दिमाग है कि मानता नहीं


संपादकीय
11 जनवरी 2012

एक लोकप्रिय गीत है- दिल है कि मानता नहीं, लेकिन लंदन में एक दिलचस्प शोध हुई है जिसके मुतबिक औरतों का दिमाग, उनके जिस्म  को आईने  में उसके  असल आकार के मुकाबले दो तिहाई ज्यादा फैसला हुआ दिखाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि शरीर की अपनी व्यवस्था तो हमें हमारे अंगों के बारे में सही जानकारी देती है, लेकिन यह हमारे  दिमाग  की शरारत है, कि आइने में हमें हमारा जिस्म मोटा दिखाता है। शोध करने वालों ने पाया कि यंू तो अपने शरीर को शीशे में असलियत से ज्यादा मोटा देखने की गलती सभी करते हंै, लेकिन औरतों में यह बात खासतौर पर पाई जाती है, लेकिन यूनिवर्सिटी कालेज ऑफ लंदन के वैज्ञानिकों ने जो बात खोजबीन करके कही है, क्या उसके फायदे खूबसूरती का बाजार अर्से से भुना नहीं रहा है? या कि बरसों से इस बाजार ने औरतों के दिमाग की जो वायरिंग की है, उसे जिस दिशा में दसियों सालों से धकेला है, उसका ही यह नतीजा है कि आज हमारा दिमाग हमें आईने में अपने असल आकार से मोटा समझने, हम जितने अच्छे दिखते हंै, उससे कमतर देखने के लिए भटका रहा है, ताकि हम उसे अपने मन माफिक बनाने के लिए खूबसूरती के बजार के हाथों खेलें, क्रीम लोशन या कास्मेटिक सर्जन के चाकू की धार का सामना करें।
एक पुरानी कहावत है- आईना झूठ नहीं बोलता। लंदन के वैज्ञानिकों ने  अब बताया है कि दरअसल यह दिमाग है, जो झूठ बोलता है। इस शोध के सतही और गहरे दोनों लिहाज  से मायने निकाले जा सकते हंै। ट्विटर पर फैशन इंडस्ट्रीज़ नाम के पेज पर पोस्ट किया गया एक ट्वीट हमारे समाज में इस शोध की जडं़े बताता है-- मंै फैशन इंड्स्ट्री हंू, जो औरतों को आज़ादी की राह से भटकाकर उन्हें दिमागी और जिस्मानी तौर पर पूरी तरह गुलाम बना देती है। खूबसूरत दिखने की चाह, जैसे है उससे बेहतर दिखने की चाह में कुछ गलत नहीं, लेकिन उसके पीछे लगाई जाने वाली बेदिमाग  दौड़, जिसके लिए आज भारत के महानगरों से लेकर गांव-देहात के कस्बों तक लकीरे खींची जा चुकी हैं, खतरनाक है। एक के बाद एक देश ने कुछ सौंदर्य  साम्राज्ञियां  दुनिया को दीं ,और 42 फीसदी कुपोषित देश पूरी तरह खूबसूरती के व्यापारियों की झोली में आ गिरा। अब बाजार के जानकार कह रहे हंै कि 2014 तक भारत का पहले से ही तेज़ी से बढ़ रहा खूबसूरती का उद्योग 50 फीसदी और ज्यादा हो जाएगा। इनका कहना है कि ऐसा लोगों ने स्वच्छता और अपनी छवि के प्रति जागरुकता आने के कारण होगा। सुनने में यह बातें मासूम लगती हंै, जो किसी भी इंसान के लिए बुरी नहीं हो सकती, लेकिन यह जागरुकता किस कीमत पर, किन नैतिक धरातलों पर और कैसे, और किस हद तक आ रही है, यह सोचना भी जरूरी है। टी वी खोलते ही विज्ञापन दिखाते हंै कि किस  तरह एक सांवली आबादी को महज गोरा बना देने से उसकी  समस्याएं सुलझ जाती हंै। शैम्पू, टूथ पेस्ट, साबुन के विज्ञापनों में बताया जाता है कि इन्हें बनाने के दुनिया भर के कितने जहीन लोगों का ज्ञान उंडेला गया है, लेकिन इन उत्पादों के निर्माता उन्हें कितनी ईमानदारी से बनाते हैं, यह जांचने वाला कौन है ?
गोरी चमड़ी के लिए क्रीम, लोशन, आंखों के लिए कॉंटेक्ट लेंस, और शरीर को बार्बी डॉल जैसा बनाने के लिये देश के छोटे  छोटे कस्बाई शहरों में भी लोगों के जिस्मों पर चलते कास्मेटिक सर्जनों के नश्तर आम हैं। पिछले दिनों एक रिपोर्ट में बताया गया कि किस तरह रायपुर जैसे छोटे कस्बाई शहर में भी लोग लाखों  रुपये खर्च करके अपने रूप, रंग,जिस्म  का कायाकल्प करवा कर अपनी समस्याए सुलझाने की कोशिशें कर रहे हंै, लेकिन इन कास्मेटिक  सर्जरियों के लंबे समय के नुकसान के बारे में अपने उपभोक्ताओं को जागरुक करने की इन पर कोई बंदिश नहीं है। अमरीका में कम उम्र से ही लड़कियों में सौन्दर्य प्रसाधनों के इस्तेमाल का चलन बढ़ गया है। अपनी कदकाठी छोड़ वह साईज जीरो या बार्बी जैसी अस्वाभाविक काया हासिल करने के लिए भूखी मरती, गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाती हंै, कोई कोई तो मर भी जाती हैं। दुनिया में पूंजीवाद के प्रतीक वालमार्ट के प्रवक्ता का कहना है कि उनका स्टोर मेकअप के सामान बेचता है, लेकिन उन्हें किस उम्र की बच्चियों के लिए खरीदना है, यह फैसला माता-पिता का है। इस बाजार की देन ऐसे  माता-पिता हंै जो अपनी  बच्चियों को परीकथाएं सुनाने की उम्र में लेडी  गागा की मिसालें देते हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुए है जब अमरीका में खुद को मानव बार्बी कहने वाली, अब तक अपने ऊपर दस लाख पाऊंड की कास्मेटिक सर्जरी करवा चुकी 51 बरस की सारा बर्ज ने अपनी 7 साल की बेटी की फरमाईश पर उसे ब्रेस्ट इम्प्लांट वाऊचर जन्मदिन पर भेंट में दिया। इस  लालसा को कुरदने और हवा देने के लिए आए दिन होने वाली सौंदर्य स्पर्धाएं, फैशन शो, और फैशन पत्रकारिता जैसे हथियार इस बाजार के हाथियार हैं। और इस बाजार का निशाना कौन है? एक ऐसी दुनिया ,जो एड्स ,गरीबी, और भुखमरी जैसी समस्यओं से जूझ रही है, जहां एक बीमारी खत्म होती नहीं कि दूसरी सिर उठा लेती हंै, ऐसी दुनिया में खुद को और ज्यादा खूबसूरत देखने की जि़द लिए बैठा दिमाग नई-नई तरह की असमनाताएं पैदा कर रहा है। जब सेहत पर होने वाले खर्च का हिसाब लगा कर दुनिया के जहीन यह समझा रहे हंै कि स्वास्थ्य गया, तो बहुत कुछ गया, और सेहत, विकास की चिंताओं में अहम् बन चुकी है, खूबसूरती का बाज़ार  मानव बल की  सेहत, सौन्दर्य प्रसाधनों की कीमत पर बिक्री कर की तरह वसूल ले रहे हंै। अमरीकी सरकार ब्रेस्ट इम्पलांट कारण सेहत का खतरा उठा रही 30 हजार महिलाओं का दोबारा ऑपरेशन कर यह सिलिकॉन इम्प्लांट्स अपने खर्च पर उनके जिस्म से निकलवा रही हंै लेकिन भारत जैसे देश में, जहां भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़तों से सरकारों का बेदरकारी का इतिहास रहा है ऐसे किसी खतरे से जनता के हिफाज़त कौन करेगा? भारत ही नहीं, बहुत से विकासशील देशों की व्यवस्थाओं में ऐसी बहुत सी खामियां हंै जो इस बाज़ार को उसकी जवाबदेही से छूट जाने की आज़ादी दे देती हैं। और दुख की बात यह है कि इस बाज़ार का निशाना ऐसे ही देश ज्यादा है ऐसे में  दिमाग को सही रास्ते पर चलाना, उसे ऐसा बनाए रखनाकि इंसान को सचाई देखने दे, एक बड़ी चुनौती है।

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