जेल भेज दिया। देश के जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ आडवानी एक जनचेतना यात्रा निकालकर प्रधानमंत्री पद की अटकलें बढ़ाते चल रहे हैं, वही भ्रष्टाचार सतना से लेकर बेंगलुरू तक बांस की ऊंची गेड़ी पर चढ़कर-चलकर उनकी यात्रा की राह पर खबरें गढ़ रहा है। दूसरी तरफ गुजरात के मुख्यमंत्री लगातार इंटरनेट पर अपने-आपको और अपने राज्य को भ्रष्टाचारमुक्त, भारी कामयाब साबित करते हुए अपना बुत पार्टी से बहुत ऊंचा खड़ा करते चल रहे हैं।
यह सोचना मुश्किल है कि भाजपा के भीतर के इन दो बड़े नेताओं के ऐसे दो बड़े जलसे करने की क्या जरूरत थी जिनको पार्टी ने घोषित नहीं किया था और जिन्हें इन दोनों ने अपने-अपने बूते खुद ही तय किया, खुद ही मुनादी की और बाद में पार्टी जाकर एक बेबस और मजबूर की तरह इनसे जुड़ी। ये दोनों ही कार्यक्रम ऐसे वक्त पर हुए या घोषित हुए जब पार्टी के एक, इन दोनों से बहुत छोटे, नेता भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी एक ऑपरेशन के बाद आराम पर थे। हम भाजपा की इस नौबत का विश्लेषण करते हुए किसी भी बात का अतिसरलीकरण करना नहीं चाहते और न ही कूदकर किसी नतीजे पर पहुंचना नहीं चाहते, लेकिन यह बात साफ है कि आडवानी और मोदी इन दोनों के इन जलसों में भाजपा को ताकतवर बनाने के बजाय उसके भीतर की दरारों को और गहरा कर दिया और उस पर रौशनी का घेरा भी डालकर देश भर के सामने इस पार्टी की ऐसी तस्वीर रखी कि इसके नेता प्रधानमंत्री बनने के लिए उतावले हो रखे हैं। देश में, और भाजपा में, आज यह नौबत सूत न कपास, जुलाहों में ल_मल_ा जैसी तस्वीर पेश कर रही है और इससे भाजपा का भला कुछ भी नहीं हो रहा।
यह नौबत भाजपा के भीतर अध्यक्ष नितिन गडकरी की उदारता है, या कमजोर पकड़ है, यह तो बाद की बात है, पहली बात तो यह है कि प्रधानमंत्री के पद को लेकर अगर इस पार्टी मेें बावलेपन का संक्रमण इसी तरह बढ़ेगा तो एनडीए के भीतर भी इसकी फजीहत बढ़ेगी और इस पार्टी, इस गठबंधन की संभावनाएं घटेंगी।
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