पत्रकारिता और बाज़ार में सालगिरह


14 जनवरी 2012
विशेष संपादकीय

 सुनील कुमार

छत्तीसगढ़ के इस पुराने अख़बार की इस मौजूदा शक्ल के एक और बरस पूरे होने पर कुछ लिखना इसलिए मुश्किल है, कि अपने बारे में लिखना ठीक नहीं, और बाकी किसी मुद्दे के बारे में लिखने में हम कुछ घंटे की भी देर नहीं करते, मीडिया के बारे में हम आये दिन लिखते ही रहते हैं। लेकिन अख़बार की सालगिरह पर अखबारनवीसी के बारे में तो लिखने का मौका बनता है।
एक वक्त पत्रकारिता कहा जाता था, फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आ जाने से यह मीडिया हो गया, क्योंकि यह महज़ पत्र यानी अख़बार नहीं रह गया। फिर इंटरनेट के बढ़ते चले जाने से इसकी शक्ल, और अक्ल, दोनों बदल गए। आज सुबह एक अच्छे ब्रिटिश अख़बार में एक लेख पढ़ते हुए उस पर यह सूचना जगमगा रही थी कि कुछ घंटों के भीतर उसे 2800 लोग पढ़ चुके हैं। कल तक यह अख़बार महज कागज पर पढ़ा जाता था, और उसके रद्दी में चले जाने तक लोगों को यह पता भी नहीं चलता था कि उसमें पढऩे लायक क्या है, और कितने लोगों ने उसे पढ़ा है। लोग अपनी मर्जी से पढ़ते थे। अब  तकनीक और कारोबार ने मिलकर लोगों के दिमाग में यह भरना शुरू कर दिया है कि पढऩे लायक क्या है। किस मुद्दे पर, किस का लिखा हुआ, अधिक पढ़ा जाता है। इसे आज इंटरनेट के पन्नों पर एक काउंटर इस तरह गिनते चलता है जिस तरह किसी ऑटो का मीटर चलता हो। इसी हिसाब से उन पन्नों पर इश्तहार मिलते हैं। अख़बारों की बाजारू लड़ाई में अख़बार यह साबित करने में लगे रहते थे कि कौन सा पेपर अधिक छपता है, लेकिन अब तो किस खबर को, किस लेख को कितनों ने पढ़ा, यह भी हर किसी को साथ-साथ दिखते चलता है। इसने कल तक की अखबारनवीसी और आज के मीडिया की अक्ल भी बदल दी। अब कोई भी रिपोर्टर या स्तंभकार, लेखक, संपादक, टीवी प्रस्तुतकर्ता, अपने लिखे या किये को रात-दिन इंटरनेट पर बढ़ावा देते दिख जाते हैं। हिंदुस्तान के एक बड़े नामी-गिरामी इंग्लिश न्यूज़ चैनल के मुखिया का नाम लेकर अभी अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर लिखा, कि वे यह समझ नहीं पाए कि उसने अपने चैनल के कार्यक्रमों का प्रचार करने के लिए, उसके भेजे हुए ट्वीट को आगे फ़ैलाने की बात उनसे क्यों कही। दरअसल अमिताभ अगर उस चैनल के कार्यक्रमों की ट्वीट को अपने नाम से फिर ट्वीट कर देते, तो उनको पढऩे वाले 5-10 लाख लोग भी उस चैनल के कार्यक्रम के बारे में जान जाते, लेकिन एक निजी सन्देश को उजागर करके अमिताभ ने चैनल को शर्मिंदगी में डाल दिया। बहुत से दूसरे लोगों ने अमिताभ को कोसा कि वे ट्विटर की तहजीब नहीं जानते, लेकिन अमिताभ ने चाहे जो किया हो, चैनल ने जो किया वो? अभी कुछ दिन पहले ही अमिताभ अपनी फिल्म की रिलीज़ के ठीक पहले उसके प्रचार के लिए इस स्टूडियो गए थे। जब खुद का प्रचार चैनल से करवाया, तो अब चैनल की बारी है अपना प्रचार अमिताभ से करवाने की।
बाज़ार की ऐसी मारकाट के बीच सबसे अधिक नुकसान अगर किसी का हुआ है तो वह पत्रकारिता है। अख़बारों के छपने (बिकने की बात नहीं करनी चाहिए, क्योंकि मुकाबले में कितना बिकता है, कितना बंटता है, इसका हिसाब कोई नहीं लगा सकता), के आंकड़े, और टीवी समाचार चैनलों के दर्शकों की गिनती से अब मीडिया या पत्रकारिता की कामयाबी तय होती है। जिस तरह लोग पैसे वालों को बड़े लोग या अच्छे लोग कहने लगते हैं, उसी तरह अब अधिक गिनती वाले लोग बड़ा मीडिया कहलाते हैं। यह बड़ा कारोबार तो हो सकता है, लेकिन बड़ा अख़बार तो कोई अपनी साख से ही बन सकता है। गुलशन नंदा अगर प्रेमचंद से अधिक बिकने लगे, तो उससे प्रेमचंद छोटे लेखक नहीं हो जाते। लेकिन अगर साहित्य की उत्कृष्टता तय करने का काम सरकार में किताबें सप्लाई करने वाले बताने लगें, तो फिर प्रेमचंद की बारी कहाँ आयेगी? आज मीडिया के बाज़ार में यही हो रहा है।
जो लोग चीजों को अधिक बारीकी से देखकर समझते हैं, वे इस बारे में चर्चा भी करते हैं, लेकिन अपनी जिंदगी की लड़ाई में लगे अधिकतर लोगों के पास दूसरों के कारोबार में झाँकने का वक्त कहाँ? नतीज़ा यह है कि जिस अंदाज़ में अमिताभ अपनी फि़ल्में बेच रहे हैं, उससे अधिक फूहड़ अंदाज़ में मीडिया अपने को बेच रहा है। कभी-कभी हमें लगता है कि बहुत से बड़े-बड़े अख़बारों का अंदाज़ ऐसा होता है कि कार्यक्रमों को कराने के साथ-साथ वे अख़बार भी निकालते हैं। कुछ बड़े अख़बार देश में बड़े-बड़े कार्यक्रम ऐसी कंपनियों को प्रायोजक बनाकर करवा रहे हंै, जो कटघरों में खड़ी हैं, और जिनके खिलाफ मीडिया में बहुत लिखा जा रहा है, और जिनके जेल जाने के दिन करीब हैं।
अब वक्त है कि मीडिया के कारोबार वाले हिससे को पत्रकारिता से अलग करके देखा जाए।

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