भारत चीन हो सकता है?


संपादकीय
15 जनवरी 2012

कल अपनी सालगिरह पर पत्रकारिता और बाजार में अपनी मौजूदगी की जब हम बात कर रहे थे, तो अपने नए  साल की शुरुआत करते वक्त भी  हमारे सामने ऐसी दो खबरें थीं  जो इस दिशा में अपना कूच, अपनी कोशिशें जारी रखने की ज़रूरत साबित करती हंै- एक,भारत की अदालतों की, फेसबुक और गूगल पर चीन की तर्ज पर कार्रवाई की धमकी, तो दूसरी राजकोट में एक अखबार में नये साल की दावत मनाते पुलिस की आला अफसर की तस्वीर छापने पर, एक बड़े अखबार समूह के रिपोर्टरों और वरिष्ठ संपादकों की गिरफ्तारी। दिल्ली की अदालतों ने गूगल समेत 21 कंपनियों को बुलाकर कहा है कि वह ऐतराज के काबिल सामग्री अपनी साईट्स से हटाए, वर्ना चीन की तर्ज पर उन पर यहां भी रोक लगाई जाएगी। यह चेतावनी उन तमाम सायबर कानूनों के अलावा दी जा रही है, जिनके तहत सजा देने का प्रवधान देश का कानून में पहले ही किया जा चुका है। दिल्ली की अदालत की इस बात पर कपिल सिब्बल खुश हो सकते हंै, लेकिन एक प्रजातांत्रिक देश में चीन की मिसाल देकर उसकी राह पर चलना हमारे लिए कितना ठीक होगा, यह गौर करने लायक बात है।
गूगल, फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्किंग  साईट्स लोगों को एक-दूसरे से बातें करने का मौका देती हैं। सामने कोई मौका हो, तो उसका फायदा अलग-अलग तरीके से उठाने वाले लोग भी मिल जाते हैं, लेकिन क्या इसमे उस मौके में खामी ढूंढना सही होगा? इन सोशल नेट्वर्किंग साईट्स पर लोग क्या बोल रहे हंै,क्या पोस्ट कर रहे हैं, उसे नियंत्रित करना तकनीकी रूप से आज भारत में धमकाई जा रही कंपनियों के लिए कितना मुमकिन है, इसका जवाब वह देश की अदालतों को देंगी, लेकिन यह बोलने की आज़ादी ही तो है, कि दिग्विजय सिंह अपनी पार्टी और सरकार  के रुख के खिलाफ बटला हाऊस एनकाऊंटर  को फर्जी करार दे रहे हंै, और कांग्रेस के प्रवक्ता कह रहे हंै कि यह उनके दल के भीतर का आंतरिक प्रजातंत्र है। अगर ऐसा है, तो यह कांग्रेस के तय करने की बात है कि उसे किस नेता को बोलने की कैसी, और कितनी आज़ादी देनी है, और यह जनता के तय करने की बात है कि वह इस मामले में किसको, कितना सही मानती है। इसी तरह सोशल नेट्वर्किंग साईट्स पर, देश के सायबर कानूनों की हद में आ रही सामग्री पर किस तरह प्रतिक्रिया देनी है, यह तय करने का हक क्या इसके उपभोक्ताओं का नहीं है ?  प्रजातंत्र के 6 दशक के बाद ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में, क्या हमारे  पास चीन की तरफ ताकने के अलावा कोई  रास्ता नहीं बचा है?  हम यह मानते हंै कि एक-दूसरे से बोलने, बात करने की आजादी पर कोई कटौती लादने के अपने खतरे हो सकते हंै, देश में पहले ही इंटरनेट और सायबर पर रखी जाने वाली सामग्री के लिए कानून बने हुए हंै। इन्हें तोडऩे वालों के खिलाफ सख्ती करने के रास्ते कानून पर अमल करने वाली एजेंसियों के पास पहले से हंै, लेकिन किसी  भी बहाने विचारों का गला घोंटने से पहले इमरजेंसी के दिनों की याद कर लेनी चाहिए- यह हरकत जिनकी आवाज दबाई गई उनके साथ, और जिन्होंने आवाज़ दबाई, उनके लिए भी बुरी साबित हुई थी।
राजकोट की घटना में पुलिस अधिकारी की तस्वीर एक प्रेमी युगल के साथ छापने के एवज में अखबार के कर्मियों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस का कहना है कि अखबार ने जानबूझकर एक प्रेमी युगल के साथ पुलिस की आला अफसर, और उनके पति की तस्वीर छापकर अशिष्ट संकेत देने की कोशिश की। क्या शिष्ट है, क्या अशिष्ट , किसी ने क्या संकेत देने की कोशिश की, इन मसलों पर बहुत बारीकी से सोचने, और फैसले लेने की जरूरत पड़ती है। लेकिन गुजरात के एक कस्बाई शहर में एक अखबार, और दिल्ली की अदालत में सोशल नेट्वर्किंग के जरिये अभिव्यक्ति की आज़ादी देने वाले दिग्गजों का, सत्ता के जिस मिजाज़  से  सामना हो रहा है,  उससे अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए कैसा संकेत मिल रहा है, इस पर गौर करने की जरूरत है। अच्छे बुरे को  तौलने के लिए हम एक व्यापक और उदार नजरिये के हामी हैं, और हमारा मानना है कि ऐसा एक दूसरे के साथ बात करके ज्यादा आसानी से, बेहतर तरीके से किया जा सकता है। हमारी नजर में संवाद, सख्ती से बेहतर विकल्प है। विकास को बढ़ावा देने के लिए, जनता की नब्ज पर हाथ रखने में कामयाब होने के लिए, देश के जिन राजनीतिज्ञों की तारीफ की जाती है, अगर ध्यान दें तो वह तमाम, फेसबुक, ट्विटर, यहां तक कि एसएमएस का भी खुलकर इस्तेमाल करते हैं। विचारों की अभिव्यक्ति पर कोई बंदिश लगाने की बजाए, उसे विचारों के लेनदेन में बदलना क्या बेहतर नहीं है? सवाल नजरिये का है। एक तरफ इजराईल है, जिसके बारे में खबर है कि वह फिलीस्तीनी आज़ादी के लिए संघर्ष करने वालों के मुकाबिल अपना प्रचार करने के लिए सोशल नेट्वर्किंग साईट्स और इंटरनेट पर सक्रिय युवाओं की भर्ती कर रहा है, क्योंकि फिलीस्तीनी आज़ादी के लिए लड़ रहे लोग दुनिया को गाज़ा की दुश्वारियों के बारे में बताने के लिए सोशल नेट्वर्किंग  साईट्स का खुलकर इस्तेमाल कर रहे हंै, और इजराईल को डर है कि इनसे यहूदी विरोधी माहौल बन रहा है, जिसका सामना किया जाना जरूरी है। दूसरी तरफ एक जमे जमाए प्रजातंत्र में यह साईट्स आज अदालतों के कटघरे में खड़ी है, हालांकि यह बात सच है कि भारत में इन्हें अदालत तक सरकार नहीं खींच ले गई हैं, लेकिन ऐसे ही कानूनों की पैरवी वह पहले कर चुकी हैं। जहां तक आपत्तिजनक सामग्री का सवाल है उसके लिए जब देश में पहले ही  कानून बना हुआ है तब पहले सरकार का सोशल नेट्वर्किंग साईट्स और इंटरनेट पर सेंसरशिप लगाने की कोशिश करना ,और फिर अदालतों का यह रुख, क्या इतने सालों से प्रजातंत्र को सहेजने के बाद हमें यही पहुंचना था? क्या अपने बारे में किसी की राय सुनने से इंकार कर देना किसी समस्या का हल है?
फिर यह भी बात है कि  रोक लगाने की कोई सीमा नहीं होती। इस ताकत का इस्तेमाल करने के लिए जिस समझ-बूझ की जरूरत होती है, कानून पर अमल करवाने वालो की  लंबी जंजार में वह समझ कब कहा छूट जाए कोई नहीं कह सकता। इसके खतरे बहुत हैं- जनता के लिए भी और सरकार के लिए भी, लेकिन इमरजेंसी के अनुभवों से हमने देखा है कि अभिव्यक्ति को रोकने का बुरा अंजाम कुर्सी पर बैठे लोगों ने ही ज्यादा भुगता है। अवाम तो जीवन की जद्दोजहद की आदी है और अपने लिए वह एक नहीं तो दूसरा रास्ता निकाल ही लेती है। दिल्ली और राजकोट के मामलों पर अदालतें अपने फैसले सुनाएंगी। उनके फैसलों से सहमत न होने वालो के लिए देश की न्यायपालिका में आगे भी सुनवाई की व्यवस्था है। प्रजातंत्र की यही खासियत है कि यह जनता की व्यवस्था है, और उसे कानून के दायरे में अपनी बात आखिर तक करने का अधिकार संविधान ने दिया है। इस दायरे में उसकी, और कानून की हद पर विवाद हो सकता है, लेकिन अपनी बात कहने का हक तो फिर भी है ही!

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