संपादकीय
16 जनवरी 2012
ट्यूनिशिया से शुरू हुई अरब क्रांति को एक बरस पूरा हो गया है। ट्यूनिशिया से शुरू हुई अरब क्रांति मिस्त्र में मोहभंग के दौर से गुजरती दिख रही है, और एक तानशाह से निजात पाकर प्रजातंत्र अपनाने की मिस्त्र के लोगों की इच्छाओं पर सेना और इस्लामी कट्टरपंथियों के काबिज होने की खबरें आ रही हैं। दूसरी तरफ लोकतंत्र का त्यौहार जिसे कहा जाता है, वह चुनाव भारत में पांच राज्यों में होने जा रहे है। तब राजनीतिक पार्टियों का प्रजातंत्र के लिए रवैया और चुनावी कवायद देखना अपने आपमें इस हिसाब से दिलचस्प है कि इतने बरसों बाद भी राजनीतिक दल मतदाताओं को प्रजातंत्र के लिए कितना तैयार, कितना सयाना समझते हंै। उत्तराखंड से लेकर गोवा तक जहां भी देख लें राजनीतिक दलों का बर्ताव देखकर लगता है कि उन्हें मतदाता के सयाने ना होने का पूरा इत्मीनान है। चुनावी कार्यक्रम जारी होते ही करोड़ों रुपयों का काल धन पकड़ाया जाना आम खबर हो गई है। चुनाव आयोग की सख्ती जितनी बढ़ती जा रही है कालेधन के इस्तेमाल के लिए नेताओं का दिमाग भी उतनी ही तेज़ी से काम करने लगा है। निजी वाहनों से कालाधन जब्त करने की घटनाओं ने उन्हें इसकी हेरफेर के लिए अब बैंकों की एटीएम गाडिय़ों का इस्तेमाल करने की अक्ल दे दी है।जाति धर्म के समीकरणों के साथ-साथ अपनी कमज़ोरियों को शहादत में बदलने की नेताओं की चालाकी देखते ही बनती है। मायावती अपने राजनीतिक दल बहुजन समाज पार्टी को जन आंदोलन कह रही है। यह ऐसा जन आंदोलन है जिसके नेता की वसीयत पर अमल करने के लिए उन्होंने जनता के हक के करोड़ों रुपये पत्थर की मूर्तियां बनवाने में खर्च कर दिए, जबकि उनके राज में बच्चे देश में सबसे ज्यादा कुपोषित रह गए हंै। अब चुनावों के पहले जब चुनाव आयोग ने इन बुतों को कपड़े से ढंकने का देश दिया तो मायावती के तेज दिमाग का चर्चा हो रहा है कि किस तरह उन्होंने 2012 के चुनावों का खयाल कर के 2007 से ही अपनी पार्टी के प्रतीक और अपने बुत बनवाने शुरू कर दिए। चुनाव आयोग के इस फैसले को मायावती दलित विरोधी बताती हैं। एक मामूली क्लर्क की बेटी से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी माया जाहिर तौर पर कोई 88 करोड़ की मालकिन बताई जाती हैं। एक ऐसे राज्य में जहां दलितों पर हिंसा के मामले 2009 और 2010 में सबसे ज्यादा हुए, चुनाव आयोग पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाने वाली मुख्यमंत्री इस बारे में कोई जवाब देना ठीक नहीं समझती कि अभी दस साल पहले उसमें से ही निकालकर बनाया गया उत्तराखंड विकास के मामले में उससे बहुत आगे कैसे है? क्यों उनके राज्य में कुपोषित बच्चों की तादाद सबसे ज्यादा है? क्यों एक सख्त महिला मुख्यमंत्री होने का दम भरने वाली इस नेता के राज्य में महिलाओं के साथ देश में सबसे ज्यादा हिंसा होती है? वह खुद के भ्रष्टाचार के खिलाफ होने का सुबूत इस बात से देती है कि उन्होंने सैकड़ों अफसरों का बात की बात में तबदला कर दिया। 21 मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया, और आधे से ज्यादा मौजूदा विधायकों का टिकिट काट दिया। चुनावी पंडित इसे माया की चित भी मेरी पट भी मेरी बताते हुए कह रहे हैं कि किस तरह, माया दस हजार करोड़ के एन एच आर एम घोटाले से भी फायदा उठाने की सूझबूझ रखती है, किस तरह उन्होंने केवल उतने ही विधायकों की टिकिट काटी जो बहुत कम मतों से जीते थे, और किस तरह मौका मिलते ही वह अपने बहुजन दल को सर्वजन में बदलने की ताकत रखती है। चुनावी माहौल में "टीना"( देयर इज़ नो ऑल्टर नेटिव) और मीता ( माया इस द ऑल्टर्नेटिव) जैसे लफ्ज उछाले जा रहे हैं। मायावती की जवाबदेही तय करने की बात कहीं नहीं होती। उन पर वार करने वाली कांग्रेस और उसके नेता मौका पड़ते ही उसके साथ सरकार रचने को तैयार बैठे बताए जाते हंै। आय के मुकाबले ज्यादा दौलत इक_ी करने के लिए उनके खिलाफ मामले को संसद में मुश्किल घड़ी में सरकार की नैया पार करने की पतवार की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
यह सब इसलिए किया जाता है क्योंकि राजनीतिक दल और उनके नेताओं को जनता के लाचार होने का पूरा इत्मीनान है। संविधान में किए गए प्रावधानों को किस तरह तोड़ मरोड़कर अपनी तरफ वोट बैंक राजनीति की जाए, इसकी जुगत में राजनीतिक दल लगे हुए हैं। यह सोच कि संविधान को चुनावी फायदे के लिए तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है, कभी खतरनाक भी हो सकती है। कानून मंत्री जैसे उदारवादी,कानून के जानकार माने जाने वाले नेता के बयानों को देखकर इसका अन्दाज लगाया जा सकता है, लेकिन 60 बरस के जनतंत्र में क्या मतदाता इस खतरे को भांपने को तैयार हो सका है? बिकाऊ खबरों को कोसने वाले देश से कोई यह जवाब भी तो मांगे कि उसे बिकाऊ खबरें पढ़कर वोट दे देने वाला क्यों समझता जाता है? हमने बार-बार लिखा है कि लोकतंत्र अनमोल है, इसका पता इसका बेजा इस्तेमाल करने वालों को उस दिन लगेगा, जब इस अंधेरगर्दी से त्रस्त जनता अपना नसीब जंगलों में फैले किसी आंदोलन को थमा देगी, और वह कंगारू अदालतों में इतने बरसों की आजादी का मर्सिया पढ़ डालेगा। उत्तर प्रदेश हो या मणिपुर, उत्तराखंड हो या गोवा अलग-अलग राज्यों की समस्या अलग-अलग हो सकती है, लेकिन मतदाताओं का सामना नेताओं के एक जैसे बर्ताव से है। बिहार के विधानसभा चुनावों में मतदाताओं ने धर्म और जाति के आधार पर खुद को मूर्ख बनाए जाने की कांग्रेस और राजद की कोशिशें नाकाम की थीं। यह सच है कि बहुमत की आवाज सुनने वाली व्यवस्था में अपनी जति और सम्प्रदाय के साथ खड़ा होने में मतदाता को ज्यादा सलामती लगती होगी, लेकिन अरब देशों, उत्तरी कोरिया, म्यांमनार , चीन की जनता की हालत देखकर यह समझ में आता है कि अपनी सलामती से बड़े मुद्दे जो हमारे सामने हंै उन पर भी उसे गौर करना चाहिए। चुनाव में हिसाब तो स्थानीय मुद्दों पर मांगना चाहिए, लेकिन नजर व्यापक मुद्दों पर हो, तो प्रजातंत्र को मजबूत करने में मतदाता अपना योगदान कर सकेंगे।
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