अरब क्रांति की सालगिरह और प्रजातंत्र की कीमत


संपादकीय
16 जनवरी 2012
ट्यूनिशिया से शुरू हुई अरब क्रांति को एक बरस पूरा हो गया है। ट्यूनिशिया से शुरू हुई अरब क्रांति मिस्त्र में मोहभंग  के दौर से गुजरती दिख रही है, और एक तानशाह से निजात पाकर प्रजातंत्र अपनाने की मिस्त्र के लोगों की इच्छाओं पर सेना और इस्लामी कट्टरपंथियों के काबिज होने की खबरें आ रही हैं। दूसरी तरफ लोकतंत्र का त्यौहार जिसे कहा जाता है, वह चुनाव भारत में पांच राज्यों में होने जा रहे है। तब राजनीतिक पार्टियों का प्रजातंत्र के लिए रवैया और चुनावी कवायद देखना अपने आपमें इस हिसाब से दिलचस्प है  कि इतने बरसों बाद भी राजनीतिक दल मतदाताओं को प्रजातंत्र के लिए कितना तैयार, कितना सयाना समझते हंै। उत्तराखंड से लेकर गोवा तक जहां भी देख लें राजनीतिक दलों का बर्ताव देखकर लगता है कि उन्हें मतदाता के सयाने ना होने का पूरा इत्मीनान है।  चुनावी कार्यक्रम जारी होते ही  करोड़ों रुपयों का काल धन पकड़ाया जाना आम खबर हो गई है। चुनाव आयोग की सख्ती जितनी बढ़ती जा रही है कालेधन के इस्तेमाल के लिए नेताओं का दिमाग भी उतनी ही तेज़ी से काम करने लगा है। निजी वाहनों से कालाधन जब्त करने की घटनाओं ने उन्हें इसकी हेरफेर के लिए अब बैंकों की एटीएम गाडिय़ों का इस्तेमाल करने की अक्ल दे दी है।
जाति धर्म के समीकरणों के साथ-साथ  अपनी कमज़ोरियों को शहादत में बदलने की नेताओं की चालाकी देखते ही बनती है। मायावती अपने राजनीतिक दल बहुजन समाज पार्टी को जन आंदोलन कह रही है। यह ऐसा जन आंदोलन है  जिसके नेता की वसीयत  पर अमल करने के लिए उन्होंने जनता के हक के  करोड़ों रुपये पत्थर की मूर्तियां बनवाने में खर्च कर दिए, जबकि उनके राज  में बच्चे देश में सबसे ज्यादा कुपोषित रह गए हंै। अब चुनावों के पहले जब चुनाव आयोग ने इन बुतों को कपड़े से ढंकने का देश दिया तो मायावती के तेज दिमाग का चर्चा हो रहा है कि किस तरह उन्होंने 2012 के चुनावों का खयाल कर के 2007 से ही अपनी पार्टी  के प्रतीक और अपने बुत बनवाने शुरू कर दिए। चुनाव आयोग के इस फैसले को मायावती दलित विरोधी बताती हैं। एक मामूली क्लर्क की बेटी से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी माया जाहिर तौर पर कोई 88 करोड़ की मालकिन बताई जाती हैं। एक ऐसे राज्य में जहां दलितों पर हिंसा के मामले 2009 और 2010 में सबसे ज्यादा हुए,  चुनाव आयोग  पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाने वाली मुख्यमंत्री  इस बारे में कोई जवाब देना ठीक नहीं समझती कि अभी दस साल पहले उसमें से ही निकालकर बनाया गया उत्तराखंड विकास के मामले में उससे बहुत आगे कैसे है? क्यों उनके राज्य में कुपोषित बच्चों की तादाद सबसे ज्यादा है? क्यों एक सख्त महिला मुख्यमंत्री होने का दम भरने वाली इस नेता के राज्य में महिलाओं के साथ देश में सबसे ज्यादा हिंसा होती है? वह खुद के भ्रष्टाचार के खिलाफ होने का सुबूत इस बात से देती है कि उन्होंने  सैकड़ों अफसरों का बात की बात में तबदला कर दिया। 21 मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया, और आधे से ज्यादा मौजूदा विधायकों का टिकिट काट दिया। चुनावी पंडित इसे माया की चित भी मेरी पट भी मेरी बताते हुए कह रहे हैं कि किस तरह, माया दस हजार करोड़ के एन एच आर एम घोटाले से भी  फायदा उठाने की सूझबूझ रखती है, किस  तरह उन्होंने केवल उतने ही विधायकों की टिकिट काटी जो बहुत कम मतों से जीते थे, और किस तरह मौका मिलते ही वह अपने बहुजन दल को सर्वजन में बदलने की ताकत रखती है। चुनावी माहौल में "टीना"( देयर इज़ नो ऑल्टर नेटिव)  और मीता ( माया इस द ऑल्टर्नेटिव) जैसे लफ्ज उछाले जा रहे हैं। मायावती  की जवाबदेही तय करने की बात कहीं नहीं होती। उन पर वार करने वाली कांग्रेस और उसके नेता मौका पड़ते ही उसके साथ सरकार रचने को तैयार बैठे बताए जाते हंै। आय के मुकाबले ज्यादा दौलत इक_ी करने के लिए उनके खिलाफ मामले को संसद में मुश्किल घड़ी में सरकार की नैया पार करने की पतवार की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
यह सब इसलिए किया जाता है क्योंकि राजनीतिक दल और उनके नेताओं को जनता के लाचार होने का पूरा इत्मीनान है।  संविधान में किए गए प्रावधानों को किस तरह तोड़ मरोड़कर अपनी तरफ वोट बैंक राजनीति की जाए, इसकी जुगत में राजनीतिक दल लगे  हुए हैं। यह सोच कि  संविधान को चुनावी फायदे के लिए तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है, कभी खतरनाक भी हो सकती है। कानून मंत्री जैसे उदारवादी,कानून के जानकार माने जाने वाले नेता के बयानों को देखकर इसका अन्दाज लगाया जा सकता है, लेकिन 60 बरस के जनतंत्र में क्या मतदाता इस खतरे को भांपने को तैयार हो सका है? बिकाऊ खबरों को कोसने वाले देश से कोई यह जवाब भी तो मांगे  कि उसे बिकाऊ खबरें पढ़कर वोट दे देने वाला क्यों समझता जाता है? हमने बार-बार लिखा है कि लोकतंत्र अनमोल है, इसका पता इसका बेजा इस्तेमाल करने वालों को उस दिन लगेगा, जब इस अंधेरगर्दी से त्रस्त जनता अपना नसीब जंगलों में फैले किसी आंदोलन को थमा देगी, और वह कंगारू अदालतों में इतने बरसों की आजादी का मर्सिया पढ़ डालेगा। उत्तर प्रदेश हो या मणिपुर, उत्तराखंड हो या गोवा अलग-अलग राज्यों की समस्या अलग-अलग हो सकती है, लेकिन मतदाताओं का सामना नेताओं के एक जैसे बर्ताव से है। बिहार के विधानसभा चुनावों में मतदाताओं ने धर्म और जाति के आधार पर खुद को मूर्ख बनाए जाने की कांग्रेस और राजद की कोशिशें नाकाम की थीं। यह सच है कि बहुमत  की आवाज सुनने वाली व्यवस्था में अपनी जति और सम्प्रदाय के साथ खड़ा होने में  मतदाता को ज्यादा सलामती लगती होगी, लेकिन अरब देशों, उत्तरी कोरिया, म्यांमनार , चीन की जनता की हालत देखकर यह समझ में आता है कि अपनी सलामती से बड़े मुद्दे जो हमारे सामने हंै  उन पर भी उसे गौर करना चाहिए। चुनाव में हिसाब तो स्थानीय मुद्दों पर मांगना चाहिए, लेकिन नजर व्यापक मुद्दों पर हो, तो प्रजातंत्र को मजबूत करने में मतदाता अपना योगदान कर सकेंगे।

भारत चीन हो सकता है?


संपादकीय
15 जनवरी 2012

कल अपनी सालगिरह पर पत्रकारिता और बाजार में अपनी मौजूदगी की जब हम बात कर रहे थे, तो अपने नए  साल की शुरुआत करते वक्त भी  हमारे सामने ऐसी दो खबरें थीं  जो इस दिशा में अपना कूच, अपनी कोशिशें जारी रखने की ज़रूरत साबित करती हंै- एक,भारत की अदालतों की, फेसबुक और गूगल पर चीन की तर्ज पर कार्रवाई की धमकी, तो दूसरी राजकोट में एक अखबार में नये साल की दावत मनाते पुलिस की आला अफसर की तस्वीर छापने पर, एक बड़े अखबार समूह के रिपोर्टरों और वरिष्ठ संपादकों की गिरफ्तारी। दिल्ली की अदालतों ने गूगल समेत 21 कंपनियों को बुलाकर कहा है कि वह ऐतराज के काबिल सामग्री अपनी साईट्स से हटाए, वर्ना चीन की तर्ज पर उन पर यहां भी रोक लगाई जाएगी। यह चेतावनी उन तमाम सायबर कानूनों के अलावा दी जा रही है, जिनके तहत सजा देने का प्रवधान देश का कानून में पहले ही किया जा चुका है। दिल्ली की अदालत की इस बात पर कपिल सिब्बल खुश हो सकते हंै, लेकिन एक प्रजातांत्रिक देश में चीन की मिसाल देकर उसकी राह पर चलना हमारे लिए कितना ठीक होगा, यह गौर करने लायक बात है।
गूगल, फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्किंग  साईट्स लोगों को एक-दूसरे से बातें करने का मौका देती हैं। सामने कोई मौका हो, तो उसका फायदा अलग-अलग तरीके से उठाने वाले लोग भी मिल जाते हैं, लेकिन क्या इसमे उस मौके में खामी ढूंढना सही होगा? इन सोशल नेट्वर्किंग साईट्स पर लोग क्या बोल रहे हंै,क्या पोस्ट कर रहे हैं, उसे नियंत्रित करना तकनीकी रूप से आज भारत में धमकाई जा रही कंपनियों के लिए कितना मुमकिन है, इसका जवाब वह देश की अदालतों को देंगी, लेकिन यह बोलने की आज़ादी ही तो है, कि दिग्विजय सिंह अपनी पार्टी और सरकार  के रुख के खिलाफ बटला हाऊस एनकाऊंटर  को फर्जी करार दे रहे हंै, और कांग्रेस के प्रवक्ता कह रहे हंै कि यह उनके दल के भीतर का आंतरिक प्रजातंत्र है। अगर ऐसा है, तो यह कांग्रेस के तय करने की बात है कि उसे किस नेता को बोलने की कैसी, और कितनी आज़ादी देनी है, और यह जनता के तय करने की बात है कि वह इस मामले में किसको, कितना सही मानती है। इसी तरह सोशल नेट्वर्किंग साईट्स पर, देश के सायबर कानूनों की हद में आ रही सामग्री पर किस तरह प्रतिक्रिया देनी है, यह तय करने का हक क्या इसके उपभोक्ताओं का नहीं है ?  प्रजातंत्र के 6 दशक के बाद ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में, क्या हमारे  पास चीन की तरफ ताकने के अलावा कोई  रास्ता नहीं बचा है?  हम यह मानते हंै कि एक-दूसरे से बोलने, बात करने की आजादी पर कोई कटौती लादने के अपने खतरे हो सकते हंै, देश में पहले ही इंटरनेट और सायबर पर रखी जाने वाली सामग्री के लिए कानून बने हुए हंै। इन्हें तोडऩे वालों के खिलाफ सख्ती करने के रास्ते कानून पर अमल करने वाली एजेंसियों के पास पहले से हंै, लेकिन किसी  भी बहाने विचारों का गला घोंटने से पहले इमरजेंसी के दिनों की याद कर लेनी चाहिए- यह हरकत जिनकी आवाज दबाई गई उनके साथ, और जिन्होंने आवाज़ दबाई, उनके लिए भी बुरी साबित हुई थी।
राजकोट की घटना में पुलिस अधिकारी की तस्वीर एक प्रेमी युगल के साथ छापने के एवज में अखबार के कर्मियों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस का कहना है कि अखबार ने जानबूझकर एक प्रेमी युगल के साथ पुलिस की आला अफसर, और उनके पति की तस्वीर छापकर अशिष्ट संकेत देने की कोशिश की। क्या शिष्ट है, क्या अशिष्ट , किसी ने क्या संकेत देने की कोशिश की, इन मसलों पर बहुत बारीकी से सोचने, और फैसले लेने की जरूरत पड़ती है। लेकिन गुजरात के एक कस्बाई शहर में एक अखबार, और दिल्ली की अदालत में सोशल नेट्वर्किंग के जरिये अभिव्यक्ति की आज़ादी देने वाले दिग्गजों का, सत्ता के जिस मिजाज़  से  सामना हो रहा है,  उससे अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए कैसा संकेत मिल रहा है, इस पर गौर करने की जरूरत है। अच्छे बुरे को  तौलने के लिए हम एक व्यापक और उदार नजरिये के हामी हैं, और हमारा मानना है कि ऐसा एक दूसरे के साथ बात करके ज्यादा आसानी से, बेहतर तरीके से किया जा सकता है। हमारी नजर में संवाद, सख्ती से बेहतर विकल्प है। विकास को बढ़ावा देने के लिए, जनता की नब्ज पर हाथ रखने में कामयाब होने के लिए, देश के जिन राजनीतिज्ञों की तारीफ की जाती है, अगर ध्यान दें तो वह तमाम, फेसबुक, ट्विटर, यहां तक कि एसएमएस का भी खुलकर इस्तेमाल करते हैं। विचारों की अभिव्यक्ति पर कोई बंदिश लगाने की बजाए, उसे विचारों के लेनदेन में बदलना क्या बेहतर नहीं है? सवाल नजरिये का है। एक तरफ इजराईल है, जिसके बारे में खबर है कि वह फिलीस्तीनी आज़ादी के लिए संघर्ष करने वालों के मुकाबिल अपना प्रचार करने के लिए सोशल नेट्वर्किंग साईट्स और इंटरनेट पर सक्रिय युवाओं की भर्ती कर रहा है, क्योंकि फिलीस्तीनी आज़ादी के लिए लड़ रहे लोग दुनिया को गाज़ा की दुश्वारियों के बारे में बताने के लिए सोशल नेट्वर्किंग  साईट्स का खुलकर इस्तेमाल कर रहे हंै, और इजराईल को डर है कि इनसे यहूदी विरोधी माहौल बन रहा है, जिसका सामना किया जाना जरूरी है। दूसरी तरफ एक जमे जमाए प्रजातंत्र में यह साईट्स आज अदालतों के कटघरे में खड़ी है, हालांकि यह बात सच है कि भारत में इन्हें अदालत तक सरकार नहीं खींच ले गई हैं, लेकिन ऐसे ही कानूनों की पैरवी वह पहले कर चुकी हैं। जहां तक आपत्तिजनक सामग्री का सवाल है उसके लिए जब देश में पहले ही  कानून बना हुआ है तब पहले सरकार का सोशल नेट्वर्किंग साईट्स और इंटरनेट पर सेंसरशिप लगाने की कोशिश करना ,और फिर अदालतों का यह रुख, क्या इतने सालों से प्रजातंत्र को सहेजने के बाद हमें यही पहुंचना था? क्या अपने बारे में किसी की राय सुनने से इंकार कर देना किसी समस्या का हल है?
फिर यह भी बात है कि  रोक लगाने की कोई सीमा नहीं होती। इस ताकत का इस्तेमाल करने के लिए जिस समझ-बूझ की जरूरत होती है, कानून पर अमल करवाने वालो की  लंबी जंजार में वह समझ कब कहा छूट जाए कोई नहीं कह सकता। इसके खतरे बहुत हैं- जनता के लिए भी और सरकार के लिए भी, लेकिन इमरजेंसी के अनुभवों से हमने देखा है कि अभिव्यक्ति को रोकने का बुरा अंजाम कुर्सी पर बैठे लोगों ने ही ज्यादा भुगता है। अवाम तो जीवन की जद्दोजहद की आदी है और अपने लिए वह एक नहीं तो दूसरा रास्ता निकाल ही लेती है। दिल्ली और राजकोट के मामलों पर अदालतें अपने फैसले सुनाएंगी। उनके फैसलों से सहमत न होने वालो के लिए देश की न्यायपालिका में आगे भी सुनवाई की व्यवस्था है। प्रजातंत्र की यही खासियत है कि यह जनता की व्यवस्था है, और उसे कानून के दायरे में अपनी बात आखिर तक करने का अधिकार संविधान ने दिया है। इस दायरे में उसकी, और कानून की हद पर विवाद हो सकता है, लेकिन अपनी बात कहने का हक तो फिर भी है ही!

पत्रकारिता और बाज़ार में सालगिरह


14 जनवरी 2012
विशेष संपादकीय

 सुनील कुमार

छत्तीसगढ़ के इस पुराने अख़बार की इस मौजूदा शक्ल के एक और बरस पूरे होने पर कुछ लिखना इसलिए मुश्किल है, कि अपने बारे में लिखना ठीक नहीं, और बाकी किसी मुद्दे के बारे में लिखने में हम कुछ घंटे की भी देर नहीं करते, मीडिया के बारे में हम आये दिन लिखते ही रहते हैं। लेकिन अख़बार की सालगिरह पर अखबारनवीसी के बारे में तो लिखने का मौका बनता है।
एक वक्त पत्रकारिता कहा जाता था, फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आ जाने से यह मीडिया हो गया, क्योंकि यह महज़ पत्र यानी अख़बार नहीं रह गया। फिर इंटरनेट के बढ़ते चले जाने से इसकी शक्ल, और अक्ल, दोनों बदल गए। आज सुबह एक अच्छे ब्रिटिश अख़बार में एक लेख पढ़ते हुए उस पर यह सूचना जगमगा रही थी कि कुछ घंटों के भीतर उसे 2800 लोग पढ़ चुके हैं। कल तक यह अख़बार महज कागज पर पढ़ा जाता था, और उसके रद्दी में चले जाने तक लोगों को यह पता भी नहीं चलता था कि उसमें पढऩे लायक क्या है, और कितने लोगों ने उसे पढ़ा है। लोग अपनी मर्जी से पढ़ते थे। अब  तकनीक और कारोबार ने मिलकर लोगों के दिमाग में यह भरना शुरू कर दिया है कि पढऩे लायक क्या है। किस मुद्दे पर, किस का लिखा हुआ, अधिक पढ़ा जाता है। इसे आज इंटरनेट के पन्नों पर एक काउंटर इस तरह गिनते चलता है जिस तरह किसी ऑटो का मीटर चलता हो। इसी हिसाब से उन पन्नों पर इश्तहार मिलते हैं। अख़बारों की बाजारू लड़ाई में अख़बार यह साबित करने में लगे रहते थे कि कौन सा पेपर अधिक छपता है, लेकिन अब तो किस खबर को, किस लेख को कितनों ने पढ़ा, यह भी हर किसी को साथ-साथ दिखते चलता है। इसने कल तक की अखबारनवीसी और आज के मीडिया की अक्ल भी बदल दी। अब कोई भी रिपोर्टर या स्तंभकार, लेखक, संपादक, टीवी प्रस्तुतकर्ता, अपने लिखे या किये को रात-दिन इंटरनेट पर बढ़ावा देते दिख जाते हैं। हिंदुस्तान के एक बड़े नामी-गिरामी इंग्लिश न्यूज़ चैनल के मुखिया का नाम लेकर अभी अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर लिखा, कि वे यह समझ नहीं पाए कि उसने अपने चैनल के कार्यक्रमों का प्रचार करने के लिए, उसके भेजे हुए ट्वीट को आगे फ़ैलाने की बात उनसे क्यों कही। दरअसल अमिताभ अगर उस चैनल के कार्यक्रमों की ट्वीट को अपने नाम से फिर ट्वीट कर देते, तो उनको पढऩे वाले 5-10 लाख लोग भी उस चैनल के कार्यक्रम के बारे में जान जाते, लेकिन एक निजी सन्देश को उजागर करके अमिताभ ने चैनल को शर्मिंदगी में डाल दिया। बहुत से दूसरे लोगों ने अमिताभ को कोसा कि वे ट्विटर की तहजीब नहीं जानते, लेकिन अमिताभ ने चाहे जो किया हो, चैनल ने जो किया वो? अभी कुछ दिन पहले ही अमिताभ अपनी फिल्म की रिलीज़ के ठीक पहले उसके प्रचार के लिए इस स्टूडियो गए थे। जब खुद का प्रचार चैनल से करवाया, तो अब चैनल की बारी है अपना प्रचार अमिताभ से करवाने की।
बाज़ार की ऐसी मारकाट के बीच सबसे अधिक नुकसान अगर किसी का हुआ है तो वह पत्रकारिता है। अख़बारों के छपने (बिकने की बात नहीं करनी चाहिए, क्योंकि मुकाबले में कितना बिकता है, कितना बंटता है, इसका हिसाब कोई नहीं लगा सकता), के आंकड़े, और टीवी समाचार चैनलों के दर्शकों की गिनती से अब मीडिया या पत्रकारिता की कामयाबी तय होती है। जिस तरह लोग पैसे वालों को बड़े लोग या अच्छे लोग कहने लगते हैं, उसी तरह अब अधिक गिनती वाले लोग बड़ा मीडिया कहलाते हैं। यह बड़ा कारोबार तो हो सकता है, लेकिन बड़ा अख़बार तो कोई अपनी साख से ही बन सकता है। गुलशन नंदा अगर प्रेमचंद से अधिक बिकने लगे, तो उससे प्रेमचंद छोटे लेखक नहीं हो जाते। लेकिन अगर साहित्य की उत्कृष्टता तय करने का काम सरकार में किताबें सप्लाई करने वाले बताने लगें, तो फिर प्रेमचंद की बारी कहाँ आयेगी? आज मीडिया के बाज़ार में यही हो रहा है।
जो लोग चीजों को अधिक बारीकी से देखकर समझते हैं, वे इस बारे में चर्चा भी करते हैं, लेकिन अपनी जिंदगी की लड़ाई में लगे अधिकतर लोगों के पास दूसरों के कारोबार में झाँकने का वक्त कहाँ? नतीज़ा यह है कि जिस अंदाज़ में अमिताभ अपनी फि़ल्में बेच रहे हैं, उससे अधिक फूहड़ अंदाज़ में मीडिया अपने को बेच रहा है। कभी-कभी हमें लगता है कि बहुत से बड़े-बड़े अख़बारों का अंदाज़ ऐसा होता है कि कार्यक्रमों को कराने के साथ-साथ वे अख़बार भी निकालते हैं। कुछ बड़े अख़बार देश में बड़े-बड़े कार्यक्रम ऐसी कंपनियों को प्रायोजक बनाकर करवा रहे हंै, जो कटघरों में खड़ी हैं, और जिनके खिलाफ मीडिया में बहुत लिखा जा रहा है, और जिनके जेल जाने के दिन करीब हैं।
अब वक्त है कि मीडिया के कारोबार वाले हिससे को पत्रकारिता से अलग करके देखा जाए।

फौजी ताकत से इंसानियत फिर शर्मसार



संपादकीय 
13 जनवरी 2012
अफगानिस्तान में तालिबानियों की लाशों के साथ अमरीकी फौजियों के आपत्तिजनक बर्ताव की दुनिया भर में निंदा हो रही है। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई, और अमरीकी रक्षा मंत्री लेओन पनेटा ने अमरीकी फौजियों की इस हरकत की कड़ी निंदा की है। पनेटा ने कहा है कि यह हरकत करने वाले अमरीकी फौजियों से इसका पूरा जवाब मांगा जाएगा। उन्होंने अमरीकी, और नाटो सेना के कमांडर की अगुवाई में इस घटना की जांच के आदेश भी दे दिए हैं। यह फूटेज बहुत ही संवेदनशील समय में आया है। यह ऐसे समय में आया है, जब नाटो की सेना 2014 में अफगानिस्तान से चले जाने का ऐलान कर चुकी है। अफगानिस्तान में उसके बाद हालात बिगड़े नहीं, इसके लिए नाटो और अफगान सरकार तालिबानियों के साथ बातचीत शुरू कर रही है। अब तक पिछले दरवाजों से हो रही यह कोशिशें, अब कतार में तालिबानियों को बातचीत के लिये एक दफ्तर जुट जाने के बाद से खुलकर सामने आ गई है। ऐसे में जब तालिबानियों को बस 2014 तक अपनी ताकत सम्हाल कर इंतज़ार ही करना, और उसके बाद कमजोर अफगान तंत्र पर टूट पडऩा भर बाकी रह जाता था। इस वीडियो का सामने आना अफगानिस्तान में सामान्य स्थिति की बहाली के लिए नुकसानदेह हो सकता है। इस वीडियो में खून से लथपथ एक तालिबानी लाश के साथ होने वाला दुव्र्यवहार अफगानिस्तान में तालिबानियों को नए लड़ाके जुटाने के लिए काफी हो सकता है। वहीं दूसरी ओर नाटो के दूसरे सदस्य देशों की नाराजगी, जिनेवा घोषणा और युद्ध के अंतरराष्ट्रीय नियम तोडऩे का इल्जाम अमरीका पर लग सकता है, वह अलग।

इसलिए अमरीकी रक्षा प्रतिष्ठानों ने तुरत-फुरत इस फूटेज में दिखाई गई घटना की निंदा कर डाली है। अबु गरीब जैसी घटनाओं के समय अमरीकी फौज की ज्यादतियों पर खामोश रहने वाले अमरीकी मीडिया का एक हिस्सा अब यह भी कह रहा है कि अच्छे बुरे लोग सब जगह होते हंै, सो फौज में भी हैं। ऐसी बातें भी कही जा रही हंै कि यह हरकत उन युवाओं ने की है, जिनके माता-पिता ने उन्हें सही परवरिश नहीं दी।  लेकिन इन सबके बीच एक बात जो गौर करने जैसी लग रही है, वह है किसी फौज की, किसी जगह लंबे समय तक तैनाती के मानसिक स्थितियों की। जब एक फौज किसी इलाके में तैनात की जाती है तो जाहिर तौर पर उस इलाके के लोगों को यह जताया जाता है कि वह कानून के दायरे में नहीं रहते, और उन्हें सही रास्ते पर रखने के लिए, या किसी विदेशी, बाहरी खतरे से उन्हें बचाने के नाम पर वहां फौज की तैनाती की गई है। ऐसी फौजों को किसी न किसी कारण लगातर हिंसा करनी पड़ती है, और कही न कहीं इंसानियत के प्रति फौजियों की संवेदनशीलता कम होते जाने की बहुत सी मिसालें दुनिया में जगह-जगह देखने को मिलती हैं। मारे गए तालिबानियों के साथ अमरीकी युवा फौजियों की हरकत ऐसी ही मानसिकता की मिसाल है। इसका फायदा दुनिया में अमरीकियों को निशाना बनाने के लिए उठाया जा सकता है। एक तालिबानी प्रवक्ता ने अमरीकियों पर अपने हमलों को जायज ठहराते हुए कहा भी है कि ऐसी हरकत अमरीकियों ने पहली बार नहीं की है, और उनके खिलाफ तालिबानियों के हमले जारी रहेंगे। अमरीकी ड्रोन हमलों के निशाने से ध्वस्त होकर, और अपने बड़े नेताओं के गिरफ्तार हो जाने के बाद टूटी कमर लेकर अमरीका से बात करने को राजी हुए तालिबानी आज तो यह कह रहे हंै कि, इस घटना से उनकी अपने  कैदियों को नाटो की गिरफ्त से छुड़ाने के लिए होने वाली बातचीत पर असर नहीं पड़ेगा, लेकिन क्या इस घटना के बाद तालिबानियों के साथ सौदेबाजी में नाटो का हाथ नीचे नहीं हो जाएगा?
इन सब बातों पर गौर करने पर यह अंदाज भी लगाया जा सकता है कि नाटो-तालिबान के बीच की बातचीत में, नाटो का पक्ष हलका करने के लिए इस समय जानबूझकर यह वीडियो जारी किया गया है। भारत में भी हम देखते हैं कि जब आतंकवादियों में से नर्मपंथियों के साथ सरकार बातचीत का कोई सिरा खोलती है, तो जन भावनाएं भड़काने वाली या सरकार को बचाव की मुद्रा में लाने वाली कोई घटना हो जाया करती है। हालांकि इस घटना में गलती अमरीकी फौज की दिखती है, और खुद अमरीकी विदेश मंत्री इस वीडियो की सच्चाई से  इंकार नहीं कर रहे हैं। अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भी कह रही हंै कि अमरीका इस घटना के निंदा करता है लेकिन इसके कारण वह किसी दबाव में आकर अपनी नीति नहीं बदलेगा। आज के मुश्किल हालात में जब परमाणु हथियारों से लैस पाकिस्तान राजनीतिक अस्थिरता की कगार पर खड़ा है, परमाणु शक्ति से सम्पन्न उत्तरी कोरिया की कमान एक कम उम्र, कम तजुर्बेकार तानाशाह के हाथ में आ गई है, इस वीडियो का सामने आकर ताकत संपन्न देशों को आतंकवादी गुटों के आगे कमज़ोर करना, दुनिया के लिए कोई अच्छे आसार पैदा नहीं करता। भारत के लिए खासकर यह चिंता की बात है कि उसके एक पड़ोसी देश में राजनीतिक अस्थिरता है तो दूसरे में यह वीडियो बम फूटा है।

दीवारों पर लिक्खा है,


छोटी सी बात


12 जनवरी 2012
छोटी सी बात
आम जगहों को आप जीतना साफ-सुथरा रखते हैं, उतनी ही अच्छी सीख आपको मां-बाप आपको दे पाए...

एनजीओ भूख का हौव्वा खड़ा करते हैं, और सरकार?


12 जनवरी 2012
संपादकीय
मशहूर अर्थशास्त्री अरविंद पनगढिय़ा ने कहा है कि भारत और अफ्रीका की भूख की बातें कर करके एनजीओ दौलतमंद बनते जा रहे हंै, लोगों की तकलीफों से उनका व्यापार बढ़ रहा है। बात सुनने में बहुत कड़वी लगती है,क्योंकि पिछले कुछ सालों से गैर सरकारी संगठन क्षेत्र के दखल, और सुझावों से ही गरीबों के लिए सरकारों ने बहुत मानवीय योजनाएं बनाई हंै, जैसे- नरेगा। छत्तीसगढ़ की खाद्य सुरक्षा योजना जिससे सीख लेकर केंद्र सरकार अब खाद्य सुरक्षा विधेयक लाने जा रही है। यही नहीं, सामाजिक और  सियासी फलक पर भी एनजीओ के दखल, और उनके कामों के कारण कौमी भेदभाव, जात-पांत का भेदभाव, कोख में बेटियों की हत्या, और विवादास्पद होने पर भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन ने जनता और सरकार दोनों को दिशा दी है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन जब अपने विषय का कोई बड़ा जानकार  ऐसी चुभती बात कहता है, तो उस पर गौर करना लाजिमी हो जाता है।
जनता की भलाई के लिए सरकारों की योजनाएं एनजीओ की मदद से सही तरीके से अंजाम तक पहुंच सकती हैं। वह समाज और सरकार के बीच कड़ी का काम करते हैं। सन 2000 में गुजरात में विनाशकारी भूकंप आने के बाद से देश में एनजीओ की तादाद बहुत बढ़ी, क्योंकि उस दौर में लोगों ने देखा कि मुसीबत में पड़ी जनता के लिए मदद जुटाने में एनजीओ कितने कारगर होते सकते हैं। प्रशिक्षित, विषयों के जानकार, और दिलों में जनता की सेवा करने का जज़्बा रखने वाले लोग समाज में बदलाव लाने के लिए क्या कुछ नहीं कर सकते। देश के कोने-कोने में ऐसे बहुत से एनजीओ हंै, जो बिना किसी शोर शराबे,  शोहरत की हसरत के, किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के बिना, संजीदगी से अपना काम करते रहते हैं। ऐसे संगठनों के कारण एनजीओ क्षेत्र को नाम विश्वसनीयता और इज़्ज़त मिली है,  लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। जहां तकलीफंे हंै और उन्हें दूर करने की जरूरत है वहां ऐसे लोगों के लिए मौके हैं। जिन्हें एनजीओ बनाने, उन्हें चलाने की जानकारी है, और वह यह काम करना चाहते हैं समाससेवा का बहुत बड़ा जज़्बा दिल में ना होने पर भी यह लोग पेशेवर अंदाज में, अपनी पढ़ाई-लिखाई को काम में लगाकर इस क्षेत्र में अपना कैरियर बनाते हैं, लेकिन जब लोगों की तकलीफंे किसी की रोजी रोटी का जरिया बन जाए, तो यह खयाल भी उभर सकता है कि तकलीफे नहीं रहेंगी, तो हमें पूछेगा कौन, या तकलीफों का खौफ खड़ा करके अपने पैरों तले जमीन मजबूत की जाए। बहुत से विवादास्पद एनजीओ के कारण आज लोग इन सगठनों पर हावी हो रही पांच सितारा संस्कृति के बारे में बात करने लगे हैं। भोपाल गैस त्रासदी हो या गुजरात भूकंप, या गुजरात  कौमी  दंगे, या फिर छत्तीसगढ़ समेत नक्सल प्रभावित राज्यों की समस्याएं। शक पैदा करने वाले  एनजीओ और उनकी भूमिका पर चर्चे गाहे-बगाहे होते ही रहे है। यही नहीं आतंकवादियों की मदद के लिए एनजीओ के इस्तेमाल पर भी सरकार की तेज नजर है।
हम अक्सर एनजीओ के खिलाफ कुछ लिखने में संयम बरतते हंै, क्योंकि मु_ीभर लोगों के कारण, वाकई गंभीरता से काम कर रहे बहुत से संगठनों के लिए जनता के दिल में शक पैदा हो, यह हम नहीं चाहते। लेकिन यह सच है कि पैसों का गलत इस्तेमाल करने वाले, समस्याओं को बढ़ा-चढ़ाकर बताकर सरकारी दान लेने वाले एनजीओ आखिरकार चलते तो जनता के पैसों से ही हैं। यही नहीं कार्पोरेट क्षेत्रों से बड़े-बड़े दान लेकर चल रहे एनजीओ भी आखिरकार तो जनता के पैसों से चलते हंै, क्योंकि इन कार्पोरेटों की शेयरधारक जनता है। यह जिन संसाधनों का इस्तेमाल करके धन बटोरते हंै, उन पर जनता का हक है, इसलिए हमारी यही उम्मीद रहती है कि एनजीओ के कामकाज में जितनी हो सके, पारदर्शिता बरती जाए। पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय में एक व्यक्ति ने एनजीओ को दिए जाने वाले पैसों के खर्च की जांच के लिए याचिका दायर की, तो सरकार की एक विकास एजेंसी कापार्ट ने अदालत को बताया कि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ जेहाद चलाए हुए अन्ना हजारे के अपने ट्रस्ट ने गांवों में सिंचाई के लिए मिले पैसों का 90 फीसदी आने-जाने, वेतन, और छपाई में ही खर्च कर दिया। एजेंसी को फिर भी इससे शिकायत नहीं, शायद इसलिए कि जनता का पैसा सबका पैसा होता है। एनजीओ की जवाबदेही और पारदर्शिता की जांच सरकार का काम है, क्योंकि वही इन्हें जनता के लिए बनाए गई अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों की जिम्मेदारी और उसे निभाने के लिए जनता के पैसे सौंपती है, लेकिन ऐसे संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वह अपनी पारदर्शिता बनाए रखे।
पनगढिय़ा ने जो बात कही है वह पारदर्शिता और जवाबदेही के इसी मुद्दे से जुड़ा दूसरा, और बहुत अहम मुद्दा है। अपने लिए बाज़ार तलाशने, आर्थिक फायदे के लिए किसी समस्या का हौव्वा खड़ा करने का आरोप अक्सर संगठनों पर लगाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य  संगठन पर पिछले बरसों में यह आरोप कई बार लगते रहा कि वह कुछ दवा कंपनियों के फायदे के लिए महामारियों का डर खड़ा कर रहा है। यही बात एड्स और भुखमरी के लिए काम कर रहे संगठनों पर अक्सर लगता रहता है। भारत में भुखमरी और गरीबी के आंकड़ों पर इस क्षेत्र में काम कर रहे संगठनों, खाद्य सुरक्षा पर अभियान चला रहे संगठनों का,  योजना आयोग से टकराव इन दिनों ज़ोरों पर है। इन संगठनों ने योजना आयोग को गरीबी की बहुत अपमानजनक सीमा वापस लेने पर मजबूर किया है, लेकिन कार्पोरेटों को लाखों-करोड़ों की रियायत देने वाली सरकार गरीबों की खाद्य सुरक्षा में कुछ हजार करोड़ के खर्च को बूते के बाहर बताकर इन संगठनों की बात न मानने पर तुली है। पनगढिय़ा एशियाई विकास बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री रह चुके हंै। उन्होंने विश्व बैंक और आईएमएफ में भी काम किया है, इसलिए भूख पर काम कर रहे संगठनों के बारे में उनकी राय, ऐसे संगठनों के लगातार निशाने पर बने हुए मॉंटेक सिंह अहलुवालिया से किसी हमदर्दी के कारण है, या उससे परे, यह तय करने का बीड़ा हम नहीं उठाते। यह सच है कि भूख मिटाने के लिए देश के संसाधनों में से ज्यादा हिस्सा मांग रहे समाजिक संगठन, योजना आयोग और वित्त मंत्रालय के आंख की किरकिरी बने हुए हैं, और यह भी सच है कि दुनिया में ऐसे भी एनजीओ जिन्होंने लोगों की तकलीफों को पैसे कमाने का जरिया बनाया है, पनगढिय़ा  के बयान को इन दोनों बातों की बिना पर तौलकर देखना होगा। लेकिन यह सच है कि अगर भूख पर शोर मचाने वाले एन जी नो नहीं होते तो, मॉंटेक सिंह 20 रुपये रोज को गरीबों के गुजारे के लिए काफी ठहरा चुके होते। और यह भी कि अगर एनजीओ भूख का हौव्वा खड़ा करके पैसे बना रहे हंै, तो इसकी जिम्मेदारी से सरकारें और ऐसे  बैंक नहीं बच सकते, जो जनता का पैसा उन्हें देकर उस पर नजर रखने की अपनी जिम्मेदारी से चूक जाते हैं।


दिमाग है कि मानता नहीं


संपादकीय
11 जनवरी 2012

एक लोकप्रिय गीत है- दिल है कि मानता नहीं, लेकिन लंदन में एक दिलचस्प शोध हुई है जिसके मुतबिक औरतों का दिमाग, उनके जिस्म  को आईने  में उसके  असल आकार के मुकाबले दो तिहाई ज्यादा फैसला हुआ दिखाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि शरीर की अपनी व्यवस्था तो हमें हमारे अंगों के बारे में सही जानकारी देती है, लेकिन यह हमारे  दिमाग  की शरारत है, कि आइने में हमें हमारा जिस्म मोटा दिखाता है। शोध करने वालों ने पाया कि यंू तो अपने शरीर को शीशे में असलियत से ज्यादा मोटा देखने की गलती सभी करते हंै, लेकिन औरतों में यह बात खासतौर पर पाई जाती है, लेकिन यूनिवर्सिटी कालेज ऑफ लंदन के वैज्ञानिकों ने जो बात खोजबीन करके कही है, क्या उसके फायदे खूबसूरती का बाजार अर्से से भुना नहीं रहा है? या कि बरसों से इस बाजार ने औरतों के दिमाग की जो वायरिंग की है, उसे जिस दिशा में दसियों सालों से धकेला है, उसका ही यह नतीजा है कि आज हमारा दिमाग हमें आईने में अपने असल आकार से मोटा समझने, हम जितने अच्छे दिखते हंै, उससे कमतर देखने के लिए भटका रहा है, ताकि हम उसे अपने मन माफिक बनाने के लिए खूबसूरती के बजार के हाथों खेलें, क्रीम लोशन या कास्मेटिक सर्जन के चाकू की धार का सामना करें।
एक पुरानी कहावत है- आईना झूठ नहीं बोलता। लंदन के वैज्ञानिकों ने  अब बताया है कि दरअसल यह दिमाग है, जो झूठ बोलता है। इस शोध के सतही और गहरे दोनों लिहाज  से मायने निकाले जा सकते हंै। ट्विटर पर फैशन इंडस्ट्रीज़ नाम के पेज पर पोस्ट किया गया एक ट्वीट हमारे समाज में इस शोध की जडं़े बताता है-- मंै फैशन इंड्स्ट्री हंू, जो औरतों को आज़ादी की राह से भटकाकर उन्हें दिमागी और जिस्मानी तौर पर पूरी तरह गुलाम बना देती है। खूबसूरत दिखने की चाह, जैसे है उससे बेहतर दिखने की चाह में कुछ गलत नहीं, लेकिन उसके पीछे लगाई जाने वाली बेदिमाग  दौड़, जिसके लिए आज भारत के महानगरों से लेकर गांव-देहात के कस्बों तक लकीरे खींची जा चुकी हैं, खतरनाक है। एक के बाद एक देश ने कुछ सौंदर्य  साम्राज्ञियां  दुनिया को दीं ,और 42 फीसदी कुपोषित देश पूरी तरह खूबसूरती के व्यापारियों की झोली में आ गिरा। अब बाजार के जानकार कह रहे हंै कि 2014 तक भारत का पहले से ही तेज़ी से बढ़ रहा खूबसूरती का उद्योग 50 फीसदी और ज्यादा हो जाएगा। इनका कहना है कि ऐसा लोगों ने स्वच्छता और अपनी छवि के प्रति जागरुकता आने के कारण होगा। सुनने में यह बातें मासूम लगती हंै, जो किसी भी इंसान के लिए बुरी नहीं हो सकती, लेकिन यह जागरुकता किस कीमत पर, किन नैतिक धरातलों पर और कैसे, और किस हद तक आ रही है, यह सोचना भी जरूरी है। टी वी खोलते ही विज्ञापन दिखाते हंै कि किस  तरह एक सांवली आबादी को महज गोरा बना देने से उसकी  समस्याएं सुलझ जाती हंै। शैम्पू, टूथ पेस्ट, साबुन के विज्ञापनों में बताया जाता है कि इन्हें बनाने के दुनिया भर के कितने जहीन लोगों का ज्ञान उंडेला गया है, लेकिन इन उत्पादों के निर्माता उन्हें कितनी ईमानदारी से बनाते हैं, यह जांचने वाला कौन है ?
गोरी चमड़ी के लिए क्रीम, लोशन, आंखों के लिए कॉंटेक्ट लेंस, और शरीर को बार्बी डॉल जैसा बनाने के लिये देश के छोटे  छोटे कस्बाई शहरों में भी लोगों के जिस्मों पर चलते कास्मेटिक सर्जनों के नश्तर आम हैं। पिछले दिनों एक रिपोर्ट में बताया गया कि किस तरह रायपुर जैसे छोटे कस्बाई शहर में भी लोग लाखों  रुपये खर्च करके अपने रूप, रंग,जिस्म  का कायाकल्प करवा कर अपनी समस्याए सुलझाने की कोशिशें कर रहे हंै, लेकिन इन कास्मेटिक  सर्जरियों के लंबे समय के नुकसान के बारे में अपने उपभोक्ताओं को जागरुक करने की इन पर कोई बंदिश नहीं है। अमरीका में कम उम्र से ही लड़कियों में सौन्दर्य प्रसाधनों के इस्तेमाल का चलन बढ़ गया है। अपनी कदकाठी छोड़ वह साईज जीरो या बार्बी जैसी अस्वाभाविक काया हासिल करने के लिए भूखी मरती, गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाती हंै, कोई कोई तो मर भी जाती हैं। दुनिया में पूंजीवाद के प्रतीक वालमार्ट के प्रवक्ता का कहना है कि उनका स्टोर मेकअप के सामान बेचता है, लेकिन उन्हें किस उम्र की बच्चियों के लिए खरीदना है, यह फैसला माता-पिता का है। इस बाजार की देन ऐसे  माता-पिता हंै जो अपनी  बच्चियों को परीकथाएं सुनाने की उम्र में लेडी  गागा की मिसालें देते हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुए है जब अमरीका में खुद को मानव बार्बी कहने वाली, अब तक अपने ऊपर दस लाख पाऊंड की कास्मेटिक सर्जरी करवा चुकी 51 बरस की सारा बर्ज ने अपनी 7 साल की बेटी की फरमाईश पर उसे ब्रेस्ट इम्प्लांट वाऊचर जन्मदिन पर भेंट में दिया। इस  लालसा को कुरदने और हवा देने के लिए आए दिन होने वाली सौंदर्य स्पर्धाएं, फैशन शो, और फैशन पत्रकारिता जैसे हथियार इस बाजार के हाथियार हैं। और इस बाजार का निशाना कौन है? एक ऐसी दुनिया ,जो एड्स ,गरीबी, और भुखमरी जैसी समस्यओं से जूझ रही है, जहां एक बीमारी खत्म होती नहीं कि दूसरी सिर उठा लेती हंै, ऐसी दुनिया में खुद को और ज्यादा खूबसूरत देखने की जि़द लिए बैठा दिमाग नई-नई तरह की असमनाताएं पैदा कर रहा है। जब सेहत पर होने वाले खर्च का हिसाब लगा कर दुनिया के जहीन यह समझा रहे हंै कि स्वास्थ्य गया, तो बहुत कुछ गया, और सेहत, विकास की चिंताओं में अहम् बन चुकी है, खूबसूरती का बाज़ार  मानव बल की  सेहत, सौन्दर्य प्रसाधनों की कीमत पर बिक्री कर की तरह वसूल ले रहे हंै। अमरीकी सरकार ब्रेस्ट इम्पलांट कारण सेहत का खतरा उठा रही 30 हजार महिलाओं का दोबारा ऑपरेशन कर यह सिलिकॉन इम्प्लांट्स अपने खर्च पर उनके जिस्म से निकलवा रही हंै लेकिन भारत जैसे देश में, जहां भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़तों से सरकारों का बेदरकारी का इतिहास रहा है ऐसे किसी खतरे से जनता के हिफाज़त कौन करेगा? भारत ही नहीं, बहुत से विकासशील देशों की व्यवस्थाओं में ऐसी बहुत सी खामियां हंै जो इस बाज़ार को उसकी जवाबदेही से छूट जाने की आज़ादी दे देती हैं। और दुख की बात यह है कि इस बाज़ार का निशाना ऐसे ही देश ज्यादा है ऐसे में  दिमाग को सही रास्ते पर चलाना, उसे ऐसा बनाए रखनाकि इंसान को सचाई देखने दे, एक बड़ी चुनौती है।